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शनिवार, 2 सितंबर 2017

घुट घुट के न मर जाऊँ

टूटी  है वीणा टूटी है आशा
व्यथित मन की हूँ परिभाषा
बोलो गीत मैं कैसे गाऊँ
कैसे मै  अब मुस्काऊँ

कब जाने ये बंधन टूटा
जाने क्यों तू मुझसे रूठा
जोड़ूँ कैसे मैं टूटे रिश्ते
कैसे दिल को धीर बँधाऊँ

सारे अपने छूट गए हैं
 रिश्ते नाते टूट गए हैं
अपने पराये से लगते हैं
किसको मैं मीत बनाऊँ

आसमान  से टूटे तारे
बिखरे हैं बनके अंगारे
सुलग रहा है मन मेरा
जाने क्यों मैं अकुलाऊँ

हाल कोई तो पूछे मेरा
काश कोई तो होता मेरा
किसे दिखाऊँ दिलके छाले
घुट घुट के न मर जाऊँ
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

तुम न होते तो क्या होता

कभी कभी मैं सोचती हूँ
तुम न होते तो क्या होता
न दिल का सुकूँ खोता
न यूँ उदास ये होता

            न नज़रों के बोल हम सुनते
            न सपने नए रोज़ बुनते
             न कभी फूल मुस्काते
             न भँवरे ये गुनगुनाते

न चिड़िया ये चहकती
न हवाएँ यूँ बहकती
न घटाएँ आँसू बहाती
न कलियाँ यूँ मुस्काती

           न आता मदमस्त वो सावन
           न फूलों से महकता गुलशन
          न दिल गुलज़ार ये होता
          न तुमसे प्यार यूँ होता

न दिल में अरमां होते
न आँख में आँसू होते
न होती हमें बेकरारी
न दिल को होती लाचारी

          न कल कल झरने बहते
          न हम तुम ऐसे मिलते
         न चमन में फूल यूँ खिलते
         न खुशियों के पल मिलते
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 30 अगस्त 2017

जाने कब परदेसी आये

ये साँसों की डोर न पड़े कमज़ोर
इक बार तो मुख दिखला जाना
बात जोहती हैं आँखे सूने हैं कोर
दिल मेरा ज़रा सा बहला जाना

                 कोयल कूकना है भूली मैना रास्ता भूली
                 भूली चिड़िया रानी अब तो चहकना
                 भूले भँवरे अपनी गुंजन भूले बहकना
                 कलियाँ सुध बुध में भूली हैं खिलना

तुम बिन बिरहन कल न पाती
भेजी लिख लिख तुझको पाती
कब आओगे इस देस लिखना
परदेसी न तड़पाओ अब इतना

                आवे बिरहन को फिर चैन
                पोंछे भर भर अपने नैन
                बैठी पथ पे आँख बिछाए
                 जाने कब परदेसी आये
@मीना गुलियानी


सोमवार, 28 अगस्त 2017

सब्र की इन्तहा कहाँ तक है

न पूछ मुझसे सब्र की इन्तहा कहाँ तक है
तू ज़ुल्म कर ले तेरी हसरत जहाँ तक है

न पूछो मुझसे ये नज़रें क्या ढूँढती रहती हैं
पूछो इनसे ये खुद से भी ख़फ़ा कहाँ तक हैं

आये ख्याल उनके तो आँखों में सिमट गए
मालूम न था इनको मुरव्वत कहाँ तक है

हुए मशहूर तुम तो हम भी मसरूफ हो गए
अब पता चला हमें तेरी शौहरत कहाँ तक है

काँधे पे ज़नाज़ा खुद का तलाशते राहबर को हम
किससे पूछे पता उसका जहाँ फैला कहाँ तक है
@मीना गुलियानी 

रविवार, 27 अगस्त 2017

संतप्त मन को शांत कर जाओ

आज तुम मेरे हृदय में बस जाओ
 अतृप्त मन पे  करुणाजल बरसाओ

थम जाए भावों का क्रन्दन
विचलित न हो फिर ये मन
तुम फुहार बनके बरस जाओ

नवांकुर फूटने लगा धरा पर
थामो हाथ मेरा बनो हमसफ़र
मन मेरा तुम आज हर्षाओ

कैसी विहंगम दृष्टि तूने डाली
कूकी है देखो कोयल ये काली
मन मयूरा नाचे  साज़ बजाओ

संध्या भी देखो तारों को लाई
धानी चुनरिया मोरी लहराई
संतप्त मन को शांत कर जाओ
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

धड़कन कैसे सुन पाओगे

बोलो तो ज़रा मेरे अन्तर्मन कितना मुझको तड़पाओगे
कब तक मैं जिऊँ चुप रहके कब तक मन को बहलाओगे

हर पीड़ा मुझसे पूछती है ये कलियाँ क्यों मुझसे रूठी हैं
तुम जानते हो इनकी भाषा मेरी तो हिम्मत टूटी है
अब तक तो जिए हम घुट घुट के कितना और सताओगे

मैं भूल गई प्यारे सपने गुम हो गए सब जो थे अपने
मोती की माला बिखर गई जिनमें गूँथे थे हर सपने
अब कैसे गाऊँ गीत नए सुर कैसे तुम सुन पाओगे

न साज बजाया जा सकता न गीत कोई दोहरा सकता
अब तुम ही बताओ कैसे अपना दिल मैं बहला सकता
साँसे भी अब थमने को है धड़कन कैसे सुन पाओगे
@मीना गुलियानी

सोमवार, 21 अगस्त 2017

घड़ी हुई जग जाने की

समय परिवर्तनशील बना  है घड़ी हुई जग जाने की
अपनी क्षमता को पहचानो बात यही समझाने की

सब स्वार्थ के पुतले यहाँ हैं मन में कितनी कटुता है
अपनापन भुलाया सबने मानव मूल्य न दिखता है
हिम्मत अपनी आज जगाओ उन्हें मार्ग पर लाने की

आज की पीढ़ी को तुम देखो कितनी दलदल में है धँसी
हर तरफ है अनाचार दुष्प्रवृति के जाल में है ये फँसी
तुमसे ही  आशाएँ हैं इनको सन्मार्ग दिखलाने की

तुम भारत माँ के सपूत हो कर  सकते हो काम बड़ा
उस जननी का मान बढ़ाओ जिसको तुमपे नाज़ बड़ा
है ज़रूरत आज हमें है  गुमराह को राह पे लाने की
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

पथ की ऐसी करें तैयारी

आज की नारी में ऊर्जा का भारी संचार हुआ
नई चुनौती की तैयारी हेतु इसको है चुना
युगों से सुप्त जन सत्ता भी आज है जागी
धर्म कर्म की सत्ता में है इसकी भागीदारी

काम नहीं आसान बहुत लहरों से टकराना
है चुनौतीपूर्ण पर तनिक न तुम घबराना
सतत साधना बुद्धिबल से साहस बढ़ाएँ
युग निर्माण में जुड़ें हम ऐसा कदम बढ़ाएँ

वैर भाव मिटा दें सारे हर कटुता बिसरा दें
जन जन के मानस  में आशादीप जलादें
रोक न पाए कोई भी अक्षमता या लाचारी
हर अवरोध मिटादें पथ की ऐसी करें तैयारी
@मीना गुलियानी 

रविवार, 13 अगस्त 2017

गम रहेगा क्यों फासले मिले

जिंदगी की तलाश में जब हम निकले
जिंदगी तो मिली नहीं तजुर्बे बड़े मिले

दोस्तों से जब हम  मिले तो  पता चला
जिंदगी में रौनक के उनसे थे सिलसिले

जिंदगी मेरी एक रंगमंच बनकर रह गई
टूटते पुर्जे जुड़ने का नाटक करते हुए मिले

जलने वालों की इस जहाँ में कोई कमी नहीं
बिना तीली सुलगाये दिल जलाते हुए मिले

शीशा और पत्थर बनकर संग रहे दोनों
अब बात कुछ और है टकराते हुए मिले

जिंदगी के कई  ख़्वाब अधूरे पड़े रहे
हर लम्हा गम रहेगा क्यों फासले मिले
@मीना गुलियानी


बुधवार, 9 अगस्त 2017

सन्देश ये तुमको देती है

तेरी आँखों से बहता जल
बूँद बूँद इक मोती है

नदिया की धारा भी देखी
सागर  से वो मिलती है
पर किसी की याद में तेरी
आँख रात भर रोती है

नीम खेजड़ी की शाखाएँ
कितनी ही गदराई हैं
चकवी चकवे की याद में
आँसू से मुख धोती है

नया सवेरा फिर आएगा
डूबा सूरज उग जाएगा
हर पत्ते पर ओस की बूँदे
सन्देश ये तुमको देती है
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 5 अगस्त 2017

सर अपना झुकाने लगे हैं

बिना पिए ही कदम लड़खड़ाने लगे हैं
राहों में फिर से डगमगाने लगे हैं

बहारें तो आई थीं कुछ दिल पहले
ख़ुशी दिल में आई हम भी बहले
गुलिस्तां के फूल मुरझाने लगे हैं

सोचा था क्या हमने क्या हो गया है
यकीं जिसपे था बेवफा हो गया है
दिल तसल्लियों से बहलाने लगे हैं

जिए हम अधूरे रहे हम अकेले
जाने कहाँ छूटे खुशियों के मेले
सपनों के फूल बिखराने लगे हैं

