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शनिवार, 29 सितंबर 2018

भारत को उच्च शिखर पहुँचाया

आज फिर धूप आँगन में खिल उठी
मन के आकाश पर छितरा गई
कैनवास पर अक्स उभरने लगे
तूलिका रंग से भरकर चलने लगी
हरे रंग से धरा की हरीतिमा झलकी
सुनहरे रंग से धूप की किरणें चमकी
हथेली मेहँदी रचाकर माथे बिंदिया लगा
फूलों के कर्णफूल पहन धरा दुल्हन सी दमकी
पैरों में महावर  रचाकर रुनझुन पायल खनकी
गले में पहनी फूलमाला ओढ़ा पत्तों का दुशाला
काजल बदरी से चुरा धरा ने नैनो में लगाया
मांग में सिन्दूरी फूल चले झूमती उड़ाके धूल
स्वप्न हुए उसके सिन्दूरी हर आशा करने को पूरी
धरती ने खलिहान सजाया धन धान्य उपजाया
नए नए आयामों से भारत को उच्च शिखर पहुँचाया
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

रुख़सत अब दे दीजिए जनाब

ये भोली चितवन और उस पर हिज़ाब
दिल  बोला वल्लाह क्या बात है जनाब

आये हो तुम दूर से बैठो ज़रा
कुछ तुमसे बातें करलें ज़रा
अच्छी शायरी कर लेते जनाब

जाने की जल्दी क्यों तुमको पड़ी
इतनी जल्दबाज़ी भी अच्छी नहीं
थोड़ा इत्मिनान कीजिए जनाब

 आयेंगे फिर भी सुनिए  हुज़ूर
ख़िदमत का मौका देंगे ज़रूर
रुख़सत अब दे दीजिए जनाब
@मीना गुलियानी



गुरुवार, 27 सितंबर 2018

तू शान बन के जी

ओ जीने वाले तू सिर्फ इक इंसान बनके जी
धरती का बोझ बनकर न हैवान बनके जी

हो पेट जिनका खाली तू उनका पेट भर
ओ मौज करने वाले कभी उनकी ले खबर
गिरतों का बन सहारा तू इंसान बनके जी

नैया भंवर में डोले किसी की  तू पार लगा दे
हो आफत में जां किसी की तू उसको बचाले
रोते  हुए चेहरे की  तू मुस्कान बनके जी

बन अन्धों की लाठी निराशों की आस बन
भटके हुए लोगों के लिए तू प्रकाश बन
इस पावन धरा की तू शान बन के जी
@मीना गुलियानी

इतनी न सज़ा दीजिए

अपने दिल में जगह दीजिए करम इतना अता कीजिए

दुनिया ने लाखो सितम ढाये हैं हम पर
थोड़ा मरहम लगा दीजिए

कभी तुझसे शिकवा या शिकायत न करेंगे
आते जाते रहा कीजिए

दिल्लगी की है हमने माना थोड़ी सी मगर
इतनी न सज़ा दीजिए
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

मानुष जन्म अनमोल रे

रे मन संभल संभल पग धरना
आँखें अपनी खोल रे
ये धरती है उबड़ खाबड़ कहीं
कदम न जाए डोल रे

काम क्रोध मद लोभ के रोड़े
रास्ता तेरा रोकेंगे
ईर्ष्या द्वेष महीधर बैठे
तुझको न बढ़ने देंगे
न डरना तू इनसे मानव
तू  अपनी राह टटोल रे

इनके प्रलोभन में मत आना
दूर से ही नाता निभाना
अपने साक्षीभाव में रहकर
दुष्कर्मों को दूर भगाना
समझ लेना जग नश्वर है
मानुष जन्म अनमोल रे
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 24 सितंबर 2018

अपने जीवन की वीणा

ओ  जीने  वाले हँसते हँसते जीना

आँसू तेरे छलक न जाएँ
छलक कर ढलक न जाएँ
आँखों में ही इनको पीना

सूरज डूबे कभी न तेरा
जब तू जागे तभी सवेरा
तेरा रंग बदले कभी ना

बिजली तुझको राह दिखाए
सुख के स्वर में बजा बाँवरे
अपने  जीवन की वीणा
@मीना गुलियानी 

रविवार, 23 सितंबर 2018

कल फिर आये ना

तुमको कसम है मेरी दूर तुम जाओ ना
आओ बैठो पास मेरे ऐसे तरसाओ ना

कितने बरस के बाद दिन ऐसा आया
सपनों में तुमसे मिले फिर बने साया
आज की घड़ी को तुम यूँ ही गवाँओ ना

सोचा था दिल में सनम से होंगीं बातें
पता न था कितनी छोटी हैं मुलाकातें
बीता जाए ये लम्हा कल फिर आये ना
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 22 सितंबर 2018

रास्ता खुल जाएगा

इच्छाएँ हमेशा बलवती रहती हैं
ये कभी भी मरती ही नहीं हैं
 कभी राहें भी धूमिल होती हैं
जिससे मन हताश हो जाता है
लेकिन मन के पाँव नहीं रुकते
मन मृगतृष्णा में ही डोलता है
जीवन में संतुष्टि आवश्यक है
खुशियों का स्त्रोत हमारे भीतर है
अपने जीवन को स्वयं संवार लो
सांसारिक कामनाओं का अंत करो
जीवन को कभी बोझ न समझो
अपने विवेक को जागृत कर लो
फिर आगे का रास्ता खुल जाएगा
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

लौटके आएँ

विरही नैना नीर बहाए
कोई इन्हें आके समझाये
हर पल पलकों में रहते हैं
अश्रु बन जो छलक न पाए

गम नैनो में छिपा रहता
व्याकुल मन की कहते व्यथा
बदरी जब भी घिरके आये
उमड़ घुमड़ के जल बरसाए

सावन की रिमझिम का मौसम
बूँदों की टिपटिप सुनते हरदम
प्यासा सावन बीत न जाए
कहदो पिया  से लौटके आएँ
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

व्याकुल जियरा है तुम बिन

उलझ गए जबसे तोसे नैन
मन ने तनिक न पायो चैन
श्यामल रंग बदरी से चुराया
साँवरा तू मेरे मन में समाया
हँस हँस करे तू मोसे मीठे बैन
तेरी बन्सी मोरा जियरा चुराए
दिल मेरा बिन मोल बिका जाए
इसके मीठे सुर मन को लुभायें
आऊँ जब पनघट पे संग सखियाँ
बावरी बनायें कान्हा तोरी बतियाँ
सखियाँ करत मोसे हँसी ठिठोली
कान्हा तूने मति हर लीन्ही मोरी
चकोरी ज्यों तड़पे चंदा के बिन
ऐसे व्याकुल जियरा है तुम बिन
@मीना गुलियानी

बुधवार, 19 सितंबर 2018

तू जाने ना

कैसे दिन बीते कैसे कटी रतियाँ तू जाने ना
नैना बरसें जागूँ सारी रतियाँ तू माने ना

एक एक पल ये बरस सम लागे
व्याकुल नैना रोयें अभागे
तुम बिन कौन सुने इस दिल की
पीर जो अंतर् में मोरे जागे
कासे कहूँ पिया दर्द मैं अपना तू जाने ना

क्या हालत है तुम बिन मोरी
कबसे राह देखत हूँ तोरी
अब तो विनती सुनलो मोरी
बावरी हो गई विरह में तोरी
दर्द से दूखन  लागि मोरी अखियाँ तू जाने ना
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

मेरी मंजिल कहाँ है

हर तूफ़ां को इशारा मिलेगा
हर लहर को किनारा मिलेगा
उठेंगीं मोजें समुन्द्र में जब भी
किश्ती को लेकिन धारा मिलेगा

हम वो नहीं बैठ जाएँ जो थककर
अभी हौसला और यकीं है खुद पर
चाहे लाख  तूफ़ां राहों में आएँ
पूरा करेंगे जो शुरू किया है सफर

हैं फौलादी बाजू उमंगें जवां हैं
दिलों में उमड़ा हुआ तूफ़ां है
ये सफर तो जैसे इक इम्तहाँ है
बताए कोई मेरी मंजिल कहाँ है
@मीना गुलियानी

सदायें दिए जा

उठाए जा रंजो -ओ सितम और जिए जा
 न शिकवा जुबां पे ला अश्क अपने पिए जा

यही तेरी किस्मत का फैसला ऐ दिल
उठाए जा दर्दो -अलम दुआएँ दिए जा

सताये ज़माना तू परवाह न करना
उसी की इबादत का सहारा लिए जा

कोई गम नहीं गर जान भी जाए
तू चौखट पे उसकी सदायें दिए जा
@मीना गुलियानी 

रविवार, 16 सितंबर 2018

राहों से काँटे बुहारना

ऐ मन तू कभी भी हिम्मत न हारना
दिन जैसे भी हों तेरे हँसके गुज़ारना

मत घबराना गर हो गहन अँधियारा
मन दीप जलाकर कर लेना उजियारा
उस उज्ज्वल रौशनी में जीवन गुज़ारना

