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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

Meri nayi kitaab 'Bikhare Panne' se liye gaye kuch Ansh (Book Available on Amazon.in)

तुम्हारी याद


न जाने क्यों तुम्हारा स्मरण होते ही भर आते है नैना मेरे
वो सागर वो  नदी का किनारा लो अब छूटा साथ तुम्हारा

ख़ुशी से बीते वो क्षण अब स्वप्न बन विचरते है
आँखों में सीप के मोती की तरह अश्रु  निकलते है

दिल का कोई कोना सूना पड़ गया परछाई बाकी है
इक चिंगारी दबी रह गई जो कभी  सुलग पड़ती है

थामकर हवाओ का दामन मैने इक खता  की
जिसकी मुझे सज़ा मिली हवाओ के झोंके से

वो दामन भी मुझसे अब छूट गया सांस बाकी है
न जाने कब दिल की धड़कन बंद हो जाये

और तमन्नायें दिल की सिसकती रह जाएं
 याद तुम्हारी दिल की दिल में ही रह जाए




जुदाई का दर्द


जुदा तुमसे होके जो करार दिल को न आये तो क्या करूँ
तुम्ही कहदो  कैसे तुम्हारा ख्याल दिल से जुदा करूँ
हर पल तुम मेरी नज़रो में समाये रहते हो
फिर भी तुम्हे देख न पाऊँ तो क्या करूँ
 तुम ओझल न होते हुए भी ओझल हो
दिल कहीं  और लग न पाये तो क्या करूँ
किससे कहूँ दास्ता मै अपनी
तुम्ही जो समझ न पाओ तो क्या करूँ
हाले दिल तो सबसे कहा नही जाता
तुम देखने न आओ तो क्या करूँ
तुम बिन जिंदगी वीरान है उजड़ा है चमन
जो तुम बहार न लाओ तो मै क्या करूँ
न जाने कब तुम मेघ बनकर बरसोगे
करार दिल जो न पाये तो क्या करूँ
दिन यूं ही कटता है रात रोते बीती है
मार डालेगा ये इंतज़ार में क्या करूँ



माँ शिशु


नन्हा शिशु मचल रहा था
अपनी माँ का ममत्व पाने को
धीरे धीरे घुटनों के बल रेंगकर
आया अपनी माँ के पास
माँ ने चुपके से आँखे बंद कर ली
तो शिशु रोमांचित हो उठा
लगा वो किलकारी भरने
धीरे से फिर  की गोद में लेटा
माँ ने उसे देखा, चूमा
पुलकित हो लगी स्तनपान कराने
शिशु भी दुलारने लगा माँ को
कभी कभी शरारत से अपने
नख और दाँत चुभोता उसके वक्ष में
माँ की हल्की सिसकारी को सुन
वो और प्रफुल्लित होता माँ
फिर उसे सीने से लगाती
थपकी दे प्यार से लोरी गाती



गुड़िया रानी


उछल रहे थे भालू बंदर
कब डमरू की ताल पे
गुड़िया रानी भागी आई
लगी झपकने पलको को

उनको देख देख खुश होती
बंदर मामी जब रूठ जाती
बंदर की शांमत आ जाती
फिर क्रोधित हो उसे घुड़कता
तब गुड़िया का जिया धड़कता


वो बंद कर लेती आँखों को
अपने नन्हे नन्हे हाथो से
भालू मामा उसे हंसाता
नाच नाच कर शोर मचाता


गुड़िया करती ता ता थैया
कहती झूमो नाचो भैया



वियोग


आज है फ़िज़ा उदास उदास
वीरान सी चुपचाप
दीवारे ख़ामोशी से घूर रही है
बहारो की रंगत किसी ने चुरा ली है
आँखों से निंदिया उडा  ली है
पिया बिन सब सूना पड़ गया
श्याम बिना जैसी सूनी ब्रज की गलियाँ
पेड़ से जैसी टूटी हुई कलियाँ
फूलो का जैसे मुरझाया हुआ रंग
वही आज है पी -बिन मेरे संग
कोयल की कूक , पवन की मस्ती
दिल की बस्ती, सब है वीरान
 गुमसुम शोक में डूबा हुआ है जहाँ





