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Thursday, 18 January 2018

दर्द सब बेअसर हो गए

आप जाने किधर खो गए
दुनिया में तन्हा हम हो गए

रात काटे ये कटती नहीं
दिन भी अब ज़हर हो गए

याद में तेरे छलनी जिगर
हर नज़र चश्मे तर हो गए

ज़ुल्म तो हम पे होते रहे
हादसों के शहर हो गए

ख़्वाब पलकों पे जो थे सजे
जिंदगी पे वो क़हर हो गए

मत पूछो मेरा  हाले दिल
दर्द सब बेअसर हो गए
@मीना गुलियानी 

Wednesday, 17 January 2018

महल हमारे न टूट जाएँ

जिंदगी के फैसले जाने क्या हो जाएँ
यादों के सिलसिले जुड़ें या टूट जाएँ

वक्त की हलचल बनी हुई सी है
जाने कब किस मोड़ पे ले जाए

हर कदम सोचकर हम बढ़ा रहे हैं
मंजिल पे कदम न कहीं डगमगाएं

गैरों की बातों का शिकवा नहीं है
अपनों के अफ़साने हमको रुलाएं

हकीकत में हर लम्हा हँसके बिताया
ख्वाबों के महल हमारे न टूट जाएँ
@मीना गुलियानी 

Monday, 15 January 2018

मित्र वही कहलाता है

जो मित्र की पीड़ा देखके
आँखों से अश्रु बहाता है
मित्र वही कहलाता है

फ़टी बिवाई सुदामा की
अश्रुजल से धुलवाता है
मित्र वही कहलाता है

जो उसके तप्त हृदय को
 स्नेह से सहलाता है
मित्र वही कहलाता है

जो आहत मन की पीड़ा को
प्रेम से अपने मिटाता है
मित्र वही कहलाता है

जिसका हृदय परपीड़ा में
तुरंत द्रवित हो जाता है
मित्र वही कहलाता है

रूखे सूखे भात छीनके
बड़े चाव से खाता है
मित्र वही कहलाता है
@मीना गुलियानी 

Friday, 12 January 2018

रोते चेहरे भी मुस्कुराते हैं

हर पल डर हमें सताता है
कभी समाज का डर
कभी असफल होने का डर
अकेले हो जाने का डर
रिश्ते टूटने का डर
नाकारा साबित होने का डर
निर्णय से चूकने का डर
हम डर पर विजय पा सकते हैं
भावनाओं को नियंत्रित करके
तो लगेगा अँधेरे से निकले हैं
उजाले में आ पहुँचे हैं
किसी पहाड़ की चोटी पर हैं
या किसी पेड़ की छाँव में हैं
नदी की कल कल ध्वनि
पेड़ के पत्तों की सरसराहट
चिड़ियों का कलरव होना
ओस की बूंदों का गिरना
सब मन को लुभाता है
खुशियों के पल लौट आते हैं
प्रकृति से हम जुड़ जाते हैं
रोते चेहरे भी मुस्कुराते हैं
@मीना गुलियानी 

Thursday, 11 January 2018

दूर हो हर उलझन

मैंने महसूस की ओस की ताज़गी की छुअन
मिट्टी पर गिरी पहली बूंदों की वो सिहरन

पेड़ों की शाखाओं पर चिड़ियों की चहकन
 कोमल फूलों के प्रस्फुटन में डूबा ये मन

चाँद की चाँदनी में नहाकर अलसाया यौवन
इठलाता इतराता हुआ मधुर नेह का बंधन

मन का मदमाता हुआ प्रकृति से संगम
पक्षियों के कलरव में जुड़ने का उपक्रम

मन को सुकून देता है ये सुरम्य वातावरण
ईश्वर की चित्रकारी का होता है हमें दर्शन

हर  पीड़ा शमन करता आत्मिक उद्बोधन
अनुभूतियों में उतरकर दूर हो हर उलझन
@मीना गुलियानी 

Tuesday, 9 January 2018

प्रेम का एहसास देते हैं

कुछ रिश्ते अनायास ही जुड़ जाते हैं
एक कच्चे धागे से ही बँध जाते हैं

ज़रूरत नहीं होती झूठी रिवायतों की
न ही इन्हें परम्पराओं में कसने की

ज़रूरत नहीं होती रोपने और सींचने की
ज़रूरत नहीं पड़ती खोखले रिवाज़ों की

फिर भी ये रिश्ते वटवृक्ष जैसे पनपते हैं
मन को सुकून प्रेम का एहसास देते हैं
@मीना गुलियानी 

Monday, 8 January 2018

भूली दास्ताँ लिख रहा हूँ

रफ़्ता रफ़्ता याद में खोकर
भूली दास्ताँ लिख रहा हूँ

कहने को तो भीड़ बहुत है
 फिर भी तन्हा लिख रहा हूँ

तुमने पूछा है हाल जो मेरा
ख़ुद को अच्छा लिख रहा हूँ

हुई है रोशन तुमसे दुनिया
चंदा तुमको लिख रहा हूँ

इस ज़मीं से दूर फ़लक तक
तेरा आशियाँ लिख रहा हूँ

महक घुली है साँसो में तेरी
उसकी ऊष्मा लिख रहा हूँ
@मीना गुलियानी