जीवन में सुख दुःख तो आते हैं जाते हैं
हौसले वाले केवल लक्ष्य अपना पाते हैं
हर हाल में तू खुश होके जीवन संवारना

चाहे पर्वत रोके राहें चाहे सागर पार उतरना
हिम्मत से सम्भव है हर मुशिकल से उबरना
तू खुद अपनी  कंटीली राहों से काँटे बुहारना
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

हमसफ़र हमनशीं न हुए

ऐ चाँद तू गवाह रहना
        मेरे उन पलों का जो
        दूरी में उनकी बिताए
        हर कदम पे धोखे खाए
        लब से कुछ कह न पाए

ऐ चाँद तू गवाह रहना
       मेरी उन हसीन यादों का
       जो संग पिया के गुज़रीं
       जो डोर बँधी न उलझी
       जब उलझी कभी न सुलझी

ऐ चाँद तू गवाह रहना
        पलों का जो हमारे न हुए
        साये की तरह साथ चले
        बेगानों की तरह मिले बिछुड़े
        हमसफ़र हमनशीं न हुए
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

हम संग और झूमें ज़मी

है प्यारा सफर और कितना हसीं
सुहाना है मौसम और संग हमनशीं

कितने प्यारे ये गुलशन यहाँ हैं
फूल हर रंग के सब यहाँ हैं
प्यारे प्यारे हैं नज़ारे नज़र लगे न कहीं

लहरें टकरातीं जब भी यहाँ हैं
उमंगें दिल की हो जाती जवां हैं
खूबसूरत ये समां है बदल न जाए कहीं

चाँद तारों का लगता है मेला
मेले में भी क्यों दिल है अकेला
चलो साथी झूमें हम संग और झूमें ज़मी
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 12 सितंबर 2018

उसकी बलैंया लेती जाती

ये सुरमई शाम सुहाने झरने
कल कल बहता है पानी
ये हवा मदमस्त सी दीवानी
आई है रुत ये मस्तानी
नभ पर सितारे भी चमके
लगता है जुगनू जैसे दमके
खगवृन्द भी पंक्तिबद्ध आते
खुले व्योम में वो छा जाते
गाय चरकर शाम को आती
 कुमुदिनी देखो खिल जाती
चन्द्रमा भी गगन में निकला
चाँदनी को भी संग में लाया
 सितारों की ओढ़नी लहराती
जुल्फ़ें बादल सी बन जातीं
घटा में बिजुरिया चमक जाती
चाँदनी फिर पायल छनकाती
हिमकणों का मुकुट पहनती
मणिमेखला करधनी लटकाती
लगती वो स्वर्ग की अप्सरा सी
चले लज्जाती सकुचाती बलखाती
धरती उसकी बलैंया लेती जाती
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

कोहराम मचा रखा है

न कभी पूछ मुझसे वफ़ा में क्या रखा है
एक शोला सा है जो दिल में छुपा रखा है

कम नहीं होगी कभी मेरी वफ़ा तेरे लिए
वादा धड़कन ने ये कबसे निभा रखा है

ये ज़माना जिसे बेताब था दफन करने को
मैंने उस याद को सीने से लगा रखा है

सिर्फ़ नज़रों से ही बेताबी मिट जाती है
 फिर क्यों यूँ ही कोहराम मचा रखा है
@मीना गुलियानी

सोमवार, 10 सितंबर 2018

मन पंछी सा डोले

सखी री मोरा मनवा यूँ मुझसे बोले
भाग जगें मेरे जब उनके दर्श होलें

उन बिन मुझको चैन पड़े ना
डोलूँ इत उत ध्यान बँटे ना
छत पे कौआ भी बोले

आँखों से मेरे नीँद उड़ी है
प्यास जाने कैसी जगी है
दिल में उमंगें डोले

जाने कब आयेंगे साजन
बाट निहारूँ बनके पुजारन
मन पंछी सा डोले
@मीना गुलियानी 

रविवार, 9 सितंबर 2018

क्यों करूँ ख़ुद की फ़िक्र

पी जायेंगे खुद अकेले ही
यह चुप्पी का ज़हर
न हमसे कभी पूछना
क्यों छलकी ये नज़र
जुबां पर न लायेंगे कभी
शिकवा ज़माने भर का
न बतायेंगे किसी को कभी
क्या है अपनी अब खबर
पहले कभी न किया था जिक्र
सुना है तू नहीं है बेख़बर
फिर क्यों करूँ ख़ुद की फ़िक्र
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 8 सितंबर 2018

लट ये बिखर जायेगी

ऐ चाँद कुछ देर के लिए तू छिप जा
मुझे एक झलक उसे देख लेने दे
तेरे आने से वो शर्मा जाती है लेकिन
तेरे ओझल होने पर वो नज़र आएगी

सितारे फ़लक पे चमकने दो ज़रा
मेरी उम्मीद को भी जगने दो ज़रा
बाज़ी किस्मत की भी पलट जायेगी
उसके रुख पे लट ये बिखर जायेगी
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

मैं उदास नहीं

मैं भाव भरी हूँ इक बदली
आज आँगन तेरे बरस गई
कितनी दुविधा में तुमसे मिली
अखियाँ भादो सी बरस गईं

कितने वो स्वप्न सुहाने थे
गुज़रे वो कल के ज़माने थे
थे कुछ वो ख़्वाब अधूरे से
 लब पर दिल के फ़साने थे

उस पल का अब एहसास नहीं
लगता ही नहीं तू पास नहीं
मेरे दिल में समाया रहता है
अब देख मुझे मैं उदास नहीं
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

यादों के दीप जलते हैं

जिंदगी के सफर में अब तो हम
तेरी यादों के साथ चलते हैं
तन्हा न रह सकेंगे तुझ बिन हम
थामके हाथ हम साथ चलते हैं

कभी मुझसे न दूर जाना तुम
न कभी आँख यूँ चुराना तुम
तेरे जाने से प्राण मेरे तो
लगता है जिस्म से निकलते हैं

न कभी मुझसे तुम खफा होना
रूठ जाऊँ तो तुम मना लेना
तेरे होने से सारी रौनक है
दिल में यादों के दीप जलते हैं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 5 सितंबर 2018

इतरा रही थी

सूर्योदय के समय गगन की लाली
मन को आल्हादित कर रही थी
सूरजमुखी फूलों की आभा निखर रही थी
उषा नागरी भी अंबर पनघट में से
अपनी मटकी को भरने आई हुई थी
चन्द्रमा ने सितारों के साथ विदाई ली
सूरज की रश्मियाँ ज्योत्स्ना लुटा रही थीं
हरे पत्तों पर ओस की बूँदे चमक रहीं थीं
शीतल सुगंधित बयार मन लुभा रही थी
पक्षियों का कलरव सौंदर्य बढ़ा रहा था
उनकी कतार गगन की ओर जा रही थी
लोग हरी घास पर योगाभ्यास कर रहे थे
गाय के रम्भाने की आवाज़ आ रही थी
मुर्गे भी बांग देकर सबको जगा रहे थे
मंदिर में शंखनाद घण्टाध्वनि हो रही थी
बच्चे पेड़ों से अमरुद आंवले तोड़ रहे थे
किसान खेतों में ट्रैक्टर चला रहे थे
गाँव की पनिहारिनें गीत गा रही थीं
कुछ बच्चे खो खो कबड्डी खेल रहे थे
महिलाएँ आँगन में रंगोली बना रही थीं
धरा  स्वर्णिम आभा पर इतरा रही थी
@मीना गुलियानी


मंगलवार, 4 सितंबर 2018

जलाया जा नहीं सकता

सुनाऊँ क्या मैं ग़म अपना
तुझे बतला नहीं सकता
जो मेरे दिल की बातें हैं
तुझे समझा नहीं सकता

तुझे पाकर के खो देना
ये किस्मत की थी मजबूरी
मिलकर भी मिल नहीं पाए
गम भुलाया जा नहीं सकता

न जाने कैसा दौर आया
जिसने सितम है ये ढाया
जिग़र के हो गए टुकड़े
तुझे बतला नहीं सकता

गुलिस्तां ऐसा अब उजड़ा
बसाना जिसको मुश्किल है
वो शमा कैसे करूँ मैं रोशन
जिसे जलाया जा नहीं सकता
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 3 सितंबर 2018

मनवा मोरा हर्षाये

मतवारे तेरे नैन
लूटें मन का चैन
सितारे ये चमकें
बिजुरिया भी दमके
काले काले मेघा छाये
बारिश की बूँदे लाये
कोयलिया कूक मचाये
जियरा हुलसा जाए
मन मयूरा झूमे गाये
दिल पागल हुआ जाए
शीतल बयार मस्त बनाये
मन व्याकुल कर जाए
मलयानिल की पवन आए
पिया का संदेशा लाये
मनवा मोरा हर्षाये
@मीना गुलियानी 

