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Saturday, 21 April 2018

साहिल ने ठुकराया मुझको

ये अन्जान राहें घेर लेती हैं मुझको
तेरी सदा झकझोर देती है मुझको

नहीं कोई अपना जाएँ तो जाएँ हम कहाँ
जिंदगी भी चुपके से क्या कह जाती मुझको

मुझे कोई गिला न शिकवा है किसी से
बुझता चिराग हूँ रोशनी की तलाश मुझको

क्यों सबकी निगाहें गैरों सी लगती हैं
सहारा न कोई साहिल ने ठुकराया मुझको
@मीना गुलियानी 

Friday, 20 April 2018

मगर बात नहीं होती है

कैसे कहदूँ कि मुलाक़ात नहीं होती है
मिलते वो रोज़ हैं पर बात  नहीं होती है

वो कभी भूले से भी पूछते जो हाल मेरा
दिन तो कट जाता है पर रात नहीं होती है

तुम कभी भूले से भी आइना देखा न करो
खुद पे मिट जाना बड़ी बात नहीं होती है

चुपके दुनिया से पहरों आँसू हम बहाते हैं
कब इन आँखों से बरसात नहीं होती है

गर वो सामने आ जाएँ तो पूछें हम कैसे
नज़रें मिलती हैं मगर बात नहीं होती है
@मीना गुलियानी







Thursday, 19 April 2018

सच्चा होना चाहिए

जिंदादिली से सफ़र तय होना चाहिए
ख़ुशी से जीवन ये बसर होना चाहिए

जिंदगी में कई लोग मिल जायेंगे
खुद में कोई हुनर होना चाहिए

प्यार किस्मत में तुमको मिले न मिले
बेवफ़ा न मगर कभी होना चाहिए

दिल लगाके  दगा न करना कभी
इरादा दिल में सच्चा होना चाहिए
@मीना गुलियानी 

Wednesday, 18 April 2018

जीतना सीख लिया

ऐ गम की परछाइयों
तुम दूर रहो मुझसे
मेरा पीछा करना छोड़ो
मेरा तुम्हारा मेल नहीं
मैंने अब जीना सीख लिया
घुट घुट के बहुत जी लिए
अब कड़वे घूँट पीके भी
मैंने जीना सीख लिया
सागर में मौजो के हाथों में
पतवार ही जब सौंप दी
फिर तूफां से डर कैसा
मंझधार से तैरना सीख लिया
नीला अंबर मेरा प्रहरी बना
बिजली मुझे राह दिखाती है
हर मोड़ पे ग़म की बदली
मुझे देखके अब घबराती है
डर लगता नहीं किसी हार से
हर हार  से जीतना सीख लिया
@मीना गुलियानी

Tuesday, 17 April 2018

खुशहाल बनाओ तुम

चहुँ ओर मचा है हाहाकार
बर्बादी का मचा है तांडव
नौजवानों जागो तुम
अब निद्रा को त्यागो तुम
शिवजी का डमरू भी बोले
डम डम डम हर हर भोले
अब तो अलख जगाओ तुम
आगे कदम बढ़ाओ तुम
मर्यादा हो रही तार तार
हर तरफ है भ्रष्टाचार
स्त्री की मर्यादा रहे सुरक्षित
दहेज का कलंक मिटाओ तुम
कहाँ  है अब वो देश हमारा
कहते थे जिसे हम सोन चिरैया
अब वीणा की तान भी टूटी
कैसे होगा ता ता थैया
अब वीणा के  तार कसो  तुम
नारी की पीड़ा को हरो तुम
तुम पर है सबको भरोसा
देश को खुशहाल बनाओ तुम
@मीना गुलियानी

करना चाहती हूँ

मैं अपने अन्तर  के
अन्धकार को भेदकर
प्रकाश पुंज को
पाना चाहती हूँ
इड़ा पिंगला सुषुम्ना
का संगम मैं स्वयं
खुले नेत्रों से
देखना चाहती हूँ
अनहद का नाद
सुनना चाहती हूँ
त्रिकुटी के अमृत
का स्वाद भी
चखना चाहती हूँ
उस अनन्त में
 खुद को विलीन
करना चाहती हूँ
@मीना गुलियानी 

Sunday, 15 April 2018

फिर कोई महत्व नहीं

संघर्ष भरा हो जब जीवन
 टूटा हुआ हो जिसका मन
उसके आगे सुख सागर का
रह जाता कोई महत्व नहीं

जब मन किसी का आहत हो
किसी के अप्रिय वचनों से
फिर बाद में बोले मृदु वचन
मन होगा कभी संतुष्ट नहीं

कहने को सभी अपने बनते
पर दुःख में साथ नहीं देते
फिर सुख में बने संबंधी जो
उस रिश्ते का औचित्य नहीं

जब फसलें सूखे जल के बिन
धरती की छाती भी फट जाए
फिर बरसे अंबर से पानी
उसका फिर कोई महत्व नहीं
@मीना गुलियानी