यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 17 मार्च 2018

माता की भेंट -कैसे क़द्रदानियाँ

तेरे दर आऊँ तेरा दर्श मैं पाऊँ खाली लौटके न जाऊँ
 मेरी माँ ---करदे मेहरबानियाँ करदे मेहरबानियाँ

तू है माँ भोली , भरती सबकी तू झोली
मुझे पार लगाना माँ ,मेरी नैया डोली
मेरी माँ शेरों वाली, जोतों वाली
सुन माँ  -  दुःख भरी कहानियाँ

तेरे दर आया हूँ , माँ ग़म का सताया हूँ
दुःख दूर करो मेरे ,जग का ठुकराया हूँ
मेरी माँ दे दो शक्ति ,करूँ मैं भक्ति
जलाऊँ  -  जोतें नुरानियाँ

तेरा सहारा है ,माँ तेरा ऊँचा द्वारा है
तेरे भक्तों को लगता ,तेरा नाम प्यारा है
माँ भव से तारे , पार उतारे
भूलें हम--कैसे क़द्रदानियाँ
@मीना गुलियानी




नित दर्शन की प्यासी

प्रभु जी तेरी शरण पड़ी है दासी
भव पार करो काटो जम की फाँसी

मैंने कष्ट बहुत है पाया
भटक भटक जून चौरासी
मानुष का तन पाया
मिटादो दुखों की ये राशि

मैंने बहुत पाप है कीन्हा
संसारी भोगों की आशा ने
दुःख बहुत मुझे  दीन्हा
ये कामना है सत्यानाशी

प्रभु जी मैंने भक्ति नहीं कीन्हि
झूठे भोगों की तृष्णा में
उम्र सारी खो दीन्ही
दुःख मेरे काटो अविनाशी

प्रभु जी अब सारी आशा टूटी
तेरे चरण की धूलि लागे
मुझे एक संजीवनी बूटी
रहूँ नित दर्शन की प्यासी
@मीना गुलियानी

वो लम्हा न मिला

मैं तन्हा हूँ तुम्हारा तसुव्वर है
वक्त कुछ ठहर सा गया है
तुम्हारे पाँव के निशान खो गए
मैं सोच रहा हूँ कि कहाँ जाएँ

तुम अभी अभी तो गुज़रे थे
तुम्हारी महक हवाओं में है
इस गहन सन्नाटों के बीच
तुम्हारे चहकने की आवाज़ है

मैंने अपनी उम्र यूँ ही गुज़ार दी
इसी बात का ग़म सालता है
मुझे सिर्फ तन्हाई ही मिली
फ़ुरक़त का वो लम्हा न मिला
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 14 मार्च 2018

किसी का दिल बहलाने

मैं जो कहता था तब किसी ने न सुना
अब चुप हुआ तो सबने बनाए अफ़साने

अपने ग़म खुद ही समेटे जीने के लिए
चाहता हूँ कि कोई भी न मुझे पहचाने

गुज़ारे हैं कितने ही लम्हे यूँ तेरे बगैर
अब तो खुद को भी लगने लगे दीवाने

ये चाँद सितारे भी आज ग़ुम क्यों हुए
गए हैं शायद किसी का दिल बहलाने
@मीना गुलियानी


सोमवार, 12 मार्च 2018

मेहमाँ तुम्हीं तो हो

करते हमेशा याद वो मेहरबां तुम्हीं तो हो
करते हैं जां निसार जिसपे राजदां तुम्हीं हो

दिल की बात कह रहे हैं तुमसे कबसे हम
मतलब भी पूछते हो नादाँ तुम्हीं तो हो

आता है बाद ज़ुल्म के रहम भी तुम्हीं को
अपने किए पे खुद भी परेशां तुम्हीं तो हो

पछताओगे एक दिन मेरा सुकूँ उजाड़कर
इस दिल में कौन है मेहमाँ तुम्हीं तो हो
@मीना गुलियानी

शनिवार, 10 मार्च 2018

तुम बहुत याद आते हो

इस मतलबी दुनिया की तंगदिली
दुनिया के फरेब और कड़वे शब्द
जब मेरे मन को ठेस पहुँचातें हैं
तुम बहुत याद आते हो