रविवार, 2 सितंबर 2018

पछताओगे वरना

उन विशाल अट्टालिकाओं के पीछे से
कोई एकटक उसे निहार रहा था
एक विद्रूप सी स्मित रेखा थी उसके चेहरे पर
जो छल ,प्रपंच रच रही प्रतीत होती थी
वो भोली भाली ग्रामीण कन्या अपनी धुन में
इठलाते हुए  मंथरगति से चली जा रही थी
अचानक ही पीछे से उसने कन्या के कंधे पर
झपट्टा सा मारा तो उस कन्या ने पलटकर देखा
यकायक ही वो कन्या सकपका गई ,सहम गई
फिर भी उसने हिम्मत न हारी, वो पलटी
बिजली सी फुर्ती दिखाई ,सामने पड़े बांस को उठाया
पलटवार उस पर किया वो लड़खड़ाया और गिरा
वो ग्रामीण बाला अब साक्षात् चण्डी के रूप में थी
बांस त्रिशूल जैसा प्रतीत हो रहा था उसे घुमाने लगी
सीधा उसकी छाती पर तान दिया हुँकारने लगी
वो उसका चण्डी रूप देखकर डर गया
जल्दी से ही घबराकर उसके पाँव पड़ गया
अब वो लगा गिड़गिड़ाने लगा क्षमा मांगने
उस कन्या ने बोला फिर कभी ऐसा न करना
जान भी न बचा पाओगे पछताओगे वरना
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 1 सितंबर 2018

इस बारिश में

स्वप्न हुए सिन्दूरी अपने
इस मतवाली बारिश में
टिपटिप बरसा है पानी
छत पे रात भर बारिश में

बच्चों ने फिर नाव बनाई
पोखर तलैया में चलाई
पकौड़े और जलेबी खाई
इस मदमाती बारिश में

भीगी है धरती की चूनर
इस रुपहली बारिश में
मौसम फिर गुलज़ार हुआ
रिमझिम सी इस बारिश में
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

जगमग चमकेंगे तारे

काला कौआ मुँडेर पे सुबह से बोले
सुनके काँव काँव जियरा मेरा डोले
शायद पिया का संदेशा वो ले आये
मनवा ख़ुशी से मेरा झूमे और गाये
काली कोयल जब भी कूक सुनाये
दिल को मेरे वो तो घायल कर जाए
अपनी मीठी  वाणी में बोल सुनाये
बतियाँ अपनी सारी वो कह जाए
खोलके अपनी खिड़की और चौबारे
आ बैठी हूँ राह में उनकी नैन पसारे
गगन चंदा तू भी ज़रा राह दिखाना
उनकी राहों से हम अब शूल बुहारें
आयेंगे जब लौटके वो पिया हमारे
गगन में तब जगमग चमकेंगे तारे
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

शमा दिल में जगाएं

पूर्णिमा को चाँदनी रात थी
हम खो गए मधुरता में
लबों पे लग गए थे ताले
न तुम कुछ कह पाए
न मैं तुमसे कुछ कह पाई
जिंदगी के मधुर क्षण यूँ
बेख़बरी  से गुज़रते रहे
उलझने बढ़ती ही रहीं
दिलों मेँ फासले भी बढ़े
फूलों की सुरभि खोने लगी
दिलों की पीर मुखरित हुई
वेदना के सुर चुपके से बजे
मधुर गीत के बोल न सुने
आज फिर चाँदनी रात है
बारिश का भी साथ है
 पुराने गिले शिकवे मिटाएं
प्रीत की शमा दिल में जगाएं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 29 अगस्त 2018

प्रतीक्षारत हूँ

कहने को तो मैं एक समुंद्र हूँ
अनगिनत लहरें भी मेरे पास हैं
मुझसे आकर रोज़ टकराती हैं
जाने क्या क्या वो कह जाती हैं
फिर भी न जाने क्यों तन्हा हूँ
मेरा तट भी कबसे सूना पड़ा है
इसे तुम बिन कौन रोशन करेगा
तुम्हारे आने से ही उजाला होगा
मेरा सूनापन भी स्वत; दूर होगा
तुम्हारी राहों के शूल मैं चुनता हूँ
तुम्हारी माला के लिए मोती सीपियाँ
रोज़ मैं अपनी तलहटी से चुनता हूँ
आज भी इसी तट पर तुम्हारे लौटने को
दोनों किनारों की बाहें पसारकर मैं
जाने कितने समय से प्रतीक्षारत हूँ
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

मिलेगा मुकाम

ऐ दिल कहाँ खोई तेरी मंजिल
जीवन पथ में छाया अंधियारा है
रोशनी का है ना नामो निशाँ
कैसे ढूँढे  है  धुआँ ही धुआँ

खुशियाँ जाने कहाँ खो गई हैं
सदियों से राहें भी वीरां पड़ी हैं
डगमग सी डोले है नैया तेरी
कैसे खोजेगा तू अपना मकां

हर पल गम के फैले हैं साये
सब हुए बेगाने जो थे हमसाये
सब हुए अपने भी अब पराये
न खो हौंसला तो मिलेगा मुकाम
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 27 अगस्त 2018

वो गुज़रा ज़माना

आज फिर याद आया वो गुज़रा ज़माना
वो हर बात पर हमेशा तेरा यूँ मुस्कुराना

 मुहल्ले में मोटरसाईकिल पर चक्कर लगाना
बिना काम के भी सबसे मिलते हुए चले आना

वो सैर , सपाटे , दोस्तों संग पिकनिक मनाना
हर पल को बेफ़िक्री यूँ ही से ठहाकों में बिताना

एक पल को भी न कभी भी यूँ खाली गंवाना
हर पल ज़िन्दगी का है आखिरी पल समझाना

उन बीते लम्हों का अब मुझ पर ही  कहर ढाना
कोई तो कहीं से लौटा दे मुझे वो गुज़रा ज़माना
@मीना गुलियानी

रविवार, 26 अगस्त 2018

जिसकी अंतर्रात्मा शुद्ध हो

प्रेम तो ईश्वर की देन है
जरूरी नहीं तो जिस्मों में हो
यह तो आसमाँ से,ज़मीं से
चाँद सितारों से हवाओं से
इन बरसती घटाओं से
कल कल बहते झरनों से
पर्वत की श्रृंखलाओं से
दूर की अमराइयों से
वन की इन लताओं से
अपनों और बेगानों से
खामोशी से गुनगुनाने से
देश में या विदेश में भी
यह जागृत हो सकता है
यह तो पूजा है इबादत है
दिल और भावना का संगम
सत्य पर आधारित होना चाहिए
बिना छल कपट ईर्ष्या के
कहीं भी प्रकट हो जाता है
इसे छुपाना मुश्किल है
यह तो दिल की धड़कन में
संगीत की तरह बजता है
इसकी धुन वही सुन सकता है
जिसकी अंतर्रात्मा शुद्ध हो
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

मेरी शान है तू

तू मेरी है आरजू तू ही मेरी है ज़ुस्तज़ू
जिधर भी देखूँ मैं नज़र आये तू ही तू

हरसू तेरी ही वफ़ा मुझको नज़र आती है
जाऊँ कहीं दूर तो तेरी ही सदा आती है
हर पल साथ है तू मेरा एहसास है तू

देखूँ जो पलट के कहीं तू नज़र आये वहीँ
तेरे कदमों के निशाँ चलें संग मेरे वहीँ
मेरा ये जहान भी तू और मेरी शान है तू
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 20 अगस्त 2018

तुझे कितना मेरा ख्याल है

तुझे कैसे कह दूँ मैं खुश नहीं
तेरे दिल में लाखों सवाल हैं
क्या जवाब दूँ यही सोचूँ मैं
तेरे सामने मेरा हाल है

 ये जिंदगी बेसबब सी है
ये रौशनी न मतलब की है
तू नहीं जब मेरे पास तो
सब रौनके भी मुहाल हैं

किस काम की ये जिंदगी
जो किसी के काम न आ सके
शिकवे शिकायतें क्या करूँ
मेरे दिल की कब मज़ाल है

सारी  हसरतें तेरे दम से हैं
मेरी हर ख़ुशी तेरे दम से है
तू है बेखबर कैसे कहूँ
तुझे कितना मेरा ख्याल है
@मीना गुलियानी

रविवार, 19 अगस्त 2018

मेरी पीर न जाने कोय

मेरी वीणा के सुर खोए
दुःख कासे कहूँ सजना
मेरी पीड़ा न समझे कोय
दुःख कासे कहूँ सजना

कहाँ पे भेजूँ लिख लिख पत्तियां
मैं वो गाँव न जानू
कैसे काटूँ जीवन तुम बिन
मैं ये ज्ञान न जानू
कैसे दर्श तिहारो होय