करूँ मैं दुआ गर उसको कबूल हो
गुनाह माफ़ करदे जो उसे मंजूर हो
सज़दे में सर अपना झुकाने लगे हैं
@मीना गुलियानि


सोमवार, 31 जुलाई 2017

कैसे सपने साकार करूँ

कबसे समाया तू मेरे मन में
कैसे इसका इज़हार करूँ
दुविधा के ऊँचे पर्वत को
कैसे  मैं अब पार करूँ

जीवन के पथ की ये देहरी
हर दम आती यादें तेरी
प्रीत की उलझी भंवरों से
कैसे तुम बिन आज तरूं

तेरे बिना हम हुए अधूरे
मिले तुम सपने हुए पूरे
इक डोरी से दोनों जुड़े
कैसे सपने साकार करूँ
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

नाचें और गुनगुनाएँ

शाम है कोहरे में डूबी हुई
समुद्र का किनारा वीरान है
आओ हम तुम गीत गाएँ
जगमगाएँ उदास साँझ है

                       मिल बैठ कर लें मौसम की आहट
                       ठण्डे रिश्तों में भरदें गर्माहट
                      कटुता खत्म करें जी भर जी लें
                      दिल से दिल बात करे होंठ सी लें

जो भी हों शिकवे बिसराएँ सारे
तोड़के लायें आसमाँ से तारे
गहराने लगी शाम कंदीले जलाएँ
आओ झूमें नाचें और गुनगुनाएँ
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 26 जुलाई 2017

फिर से ज़रा आज जगमगाओ

आज तुम आँसू मत बहाना
दर्द को भी समीप मत लाना
आज तुम केवल मुस्कुराना
मत बनाना कोई भी बहाना

लहरों का ठहराव कहाँ होता है
जिंदगी को भी चलना होता है
उलझने भटकाव आते जाते हैं
समय की नाव को खेना होता है

पतझड़ हमें कहाँ सुहाता है
लेकिन वसन्त गुनगुनाता है
गर्मी में सूरज तमतमाता है
सर्दी में वही मन को भाता है

आज भूलकर कड़वे पलों को
जीवन में फिर प्रीत जगाओ
ढलती हुई जीवन की शाम को
फिर से ज़रा आज जगमगाओ
@मीना गुलियानी




शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

साये से बिछुड़ जाना है

जिंदगी इक सफर है चलते ही जाना है
जीवन है जिम्मेदारी उसको निभाना है

कभी पाई ख़ुशी कभी मिला हमें गम
कभी खाई ठोकर जहाँ चूके थे हम
लेकिन हँसते हँसते सब सहते जाना है

मर मरके भी हम पूछो कैसे जिए
कितने रोये थे हम कितने आँसू पिए
अश्कों को दी कसम न बाहर आना है

दोस्त दुश्मन बने पराये अपने बने
जिनपे हमको गुमां था वो कातिल बने
तन्हाइयों में साये से बिछुड़ जाना है
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

यादों का वो सिलसिला

आज ख़ुशी के मारे उसकी चीख जो निकली
लगा जैसे आसमां से कौंधी हो बिजली
तेरे आँचल को लहरा के पवन हँसके निकली
बरखा की बूंदे तेरे मुखड़े से झूमके निकली

बहारें गुनगुना उठीं पायल झनझना उठी
गीत ले  बहारों के तितलियाँ मुस्कुरा उठी
फूलों से महके गुंचे तमन्नाएँ खिलखिला उठी
हथेलियों से मुँह छिपाए अदाएं झिलमिला उठी

सितारों की कायनात सजी चाँद दूल्हा सजा
रात की तन्हाइयों में रजनी का मुख सजा
सिहरते ,दुबकते ,बादलों का देखो चला काफिला
शर्माते , सकुचाते थमा यादों का वो सिलसिला
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

अकेले मन घबराता है

आज फिर दिल मेरा उड़ा उड़ा जाता है
खुशियों का लेके पैगाम कोई आता है

हवा में संदली दुपट्टा जब लहराता है
खुशबू से तन मन मेरा महका जाता है

गेसुओं की लटें  माथे पे बल खाती हैं
सर्पिणी सी बन हवा में वो लहराती है

तेरे तब्बसुम से चाँद भी शर्मा जाता है
बादलों को भी देखके पसीना आता है

बौछारें बनके वो मुझपे बरस पड़ती हैं
रिमझिम सी टिप टिप बूँदें पड़ती हैं

ऐसा मौका कहाँ रोज़ रोज़ आता है
चले भी आओ अकेले मन घबराता है
@मीना गुलियानी


बुधवार, 5 जुलाई 2017

औंधे मुँह गिर पड़ा

अक्स अपना देखने को मन मेरा था जब करा
झील पर पहुंचा तो देखा उसका पानी था हरा

                  सोचा था तन्हाई ही है मेरे जीने का सबब
                  उसको मिलने पर सोचा तन्हा मै क्यों रहा

अपनी बर्बादी के गम से दिल बहुत मेरा भरा
मेरे जिस्म का साया मुझसे इस कदर है डरा

                    थे बुरे हम पर खुद को ही समझा खरा              
                   डूबा दिल का सफीना औंधे मुँह गिर पड़ा
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 22 जून 2017

सच बोलना भी दरकिनार

मै बहुत कुछ सोचता हूँ पर कहता नहीं
कहना तो क्या सच बोलना भी दरकिनार

अब किसी को दरार नज़र आती नहीं
घर की दीवारों पर हैं पर्दे बेशुमार

कैसे बचकर चलें सूरत नज़र आती नहीं
रहगुज़र घेरे हुए हैं लिए तोहमतें हज़ार

रौनके ज़न्नत भी रास न आई मुझे
सुकूँ मिला था जहन्नुम में बेशुमार
@मीना गुलियानी

सोमवार, 19 जून 2017

तुमको मेरी याद दिलायेंगे

मेले में गर भटकते तो ठौर मिल जाता
 घर में भटके हैं कैसे ठौर अपना पायेंगे

आँच कुछ बाकी है धुआँ निकलने दो
देखना मुसाफिर इसी बहाने आयेंगे

पाँव जल में इस कदर न हिलाओ तुम
बुद्बुदे पानी के हिलके टूट ही जायेंगे

गीत मेरे जो अधूरे और अछूते रह गए
देखना कल तुमको मेरी याद दिलायेंगे
@मीना गुलियानी 

सपने ज़रा प्यारे तू देख

दुःख का दरिया दूर तक फैला हुआ
बाजुओं की ताकत देख धारे न देख

जंग जीवन की लड़नी पड़ेगी तुझे
हकीकत ये खौफ के मारे न देख

न हो मायूस देख धुंधलका इस कदर
रोज़नों को भी इन दीवारों में देख

चमका ले किस्मत छू ले आसमां तू
घर अँधेरा है तो क्या  तारे भी देख

दिल बहला ले मगर इतना न उड़
सम्भल के सपने ज़रा प्यारे तू देख
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 15 जून 2017

मोर भी नाचे डाली डाली

देखो कैसा फूल खिला है इस उपवन में
झूम उठा है जीवन हरियाली आँगन में

कण कण पर देखो प्रसून के आया पराग है
गा रही है गीत मधुमास के क्या अनुराग है

फूलों की रुत लाई  कैसी ये फुहार है
 मन में उमंग छाई मस्ती बेशुमार है

प्यार के गीत सुनाती है कोयल ये काली
झूम झूम के मोर भी नाचे  डाली डाली

कुहुक कुहुक कर  नाच रहा है मनवा उसका
देखो चित्त चुरा लिया गोरी ने जिसका
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 13 जून 2017

ऐसा देश बनायेंगे

गाओगे जब गीत तुम
मौसम सुहाने आयेंगे
मुस्कुराओगे जो तुम
फूल खुशबु लुटायेंगे

                     कलियाँ फिर खिलने लगेंगी
                      भँवरे भी गुनगुनायेंगे
                      चहकेंगी चिड़ियाँ चमन में
                      पत्ते भी लहलहायेंगे

धरा भी उगलेगी सोना
श्रमकण भी जगमगायेंगे
हर घर से मिटे अँधेरा
ऐसा दीप जलायेंगे

                    कोई भी भूखा न सोए
                    ऐसी अलख जगायेंगे
                    धन धान्य से परिपूर्ण हो
                    ऐसा देश बनायेंगे
@मीना गुलियानी

जीवन ज्योति जगाओ तुम

ये जीवन इक समरांगण है
 हार जीत होती है जीवन में

थक के बैठ न जाना तुम
आगे कदम बढ़ाना तुम

जीवन का आनन्द मिलेगा
जब उतरोगे रण में तुम

बहेगी फिर प्रेम की गंगा
जीवन को महकाओ तुम

बंजर धरती सोना उगले
ऐसी धरा बनाओ तुम

माथे से मेहनत का पसीना
आज अपने बहाओ तुम

छोडो नैराश्य मिटाओ वैमनस्य
जीवन ज्योति जगाओ तुम
@मीना गुलियानी 

रविवार, 11 जून 2017

मेहमाँ तुम्हीं तो हो

पछताओगे इक दिन तुम दिल मेरा उजाड़कर
इस दिल में बसता कौन है मेहमाँ तुम्हीं तो हो

आता है तुमको रहम जुल्मों के बाद भी
अपने किए पे खुद पशेमां तुम्हीं तो हो

मेरी आँखों का नूर दिल का सुरूर हो तुम
 हम जानते थे जान के खैरखाह तुम्हीं हो

हम भूल न पायेंगे कभी तेरी कद्र्दानियाँ
हर किस्से में पुरज़ोर से शुमार तुम्हीं हो
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 8 जून 2017