दिल की तमन्ना


दिल को तेरी ही तमन्ना और आरजू है
तू और किसी का हो जाए ये बात हमे मंजूर नही
कहदो कि तुम मेरे हो और रहोगे
अगर अब न कहोगे तो कब कहोगे
तेरे इकरार करने से मुझे तसल्ली होगी
तेरे इंकार से दुनिया ही अँधेरी होगी
तू ही तो मेरा चिराग है मै तेरी शमा हूँ
बिन तेरे तो मै इक बुझता दिया हूँ
तू ही मेरा सब्रो करार  तू ही नसीब मेरा
तुझसे जुदा होकर जिऊँ मै कैसे
बतादो मुझको मेरी जान ऐसे
कि तुम न कभी मुझसे जुदा थे न होंगे
तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे




तेरी याद


आज फिर दिल में इक उमंग सी उठ आई है
न जाने क्यों फिर से तेरी याद चली आई है

कभी कभी तो ये बहुत ही सताती है
कभी कभी तो ये बहुत ही रुलाती है
कभी तेरी बात पे हंसी मुझे आई है
न जाने क्यों तेरी हर अदा मुझे भाई है

तेरे शानो पे सर रखके मेरा सोना
तेरा मुझपे झुकना  ख्यालो में खोना
तेरे हाथो का उठना गेसू का बखर जाना
तेरा यूं तकना और मेरा शर्मा जाना
जाने क्यों प्रीत ने कली दिल की महकाई है




प्रेम का बंधन


केसा है ये प्रेम का बंधन
जिसमे बंध गया आज मेरा मन
जो पहले मुक्त गगन में
पंछी बन विचरता था
अब एक पिंजरे में कैद हो गया है
लेकिन ये कैद भी न मालूम
क्यों सुखद लगती है
पंछी को पिंजरे से मोह हो गया है
कितना विरोधाभास है
किन्तु ये सच है
उसे जिस मंजिल की तलाश थी
वो उसे मिल गई है
और अपने पाँव में खुद
उसने जंजीरे बांध ली है




चुप्पी



तुमसे कहना तो बहुत कुछ है , सोचती हूँ पर क्या कहूँ
जब तुम मन की हालत न समझो तो बेहतर है चुप रहूँ
ख़ामोशी ही असर करगी बोलकर क्यों बेअसर करूँ
तुमने न बोलने की कसम खाई क्यों ये गवारा करूँ
ये तन्हाई का सफर लम्बा है अकेले कैसे तय करूँ
जो तुम साथ चलो मेरे हमनशीं  तो मौत से भी न डरूँ
क्यों रुस्वा होने को छोड़ जाते हो कहीं  बेमौत न मै मरूँ
जब हमसफ़र बने तो तेरी बाँहों में ही क्यों न मरूँ
न तड़पता छोड़ यूँ मुझे क़यामत की घड़ी से मै डरूँ




बेवफा या बावफा


तुझे बेवफा कहना चाहती हूँ लेकिन
समझ में आता नही बेवफा या बेवफा कहूँ
तूने दिल का चैन चुराया
नींदे लूटी है रातो की
दिल के सोये अरमा जागे
खिल गई कलियाँ बागो की
लेकिन इसके बाद जो रूठा
लगा जैसे नैया से  किनारा छूटा
दिल के अरमा दबा दिए मैने
इक चुप्पी सी साध ली मैने
तेरे दूर जाने पर भी
न मुमकिन हुआ मुझे भूलना
तेरी ही यादो से सराबोर रहती हूँ
तेरे ख्यालो में खोकर सोचती हूँ
कि तुझे बेवफा कहूँ या बावफा कहूँ