प्यासे नैना तरसें तुम बिन
कब आवोगे साजन
बिना तुम्हारे सूनी बगिया
गुल मुरझाए साजन
मेरे नैना छमछम रोये

बिजुरी मोहे अगन लगावे
बदरिया जियरा जलावे
तुम बिन कल नहीं पावत जियरा
तड़प तड़प रह जाए
मेरी पीर न जाने कोय
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 18 अगस्त 2018

जुदा न कर पाऊँ

कैसे तुझे मैं अपने दिल से भुलाऊँ

बसते हो तुम दिल की गहराईयों में
हर बात में तेरा जिक्र कैसे न लाऊँ

तुम तो मौसम की तरह बदल जाते हो
फिर भी खुद के साये से लिपटा पाऊँ

तेरा वजूद ऐसे  जर्रे जर्रे में है समाया
तेरा अक्स खुद से जुदा न कर पाऊँ
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

धरती का सुंदर श्रृंगार

आज धरती ने किया श्रृंगार
कुंकुम लगाई है माथे पर
हरित रंग के वसन पहनकर
घटा से कजरा चुराकर
अपने नैनों में लगाकर
फूलों के कंगन हैं पहने
जुगनू जैसे लगे चमकने
कानों में धान की बाली
शोभा है कैसी मतवाली
पैरों के नूपुर की शोभा
करधनी ने भी मन को मोहा
बिजुरी जैसी लगी दमकने
हीरे मोती लगे चमकने
झूले पड़े सावन की फुहार
धरती को मिली ख़ुशी अपार
नाचे मयूरा पपीहा करे पुकार
उमंग लेकर आई है बयार
वर्षा  से ही पूर्ण होता है
धरती का सुंदर श्रृंगार
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

नन्हीं चिड़ियाँ चहचहाएं

ख़िज़ाँ ही क्यों देखूँ, चाहे ख़िज़ाँ है
बहार क्यों न देखूँ , जिसका रंग जवां है

आओ फिर से गढ़े नई परिभाषा
दोहराएँ वही  प्यार की भाषा
अँधेरे से निकलें ढूँढे उजाला कहाँ है

कोई नई उम्मीद भी जगायें
बगिया को फिर से महकायें
गुलशन में नन्हीं चिड़ियाँ चहचहाएं
@मीना गुलियानी 

झूला झुलाओ सखियो

आज झूला झुलाओ सखियो
कदम्ब तले आओ सखियो

बहे  शीतल बयार
नीचे यमुना की धार
प्यार अपना लुटाओ सखियो

सभी झूलो साथ साथ
लिए हाथों में हाथ
कभी छूटे न साथ सखियो

गाओ मंगल के गीत
यही दुनिया की रीत
प्रीत दिल से निभाओ सखियो
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 15 अगस्त 2018

इसे तेरी ही ज़रूरत है

बादलों की ठंडी छाँव में
और मदमस्त हवाओं में
तेरा मेरा गर साथ हो
तो फिर क्या बात हो

एक तरफ सिर्फ तुम हो
दूसरी तरफ सारी दुनिया
दिल की डोर फिर भी
तुम तक खींच लेगी

तेरे दीदार की चाहत है
प्यार में ही राहत है
जिंदगी तेरी अमानत है
इसे तेरी ही ज़रूरत है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

खुशियों का पैगाम आयेगा

वक्त का हर दौर गुज़र जायेगा
ग़म भी ज्यादा न ठहर पायेगा

कोई कहदे उनसे कभी आके मिलें
दूर कर दूँगी मैं सब शिकवे गिले
कोई दर्द न दिल में ठहर पायेगा

जबसे तुम रूठकर यहाँ से गए
सपने सब काँच से बिखर गए
गुलशन बिन तेरे उजड़ जायेगा

तेरी परछाईं मुझसे बात करती है
तू नहीं पास तन्हाई बात करती है
कब मेरी खुशियों का पैगाम आयेगा
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 13 अगस्त 2018

डोले मन और मेरे सपने

बावरा मन देखता है कैसे कैसे सपने
कभी लगते बेगाने से कभी लगे अपने

सपनों में देखती हूँ सुंदर सी इक नदिया
पास में उसके है मेरी फूलों वाली बगिया
इन्हीं फूलों से बुनती हूँ ख़्वाब मैं अपने

प्यासी प्यासी अखियाँ भी देखती हैं राहें
आजा पिया कबसे तेरी राह ये निहारें
प्यासा प्यासा सावन न बीते बिन अपने

काली काली बदरी है छाई मोरे अंगना
कोई संदेशा पिया का लाई मोरे अंगना
पुरवइया संग डोले मन और मेरे सपने
@मीना गुलियानी 

रविवार, 12 अगस्त 2018

हम अपने गले लगाएं

आओ चिराग़ मिलकर जलाएँ
तिश्नगी दिल की हम मिटायें

जो लम्हे पीछे हमसे छूट गए
हम उन्हें याद करके मुस्कुराएं

टूटकर गिर गए जो शाखों से
उन्हीं फूलों को फिर से सजाएँ

जिंदगी की टीस हम भुलाएं
दर्द को हम अपने गले लगाएं 
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 11 अगस्त 2018

न डगमगाना है

जीवन की डगर नहीं है आसां
फिर भी तुझे चलते जाना है
चाहे दिल हो बोझ से भारी
कदम न तुझे पीछे हटाना है

रास्ते में विकट पहाड़ भी होंगे
टूटते साये भी साथ न होंगे
पर तुझ हर हाल में केवल
कदम को आगे ही बढ़ाना है

लहरें सागर के तट से टकरातीं हैं
बदरिया भी घिरके छा जाती है
कौंधती है डराती है दामिनी भी
पर रख हौंसला न डगमगाना है
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

कोई दिलाए वो हौसले

ऐ दिल क्यों तू इस कदर
होता है बेकरार क्यों
दिल का चमन उजड़ गया
गुलशन का ऐतबार क्यों

माली ने सींचा था प्रेम से
पौधा भी कितना बड़ा किया
पर जो नसीब में था लिखा
उसको वही है मिल गया

रुठी हैं अब फ़िज़ाएं भी
लो चल पड़ीं हवाएँ भी
महफिलें भी उठ गईं
बुझ गईं शमाएं भी

दिल को सुकूँ कैसे मिले
कैसे मिटाएं शिकवे गिले
कैसे कम हो ये फासले
कोई दिलाए वो हौसले
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

हो जा प्रभु का दीवाना

ऐ दिल ढूँढ अपनी मंजिल
जलाके मन का दीपक
अँधियारा अन्तर  का मिटा
वीणा के तार कसके
सुर सप्तक तू जगा
मत भूल क्यों तू आया
कहाँ तुझको है जाना
ढूँढ अपना तू ठिकाना
छोड़ मृगतृष्णा की नगरी
हो जा प्रभु का दीवाना
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 8 अगस्त 2018

मेरी नैया पार की

स्वप्न सारे टूट गए
अपने सभी रूठ गए
बुझे गए चिराग सभी
तारे पीछे छूट गए

पर हम यहीं खड़े
राह पर रुके रुके
वक्त के उतार की
ढलान देखते रहे

कल तो सब बहार थी
खुशियाँ बेशुमार थीं
रौनके ही रौनके थीं
महफिलें थी प्यार की


बदल गया है वो समां
ख्वाब हो गया धुआँ
आसमाँ सुलग उठा
दिल मेरा बिलख उठा

नाव जब मंझधार थी
दिल ने इक पुकार की
पतवार तुमने थाम ली
मेरी नैया पार की
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

ये माज़रा क्या है

ऐ मेरे हमनशीं हुआ क्या है
क्या है तेरा मर्ज़ और दवा क्या है

मैं तो कुछ जानती नहीं तू बता
अपनी हालत का पता मुझको बता
सुनके कर दूँगी फैसला क्या है

ग़मों को तुम दबाए बैठे हो
कबसे मुझसे छुपाए बैठे हो
आखिर इस उदासी का सबब क्या है

कैसे इस जिंदगी को काटूँगी
तू है चुपचाप कैसे दुःख बाँटूगी
सबब इस तन्हाई का क्या है

हम नहीं हैं ग़ैर क्यों बताते नहीं
दिल में यूँ ग़मों को भी छुपाते नहीं
तुम्हीं कहदो ये माज़रा क्या है
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 6 अगस्त 2018