तेरी याद बहुत सताती है

जब ये दुनिया की धूप मुझे झुलसाती है
तब मुझे तेरी याद बहुत सताती है

               जिंदगी के हर मुश्किल पड़ाव पर
               तेरी सांत्वना मेरा हौंसला बढ़ाती है

काम से थककर घर लौटने के बाद
तेरे हाथों की रोटी मन को भाती है

             जब ग़म का अँधेरा मेरा हौंसला तोड़ता है
             तेरे प्यार की रोशनी राह को दिखाती है
@मीना गुलियानी


बुधवार, 7 जून 2017

सुनता है वही सबकी फरियाद

हर पल जीवन के तू हँसके गुज़ार
जिंदगी के दो पल मिले हैं उधार
मत इनको रोके आंसुओं में गुज़ार

जो अब भी न समझा तो नादानी तेरी
यूँ ही बीत जायेगी जिंदगानी तेरी
सभी भूल जायेंगे कहानी ये  तेरी

तू आत्मबल बढ़ा और आगे बढ़
कर हिम्मत बुलन्द पर्वत पे चढ़
छू  लेगा आसमां भी ज़रा आगे बढ़

कर्म ऐसा कर दुनिया रखे याद
न डर रख हमेशा उसको तू याद
सुनता है वही सबकी फरियाद
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 5 जून 2017

हमें जीना आना चाहिए

जिन्दगी अनमोल है हमें जीना आना चाहिए
चाहे लाखों गम भी आयें मुस्कुराना चाहिए

दिल पे चाहे हो दर्दो गमों का बोझ भारी
भूलकर हर दुःख को हँसना आना चाहिए

माना आशा के जो पल निराशा में ढल गए
ख़ुशी में उन पलों को भूल जाना चाहिए 

कभी जीत तो कभी हार का नाम है जिंदगी
हर घड़ी परीक्षा की है ये समझ आना चाहिए
@मीना गुलियानी 

रविवार, 4 जून 2017

कोई जीवन राग सुनाओ ना

जिंदगी का फलसफा कहीं शबे ग़म न बने
 जीवन के पथ में कोई निराशा बिंदु न बने
 अब कोई कटुवचनों से दिल धड़काए ना

                      चाँद सितारो तुम भी आओ संग हमारे तुम भी गाओ
                      अँधेरी रातों के दीपक बन धरती को तुम जगमगाओ
                       फिर कोई अलगाव न उभरे  ऐसा साज़ बजाओ ना

सच्चा साथी जब मिल जाए हर लम्हा मंज़िल बन जाए
किसी पड़ाव पे साथ न छूटे दिल का अरमा वो बन जाए
सांस सांस की धड़कन पर कोई जीवन राग सुनाओ ना
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 2 जून 2017

दिलों में चाहत बनी हुई है

झुकी हैं पलकें खामोश लब हैं दिलों में चाहत बनी हुई है
ये रौशनी भी दिल की सिहरन हालत ऐसी बनी हुई है

वो पास आये तो दूर बैठे , क्या कोई समझे क्या उनसे पूछे
कुछ हमसे बोलो लब ये खोलो ,धड़कन हमारी थमी हुई है

तुमने न सोचा न हमने जाना, क्या क्या सोचेगा ये ज़माना
ज़रा तो मेरे करीब आओ , नज़रें जहाँ की तनी हुईं हैं

चेहरा छिपाते हथेलियों से ,जैसे अंगारे बरस रहे हों
पाँव ज़रा तुम सम्भल के रखना फूलों सी ज़मी हुई है
@मीना  गुलियानी 

शनिवार, 27 मई 2017

ये क्या है माज़रा

तुझको देखने से कभी मन नहीं भरा
मेरी कसम बताओ ये क्या है माज़रा

जिंदगी तो मेरी इक लम्बी सुरंग है
जहाँ पे खड़ा हूँ मै वहीँ कोई सिरा

जाने क्या सोचते रहते हो तन्हा तुम
फिरता  अंधेरों में जैसे कोई डरा डरा

सिर छुपाने के लिए कोई जगह चाहिए
यातनाओं से इस दिल का वास्ता पड़ा

गुलशन उजड़ने के बाद भी निशाँ बाकी हैं
कभी हुआ करता था ये चमन हरा भरा
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 25 मई 2017

अठखेलियाँ बहुत करती है

मुझसे धूप अठखेलियाँ बहुत करती है
एक छाया सी सीढ़ी उतरती चढ़ती है

दिल में दरारें गहरी पड़ गईं हैं
जैसे ये कोई बंजर धरती है

तुमको छू लेने भर ही सहसा
गुलाबों से ओस जैसे झरती है

तुम मेरा साथ दे दो इन अंधेरों में
एक चिड़िया धमाकों से सिहरती है

आगे निकल गए घिसटते हुए कदम
मूरत संवारने में और भी  बिगड़ती है
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 20 मई 2017

हवन वो करने लगा है

फिर हवाओं का रुख बदलने लगा है
सोया हुआ जगा आँखे मलने लगा है

जिंदगी के सफर का पहिया टूटा पड़ा था
मिले तुम तो फिर से वो चलने लगा है

 आग सीने में अब तक ठंडी पड़ी थी
यकायक सा पानी उबलने लगा है

जो रुका था अलावों की आंच लेने को
जली जब हथेली तो मसलने लगा है

जिंदगी अँधेरे में होम जिसने करदी
उजाले में हवन वो करने लगा है
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 19 मई 2017

बबूल के साये में लाये तुम

रहनुमाओं की अदा पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती दुनिया को सम्भालो तुम

दर्दे दिल का पैगाम भी उनको पहुँचेगा
कोई नश्तर सीने में उतारोगे जब तुम

कहाँ तक सहेंगे जुल्मों सितम हम
कोई रोशनी ढूँढ़ लाओ कहीं से तुम

तेरे आने से  रौनके महफ़िल जवां हुई
कोई खुशनुमा ग़ज़ल गुनगुनाओ तुम

सोचा था कि दरख्तों में छाँव होती है
पता न था बबूल के साये में लाये तुम
@मीना गुलियानी

बुधवार, 17 मई 2017

सवालों की बारिश लीजिए

तुम चाहते हो पत्ते भी गुनगुनाएँ
पेड़ों से पहले उनकी उदासी लीजिए

जीना मरना तो लगा रहेगा यहाँ पर
कुछ रोज़ ज़रा सुकून से जी लीजिए

अपने होंठों को सीकर तुम चुपचाप रहे
मगर खामोशी ने करदी मनादी लीजिए

हैरा थे अपने अक्स पे घर के तमाम लोग
शीशा चटकने पे सवालों की बारिश लीजिए
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 16 मई 2017

न सीरत बिगड़नी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी ये आग जलनी चाहिए

दर्द की लहर अब पर्वत नुमा हुई
इसमें कोई धारा निकलनी चाहिए

दरों दीवारें भी कमज़ोर हुई अब तो
 रिवाज़ों की बुनियाद हिलनी चाहिए

दिल बहलाओ मगर इतना न तुम उड़ो
सपने बिखरे न सीरत बिगड़नी चाहिए
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 15 मई 2017

कमाल देखिए

लफ्ज़ एहसास जताने लगे कमाल देखिए
ये तो माने भी छुपाने लगे कमाल देखिए

कल जो लोग दीवार गिराने आये थे
वही दीवार उठाने लगे कमाल देखिए

उनको पता नहीं कि उनके पाँवों से
गर्द भी गुलाल हुई कमाल देखिए

समुद्र की लहरें भी उठती चली गईं
यूं चाँदनी बवाल हुई कमाल देखिए

 उनका जहाँ में ठिकाना नहीं रहा
हमको मिला मुकाम कमाल देखिए
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 8 मई 2017

मशाल देखिए

बरसात आई तो दरकने लगी ज़मीं
कैसा कहर है बरपा बारिश तो देखिए

कैसी जुम्बिश हुई है जिस्म में मेरे
इस परकटे परिंदे की कोशिश देखिए

किसको पता था मर मिटेंगे तेरी अदा  पे
कैसे उठा हाथ चला तेरी अलकों पे देखिए

मेरी जुबान से निकली तो नज़्म बनी
तुम्हारे हाथोँ में आई तो मशाल देखिए
@मीना गुलियानी 

रविवार, 7 मई 2017

कितने एतराज़ मै उठाता हूँ

मै तुम्हें भूलने की कोशिश में
खुद को  कितने करीब पाता हूँ

तू बनके रेल यूँ गुज़रती है
मै बना पुल सा थरथराता हूँ

तेरी आँखों में जब भी मै देखूँ
अपनी  राहों को भूल जाता हूँ

रौनके ज़न्नत न रास आई मुझे
जहन्नुम की खुशियाँ भी लुटाता हूँ

बहुत सोचता पर न कहता हूँ
कितने एतराज़ मै उठाता हूँ
@मीना गुलियानी


शनिवार, 6 मई 2017

काटो प्रपंच का मायाजाल

उठो नवयुवको थामो मशाल
आह्वान दे रहा महाकाल

कर्मवीर तुम धर्मवीर तुम
मत होना कभी अधीर तुम
तुम सिंहनी के सपूत हो
दो दुश्मन का वक्ष चीर तुम
प्रज्वलित  करो चेतना ज्वाल