बहारो के सपने


बहारो के सपने टूटकर बिखर गए
राह में राही मिले बिछुड़ गए

मंजिल न मिली भटके हुए कदम
छालों से रिस गए

जीवन में नकाब ओढ़े हुए
चलते चलते ठिठक गए

किसी अजनबी का साथ मिला भी तो
मोड़ गया गुज़र गए

सदके किसी के जिंदगी की भी तो
निर्मोही जाने किधर गए




लगन तुमसे लगा बैठे


लगन  तुमसे लगा बैठे जो होगा देखा जाएगा
तुम्हे अपना बना बैठे जो होगा  जाएगा

दीवाने बन गए तेरे तो फिर दुनिया से क्या मतलब
जो सबसे दिल हटा बैठे जो होगा देखा जाएगा

तुम्हारी बेरुखी से दिल ये मेरा टूट जाएगा
जीवन तुम पर लुटा बैठे जो होगा देखा जाएगा

कभी दुनिया से डरते थे छुप छुप याद करते थे
है अब पर्दा उठा बैठे जो होगा देखा जाएगा




काले मेघ घिर आये




काहे काले मेघ घिर आये
मोरा जिया क्यों देख हुलसाए
बुझी न तपन फिर भी
पपीहा तू क्यों पीहू पीहू गाये

मोर नाचने लगा आँगन
बिजली को हुआ कम्पन
नैनो की बरसात रिमझिम
पिया की याद सताए

सखी बंधनवार मत बांधो
कहि भेद न सारा खुल जाए
न भाये आज बदरिया काली
रहती जो पिया संग मतवाली

झूमती तितली रस पी डाली डाली
फूल देख भंवरा ललचाये
न जाने मोरे पिया न आये
मोरा मनवा क्यों घबराये

कैसे भेजूँ उसे संदेश न जानू
क्या लिखूँ पाती में न जानू
इक विरहन सरिता के किनारे
न जाने क्यों प्यासी रह जाए

पिघला जाए हे मोम सा तन
दीपशिखा की प्रज्वलित लौ
कहीं अनायास न बुझ जाए
न जाने क्यों मोरे पिया न आये




प्रतीक्षारत


उस अपरिचित स्वर का सम्मोहन फिर  मन को छूने लगा
फिर बांसुरी की तान पर आलाप प्रकृति में विलीन हुआ
उसकी सांसो का कम्पन मेरे हृदय का स्पंदन
उस वातावरण में तीव्र हुआ मेरी पलको का मूंदना
फ़िज़ा का खामोश होना लगा जैसे दूर कोई सरिता
किसी वीरान तट से मिलने को आतुर हो उठी है
उसने सब  तोड़ दिया मुझे अपने में समेट  लिया
रोम रोम से जैसे झरना फूट पड़ा लगा डूब जाउंगी
पता नही क्यों फिर भी तपती बालू रेत सी रीती रही
आखिर वो इक झोका ही तो था जो मुझे छूकर चला गया
दे गया अपनी यादे जी रही हूँ आश्वासनों पर
,मेरी  देह जर्जर हो चुकी है पर मन तो चिर युवा है
युगो युगो से उसकी राह में आँखे बिछाए प्रतीक्षारत हूँ




मौत - मेरी महबूबा

आ मेरी महबूबा
तेरी काली परछाई में
मै छुप जाऊँ
तेरे हाथो से
इस बेदर्द दुनिया से
मुक्त हो जाऊं
न जाने कबसे मैने
तेरे अाने की लौ लगाई है
जालिम तू कितनी देर से आई है
तेरी राह में  जर्जर देह हो गई
नेत्र ज्योति क्षीण हो गई
कंचनकाया मटमैली हो गई
दुनिया के दुखो से दिल
घबरा गया है आ मुझे अब
अपने आँचल की पनाह दे
अपनी गोद में माँ के समान
लोरी गाकर चिरनिद्रा में
सदा के लिए सुला दे