आत्मबोध भी वो कराने लगा

आज मन में आस का पंछी
फिर से नीड़ बनाने लगा
नई उमंगों से नई तंरंगों से
सपने नए वो सजाने लगा
खिलती हुई नई कलियों को
वो चुनकर ख़्वाब बुनने लगा
फूलों से राहें सँवारने लगा
गीतों की माला पिरोने लगा
उम्मीदों के पँख बिखराने लगा
ख़ुशी के गीत गुनगुनाने लगा
इस डाली कभी उस डाली पर
वो फुदकने लगा बौराने लगा
जोश में झूमने लगा कूदने लगा
मस्ती में गाने लगा मुस्काने लगा
कानों में रस वो घोलने लगा
सबसे मीठा मीठा वो बोलने लगा
मन की भाषा को समझाने लगा
अनकही बातें भी वो बताने लगा
प्रेम का सबक वो सिखाने लगा
आत्मबोध भी वो कराने लगा
@मीना गुलियानी 

रविवार, 5 अगस्त 2018

चली पुरवाई जो आँगन में

चुपके चोरी से जगा के गया
ये कौन आया मेरे आँगन में
सपने भी सारे जाग उठे
महक उठे हैं फूल आँगन में

धीरे धीरे चुपके से आया है कोई
यादों में मेरी समाया है कोई
दिल मेरा तो झूम उठा
अँचरा उड़ा है आँगन मेँ

उसके ही ख्यालों में खोने लगी मैं
जागते ही जागते सोने लगी मैं
सोये सपने जाग उठे
चली पुरवाई जो आँगन में
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 4 अगस्त 2018

दिल पर तू खाए बैठा है

क्यों तू नज़रें झुकाए बैठा है
ऐसा क्या  राज़ छुपाए बैठा है

दिल लगाना तो कोई खेल नहीं
तू क्यों दिल को लगाए बैठा है

क्या सिला मिला तुझे वफाओं का
चोट इस दिल पर तू खाए बैठा है
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

नैनों की भोली चितवन

मन भूला नहीं मधुर क्षण
स्वीकारा था तुमने निमन्त्रण
आँखों ही से हुई थी बतियाँ
चाहत भरी तेरी वो पतियाँ
कितना माधुर्य भरा था
नैनों में प्यार उमड़ा था
मदभरे थे वो चंचल नैना
दिल बोल उठा क्या कहना
तेरे नैना भी सकुचाए
लब कुछ भी बोल न पाए
हिरणी सी तेरी दो आँखें
मेरे दिल का चैन उड़ाए
कस्तूरी सी गन्ध है तुझमें
उसे पाके खिंचा आता मन
जाने क्या जादू किया है
तेरे नैनों की भोली चितवन
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

माला भी मुरझाए

जाने काहे  बदरा  घिर आए
जिया मोरा कल नहीं पाए

सूना मोरा अँगना आये नहीं सजना
राह तकत  मोरी अखियाँ थक जाएँ

कासे कहूँ बैना सूने हैं दिन रैना
दिन उगे फिर दिन ये ढल जाए

सूनी मेरी वीणा संगीत के बिना
बाती मन की जले फिर बुझ जाए

छिप गए हैं तारे छाए अँधियारे
सपनों की माला भी मुरझाए
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 1 अगस्त 2018

क्यों ओझल बता मुझे

ये किसकी पदचाप सुनाई दी मुझे
लगा तूने ही शायद सदा दी है मुझे

तेरे आने की कुछ महक सी आई
हवा का झोंका छूके गया मुझे

जाने क्यों दिल को इंतज़ार तेरा
जोशे जुनून ने भी तड़पाया मुझे

तू ही मेरी आरज़ू ज़ुस्तज़ू भी है
 नज़र से क्यों ओझल बता मुझे
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

बारिश की फुहार रंग लाई

रिमझिम रिमझिम बूँदे आई
छमछम बरसीं आज ज़मी पर
नभ में कितने सारे हैं पक्षी
खुश होते सब गगन में उड़कर
कोयल भी है कूक सुनाती
अबके मन को है वो हर्षाती
पपीहा ऊँची टेर लगाता
पी पी करके मेघ बुलाता
फिर आती भेड़ों की टोली
बच्चे उनसे करते ठिठोली
उनके आगे पीछे वो भागें
वो सब अपना रास्ता नापें
नाव चलाने की आई है बारी
बच्चे करने लगे हैं तैयारी
कागज़ की सब नाव बनाते
ठुमक ठुमक पानी में चलाते
बादल फिर आता इतराकर
बरसाता बारिश वो मनभर
मेंढक भी टर्राने लगता है
मेघ को बुलाने लगता है
गगन में इंद्रधनुष बन जाता
जिसे  देखना मन को लुभाता
धरती पर छाई हरियाली
जिसे देख फूला है माली
हरित तृणों पर चमके मोती
जगमग जगमग आभा होती
झूलों की फिर आई है बारी
झूले है वृषभानु की दुलारी
कान्हा जी उनको झूला झुलाएं
सभी मिलजुल कर ख़ुशी मनाएं
सौंधी सौंधी खुशबु सी आई
बारिश की फुहार रंग लाई
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 30 जुलाई 2018

उसे सामने मैं पाऊँ

मैं अपनी दुआओं में वो असर कहाँ से लाऊँ
जो दिल को तेरे लुभाए वो सदा कहाँ से लाऊँ

तू बेख़बर है मुझसे नाराज़ मैं नहीं हूँ
हूँ परेशां फिर भी तुझसे खफ़ा मैं नहीं हूँ
तेरे दीद की है हसरत तुझे कैसे मैं बुलाऊँ

तू किधर जा छिपा है दिल मेरा ढूँढता है
दे इक मुझे इशारा ये ज़माना पूछता है
जो नज़र से आज ओझल उसे सामने मैं पाऊँ
@मीना गुलियानी 

रविवार, 29 जुलाई 2018

मिटाये तपन

कैसा ये मिलन
तरसे है मन
बेकल चितवन
उलझे हैं नयन
ठंडी ये पवन
लगाए अगन
सुलझाए कैसे
बड़ी उलझन
लाये संदेशा
मस्त पवन
लहरों सा डोले
देखो ये मन
करे व्यर्थ चिंतन
चातक पी पी की
लगाए रटन
कोयल की कूक
अकुलाए मन
फूलों पे करें
भँवरे गुञ्जन
बारिश बरसाए
देखो ये घन
धरती की ये
मिटाये तपन
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 28 जुलाई 2018

उस पार ले चल

कैसे करूँ तुम पर यकीं
तुम अभी भी बदले नहीं
जहाँ पर तुम पहले खड़े थे
आज भी तुम जमे हो वहीँ

दिल को एहसास तो है
थोड़ा सा विश्वास तो है
पर है सब कुछ अधूरा सा
जाने कैसा कयास सा है

मन में होती है उलझन
दिल में होती है हलचल
शांत लहरें भी मचली
कहती उस पार ले चल
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

कली कली है मुस्काई

आज सुबह ही गगन ने
उषाकिरण की लालिमा से
धरती की मांग सजा दी
हरित तृणों को संवारकर
पग में पायल पहना दी
टेसू के फूल पीसकर
पैरों में महावर रचा दी
हरे पत्तों की मेहँदी लगा दी
मोगरे चमेली से गजरा बनाया
धरती के बालों पे लगाया
संध्या ने भी खेल रचाया
चंदा को धरती से मिलाया
तारों की चुनरी ओढ़ाकर
धरती को दुल्हन सा सजाया
चपला दामिनी चमकी नभ में
बदरी भी देखो घिर आई
मस्ती की बयार चहुँ ओर छाई
आज हर कली कली है मुस्काई
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

दोनों मर्जी है आपकी

हे मेरे गुरुदेव करुणासिन्धु करुणा कीजिए
हूँ अधम अधीन अशरण अब शरण में लीजिए

खा रही हूँ गोते मैं भवसिंधु मँझधार में
आसरा है दूसरा न कोई अब संसार में

मुझमें  है जप तप न साधन न कोई ज्ञान है
निर्लज्जता एक बाकी और बस अभिमान है

पाप बोझे से लड़ी नैया  भंवर में आ रही
नाथ दौड़ो अब बचाओ जल्दी डूबी जा रही

आप भी यदि छोड़ देंगे फिर कहाँ जाऊँगी मैं
जन्म दुःख से नाव कैसे पार कर पाऊँगी मैं

सब जगह से प्रभु भटककर ली शरण आपकी
पार करना या न करना दोनों मर्जी है आपकी
@मीना गुलियानी

बुधवार, 25 जुलाई 2018

घर को भी वो महकाएं

कुछ मीठे सुनहरे पल
आकर ठहर गए दो घड़ी
मेरे घर की दहलीज़ पर
वो भीनी यादें लाकर इस
बारिश में सराबोर करेंगे
मैं भी भीगना चाहती हूँ
उन पलों को अपने आँचल में
समेटकर रखना चाहती हूँ
वो पल बहुमूल्य धरोहर हैं
जो बचपन से यौवन की
लम्बी दूरी तय करके आये हैं
उन पलों के लिए मैंने अपने
घर का दरवाज़ा खुला रखा है
पता नहीं कब वो भीतर आएँ
ठंडी हवा लायें और बारिश की
भीनी सौंधी सी खुशबु से
मेरे घर को भी वो महकाएं
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