संस्कारहीन हो रहा समाज
 शान्ति पथ दिखलाओ आज
भरो प्राणों में संकल्पशक्ति
करो नाश दुराचार का आज
काटो  प्रपंच का मायाजाल
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 5 मई 2017

करदो स्वयं समर्पण

जैसे साधक अपने गुरु को करता अपना सब कुछ अर्पण
 ऐसे ही तुम अपने देश के हित करदो सर्वस्व समर्पण

दीपक और  पतंगे को देखो
चातक और चंदा को देखो
गंगा की धारा को देखो
सबका अनन्य भाव से अर्पण

अर्जुन करे कान्हा से जैसे
राधा करे कृष्ण को जैसे
वंशी करे होंठों से जैसे
सुखद भाव से अर्पण

सीप और मोती के जैसे
शिशुओं का माता से जैसे
बूंदों का बादल को जैसे
होता है अस्तित्व समर्पण
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

न फिर लौटकर आएगा

वक्त कैसा भी हो वो गुज़र जाएगा
दिन में सूरज उगा शाम को ढल जाएगा

तू क्यों  मायूस होता है बशर
इक दिन अहमियत पे उतर आएगा

 फितरत बदली है फ़िज़ा ने अभी
ग़म  न कर पल ये भी निकल जाएगा

खौफ न कर हौंसला ज़रा तू रख
क़शमक़श में  उलझ मत पिछड़ जाएगा

आज़मा किस्मत खिला ये चमन
वक्त गुज़रा गर न फिर लौटकर आएगा
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

वाणी मूक न होने की

उठो मनुज  पुत्रो अब जागो घड़ी नहीं ये  सोने की
तुम पर टिकी हैं  निगाहें आशाओं के पूरे होने की

तुममें सृजन शक्ति है कण कण में  भण्डार भरा
जीवन को तुम पहचानो देश है किस  मोड़ खड़ा
मोड़ दो इसकी धारा तुम घड़ी नहीं ये खोने की

सबको इस संसार में केवल स्वार्थ नज़र ही आता है
कैसे सुखी बने ये मानव ध्यान नहीं ये आता है
तुममें है क्षमता जगाओ हिम्मत मानव होने की

कैसी दुष्प्रवृति की दलदल में फँसी है नूतन पीढ़ी
सुगम बनाओ प्रगति पथ बनाओ इक ऐसी सीढी
संस्कृति का इतिहास बदलो वाणी मूक न होने की
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

आंखे बंद करता हूँ

मै अनगिनत बातों को सोचता हूँ
शाम को तन्हाई में जब जिंदगी
खामोश महासागर सा सफर करती है
लाल गुलाबी  तन्हा रात की धुन तरह
खूबसूरत यादों के बीच नृत्य करती है
रौशनी की  जगमगाहट बज्म बनती है
नए सपनों में चुपचाप ढल जाती है
तब मेरे पाँव रेत में धंस जाते हैं
गीत बूंदें बनकर होले से बरसते हैं
लगता है कोई यति समाधि में लीन हो
खुद को भूलने के लिए आंखे बंद करता हूँ
@मीना गुलियानी  

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

इबारत लिख न पायेगी

कभी जब गुजरोगे इस राह से तन्हाई में
ये राहें फिर से तुम्हें पुकारेंगी
गुलशन जो उजड़ गया ख़िज़ाओ से
ये बहारें फिर से उसे निखारेंगी

मन भटकेगा तेरा यूँ ही बादलों की तरह
ये घटायें तेरे गेसुओं को सँवारेंगीं
चाँद तारों ने लगाया हजूम सा जानिब
यादें तुझे रात भर जगायेंगी

यादें जब रह रह कर तड़पाएंगी
बिजलियाँ आशियाँ को जलाएंगी
सदमे से चौंककर न उठना तुम
स्याही भरी कलम इबारत लिख न पायेगी
@मीना गुलियानी 

जिंदगी मौत के करीब है

 यहाँ के नज़ारे कितने अजीब हैं
लगता है वक्त ही कमनसीब है

जिंदगी यहाँ  की कितनी  वीरान है
आती जाती साँसे कितनी ज़रीब हैं

मिलने जुलने के सिलसिले भी खत्म हुए
रफीक थे जो कभी अब बने रकीब हैं

सारे आशियाने हमारे उजड़ से गए
लगता है जिंदगी मौत के करीब है
@मीना गुलियानी



शनिवार, 22 अप्रैल 2017

झारी भी सूनी पड़ी है

आज केसर की क्यारी सूनी पड़ी है

वो गौरेया कहीं खो सी गई है

ढफ ढोल की धमाधम सूनी पड़ी है

आमों की मंजरियाँ झर सी गई हैं

गाँव की हिरनिया कहीं खोई पड़ी है

दिखते नहीं कोई टेसू के फूल भी अब

गुजरिया भी रास्ता भूले खड़ी है

कैसे गाऊं मै अब फागुन के गीत

रंगों की झारी भी सूनी पड़ी है
@मीना गुलियानी 

जिंदगी मेरी उधार है कहीं

मुझसे तुम कुछ सवाल न करो
मेरे पास उनका कुछ जवाब  नहीं

मेरी सांस, धड़कन मेरी कहती है
जैसे कि ये जिंदगी अब मेरी नहीं

तुम्हारी खामोशी मुझ पर इक कर्ज है
तेरी बातों का मेरे पास जवाब नहीं

अजनबी शहर है खामोशी तन्हाई  है
कहने को जिंदगी मेरी उधार है कहीं
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

मुक्त गगन में अब विचरना है

आज भी स्त्री अपनी यंत्रणा से लड़ती है
मन ही मन पिंजरे से उड़ना चाहती है
अनंत विस्तार को पाना चाहती है
लेकिन सैयाद से भी कुछ डरती है

उसने उसके पर नोच डाले हैं
पाँवों में बेड़ियाँ लब पे ताले हैं
गहरे समुद्र की बात करती है
चीख इक बवंडर सी उभरती है

एक शतरंज का मोहरा बना दिया उसने
उसकी चालें वो सब समझती है
मन छटपटाता है आज़ादी पाने को
दिल की तमन्नाओं में रंग भरती है

कुछ कर गुज़रने की चाहत में
दिमाग में कैंची सी चलती है
जाल काटने की चाहत में
अपनी हसरतों से रोज़ लड़ती है

दुर्गा काली का रूप धारण कर
अब उस जाल से निकलना है
सैयाद के मंसूबों को कुचलना है
मुक्त गगन में अब विचरना है
@मीना गुलियानी 

मुझको फिर से बहका रही है

एक आवाज़ उस पार से आ रही है
मुझको होले से कुछ समझा रही है

दिन बीता ,शब गई,,मुझको भी सोना है
तेरी तस्वीर गीत गुनगुनाए जा रही है

जिंदगी की नई राह चुन ली थी मैंने
क्यों पुराने एहसास जगाए जा रही है

सूरज ने भी चाँद से जाने क्या कह दिया
रोशनी मुझको फिर से बहका रही है
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

कजरारी आँखे सांझ धानी

मचल रहा लहरा के झील का पानी
लिखी मैंने खुली किताब में कहानी

मैंने तय किया सफर हवाओं जैसा
सुनाए  मौसम गुज़रे पल की कहानी

मेरी गली से गुज़री तुम आज ऐसे
जैसे किसी राजा की तुम हो रानी

पड़े थे कभी अमिया की डाली पे झूले
याद आई कजरारी आँखे सांझ धानी
@मीना गुलियानी 

फितरत बदली नहीं जाती

साँस लेना भी जैसे कोई जुर्म है
जिन्दगी ऐसे तो जी नहीँ जाती

एक ठहरा हुआ सफर बन चुका हूँ मै
यह सड़क अब कहीं भी नहीं जाती

ये चाँदनी मुझे रात भर जलाती है
जाने क्यों अपने घर नहीं जाती

तुझे याद करने की आदत सी बन गई
दिल की हसरत निकाली  नहीं जाती

मै दुआओं में तुझको ही हमेशा माँगू
चाहकर भी फितरत बदली नहीं जाती
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

दीप जलाएँ प्राण का

आओ मिलकर हाथ बढ़ाकर संदेश दें ज्ञान का
मिटाकर अन्धकार हम  दीप जलाएँ प्राण का

जब तक चले साँस जीवन में
दीपक यूँ जलता ही रहे
खिले न जब तक मन उपवन
संवेदना से ये  पलता ही रहे
आओ मिलकर सदभावों से
दीप बने मिटाने को अज्ञान का

हर प्राणी जो भटक रहे हैं
सही मार्ग पर लाएँ हम
अंधविश्वास आडंबर के काँटों से
उनको आज बचाएँ हम
जीवन के तम को मिटाकर
नया प्रकाश भरें सद्ज्ञान का
@मीना गुलियानी



मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

सबको गले लगाएँ हम

आओ दीप जलाएँ हम अन्धकार मिटाएँ हम
नवज्योतस्ना को  फैलाके  कितना हर्षाएँ हम

जगाएँ हम जागृति की क्रांति
दूर हो जाए विश्व की भ्रान्ति
ऐसा पथ बतलाएँ हम

भेदभाव सब  दूर करें हम
आत्मभाव से उसे भरें हम
कुरीतियाँ दूर भगाएँ हम

सज्जनता को हम अपनाएँ
दुर्जनता को दूर भगाएँ
सबको गले लगाएँ हम
@मीना गुलियानी


शनिवार, 8 अप्रैल 2017

विश्वास और प्रेम से रहना

मैंने सीखा है जीवन से हर पल ही हँसते रहना
चाहे कितने दुःख आएँ चुपचाप ही सहते रहना

न जान पायेगा कोई ,है कितनी मन में पीड़ा
हँसते हुए इस  जीवन में ,करती है चिंता क्रीड़ा

मेरी आँखों में तो हरदम, प्यासा सागर लहराए
जो भेद छुपे मेरे मन में, कैसे कोई बतलाये

मेरे जीवन में आशा आलोकित हर पल रहती
मेरे असफल होने पर भी कभी न तिरोहित होती

मेरे साथी से मुझको मिलता उल्लास का गहना
मैंने पीड़ा से सीखा विश्वास और प्रेम से रहना 
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

माता की भेंट --10

तर्ज़ ----पिछवाड़े बुड्ढा खांसदा 

खोलो ज़रा भवना दा द्वार    ------ माँ 
-जय अम्बे जय अम्बे दीवाने तेरे बोलदे 

तेरियां उडीकां विच अखाँ गइयाँ पक माँ 
कदे ता दयाल होके बच्यां नूँ तक माँ 
करदे हाँ असी इन्तज़ार ---माँ ---जय अम्बे 

बच्यां तों दस ज़रा होया की कसूर माँ 
नोहां नालों मॉस अज होया किवें दूर माँ 
बागाँ कोलों रुसी ऐ बहार ---माँ ---जय अम्बे 

मावां बिना पुत्रां नूँ कोई वी न झलदा 
ताइयों ता जहान सारा बुआ तेरा मलदा 
लावें तू डुबदे नूँ पार ----माँ -----जय अम्बे 

भगतां ने रखियाँ माँ तेरे उते डोरियां 
तकदे ने जिवें तके चन नूँ चकोरियॉ 
दर खड़े पलड़ा पसार --माँ------जय अम्बे 
@मीना गुलियानी 


सोमवार, 3 अप्रैल 2017

माता की भेंट ---9

तर्ज़ ------रमैया वस्ता वैया 

नाम जब तेरा लिया ध्यान जब तेरा किया 
तूने दुःख दूर किया 

जग  ने तो माँ ठुकराया मुझे 
तूने ही तो माँ अपनाया मुझे 
दुनिया ने तो भरमाया मुझे 
तूने ही माँ सबसे छुड़ाया मुझे 
दिल तुझे याद करे ,माँ फरियाद करे --------तूने दुःख 

मोह के जाल में फँसके जंजाल में 
घबराके माता पुकारा तुझे 
दिल मेरा माता पुकारे तुझे 
तेरे बिन कौन पार उतारे मुझे 
जाना न दूर कहीँ ,छोड़के मुझको कहीँ -------तूने दुःख 

तेरी कृपा का सहारा मिला 
डूबती नैया को किनारा मिला 
तुझसे दया की जो भीख मिली 
माँ अंधे को जैसे तारा मिला 
कैसे मैं दूर रहूँ ,क्यों मैं गम को सहूँ----------तूने दुःख 

रविवार, 2 अप्रैल 2017

माता की भेंट --8

तर्ज़ --ऐ रात के मुसाफिर चन्दा ज़रा बता दे 

हे अम्बिके भवानी दर्शन मुझे दिखाओ 
अन्धकार ने है घेरा ज्योति मुझे दिखाओ 

मैया तेरे ही दर का मुझको तो इक सहारा 
नैया भँवर में डोले सूझे नहीँ किनारा 
मंझधार से निकालो नैया मेरी बचाओ 

लाखों को तूने तारा भव पार है उतारा 
 बतलाओ मेरी माता मुझको है क्यों बिसारा 
बच्चा तेरा हूँ माता मुझको गले लगाओ 

सूनी हैं मेरी राहें आँसू भरी निगाहें 
बोझिल हैं मेरी साँसे दुःख कैसे हम सुनाएं 
गम आज सारे  मेरे मैया तुम्हीं मिटाओ 

तेरा नाम सुनके आया जग का हूँ माँ सताया 
मुझको गले लगालो तेरी शरण हूँ आया 
रास्ते विकट हैं मैया अज्ञान को मिटाओ 
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

माता की भेंट --7

तर्ज --तुझे सूरज कहूँ या चन्दा

मेरी मैया मेरा तुझ बिन दूजा न और सहारा
मेरी नाव भँवर में डोले माँ सूझे नहीँ किनारा

तुम आके पर लगाओ माँ आप ही जान बचाओ
,मुझे पार  करो इस भव से नैया को पार लगाओ
माँ तेरे भरोसे पर ही मैंने जीवन को है गुज़ारा

माँ मैंने यही सुना है तू विपदाओं को मिटाती
माँ सबके दुखड़े हरके रोतों को तू है हँसाती
मेरी भी विनती सुन लो इस जग से मैं तो हारा

तुम अर्ज सुनो माँ मेरी सुनलो मत करना देरी
माँ शेर सवारी करके रखना तू लाज मेरी
तेरा ही सहारा लेकर माँ छोड़ दिया जग सारा
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

माता की भेंट --6

तर्ज़ ----दिल का खिलौना हाय टूट गया 

अम्बे का सहारा मैंने पा ही लिया 
दाती ने चरणों से लगा ही लिया 

जग ने मुझे था जब ठुकराया 
माँ ने ही अपने गले से लगाया 
मेरा उद्धार करके मुझसे प्यार करके 
माता ने मुझको अपना बनाया 
सच्चा सहारा मैंने पा ही लिया 

मैं अन्धकार में था मुझे रोशनी  दी 
मिटाके गमो को मेरे नई ज़िन्दगी दी 
दूर अँधेरा हुआ दिल में उजाला हुआ 
चमकाई किस्मत मेरी मुझे चाँदनी दी 
नाम की भँवर से बचा ही लिया 
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 30 मार्च 2017

माता की भेंट --5

तर्ज़ ---रहा गर्दिशों में हरदम 

मेरी मात आओ तुम बिन मेरा नहीँ सहारा 
नैया भँवर में डोले सूझे नहीँ किनारा 

आ जाओ मेरी मैया आकर मुझे बचालो 
डूबे न मेरी किश्ती करदो ज़रा इशारा 

तेरे सिवा जहाँ में कोई नहीँ है मेरा 
आओ न देर करना तेरा ही है सहारा 

क्यों देर माँ करी है मुश्किल में जां मेरी है 
विपदा को आज हरलो दे दो मुझे सहारा 

अब देर न लगाना मेरी मात जल्दी आना 
मुझको भी तार दे माँ लाखों को तूने तारा 
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 29 मार्च 2017

माता की भेंट -- 4

तर्ज़ ------छुप गया कोई रे 

जगदम्बे शेरां वाली बिगड़ी सँवार दे         
नैया भँवर में मेरी सागर से तार दे 

मैं अज्ञानी मैया कुछ भी न जानू 
दुनिया के झूठे नाते अपना मैं मानू 
आके बचालो नैया भव से उबार दे 

लाखों की तूने मैया बिगड़ी बनाई 
फिर क्यों हुई है मैया मेरी रुसवाई 
लाज बचाले माता दुखड़े निवार दे 

जपूँ तेरा नाम मैया ऐसा मुझे ज्ञान दे
नाम न तेरा भूलूँ ऐसा वरदान दे 
आशा की जोत मेरे दिल में उतार दे 
@मीना गुलियानी 

माता की भेंट

तर्ज़ ------दिल तोड़ने वाले तुझे दिल 


मेरी मात आ जाओ तुझे दिल ढूँढ रहा है 
मुझे दर्श दिखा जाओ तुझे दिल ढूँढ रहा है 

तुम आओ तो ऐ माँ मेरी किस्मत बदल जाए 
बिगड़ी हुई तकदीर माँ फिर से सँवर जाए 
कबसे खड़ा हूँ  मैं तेरी उम्मीद लगाए  तुझे दिल ढूँढ रहा है 

इस दुनिया ने ऐ माँ मेरा सुख चैन है छीना 
मुश्किल हुआ है आज तो बिन दरश के जीना 
आवाज़ दे मुझको माँ अपने पास बुला ले  तुझे दिल ढूँढ रहा है 

रो रो के मैया आँखे भी मेरी देती हैं दुहाई 
सुनो मेरी विपदा मैया जी करलो सुनाई 
अब जाऊँ कहाँ तुम बिन कहाँ और ठिकां है  तुझे दिल ढूँढ रहा है  
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 27 मार्च 2017

माता की भेंट

तर्ज़ -------रुक जा

दस जा ओ राही जान वालया
मैया दा द्वारा सानू दस जा
दस जा  ओ पंथ किनी दूर ऐ
भवन न्यारा सानू दस जा

मैया दे द्वारे दी ऐ होई निशानी ऐ
उत्थे जगमग जग रही ऐ इक जोत नुरानी ऐ -----------दस जा

 ऐ उच्चे पर्वत ते मैया दा द्वारा ऐ
माँ शेरां वाली दा भक्तां नूँ सहारा ऐ -------------------दस जा