आत्मनिवेदन



अपने विषय में ज्यादा क्या लिखूँ  यही कहना चाहूंगी कि  एक मध्यम वर्गीय परिवार में दिल्ली में मेरा
जन्म हुआ फिर विवाहोपरांत जयपुर के ही होकर रह गए।   हिंन्दी साहित्य में मैने एम  ए  किया.
बाल्यकाल  से ही मेरी रूचि खेल कूद में कम हिन्दी साहित्य पढ़ने में अधिक  रही। लगभग सभी उच्च
श्रेणी के लेखको की पुस्तके मैने पढ़ी।   मेरे प्रिय उपन्यासकार शरतचन्द्र जी, प्रेमचंद जी , विमल मित्र जी थे
तथा कवियों में सूरदास जी, जयशंकर प्रसाद जी की रचनाये मुझे अधिक प्रिय है।

मुझे कविताये , भजन , लघुकथा आदि लिखने का  शौक बचपन से था। सन 2009  में सरकारी सेवा से
वरिष्ठ अनुदेशिका के पद से सेवा निवृत हुई।   समय का लाभ उठाते हुए मैने लिखने का प्रयास ज़ारी
रखा।   मेरी चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है  जिसमे गुरुदेव जी से संबंधित दोहे, भजन एवं माता जी की
भेंटें है।

अब कविताओ से संबंधित बिखरे पन्ने  प्रकाशित हो जा रही है जो आप सभी पाठको को
समर्पित है।   इस पुस्तक में मेरी कल्पना तथा भावनाओ का समन्वय देखने को मिलेगा। 

सोमवार, 20 जुलाई 2015

मात्रिक - समछंद

तोमर छंद :-

                           तोमर एक सम मात्रिक  छंद है।  सम मात्रिक  इसलिए है क्योकि इसके चारो चरणो
                            में मात्राओ की संख्या समान होती है।   इसके प्रत्येक चरण में 12  मात्राएँ  होती है।
                            अंत में गुरु और लघु आता है।

लक्षण:-                 द्वादस   कल   ग  ल   तोमर       ---------     12  मात्राएँ    -  

उदाहरण :-
                            सुनी   राम  चन्द्र   कुमार

                            धनु   आनिये  याहि  बार

                            पुनि  बेगि  ताहि  चढ़ाय

                             यश  लोक  लोक  बढ़ाय
व्याख्या :-
                             तोमर में कुल 12  मात्राएँ  होती है।  अंत में गुरु  लघु  होता है।  उपर्युक्त
                             उदाहरण में कुल  12   मात्राएँ प्रत्येक चरण में है  अंत में गुरु लघु  अाने
                              से तोमर छंद है।


 कुण्डलिया छंद :-

व्याख्या :-

                        इस छंद में 6  चरण होते है।   इसमें प्रारम्भ की दो पंक्तियाँ दोहे की और शेष चार
                         रोल छंद की होती है।   दोहे के चतुर्थ चरण की आवृति रोल के आदि में होती है।
                          आरम्भ का और अन्त का शब्द एक होता है।
उदाहरण :-

                         गुन  के  गाहक  सहस  नर , बिनु  गुन   लहै  न कोय
                         जैसे  कागा  कोकिला , शब्द  सुने  सब   कोय।      ---------------               दोहा
 
                         शब्द सुने  सब  कोय   कोकिला  सबै  सुहावन       ----------------             रोला -
                          दोऊ  को  इक  रंग ,  काग  सब  भये  अपावन।
                          कह  गिरधर  कविराय , सुनो हो ठाकुर  मन के
                          बिनु  गुन  लहे  न कोय , सहस  नर गाहक गुन  के।

व्याख्या ::-
                          इनमे पहले दो चरणो में दोहे के लक्षण है अर्थात 13 और 11 पर यति है  और अंतिम
                           चार पंक्तियों में 24 -24  मात्राएँ  है तथा  11  व  13  पर यति  है।   अत: यह कुंडलिया
                            छंद है।  दूसरे चरण का उत्तरार्ध और तीसरे चरण का पूर्वाद्ध का पहला और अंतिम
                            शब्द एक है।   अत:  यह कुण्डलिया  छंद है।

