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Tuesday, 20 February 2018

साहिल बना दिया

आसान नहीं था आकाश अपना तलाशना
आसान नहीं था मन का रास्ता नापना
क्योकि हर नज़र प्रश्न पूछ रही थी
उस पर मेरी खामोशी जुबान बन गई
मेरी हसरतों ने मुझे बेज़ार कर दिया
मंझधार को ही अपना साहिल बना दिया
@मीना गुलियानी



अपने घर जा रही है

लगता है कोई आवाज़ आ रही है
कुछ इशारे से मुझे समझा रही है

दिन ढल गया रात आई सोना है
मगर तेरी तस्वीर क्यों गा रही है

मैंने जीने की नई राह चुनी थी
वो मेरे करीब क्यों आ रही है

रात के दामन पे लिखे थे ख़्वाब
तेरी याद आके क्यों तड़पा रही है

सितारे छिपने लगे सूरज उगने लगा
लगता है चाँदनी अपने घर जा रही है
@मीना गुलियानी 

Monday, 19 February 2018

अपनी आगोश में समेटती है

मैं तुम्हें देखकर अनगिनत बातें सोचता हूँ
जिन्हें यह जिंदगी सुनिश्चित करती है
जिसकी उदास हवा में गीत दम तोड़ते हैं
एक खामोशी गुमनामी में सफर करती है

केवल रह गईं हैं यादें गुज़रे पलों की
गर्मियों की तन्हा रातें और चाँदनी
बेवजह हम दोनों एक दूसरे को ताकते
खो जाते बिखरे हुए पलों को समेटते

तुम्हारे कानों में हौले से कुछ कहना
जो लहरा के नज़्म बन जाते हैं
दूर से आती आवाज़ें सपनों में ढलती हैं
चाँदनी अपनी आगोश में समेटती है 
@मीना गुलियानी



Friday, 16 February 2018

अपनी तस्वीर उकेरता हूँ

अपनी किताब का पन्ना पलटता हूँ
एक और बसंत सा खिलता है
झरना सा झरने लगता है मुझमें
और मेरे मन के इस उपवन में
अनगिनत रंगों के फूल खिलते हैं
बारिश की बूँदें पत्तों पर गाती हैं
फूलों की खुशबु मन को लुभाती है
सुख दुःख की व्यथा भी सुनाती है
तन्हाई की यादें आँसुओं में ढलती हैं
मेरी अँगुलियाँ रेत पर थिरकती हैं
जिस पर अपनी तस्वीर उकेरता हूँ
@मीना गुलियानी 

Thursday, 15 February 2018

सपनों में गुनगुनाती हो

कभी कभी भीड़ में भी मन
नितान्त अकेला ही होता है
मन के कोने में छिपा दर्द
अचानक जाग सा उठता है
रिस रिस कर नस नस में
धड़कन बन बहता रहता है
कभी तुम मुझे भी पहचानो
हर पल तुम्हारी आवाज़ को
मैं हमेशा तरसता रहता हूँ
तुम्हारी परछाईं मुझे छूती है
 अंधेरों में ग़ुम हो जाती है
मैं तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ
नींद मुझे आगोश में लेती है
तुम सपनों में गुनगुनाती हो
@मीना गुलियानी 

Wednesday, 14 February 2018

उसे भी जीने दो

मेरी बेटी अक्सर मुझसे सवाल करती है
हमें दूसरे घर में विदा क्यों करते हो
क्यों नहीं अपने ही आँगन में रहने देते
क्यों नहीं इसी आँगन के फूल को
इसी बगिया में ही खिलने देते
क्या दूँ मैं उत्तर इस प्रश्न का
कितने ही यत्न से सभी माँ बाप
बेटी को पाल पोसकर बड़ा करते हैं
कितना ममत्व देते हैं फिर भी
अपने कलेजे के उसी टुकड़े को
दिल पर पत्थर रख परायों को सौंप देते हैं
बेटियों को यही शिक्षा दी जाती है
दोनों घरों की लाज उसे ही रखनी है
घर में बेटा बेटी दोनों होते हैं
बेटे से माँ बाप को कोई अपेक्षा नहीं होती
बेटी सदैव उनके सुख दुःख में साथ निभाती है
बेटा तो अपनी शादी के बाद पराया हो जाता है
बेटी पराये घर जाकर भी इस घर की
चिंता में विलीन रहती है
माँ बाप की रग रग से वाकिफ होती है
दुःख की खबर पाते ही दौड़ी चली  आती है
बेटा पास होकर भी बेख़बर होता है
उसका ध्यान कहीं और बँटा होता है
बेटी को पराया धन मत समझो
उसे भी खूब प्यार दुलार दो शिक्षा दो ,संबल दो
ताकि समय आने पर वो
 अपने परिवार का ध्यान रख सके
उसे बोझ न समझो स्वावलम्बी बनाओ
खुली हवा में सांस लेने दो उसे भी जीने दो
@मीना गुलियानी


Tuesday, 13 February 2018

चिंताएँ कभी खत्म होंगीं

क्या जीवन की चिंताएँ कभी खत्म होंगीं
हर व्यक्ति के साथ क्या उम्र भर रहेंगीं

सुबह सुबह से ही खाने पीने की चिन्ता
फिर नहा धोकर दफ्तर जाने की चिंता

बच्चों को स्कूल छोड़ आने की चिन्ता
ऐसे कब तक ये चिंता दिमाग में पलेगी

दफ्तर से आते ही घर में मचा रोना धोना
बच्चों के झगड़े बीबी के कमेंट पास होना

बनिये का बिल कभी दूध वाले का बिल
कभी राशन धोबी और डाक्टर का बिल

हालत हो जाए खस्ता आमदनी से ज़्यादा खर्चा
भरूँ मैं कहाँ से बिजली और पानी का खर्चा

जितनी कमाई करो पड़  जाए वो खटाई में
कुछ जाए उधार कुछ दर्ज़ी की सिलाई में

पड़ौसी भी मांगे उधार काम वाली को बुखार
घर पर टी वी मोबाइल का नेटवर्क भी बेकार
@मीना गुलियानी