निश्चा कर आवे जो न जांदा खाली ऐ
माँ दुर्गा शक्ति दा सारा जगत सवाली ऐ -------------दस जा
@मीना गुलियानी 

माता की भेंट

तर्ज़ -------रेशमी सलवार कुरता जाली दा

जगमग जगदियां जोतां समा दिवाली दा
मन्दिर अजब रंगीला शेरां वाली दा
भगतां नूँ है आसरा माँ रखवाली दा
तेज न झल्या जाए जोतां वाली दा

माता दी शेर  सवारी है लगदी बहुत प्यारी
भगतां नूँ चा ऐ चढ़या दर्शन दा दिल विच भारी
नाम दी लाली दा ------------------------मन्दिर

 माता दी शक्ति न्यारी ते तेज न झल्या जावे
भगतां नूँ माता तारे दुष्टां नूँ मार मुकावे
खण्डा काली दा ------------------------मन्दिर

विरला कोई भगत प्रेमी विच नाम दे चोला रंगदा
सदा खिला रहे ऐ गुलशन तेरा सेवक वर मंगदा
धर्म दी डाली दा ------------------------मन्दिर

जगजननी ते दुःख हरनी दुखियाँ दे दुखड़े हरदी
तेरी देख निराली शक्ति सब दुनिया सजदा करदी
पहाड़ां वाली दा ------------------------मन्दिर
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 24 मार्च 2017

भूला अफसाना याद आया

आज फिर कोई भूला अफसाना याद आया
मौसम जो गुज़रा दिन सुहाना याद आया

बीते सावन के दिन जब झूले पड़े थे बागों में
गीतों भर वो दिन तेरा मुस्कुराना याद आया

वो कलियों का खिलना वो हँसना वो मिलना
नज़रों का झुकाना बिजली गिराना याद आया

सुबकती सी आँखे महकती कम्पकंपाती साँसे
दबे पाँवों चलकर ज़मी को खुरचना याद आया
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 22 मार्च 2017

आँसुओं में डूब न जाऊँ कहीँ

मुझे खुद पे ऐतबार है लेकिन
ये ज़ुबाँ फिसल न जाए कहीँ

तुम रहो हमेशा  हमारे ही आस पास
नज़र नवाज़ नजारे बदल न जाए कहीँ

तमाम उम्र अकेले सफर किया हमने
साथ पाके  आदत बदल न जाए कहीँ

तुम्हारे ख़्वाब कभी शोला हुआ करते थे
देखो कहीँ वो कमज़ोर पड़ न जाए कहीँ

 एहसास से लबालब भरा हुआ हूँ
तेरे आँसुओं में डूब न जाऊँ कहीँ
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 21 मार्च 2017

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रविवार, 19 मार्च 2017

नश्तर दिल में उतर जाएगा

मेरे दिल के ज़ख़्म अभी हरे हैं अभी
मत कुरेदो उन्हें लहू निकल आएगा

दिल क्या उबर पायेगा गमों से कभी
आशियाँ उजड़ा क्या वो बस पायेगा

मैंने अक्सर तलाशा बीते लम्हों को
वैसा नक्श क्या फिर उभर पायेगा

भर गया दिल मेरा तेरी बेरुखी देखकर
याद करके नश्तर दिल में उतर जाएगा
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 16 मार्च 2017

स्वच्छन्द उन्मुक्त सा आकाश

मेरा मन भी तलाशता रहता है

स्वच्छन्द उन्मुक्त सा आकाश

जिसमें सुबह सवेरे सूरज करे प्रकाश

शाम को पंछी घरौंदे में करें निवास

बच्चों की किलकारियों से गूँजे आकाश

दें वो भी अपनी उमंगों का आभास

प्रमुदित मन डोले आंगन में हर प्रभात

सन्ध्या में ईश्वर वन्दन का करें अभ्यास

हर चीज़ हो व्यवस्थित मन को भाये बात

स्वागत हो सद्व्यवहार से अपनत्व के साथ
@ मीना गुलियानी 

मुहब्बत से बसर होता है

रोज़ जब मेरा जब अँधेरे में सफर होता है
लगता है यातना का गहरा असर होता है

कभी सर पे कभी पाँव में कभी सीने में
कैसे बतायें कि कहाँ कहाँ पे दर्द होता है

दिल चाहता है  उड़कर पहुँचे आशियाने में
क्या करें हमारे पास में टूटा पंख होता है

रहने के लिए मिट्टी का घरौंदा काफ़ी है
दिल में बेपनाह मुहब्बत से बसर होता है
@ मीना गुलियानी 

मंगलवार, 14 मार्च 2017

ऐसी नज़र होगी ही नहीँ

इन अंधेरों में तुम यूँ न भटका करो
यहाँ की आबोहवा इतनी हसीन नहीँ

तुम्हारे पाँव के नीचे देखो ज़मीन नहीँ
पर तुम्हें मेरी बात का यकीन ही नहीँ

अपनी कांपती अँगुलियों को सेंक लो
इससे बेहतर लपट मिलेगी न कहीँ

तुम मेरा साथ देना ग़वारा न भी करो
मुझे मालूम है तुमसे गुज़र होगी नहीँ

तुम्हारे दिल की हालत सिर्फ जानता हूँ मैं
हर किसी के पास ऐसी नज़र होगी ही नहीँ
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 11 मार्च 2017

हसरत गर उभरती हो

मेरी कल्पना में तुम झील सी लगती हो
मैं इक नाव बनता हूँ तुम उसमें तरती हो

तुमको यूँ ही ज़रा सा भी मैं  छू लूँ तो
लगता है जैसे पत्तों से ओस गिरती हो

तुम तो अक्सर खुद ऐसे ही सिहर जाती हो
 जैसे बन्दूक के गोली से चिड़िया डरती हो

दिल के दरवाजो को कभी तो खुला रखो
करें क्या दीद की हसरत गर  उभरती हो
@मीना गुलियानी

तुम्हारा दिल बहलाने आयेंगे

मेरे ये गीत तुम्हारा दिल बहलाने आयेंगे
मेरे बाद तुम्हें मेरी याद भी ये दिलायेंगे

अभी तो थोड़ी आंच बाकी है न छेड़ो राख को
कोई तो चिंगारी फिर सुलगाने को आयेंगे

अभी तो तपती धूप  है और पथ सुनसान है
आगे बढोगे तुम तो फिर मौसम सुहाने आएंगे

कितनी बिसरी यादों के मंजर अधूरे रह गए
लोग अपने ग़मो को भुलाने यहॉ पर आयेंगे
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 7 मार्च 2017

आँसुओं से तेरा नाम जुड़ गया

शायद इन खण्डहरों में होंगीं तेरी सिसकियाँ मौजूद
मेरा पाँव न जाने क्यों जाते जाते इस ओर मुड़ गया

अपने घर से चला था मैं तो सुकून की तलाश में
न जाने क्या अपशकुन हुआ बरगद उखड़ गया

दुःख को तो बहुत छुपाया रखा था सबसे दूर
सुख जाने कैसे बन्द डिबिया से भी उड़ गया

कितने सपने सजाके चले थे सफर पे साथ हम
आया हवा का तेज़ झोंका वो  मेला उजड़ गया

तमाम उम्र भी हमने जिक्र न किया था किसी से
आखिरी वक्त पे आँसुओं से तेरा नाम जुड़ गया
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 6 मार्च 2017

फिर से रोशनी तो कीजिये

इन हवाओं में फिर लपट सी आने लगी है
कुछ ठण्डे पानी के छींटे इन पर दीजिये

तुमको भी याद कर लेंगे इस बहाने से हम
दो चार पत्थर ज़रा इधर फेंक तो दीजिये

जीना मरना तो यहाँ लगता ही रहेगा
कुछ घड़ी आराम से ज़रा जी तो लीजिये

ये पेड़ भी जुबाँ रखते हैं साजों की तरह
इनकी उदासी को ज़रा दूर तो कीजिये

जिनका जहाँ में कहीँ और ठिकाना न रहा
उनके दिलों में फिर से रोशनी तो कीजिये
@मीना गुलियानी 

रविवार, 5 मार्च 2017

तुमको भूलने लगा हूँ मैं अब

इतना दुःख मन में इकट्ठा हो गया
देख तुमको भूलने लगा हूँ मैं अब

कितनी चट्टानों से गुज़रा पाँव में छाले पड़े
सोचो कितनी तकलीफों से गुज़रा हूँ अब

मेरी जिंदगी का अब कोई मकसद नहीँ
इस इमारत में कोई गुम्बद नहीँ है अब

इस चमन को देखो सुनसान नज़र आये
एक भी पंछी शायद यहॉ नहीँ है अब

पहले तो  सब अपने से लगते थे यहॉ
दिलकश नज़ारे पराये लगने लगे अब

आज मेरा साथ दो मुझको यकीं है मगर
पत्थरों में चीख कारगर होगी न अब
@मीना गुलियानी


शनिवार, 4 मार्च 2017

सबसे था अनजाना

क्या कहें क्या सोचें अपनों ने नहीँ पहचाना
 जबकि साया था वो मेरा अब हुआ अनजाना

ये मेरा ही कसूर है  मिलता हर बात पे  ताना
जिंदगी के ताने बाने में बन्द हुआ आना जाना