दोहा :-

लक्षण :-           जान  विषम  तेरह  कला, सम  सिव  दोहा  ळान्त

व्याख्या :
                        यह अर्द्ध -सम मात्रिक  छंद  है।   इसके विषम चरणो में तेरह तथा  सम चरणो में  ग्यारह

                         मात्राएँ  होती है।   विषम चरण  के आदि में जगण  नहीं  होता  तथा अन्त  में लघु  होना

                         आवश्यक  है।

उदाहरण:-

                         ऐसी   बानी    बोलिए                            -       13   मात्राएँ

                         मन  का  आपा  खोई                             -        11   मात्राएँ

                         अपना  तन  सीतल  करे                        -         13   मात्राएँ

                         औरन   को  सुख  होइ                             -         11   मात्राएँ 
हरिगीतिका :

लक्षण :-              सोलह  दुआदस   यति  भवति   हरिगीतिका  लागत   भली

व्याख्या :-
                           इस छंद में 16  एवं  12  मात्राओ के बाद यति आती है।   इसमें कुल 28  मात्राएँ
                           होती है।   अन्त  में लघु  गुरु  होता है।   यह सम मात्रिक  छन्द  है।
उदाहरण:-
                           पापी  मनुज  भी  आज  मुँह   से ,  राम  नाम  निकालते

                            देखो  भयंकर  भेड़िये  भी ,   आज   आंसु    डालते

व्याख्या :-

                            इसमें  प्रत्येक  चरण  में  16  तथा  12   मात्राओं  के  बाद यति आई  है।   अन्त
                             
                             में  लघु  गुरु  है।   इसके प्रत्येक चरण में 28  मात्राएँ  है  अत: यह हरिगीतिका

                              छन्द  है। 

रविवार, 19 जुलाई 2015

सोरठा :

लक्षण :                 सम तेरह  विषम  शिव ,  दोहा  उलटा   सोरठा

व्याख्या :
                             इसके सम चरण अर्थात दूसरा एवं  चतुर्थ चरण में 13  मात्राएँ होती है  तथा प्रथम
                              एवं तृतीय  चरण में 11  मात्राएँ होती है।   यह दोहे से उलटा होता है।   दोहे में
                               सम में 11 तथा विषम में 13 मात्राएँ होती है।
उदाहरण:
                               मंगल  मूल  महेश                                -    11  मात्राएँ

                               दूर  अमंगल  को  करें                            -    13  मात्राएँ

                               ब्रह्मविवेक   दिनेश                               -    11  मात्राएँ

                               मोह  महा  तम  को  हरे                          -    13  मात्राएँ

व्याख्या:
                              यहाँ  प्रथम एवं तृतीय चरण में 11  मात्राएँ तथा  दूसरे एवं चौथे चरण में 13  मात्राएँ
                               आई है  अत: यहाँ पर सोरठा छंद हुआ। 
रोला :-

लक्षण :-
                         रोला   में   चौबीस  कला  यति  ग्यारह  तेरह

व्याख्या :-
                           यह सम -मात्रिक  छन्द  है।   इसके प्रत्येक  चरण में चौबीस मात्राएँ  होती है।
                            ग्यारह और तेरह पर  होती है।
उदाहरण :-
                            जीती  जाती हुई  जिन्होंने भारत    बाजी
                             जिन  बल  से  मलमेट  विधर्मी  मुगल कुरली
                              जिसके  आगे ठहर  सके जंगी  न  जसजी
                               है  ये  वही  प्रसिद्ध  छत्रपति  भूप  शिवाजी