धरती की दी प्यास बुझा

आज सुहानी बरखा आई
धरती भी कितनी हर्षाई
फूल लगे देखो इतराने
भँवरे भी लगे मंडराने

कोयल ने फिर कूक मचाई
छमछम करती बारिश आई
कोंपल पर लगी मोती सी
दमके  हीरे नग की जैसी

धरती की हरियांली देखो
चंदा का शर्माना देखो
बदली में जाके छुप गया वो
तारों को लेके संग लिए वो

मोर लगा झूमने नाचने
पी पी करके बोला पपीहा
मेघ ने पानी दिया बरसा
धरती की दी प्यास बुझा
@मीना गुलियानी


सोमवार, 23 जुलाई 2018

महल नज़र आने लगी

जबसे आये वो मेरी जिंदगी में
जिंदगी खुद ही मुस्कुराने लगी

बहुत कुछ उनसे पाया है हमने
बातें सब समझ में आने लगीँ

पहले मुझसे नज़रें चुराते थे वो
फासलों में कमी फिर आने लगी

चुपके से दिल में वो समाने लगे
झोंपड़ी भी महल नज़र आने लगी
@मीना गुलियानी 

रविवार, 22 जुलाई 2018

मैंने इससे सीखा

एक दिन इक नन्ही तितली
उड़ती हुई आई मेरी बगिया में
बैठी वो इक फूल पे पहले फिर
वो बारी बारी से लगी कूदने
कभी इस फूल पर कभी उस पर
उसके पँख बहुत सुन्दर थे
रंग भी उनका था चटकीला
सब फूलों का पराग वो लेकर
बैठी चुपचाप मेरी हथेली पर
फिर उड़ गई वो हाथ से मेरे
अपने सारे रंग वहीं छोड़कर
मेरा मन भी वहीं खो गया
कुछ सोच में मैं खो गया
विधाता ने क्या इसको रचा है
इंद्रधनुष सा रंग इसको दिया है
मुक्त गगन में वो उड़ती है
दिल में सबके उमंग भरती है
सारा दिन फूलों से पराग चुनती
मेहनत से कभी नहीं वो थकती
रेशम सा कोमल जिस्म है इसका
जीवन में रंग भरना मैंने इससे सीखा
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 21 जुलाई 2018

सुबह करती हूँ ध्यान

सुबह के पौ फटते ही
उषा ने लाली बिखराई
उधर से ची ची करती हुई
इक सुंदर सी चिड़िया आई
फुदक रही थी वो डाली पर
दाना वो चोंच अपनी में भर
नन्हा चूज़ा भी था साथ में
उछल रहा था वो खुश होकर
चोंच में अपनी दाना भरकर
चिड़िया उसे खिलाती पेटभर
अपने डैनों को फैलाकर वो
नन्हे चूज़े को देके सहारा
वो गगन में उड़ना सिखाती
उसे देखना मुझे भाता है
पक्षियों का ये कलरव भी
मधुर संगीत बन जाता है
तोता मैना और कबूतर
कोआ  गौरेया और तीतर
सारे रोज़ ही दाना चुगने
पहुँच जाते हैं मेरी छत पर
प्रभु जी की ये किसी माया
कैसा उसने भी खेल रचाया
हर प्राणी को वो खुश रखता
सबका रोज़ पेट वो भरता
करती हूँ मैं उन्हें प्रणाम
रोज़ सुबह करती हूँ ध्यान
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

बचाले तू मुझे

यहाँ क्या हो रहा है , नहीं तू बेख़बर है
मेरी बन्दगी है कम , तुझे पूरी फ़िक्र है

मैंने कब माँगा तुझसे, झोली में खज़ाना भर दे
जो भी दे ख़ुशी से , पर इतनी मेहर दे
तू सुख दे या ग़म ,पर आँखे न हों नम
मैं हूँ खुदगर्ज़ इंसान ,माँगती हूँ तुझसे रहम दे

दुनिया ठुकराती है , तेरा दर नज़र आता मुझे
तू ही इक सहारा है , तू ही किनारा दे मुझे
मेरे पापों ने ,मेरे कर्मों ने डुबोया है मुझे
तू ही खिवैया बन ,पार लगा ,बचाले तू मुझे
@मीना गुलियानी 

वो गुज़रा ज़माना

किसी शाम सा था  तेरा
मेरी जिंदगी में ठहरना
बेशक वो था ज़रा सा
लेकिन बेहद ही खूबसूरत

अब तक भुला न पाया
 वो गुज़ारे जो हमने साथ
तन्हाई के रोमांचक पल
 मेरा जीवन दिया बदल

याद आती हैं तेरी बातें
वो मुलाक़ातें चाँदनी रातें
तेरा गुनगुनाना मुस्कुराना
कोई लौटादे वो गुज़रा ज़माना
@मीना गुलियानी



मंगलवार, 17 जुलाई 2018

आँगन में बरसने लगेंगी

तुम अपनी मस्त चाल चलते रहो
नदिया भी तुम संग बहने लगेगी

तुम आज खिलखिलाकर हँसदो ज़रा
फ़िज़ाओं में रंगत बिखरने लगेगी

बालों में गजरा तुम लगाओ ज़रा
हवा ये गुलों से महकने लगेगी

तुम हवाओं में झूमो तो आज
लताएँ तुम संग थिरकने लगेँगी

फुरसत के क्षण कुछ निकालो ज़रा
खुशियाँ आँगन में बरसने लगेंगी
@मीना गुलियानी

सोमवार, 16 जुलाई 2018

आके ख़्वाबों में मिलें

कभी ऐसी भी हवा तो चले
कौन कैसा है पता तो चले

तुम उठके अभी से कहाँ को चले
अभी तो मिटाने हैं शिकवे गिले

कितनी मुद्दत बाद हमें तुम मिले
मिटाने हैं सदियों के ये फ़ासले

अभी तो शुरू किये बातों के मसले
पूरे कहाँ होंगे अभी ये सिलसिले

उम्मीदों को अपनी जगाए  रखना
कहना उनसे आके ख़्वाबों में मिलें
@मीना गुलियानी 

रविवार, 15 जुलाई 2018

खुशबु को पाकर महकने लगे

बहुत दूर है तुम्हारे घर से
हमारे घर का ये किनारा
पर हम हवा से पूछ लेते हैं
क्या हाल है अब तुम्हारा

यूँ तो आती जाती बदली
तुम्हारी राह पे जब कौंधती है
हम चौंक उठते हैं देखकर
छुपा है इसमें तुम्हारा इशारा

फूल पत्ते सब मुस्कुराने लगे
नग्में  सब प्यार के गाने लगे
दिल को ये दिन सुहाने लगे
जुगनू भी अब जगमगाने लगे

पत्ते  चिनारों से गिरने लगे
ओस के कण बिखरने लगे
फूलों से दामन हम भरने लगे
खुशबु को पाकर महकने लगे
@मीना गुलियानी




शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

बरसात चली आई

तुम मिले ,बिछुड़े , पर जब फिर से मिले
मेरी जिंदगी में ख़ुशी की इक किरण आई

अब यह क्या हुआ अचानक ख़ुशी हमारी
किसी से देखे न बनी देखते ही जुदाई आई

 कोई बात नहीं क्या हुआ जो तुम पास नहीं
दिल के कोने में तेरी याद चुपके से चली आई

है मन भी कुछ उदास इसे भी है प्यार की प्यास
पलकें भी हैं भीगीं अन्जाने ही बरसात चली आई
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

पायल अपनी छनकाई है

आज धरती दुल्हन सी नज़र आई है
ओढ़ तारों की चुनर खुद ही शरमाई है

चाँद भी देख रहा तिरछी नज़र से उसको
गगन भी डोल उठा दे हिण्डोला उसको
बादल ने रिमझिम बारिश भी बरसाई है

देखो कैसा बदला समां हर नज़ारा है जवां
पत्ता पत्ता बूटा बूटा बोले नज़रों की जुबां
फूल से भँवरे ने भी प्रीत कैसी लगाई है

कोई अजनबी न रहा सब हो गए अपने
अरमां जगने लगे सच हो गए सपने
जुगनू चमकने लगे बजी कहीं शहनाई है

अंबर खुश है बहुत धरती का बदला समां
दोनों हिलमिल से गए चाँद हो गया बेजुबां
आज धरती ने पायल अपनी छनकाई है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 10 जुलाई 2018

दिल पे इख़्तेयार

आओ कहीं छिप जाएँ खो जाएँ फिर इक बार
धीरे धीरे चुपके से फिर आएगा खुमार

मुझको अभी भी याद है जब तुमसे हम मिले
कितनी सुहानी शाम थी कैसे थे सिलसिले
कैसे भुलाएं मस्त पवन वो शाम की फुहार