कैसी हुई जिंदगी  इसे पहनाया इक खुशनुमा जामा
 कहें किससे क्यों पसन्द किया खुदगर्ज़ कहलाना

कोई बात नही किसी से नाराज़ नहीँ अब क्या पछताना
अपनों ने अनजाने में जख्म दिए मन को क्या बहलाना

किसी को भी नज़र आये न  दरार ऐसे छिपाया याराना
 सोचता हूँ कुछ कहता नही सच बोलने से लगा कतराना

रौनके जन्नत भी रास न आई मुझे जहन्नुम में था बेगाना
ये ज़मीन तप रही थी ये मकान तप रहे थे सबसे था अनजाना
@मीना गुलियानी


गुरुवार, 2 मार्च 2017

कान्हा तेरी मुरली बजी

कान्हा तेरी मुरली बजी धीरे धीरे
दिल में बजे सुर उतरे यमुना तीरे
चले आओ कान्हा इतना न सताओ
फिर से वो तान सुनाओ धीरे धीरे

जिसमें था खोया आज मेरा मन
भूली थी सुध बुध बावरा हुआ मन
छलकी मेरी गगरिया यमुना तीरे
सुनी तेरी मुरली जब धीरे धीरे

कहे तू कान्हा मोहे इतना सताये
करूँगी भरोसा कैसे समझ न आये
याद तेरी कान्हा हर पल रुलाये
सुनाओ बंसी की वो तान धीरे धीरे
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 1 मार्च 2017

सर झुकाना पड़ेगा

एक एहसास है जिंदगी प्यार उसमें जगाना पड़ेगा
चाहे सांसे थमने लगी हों गीत ये गुनगुनाना पड़ेगा

गम से बोझिल है ये दिल तो क्या
सामने गर कोई मुश्किल तो क्या
हँसके दूर करके सब उलझनों को
हमको उस पार जाना पड़ेगा

दरिया गहरा है मंझधार है
साथ टूटी सी पतवार है
रखके खुद पे भरोसा चला चल
ये कदम तो बढाना पड़ेगा

क्यों तू इतना यूँ हैरान है
बैठा क्यों तू परेशान है
जिंदगी उसके करदे हवाले
सजदे में सर झुकाना पड़ेगा
@मीना गुलियानी 

मेरे मन में थी समाई

उसने अपनी गर्मजोशी अपनी मुस्कान से दिखाई

अपनी सुंदर छवि  मेरे दिल में व्यवहार से बनाई

एक अनूठी सी छाप दिल में बनाई

मेरी कल्पना में वो  उतरती सी आई

मेरी कविता  के बोलों में वो आ समाई

मेरे दिल की धड़कनों में बजने लगी शहनाई

लिखता था गीत मैं वो गाने लगी रुबाई

तहरीर लिखी मैंने लिखावट थी उसकी आई

दिलकश थे सब नज़ारे इक घटा सी छाई

 लगा धरती पे इक चन्द्रकिरण उतर आई

अपनी  सितारोँ की ओढ़नी उसने झिलमिलाई

उसकी रौशनी में मेरी काया यूँ जगमगाई

संगेमरमरी बदन से चिलमन उसने उठाई

उसकी वो हर अदा  मेरे मन में थी समाई
@ मीना गुलियानी


सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

कान्हा तेरा मेरा ये प्यार

कान्हा तेरा मेरा ये प्यार कभी न बदले

तेरे दर पे हमेशा मैं आता रहूँ
तेरे चरणों में शीश झुकाता रहूँ
कान्हा मेरा ये व्यवहार कभी न बदले

चाहे अपना हो चाहे कोई बेगाना
रूठे तो रूठे मुझसे सारा ज़माना
कान्हा मेरा ये विचार कभी न  बदले

 सत्संग में सदा तेरे आता रहूँ
 भजन सदा मैं तेरे यूँ गाता रहूँ
जुड़े मन से मन के तार कभी न बदले
@मीना गुलियानी 

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

इतना पन्ना लिखवाके लाया

तपती दुपहरी में वो जर्जर काया

लाठी टेकता वो मुझे नज़र आया

झुर्रियों का बोझ भी झेल न पाया

इतनी अधिक  क्षीण थी उसकी काया

विधाता ने जीवन का मोह उपजाया

मोम के पुतले सी पिघलती काया

न थी एक भी तरु की वहाँ छाया

प्राणों का मात्र स्पन्दन ही हो पाया

पल में मिट्टी में  विलीन हुई वो काया

चार व्यक्तियों ने उसे काँधे पे उठाया

निष्प्राण जीव ने चिरविश्राम था पाया

जीवन का इतना पन्ना लिखवाके लाया
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

उसे प्रेम का पाठ पढ़ाया

एक हवा का झोंका चुपके से आया
आते ही उसने फूलों को सहलाया
खुशबु से अपनी गुलशन को महकाया
धीरे से उसने जुल्फों को बिखराया
कंधे पे रखकर हाथ वो था मुस्कुराया
दिल के करीब ही खिंचा चला आया
मौसम ने फिर से जीना है सिखाया
लगता है जैसे कोई त्यौहार आया
लगता है कान्हा ने बाँसुरी को बजाया
गोपीवृन्द भी संग संग चले जैसे छाया
राधा का कान्हा ने मन को हुलसाया
नदिया किनारे कदम्ब की वो छाया
कान्हा ने वहीँ उसके नीचे रास रचाया
कालिन्दी की धारा ने सब याद दिलाया
गोपियों ने विरह जल था उसमें बहाया
अश्रुजल से काली पड़ी कालिन्दी की काया
कान्हा का सा ही रूप उसने था लखाया
जिसने उद्धव का मान भी खण्डित कराया
जो ज्ञान का सन्देश देने को था आया
गोपियों ने ही उल्टा उसे प्रेम का पाठ पढ़ाया
@मीना गुलियानी 

जिस्म मिट्टी बन गया है

अब कौन धैर्य दे मेरे दिल को

जिसका पूरा इतिहास जल गया है

मुझसे मेरा बचपन रूठ गया है

मन का ये आँगन सूना पड़ गया है

ज़माने की इन फ़िक्रों ने खा लिया है

कैसे सब्र करे जिसका दिल टूट गया है

घर का तिनका तिनका बिखर गया है

आस का पत्ता पत्ता पेड़ से झड़ गया है

कल का फूला गुलशन उजड़ गया है

मिट्टी में मिलके जिस्म मिट्टी बन गया है
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

कान्हा राधा पुकारे आज

कान्हा राधा पुकारे आज, प्यारे आ जाओ इक बार
कान्हा आ जाओ न ठुकराओ,मेरी नैया लगादो पार

कान्हा तूने मुझे बिसराया है
ये कैसी तुम्हारी माया है
नित बहती है अँसुअन धार

जब याद तेरी मुझे आती है
तन मन की सुध बिसराती है
तुझपे तन मन दूँ मैं वार

कान्हा बिछुड़े हुए युग बीत गए
क्यों मीत  मेरे तुम रूठ गए
अब सपने करो साकार
@मीना गुलियानी 

बेचैनी दिल में उभरती है

तेरी तस्वीर भी आजकल मुझसे बात नहीँ करती है
वो भी चुपचाप कमरे में एक ओऱ तकती रहती है
जाने क्या बात है क्यों उदासी सी छाई रहती है
एक उलझन सी है जो ख्यालों में तेरे रहती है

हम तो तेरे ही साये में जीते हैं सँवरते हैं
फिर भी इक ठेस सी जहन में उतरती है
हम तेरे  मलाल  का सबब ढूँढते रहते हैं
 क्यों फिर इक मायूसी दिल में भरती है

तुम यकायक क्यों चले जाते हो  बिना बताये हुए
एक हसरत सी दिल में हमेशा मेरे उमड़ती है
यूँ तो लम्हे गुज़रते जाते हैं तेरे बगैर जीते हैं
 फिर भी तन्हाई की बेचैनी दिल में उभरती है
@मीना गुलियानी


मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

जिंदगी तेरे एहसास में डूबी थी

तुम्हारी याद के पल कितने सुहाने थे
हवा भी गीत गुनगुनाती थी
तेरे इंतज़ार में लोरियाँ सुनाती थी
मेरे तड़पते हुए दिल को बहलाती थी
धूप मेरे आँगन में खिल जाती थी
तुम मेरे बाज़ुओ में सिमट जाती थी
चारों दिशाओं में तुम्हारी हँसी गूँजती थी
जिन्दगी तुम्हारे प्यार पर फ़िदा होती थी
तुम्हारी लरज़ती चाल याद आती थी
तब मेरी रूह भी कांप जाती थी
तुम्हारे बालों से पराग केसर झड़ते थे
जो तुम्हारे नाज़ुक कपोलों को चूमते थे
अंगुलियाँ बालों में तुम लपेटे थी
जिसमें सारा जहाँ तुम समेटे थी
जिस्म मोम सा सांचे में ढला था
मेरी जिंदगी तेरे एहसास में डूबी थी
@मीना गुलियानी 