उदाहरण :-
                             हे  देवो  यह   नियम  सृष्टि   में  सदा   अटल  है
                             रह  सकता  है  वही  सुरक्षित  जिसमें  बल  है
                             निर्बल  का  है   नहीं   जगत  में   कहीं   ठिकाना
                             रक्षा  साधन  उसे  प्राप्त   हों     चाहे    नाना

व्याख्या:-               इसमें प्रत्येक चरण में चौबीस मात्राएँ है तथा ग्यारह या तेरह मात्राओं के बाद
                              यति आई है   अत: यहाँ पर रोला छंद है।                     

शनिवार, 18 जुलाई 2015

मात्रिक छंद

मात्रिक  छंद :-

चौपाई :-

लक्षण :-             सोलह   कल  जत   अन्त   न   भाई

                          सम   सम  विषम  विषम  चौपाई

व्याख्या :-
                          यह सम - मात्रिक  छंद है।   इसके प्रत्येक चरण में सोलह मात्राएँ  होती है।   अन्त  में
                          में जगण या  तगण  नही  होता।   सम के बाद  सम  और विषम  के बाद विषम  मात्राएँ
                           होती है।
उदाहरण :
                          सुन  जननि  सोइ  सुत  बड़  भागी                  - 16  मात्राएँ
                           जो  पितु   मातु   वचन  अनुरागी                    -16   मात्राएँ
                                                       
                            तनय  मातु  पितु   तोशन  हारा                      -16   मात्राएँ
                            दुर्लभ  जननि   सकल  संसारा                         -16   मात्राएँ
व्याख्या :-
                            इस छंद के प्रत्येक चरण में 16 -16  मात्राएँ है अंत ,में जगण , तगण नही है।
                           अत: यह चौपाई  का उदाहरण  है।   

कवित्त

कवित्त :-

व्याख्या :-
                       यह वार्णिक समछंद  है।   इसके प्रत्येक चरण में 31  वर्ण होते है।  वर्णो का क्रम
                        निश्चित नही होता है। अर्थात गणो की कोई व्यवस्था नही होती।   विशेष नियम
                         है  कि 16 तथा 15  वर्णो पर यति होती है  और चरण के अंत में एक गुरु वर्ण होता है।

उदाहरण :-

                        मैने  कभी   सोचा  वह  मंजुल  मंयक  में  है       -      16

                        देखता इसी  से  उसे  चाव  से  चकोर   है             -      15

                        कभी  यह  ज्ञात  हुआ  वह  जलधर  में  है            -      16

                         नाचता  निहार  के  उसी  को  मंजु मोर  है           -       15
व्याख्या :-
                         
                         इस पद्य के प्रत्येक चरण में 31 - 31  वर्ण और अंतिम वर्ण गुरु है  तथा  16  -15  पर
                     
                         यति है।   अत: यह कवित्त छंद है। 

मत्तगयन्द सवैया

मत्तगयन्द  सवैया :-

लक्षण :-          सात भगण  मिला  गुरु  दो  कह  दो  तब  मत्तगयन्द  सवैया

व्याख्या :-
                       यह समवृत  है।   इसमें सात भगण और दो गुरु के क्रम से 23 वर्ण होते है।
उदाहरण :-

                      या  लकुटी  अरु  कामरिया  पर  राज  तिहूँपुर  को  तजि  डारो

                       आठहु  सिद्धि  नवो  निधि  को  सुख  नन्द की गाय  चराय बिसारों

                       रसखान कबौ इन आँखिन ते ब्रज के बन बाग़ तड़ाग  निहारो

                       कोटिन हू  कलधौत के धाम  करील के  कुंजन  ऊपर  वारों

व्याख्या :-
                       इसमें सात भगण और दो गुरु के क्रम से 23  वर्ण आने से यहाँ  मत्तगयन्द

                       सवैया है। 

सवैया

सवैया :-

विशेष :       वार्णिक छन्दों में 22  वर्ण से लेकर 26  वर्ण  तक के छन्दों को सवैया कहा जाता है।  इसके अनेक
                   भेद है।   उदाहरण  के तौर पर दो निम्नलिखित  है :-