थामे हमारे हाथों को जब साथ तुम चले
ऐसा लगा कि जल उठे बुझते हुए दिए
तबसे तुम्हारी याद में दिल मेरा बेकरार

बरखा की रुत सुहानी लो मदमाती आ गई
दिल पे मेरे वो बिजलियाँ आके गिरा गई
ऐसे में भला रहता है कब दिल पे इख़्तेयार
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 9 जुलाई 2018

अचानक बुझती है

इक सेज़ पे मातम छाया है
इक सेज़ सजी फूलों वाली
इक चमन का मालिक हँसता है
इक बाग़ का रोता है माली

इक द्वार पे बजती शहनाई
इक द्वार से अर्थी जाती है
इक मांग तो लो सिन्दूर भरा
इक मांग उजड़ती जाती है

इक महफ़िल लो आबाद हुई
इक बज़्मे मुहब्बत लुटती है
देकर के उजाला औरों को
इक शमा अचानक बुझती है
@मीना गुलियानी 

रविवार, 8 जुलाई 2018

मूक पुकार न की

नीरव निशीथ में चन्द्र किरण
ज्योत्स्ना हास से धवलित हो

सच कहना तव उर सपनों में
मिलने की मृदु मनुहार न थी

क्या कभी तुम्हारे प्राणों ने
प्रियतम की मूक पुकार न की
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 7 जुलाई 2018

बिन खिले मुरझाई है

आज फिर से तुम्हारी याद चुपके से चली आई है
मेरे मन की कली भी होले से फिर मुस्कुराई है

तुमने न आने की कसम कभी खाई थी
तब तुमने दिल तोड़ने की रस्म निभाई थी
तुम्हारी याद ने फिर बगिया मेरी महकाई है

दिल को सुकूँ मिलता है तुझे याद करके
मुझे हौसला मिलता है चाहत का रंग भरके
जाने न हम क्यों  होती दुनिया में रुसवाई है

तुम्हें कसम है मेरी दूर तुम न जाया करो
जाओ कभी तो जल्दी ही लौट आया करो
वरना  तमन्ना मेरी बिन खिले मुरझाई है
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

अंतर्मन की छटपटाहट

पत्थर से बना है घर हर दीवार रंगीन है
इसमें रहने वालों की जिंदगी संगीन है
जो होना है वो होके  रहेगा इक दिन
पर काटे नहीं कटता हर लम्हा हर दिन

दिखने में तो यह इक महल बना है
नीँव कहाँ है  ?   किसपे खड़ा है  ?
सब देखते  इसकी बाहरी सजावट
नहीं दिखती अंतर्मन की छटपटाहट
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

तुझे पा लूँगा

मचल रही यूँ यादें तेरी
लहर लहर जैसे झील का पानी
मैंने कभी सोचा था कि
सच में न सही झूठ ही सही
यथार्थ में न सही ख़्वाब में सही
मैं अवश्य तुम्हें पा लूँगा
पर तू सच ही निकली
जिंदगी ख्वाब ही रही
मैं अपने तसव्वुर के पुल बाँधूगा
तू न सही तेरा अक्स ही सही
अपनी यादों में ही सही तुझे पा लूँगा
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 4 जुलाई 2018

दो मसले

बस ये दो मसले 
जिंदगी भर न हल हुए 
न नींद पूरी हुई 
न ख़्वाब मुकम्मल हुए 
वक्त ने कहा कि काश 
थोड़ा और सब्र होता 
सब्र ने कहा कि काश 
थोड़ा और वक्त होता 
बचपन में पैसा जरूर कम था 
पर उस बचपन में दम था 
अब पास में महँगा मोबाईल है 
पर गायब वो बचपन की स्माईल है 
ऐसी बेरुखी देखी है हमने 
कि लोग आप से तुम तक 
तुम से जान तक और 
जान से अनजान बन जाते हैं 
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

मेरे नाम से पहले

दिले नाकाम लूट चुका है अंजाम से पहले

मेरी तकदीर का सितारा भी अभी टूटा है
आवाज़ आई थी शिकस्ते जाम से पहले

तुम्हारी याद हमेशा ही क्यों आती है हमें
सितारे फलक में चमकते हैं शाम से पहले

कैसे जानेगा कोई दिल में उमड़ते हुए तूफ़ान
इक सन्नाटा सा छाया है कोहराम से पहले

मेरी बर्बादी के अफ़साने जहाँ में जब होंगे
तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले
@मीना गुलियानी 

दिल चमकाने को

बेल सी वो लिपटी रही खुशी पाने को
लबों को खोला जिसने मुस्कुराने को

कोशिशें तमाम की उसने ग़म भुलाने को
सब नाक़ाम हुईं मगर राह पे उसे लाने को

सिर्फ बजरी सीमेंट से आशियाँ नहीं बनता
दिल को भी जलाना पड़ता है इसे बनाने को

तेरा अक्स तो खुद ब खुद ही उभर आएगा
कोशिश करो आईना ऐ दिल चमकाने को
@मीना गुलियानी 

रविवार, 1 जुलाई 2018

मकां सा है

आसमां आग ये उगलता है
सारा मंज़र धुआँ धुआँ सा है
तुमसे दुश्मनी क्या हुई
ख़ाक गुलिस्तां सा है
शहर ये बेज़ुबाँ सा है
ले गया कहकहे हमारे सब
जो बना मेहरबां सा है
मुन्तज़िर यूँ तो ये जहाँ सा है
तेरे दहलीज़ पर कदम जो पड़े
जगमगाने लगा मकां सा है
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 25 जून 2018

ये रिश्ता कैसा है

छलकते हुए अश्कों ने बताया दर्द कैसा है
उसकी बेरुखी ने समझाया हमदर्द कैसा है
 घमण्ड ने जताया उसके पास  खूब पैसा है
व्यवहार ने बताया उसका परिवार कैसा है
मीठी वाणी से पता चला  वो इंसान कैसा है
तल्खियत से पता चला ज्ञान कितना है
स्पर्श से पता चला कि वो व्यक्ति कैसा है
वक्त ने बता दिया कि ये रिश्ता कैसा है
@मीना गुलियानी 

रविवार, 24 जून 2018

ऐसी मिली सौगात है

जाने क्या बात है , नींद कोसों दूर है
           ढलने को रात है

उसने क्या है कहा जो था मैंने सुना
अनकही  बातों का सिलसिला चला
बातों बातों में ढलने लगा जो समां
अब शुरू हो गई फिर वही बात है

तूने जो भी कहा  वो अधूरा ही कहा
वादियों में गूँज उठी इसकी सदा
चुपके चुपके से कह गई कान में
आज होने लगी फिर वो बरसात है

फूल पत्ते चिनारों के कहने लगे
धड़कनें बनके दिल में रहने लगे
खामोशी बन गई जुबां आज तो
खुशियों की ऐसी मिली सौगात है
@मीना गुलियानी

शनिवार, 23 जून 2018

तमन्ना निकल जायेगी

 तेरे चुप रहने से जां चली जायेगी
मुस्कुराओगे तो जां में जां आयेगी

गेसुओं में न मुखड़ा छिपाया करो
थोड़ा थोड़ा सा यूँ मुस्कुराया करो
दिल की बुझती शमा भी जल जायेगी

मुझसे नाराज़ हो माफ़ कर देना तुम
हूँ खतावार मुझको सजा देना तुम
रूठने से घटा ये बरस जायेगी

तेरे नाराज़ होने से बदला समां
दिल की बेताबियों से उठता धुआँ
खुश रो हर तमन्ना निकल जायेगी
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 22 जून 2018

अंत भूलता नहीं

मेहनतकश इंसान कभी घबराता ही नहीं
ज़मीं हो या आसमां थर्राता वो नहीं

सर झुकाकर रहना सीखा है उसने
कभी गुरूर से गर्दन तानता वो नहीं

जानता है वक्त लगता बड़ा होने में
इस पर भी हार मानता ही वो नहीं

उसकी मेहनत जब भी रंग लाती है
बावजूद इसके भी इतराता वो नहीं

अपनी हैसियत का खूब पता है उसे
माटी में मिलना है अंत भूलता नहीं
@मीना गुलियानी 

मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं

मेरे मन में भावनाओं का समुद्र
हर समय उमड़ता ही रहता है
इस ज्वारभाटे को रोका नहीं जा सकता
रोकने पर अश्रुधारा के रूप में ये
प्रवाहित होने लग जाता है
इसके बहाव  पर लगाम लगाना
नामुमकिन है , टेढ़ी खीर है
वैसे तो इसके अविरल रूप से
प्रवाहित होने से मन शांत होता है
नैराश्य धुल  जाता है चैतन्य
जागृत होने पर आप जिस ओर चाहो
इसे पुन: आकृष्ट कर  सकते हो
आध्यात्मिकता ,वैराग्य,भक्ति
कहीं भी मोड़ सकते हो
जीवन की पृष्ठभूमि पर एक
नई व्याख्या लिख सकते हैं
मन के भीतर दीपक प्रज्वलित करके
गहन अन्धकार मिटा सकते हैं
मन को साधकर कुण्डलिनी को
जागृत करके मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं
@मीना गुलियानी