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

मेरे सपनों का गाँव हो

मेरे अन्तर की पीड़ा को तुम क्या जान पाओगे
मेरे भावों की व्याकुलता को तुम क्या समझ पाओगे
मेरे जिस्म के अंदर एक भावुक मन भी है
जो नहीँ रहना चाहता किसी के भी पराधीन
इन सभी सम्बन्धों से ऊपर उठकर चाहता है जीना
वो जिंदगी जो कि शायद दुश्वार लगेगी तुमको
एक एहसास हमेशा मुझे कचोटता है क्या यही जीवन है
सुबह से शाम, शाम से रात, रात से फिर दिन
एक ही कल्पना, यही समरूपता , न भावों का स्पंदन
 वही आशा, वितृष्णा  भरी जिंदगी क्या जीना
जहाँ न शब्दों की है कोई परिभाषा ,सिर्फ निराशा
मैं चाहती हूँ एक नया  संसार यहाँ बसा दूँ
हर तरफ खुले आकाश का शामियाना हो
चाँद तारों को उसमें सजा दूँ ,दीपक सजा दूँ
जहाँ बादलों का झुरमुट अठखेलियाँ करता हो
लहरों भर समंदर सा मन मचलता हो
नए नए उद्गार मन में पनपते हों
नए नए पत्तों से गान हवा से झरते हों
कोयलिया जहाँ मीठे बोल सुनाती हो
तितली जहाँ पँख फैलाती उड़ती इतराती हो
वेदना का जहाँ नामोनिशान  न हो
वहीँ पर बसा मेरे सपनों का गाँव हो
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

ऐसा मकां बनाया जाए

ऐसा कब्रिस्तान कहाँ है जहाँ नफरतों को दफनाया जाए
ईर्ष्या ,द्वेष ,वैर  भाव को हर दिल से कैसे मिटाया जाए

                          हर कोई कुदरत के तमाशे पे ही नाचते रहते हैं
                          तन्हाई की महफ़िल ख़ामोशी के घुंघरू बजते हैं
                          कैसे इस बेचैनी को हर मन से अब हटाया जाए

वैसे तो जीने को तो हम यूँ भी जिए जाते हैं
बन्द कर होठों को अश्कों को  पिए जाते हैं
लम्हे जो गुज़रे नफरतों में कैसे भुलाया जाए

                       कभी तो कोई दिन ऐसा आये जो सुकूँ से भरा हो
                       कोई तो दिल मिले ऐसा जो मुहब्बत से भरा हों
                        सुकूँ  दिल को मिले कोई ऐसा मकां बनाया जाए
@मीना गुलियानी 

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

स्वप्न फिर बुनने लगी

सुना है  डूबते को तिनके का सहारा काफी है
फिर से नए ख़्वाब ये जिंदगी बुनने लगी
हरी हरी घास ने दे दी है अपनी कोमलता
फूलों की पत्तियों ने लुटा दी अपनी सुंदरता
उनका मकरन्द भी चुराया पवन ने भँवरों ने
उसको अपने गीतों में चुपचाप मैं सँजोने लगी
मधुर सपने जो देखे आँखों ने मैं उनमें खोने लगी
मन  स्वच्छन्द सा उडा  जाता है हवा के झोंके से
दिल की तरंग मृदंग की थाप सी बजने लगी
पृथ्वी का स्पर्श मेरे अन्तर्मन को फिर छू गया
प्रकृति के इस आँगन में सृजन उत्सव भर गया
मेरी पलकें सृजन के स्वप्न फिर बुनने लगी
उन सुखद पलों के एहसास बन्द आँखे करने लगी
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

मीठे बोल मुँह से बोल तो ज़रा

तुझको निहारने से कभी मन नहीँ भरा
तुम ही मुझे बताओ ये क्या है माज़रा

क्यों आ गईं माथे पे तुम्हारे सिलवटें
क्यों हर बात पे सोचते बतलाओ ज़रा

शोहरत तो तुम्हारे कदम चूमेगी मगर
तुम अभी से न इतना इतराओ तो ज़रा

यूँ तो बगिया ये सारी वीरान ही पड़ी है
दिल का ये चमन है फिर भी हरा भरा

तन्हा ज़िन्दगी का सफर काटे नहीँ कटता
कुछ मीठे मीठे बोल मुँह से बोल तो ज़रा
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

ऊपर खुला आसमान है

यह सड़क हर तरफ से ही सुनसान है
आदमी मगर यहाँ का बड़ा सावधान है

हम फिसल गए तो फिसलते चले गए
सोचा न था कि इस मोड़ पर ढलान है

कभी तो हँस दो खुलके बात करो हमसे
वरना कहेगा कोई तू कितना बेज़ुबान है

इतनी मसरूफियत भी अच्छी नहीँ लगती
सभी अपने अपने हालातों से परेशान हैं

हम उस जगह पर हैं जहाँ अपनी खबर नहीँ
चल रहे हैं ज़मी पर ऊपर खुला आसमान है
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

अंगारों को फिर कैसे हम बुझाएंगे

मेरे दिल के जख्म कुछ हरे से हैं
न कुरेदो उन्हें रिसने लग जायेंगे
गमों से इतने मुझे पाले हैं पड़े
लगता है छाले वो सारे फूट जायेंगे

                       टूटते रिश्तों में भी मौजूदगी का एहसास है
                       दिल की टीस न कम होगी अरमां रह जायेंगे
                       भावनाओं का सैलाब है आँसू ढलक जाएंगे
                       सिसकते हुए अरमान लिए तेरी गली आएंगे

सीपी में बन्द अरमानों को किया हमने
नज़ारे को भी हम सामने तेरे लेके आएंगे
दिल पे जब तिश्नगी की चोट लगी
जलते अंगारों को फिर कैसे हम बुझाएंगे
@मीना गुलियानी 

मेरा सपना अधूरा ही रहा

कल का मेरा सपना अधूरा ही रहा
तू मुझसे रूठा रूठा सा ही रहा

               मेरा दिल तुझसे मिलने को तरसता रहा
               आसमाँ पर चाँद खिला पर सिमटा रहा

सितारों पर भी बादलों का पहरा सा रहा
कुहरा आसमान पे यूँ  बिखरा सा ही रहा

              वक्त तेरे आने की आहट को सुनता ही रहा
              खुशियों से भरा दामन सिकुड़ता सा ही रहा

आईना मेरी मुस्कुराहट देखने को तरसता रहा
तेरे बिना मोती कुंदन हीरा सब फीका सा रहा
@मीना गुलियानी


सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

मय्यसर नहीँ है अपने लिए

मैंने तो सोचा था चिरागाँ करेंगे हर दिल को
 इक चिराग भी मय्यसर नहीँ है अपने लिए

इस शहर में अब कोई भी हमदम न बचा
चलो कहीँ दूर चलें छोड़के ताउम्र के लिए

कहीँ भी देखो सब ख़ाक ही नज़र आये
कोई हँसी नज़ारा न बचा नज़र के लिए

सब संगदिल ही हैं जो यहॉ पे बसते हैं
कैसी आवाज़ लाऊँ यहॉ असर के लिए

मेरा गुलशन भी तूफां से इस कदर उजड़ा
सुकूँ  दिल का मिट गया उम्र भर के लिए
@मीना गुलियानी 

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

चिंगारी हमेशा सुलगनी चाहिए

दिल की पीर इतनी बर्फ सी जमी
आज कुछ तो पिघलनी ही चाहिए

                    दर्दे दिल जब नासूर बन जाए कभी
                    धारा आँसुओ की तो बहनी चाहिए

सिर्फ तमाशा हो यहाँ नहीँ कोशिश मेरी
इस जहाँ की तस्वीर तो बदलनी चाहिए

                  तूफां इतने हैं आए कांप उठी ये ज़मी
                  अब तो फांसले की दीवार गिरनी चाहिए

होंसलों को पस्त न होने देना कभी
एक चिंगारी हमेशा सुलगनी चाहिए
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

अब बोल दे न मुझसे छिपा

तुम्हारे बगैर कुछ अच्छा नही  लगता है
दिल मेरा यूँ ही उड़ा उड़ा सा रहता है
              पूरा घर इक नुमाइश सा लगता है
              एक तूफ़ान सा दिल में उमड़ता है
मैं इन सितारों से बात करता हूँ
रौशनी इनसे घर में करता हूँ
                 कभी इनको तेरी जुल्फों में टांगता हूँ
                 कभी इनसे शामियाने को सजाता हूँ
हर पल तुझसे ही बातें करता हूँ
तेरे ही ख़्वाब बुनता रहता हूँ
              बस एक झील का किनारा है
               इसमें डूबा मेरा जहां सारा है
कैसे खोजूँ मैं अपना दिल ये बता
तू ही अब बोल दे न मुझसे छिपा
@मीना गुलियानी 

दर्द को इतना दिया गला

दिल मेरा कहीँ भी न मिला

आँगन में कोई फूल न खिला

अम्बर पे चाँद भी न घटा

बादलों में सूर्य जा छिपा

हँसी मेरी बन गई बेवफा

चुप की हमने सुनी है सदा

लहू का बहा दिया दरिया

धरती को दिया आज नहला

दर्द को इतना दिया गला
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

लरज़ते प्यालों में कहाँ

तुम्हारी आँखों में जो नशा है
वो इन लरज़ते प्यालों में कहाँ

             हम तो भूले से तेरे साये से  लिपट जाते हैं
            जो कसक तुझमें है सागरो मीना में कहाँ

करता हूँ इबादत गर कबूल हो जाए
सहर हो तेरी पर मेरा आफताब कहाँ

             अब तड़पती हुई ग़ज़ल तुम सुना दो मुझे
             जो  जुनून  तेरे प्यार में है वो और कहाँ
@मीना गुलियानी