मंदिरा सवैया :-

लक्षण :-          सात   भकार   गुरु  इक  हो  जब  पिगलवेदि  कहें   मंदिरा

व्याख्या :-        यह समवृत है।   इसके  प्रत्येक चरण में सात भगण और एक गुरु के क्रम से 22 वर्ण होते है।

उदाहरण :-
                        तोरि  सरासन  शंकर  को  सुभ  सीय  स्वयंवर  मांहि  वरी
                        ताते बढ़यो  अभिमान  महा  मन मेरियो  नेक  न   शंख  धरो
                        सो अपराध  परो  हम  सों  अब  क्यों  सुधरे तुमहू धो  कहो
                        बाहु  दे  देहु  कुठारिह  केशव  आपने  धाम को पंथ  गहो

व्याख्या :         इसमें क्रमश: सात  भगण और एक गुरु क्रमश: चारो चरणों में आये  है  अत: यह


                      मंदिरा  सवैया  है।

मन्दाक्रान्ता

मन्दाक्रान्ता :-

लक्षण :-                   मन्दाक्रान्ता   म   भ   न  त    त    गा    गा    कहें   छन्दप्रेमी

व्याख्या :-              
                               यह वर्णिक सम -छंद है।   इसके प्रत्येक चरण में क्रमश: मगण , भगण ,नगण
                             
                               तगण  तगण  तथा दो गुरु के क्रम से 17 -17 वर्ण होते है।
उदाहरण :-
                               जो   मै   कोई   विहग    उड़ता  व्योम   में  देखती  हूँ

                                तो   उतकण्ठा  वश  विवश  हो  चित्त  में  सोचती  हूँ

                                होते    मेरे   निबल  तन   में   पक्ष  जो  पंक्षियों    से

                                तो   यो    ही   मै  समुद  उड़ती  श्याम  के  पास  जाती
व्याख्या :-              
                                उपर्युक्त छंद  के प्रत्येक चरण में क्रमश: मगण , भगण , नगण ,

                               तगण ,, तगण तथा दो गुरु के क्रम से 17 -17  वर्ण  है।  अत: यह

                                मन्दाक्रान्ता  छंद  है। 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

शिखरिणी

शिखरिणी ;-

लक्षण :-         सदा   से   है   भाती   य   म  न   स  भ   ला   गा   शिखरिणी

व्याख्या :-
                       यह सम-वार्णिक  छन्द  है।   इसके प्रत्येक चरण में यगण , मगण,  नगण ,  सगण
                   
                       भगण और अन्त में लघु , गुरु  होते है।   अत:  इसमें क्रमश: 17 -17  वर्ण  होते  है।

उदाहरण :-
                      छटा  कैसी  प्यारी , प्रकृति  तिय  के  चन्द्रमुख   की

                       नया  नीला   ओढ़े   वसन   चटकीला    गगन      का

                       ज़री  सल्मा  रूपी , जिस   पर  सितारे  सब    जड़े

                       गले   में    स्वर्गगा , अति  ललित   माला  सम  पड़ी

व्याख्या :-
                        उपर्युक्त छंद में क्रमश: 17 -17  वर्ण है।   इसके प्रत्येक चरण में यगण , मगण ,नगण

                        सगण , भगण और अन्त  में  लघु तथा गुरु  होने से शिखरिणी  छंद  है।

वसन्ततिलका

वसन्ततिलका ;-


लक्षण :-                मानो   वसन्ततिलका    त    भ   जा   ज   गा    गा


व्याख्या :-             यह सम -वर्णिक छंद है।   इसके प्रत्येक चरण में तगण  भगण , जगण , जगण