बुधवार, 20 जून 2018

कोई गुनगुनाता है

अरे पपीहे तू क्यों इतना मुझे रुलाता है

जुबां पे तेरी पी पी नाम क्यों आता है
सदा ऐ ग़म की किसको तू सुनाता है

जो पहले से दुखी हो क्यों उसे सताता है
जो खुद ही जल रहा हो क्यों जलाता है

तू ये रोज़ आँसू किसके लिए बहाता है
जो सुनता नहीं क्यों दर्द उसे बताता है

चला जा  यहाँ से मत बर्बाद कर जिंदगी
कारवाँ तेरी मुहब्बत का लुटा जाता है

बसा ले आशियाँ जहाँ मिले सुकूँ का निशाँ
बसाले बस्ती ख़ुशी से कोई गुनगुनाता है
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 19 जून 2018

दीपक बुझा न सके

दिल से हम तुम्हें भुला न सके

साथ आँखों ने हमारा तो दिया
आँसुओं ने सहारा हमें तो दिया
दाग ऐ दिल फिर भी मिटा न सके

चाँद में देखी है तेरी सूरत
रात बन गई एक मुसीबत
गम के बादल हम हटा न सके

आहों ने भी तो आग लगाई
आँसुओं ने बिजली गिराई
हम जले दीपक बुझा न सके
@मीना गुलियानी




सोमवार, 18 जून 2018

निश्छल हृदय से है

विश्वास है एक आस
भरोसा है एक अहसास
कुछ पाने का कुछ खोने का
क्षणिक भर छलना बन रहने का
तेरा ही संग पाने का तू मेरा है
इसकी अनुभूति ऐसी है जैसे
पंछी को परों से
भक्त को ईश्वर से
शिशु को माँ से
पत्ते को डाली से
शब्द को आवाज़ से
आवाज़ को संगीत से
संगीत को आराध्य देव से
यथार्थ को धरातल से
प्रेमी को निश्छल हृदय से है
@मीना गुलियानी 

रविवार, 17 जून 2018

अपनी राह चल दिया

कल एक फूल ने पूछा मुझसे
तुम क्यों उदास चुपचाप हो
बोला तुम अपनी पीड़ा मुझसे कहो
यूँ न गुमसुम से तुम बैठे रहो
दिल है क्यों हैरान और पशेमान
किसने किया है तुम्हें परेशान
अपनी उलझनें बताओ तो ज़रा
क्यों खामोश रहते हो बताओ ज़रा
मैं चुपचाप सब सुनता ही रहा
अब मुझे लगा कोई मिल गया
ग़म हल्का करलूँ यकीं मिल गया
मैं चुपके से चला पगडंडी के पार
धीरे धीरे से आई वो ठंडी बयार
छूके मुझे होले से कानों में बोली
कुछ बातें मुझसे करो हमजोली
जाने क्या नशा सा छाने लगा
उसकी बातें सुन मुस्कुराने लगा
उसने हल्की सी की सरगोशियाँ
वादियों में मेरी गूँजी सिसकियाँ
मेरा सारा ग़म आँसुओं में ढल गया
मुस्कुरा के मैं अपनी राह चल दिया
@मीना गुलियानी

शनिवार, 16 जून 2018

,तेरी ये ओढ़नी

पिया मैंने ओढ़ली ,तेरी रंग भरी ओढ़नी

तूने प्यार से दीन्हि मुझको
रंग भी सारे दे दिए मुझको
भीग गई तेरे रंग में , भीगी ये ओढ़नी

पिया न फीका होवे रंग
ऐसो रंगो न होवे बदरंग
कसके चास लगाओ ,फीकी न होवे ओढ़नी

कितने जतन से ओढ़ूँ इसको
प्रेम से कितने सहेजूँ इसको
बार बार मुस्काऊँ पहनकर ,तेरी ये ओढ़नी
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 15 जून 2018

छनकने लगी है

आने से तेरे जैसे बहार आ गई है
ख़्वाबों की दुनिया सजने लगी है

सवरने लगे फूलों के गुंचे भी अब 
हवा भी रुख अपना बदलने लगी है
खिली देखो सरसों जूही ,चमेली
 दिल की बगिया महकने लगी है

फूलों ने देखो बिछाई है चादर
उषा भी अपनी लाई है गागर
सूरज की लाली लगी है चमकने
गागर भी अब छलकने लगी है

हँसी शाम अब तो होने को आई
सितारों ने अपनी महफ़िल जमाई
चंदा गगन में लगा मुस्कुराने
शबनम भी देखो बहकने लगी है

रंगीन मौसम रुत भी जवां है
फूलों से महका ये गुलिस्तां है
मिले आज तुम हर अरमां जवां है
 पायल ख़ुशी से छनकने लगी है
@मीना गुलियानी




गुरुवार, 14 जून 2018

बहुत ख़ास हूँ मैं

सत्य क्या है पता नहीं
अभी तक उसकी तलाश में हूँ
धैर्य क्या है फिर भी शायद
उसके आस पास हूँ मैं
आकाश के तारों में नहीं
चन्द्रमा के दाग़ में हूँ
धरा के किसी छोर में  नहीं
न ही रवि के प्रकाश में हूँ मैं
पूर्णिमा की रात में नहीं
अमावस की रात में हूँ मैं
निर्जीव सन्नाटे में नहीं
न सजीव बात में हूँ मैं
न ही राधा के रास में
न ही उमा के लास्य में हूँ मैं
पर इस जगत में कहीं न कहीं
किसी के लिए बहुत ख़ास हूँ मैं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 13 जून 2018

खेलूं संग संग में

आज मैं तो उड़ती चलूँ मस्त पवन में
झूमूँ नाचूँ गाऊं मैं अपनी ही लगन में

जिया झूमे चुनरिया लहराए
सर से पल पल सरकती जाए
छू लूँ बादलों को मैं उड़के गगन में

मेरे संग संग चलती पुरवइया
मेरे गज़रे की लेके बलैया
मन मयूरा नाच उठा संग पवन में

ओढ़ूँ तारों की झिलमिल चुनरिया
चंदा देखे तो यूँ चमके बिजुरिया
आँख मिचौनी भी खेलूं संग संग में
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 12 जून 2018

वादियों में हो जाएँ ग़ुम

नदिया के पार चलो करलें बसेरा हम तुम 
ढूँढे हमें सारा जहाँ कहीं खो जाएँ हम तुम 

ठण्डा ठण्डा पानी यहाँ भँवरे  गुनगुनाते हैं 
फूल गुलिस्तां में तो सब खुशबु लुटाते हैं 
चलो यहीं खो जाएँ होश हो जाने दो ग़ुम 

मस्त मस्त मौसम है हवा मतवाली है 
दिल मेरा झूम रहा झूमे डाली डाली है 
कितना सुकूँ है यहाँ चलते रहें हम तुम 

न रुको तुम भी कहीं न रुकें हम भी कहीं 
बढ़ते रहें हम आगे न दिखे हद है कहीं 
दोनों थामें हाथों को वादियों में हो जाएँ ग़ुम 
@मीना गुलियानी 

ऐसा गुलिस्तां करदे

सबके दिलों में तू आज उजाला करदे
दूर दुनिया से नफरत का अँधेरा करदे

हर दिल में सदाकत की शमा रोशन हो
झूठ का शरारा भी हर दिल से दूर करदे

प्यार के फूल खिलें जिससे महके ये फ़िज़ा
न रहे दिल में नफरत के लिए बाकी जगह

न हो कोई दुश्मन न किसी से वैर यहाँ
हर तरफ अमन  का ही रहे नामोनिशां

सबके दामन को खुशियों के गुलों से भरदे
न कभी आये ख़िज़ा ऐसा गुलिस्तां करदे
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 11 जून 2018

गीतों की तान सुनाई

है  मौसम हँसता हँसता नहीं वक्त कभी भी रुकता
चलो सफर  पे बढ़े चलो ये रास्ता कभी न रुकता

मस्ती की बयार छाई तन मन की सुध है बिसारी
झूमे है हर इक पौधा  ,खिल गई हर इक क्यारी
सूरज की लाली छाई , हर कली कली मुस्काई
कोयल भी देखो है कूकी लगा बसंत ऋतु आई

बद्री भी देखो घिर आई चपला दामिनी चमकी
लेकर के नई चित्रकारी मीनाकारी है अंबर की
हंसों की टोली है आई गीतों की गूँजी शहनाई
अंबर ने अपनी मस्ती में गीतों की तान सुनाई
@मीना गुलियानी