                             और अन्त में दो गुरु के क्रमश :  14  वर्ण होते है।

उदाहरण :-
                              भू  में   रमी    शरद   की  कमनीयता    थी

                              नीला   अनन्त  नभ    निर्मल   हो  गया  था

                              थी   छा   गई  ककुभ   में  अमिता  सिताभा

                               उत्फुल्ल   सी   प्रकृति  थी  प्रतिभात  होती

व्याख्या :-            
                               उपर्युक्त  छंद में क्रमश : 14 वर्ण  है।   इसके  प्रत्येक चरण में तगण , भगण

जगण , जगण  और  अन्त  में  दो  गुरु  है।  अत : यह वसन्ततिलका  छंद हुआ।

वंशस्थ

 वंशस्थ  :


लक्षण :-         लसे सु  वंशस्थ   ज  ता  ज  रा  शु  भा


व्याख्या :-      यह वार्णिक समछंद   है।   इसके प्रत्येक चरण में जगण , तगण ,जगण  और रगण
         
                      क्रमश : बारह  वर्ण होते है।

उदाहरण  :    -वसन्त   ने   सौरभ   ने   पराग   ने
                     प्रदान  की  थी अति  कान्त  भाव से
                     वसुन्धरा को, पिक को , मिलिन्द को
                      मनोज्ञता ,  मादकता ,    मदान्द्ता

व्याख्या :-
                      उपर्युक्त छंद में  क्रमश : 12 -12 वर्ण है।   इसके   प्रत्येक चरण में जगण , तगण , जगण

                     और  रगण आने से वंशस्थ  छंद  हुआ।
 
                       




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गुरुवार, 16 जुलाई 2015

द्रुतविलम्बित

  द्रुतविलम्बित :-

लक्षण :-              द्रुतविलम्बित  सोह   न    भा   भ  रा

व्याख्या :-          इस छन्द में  12 -12  वर्णो के बाद यति आती  है।   इसमें  क्रमश: नगण , भगण
                         
                          भगण  और  रगण  आते है।

उदाहरण :-
                          दिवस का अवसान समीप था
                   
                          गगन था कुछ लोहित हो चला

                          तरु शिखा  पर थी अब राजती

                           कमलिनी कुल वल्ल्भ की प्रभा
व्याख्या :-
                          उपर्युक्त छन्द में 12 -12 वर्णो के बाद यति आई है।   इसमें नगण , भगण ,भगण
           
                          रगण  आने से द्रुतविलम्बित   छन्द  हुआ।



                       
                         
                     

                           

                        

छन्द

छन्द :


यमाताराजभानसलगा


गण नाम                                      स्वरूप                                            उदाहरण  

यगण                                           आदिलघु                                           यमाता

मगण                                            त्रिगुरु                                               मातारा

तगण                                            अन्तलघु                                          ताराज     

रगण                                             मध्यलघु                                          राजभा

जगण                                            मध्यगुरु                                           जभान

भगण                                           आदिगुरु                                            भानस

नगण                                            त्रिलघु                                                 नसल

सगण                                           अन्तगुरु                                            सलगा
                                                                                                        


शनिवार, 13 जून 2015

आत्मनिवेदन 



अपने विषय में क्या लिखूँ बस यही कहूँगी कि मध्यम वर्गीय परिवार में जीवन -यापन हुआ मेरी माता जी एवं पिता जी ने हम तीन बहिनो  व् एक भाई के लालन - पालन के लिए संघर्षमय जीवन जिया।   माता जी का मेरे ऊपर बहुत प्रभाव पड़ा।  

उन्होंने हँसते हँसते जीवन की कठिनाइयों को  सहा एवं दुर्गा माँ  की अपार कृपा से सब सम्भव हो पाया। मैने सचिवालय पद्धति व्यवसाय में प्रशिक्षण  लिया  तथा हिन्दी साहित्य में एम  ए  किया।   माँ  की कृपा से  1971 से 2009  तक सरकारी सेवाकाल में समय देखते देखते ही व्यतीत हो गया पता भी नहीँ चला।    लिखने की प्रेरणा मुझे मेरी माता जी से ही मिली, उन्ही को समर्पित है।