चलते चलते जब इस सफर में
बहुत घना अँधेरा  छा जाता है
और मन का हौंसला टूटता है
तुम बहुत याद आते हो

तुम्हारे प्यार की रोशनी मुझे
तब एक नई राह दिखाती है
 दुनिया की मची हलचल में
तुम बहुत याद आते हो
@मीना गुलियानी



शुक्रवार, 9 मार्च 2018

जीवन की भंवर से उबरूँ

जी चाहता है पँख लगाकर
नील गगन की परिक्रमा करूँ
आकाश की ऊँचाइयाँ छू लूँ
जहाँ घुटन भरे बादल न हों
न ही भेदभाव या स्वार्थ हो
हर तनाव ताप से मुक्त होऊं
जीवन सागर की गहराई में
फिर डूबकर गोता लगाऊँ
जीवन के सत्य के मोती ढूँढूँ
जीवन में मधुरता भर लूँ
उपवन सी ताज़गी पा लूँ
मन की भटकन खत्म करूँ
सरल शान्ति की आगोश पाऊँ
और जीवन की भंवर से उबरूँ
@मीना गुलियानी 

जब बेटी ससुराल पधारे

माता पिता के प्रेम का कैसे क़र्ज़ चुकायेंगे
बच्चों के सुख खातिर कितने ग़म उठायेंगे

कैसे भूलेंगे हम वो पल जब माँ थी लोरी गाती
खुद भूखी रहकर भी हमको भरपेट वो खिलाती

राजा बेटा रानी बिटिया कहकर गले लगाती
पापा से जब डाँट पड़ती वही आके हमें बचाती

बचपन के दिन हमें याद हैं करते थे हम मौज
पापा की पीठ के घोड़े पर चढ़ते थे हर रोज़

माँ की ममता का न कोई सांनी न ऐसा ज्ञाता
बच्चे की वो प्रथम गुरु है वो ही  भाग्यविधाता

पापा भी हैं सबको प्यारे हम हैं उनकी आँख के तारे
आँखे उनकी भी भर आती जब बेटी ससुराल पधारे
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 8 मार्च 2018

हस्ती को मिटाया जाएगा

वाह क्या यही है नारी का सम्मान 
सदा से सहा है उसने इतना अपमान 
करता रहा वो जुल्म और तू सहती रही 
वो तो वहशी है और तू नादान 

अरे ---ये तो है ---एक करोड़ का बंगला 
सभी कुछ होने पर भी तू है कंगला 
कितना बड़ा बनाया तेरा ये पिंजरा 

फिर से क्या वही पाठ दोहराया जाएगा 
फिर से तेरी हस्ती को मिटाया जाएगा 
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 7 मार्च 2018

आके तुम इसे जला जाओ

दिखता है हर ओर अँधेरा
उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम
चारों ओर अँधेरा छाया
सूझे न कोई राह मुझे

मन का कोरा मेरा आँचल
रोते रोते भीग गया है
भूले से ही सही तुम आओ
एक बार तो राह दिखाओ

यह जीवन की पगडंडी
पलक झपकते डसती है
जीवन की नागिन मुझ पर
मौत बनकर हँसती है

जिंदगी की रहगुज़र कैसे होगी
हर तरफ एक परछाईं है
एक अक्स नज़र आता है
दुनिया में कौन किसका है

ये जिंदगी एक रात की है
प्यार एक चिराग सा है
जितनी देर तक जल सके
आके तुम इसे जला जाओ
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 6 मार्च 2018

मुझे तेरी सिसकियाँ

क्यों तेरे चेहरे पर दिखाई देती हैं वीरानियाँ
अजीब सी करती हैं मुझसे ये सरगोशियाँ

क्यों हैं फूलों के बगीचे यूँ पड़े सुनसान से
दर्द के गुल खिले छाईं ग़म की बदलियाँ

क्यों छिपा रहे हो हाथों से अपना चेहरा तुम
तेरे चेहरे से अयाँ होती कितनी कहानियाँ

दिल तेरा यूँ टूटा टूटा रोता है चुपचाप क्यों
अक्सर सुनाई देती हैं मुझे तेरी सिसकियाँ
@मीना गुलियानी

रविवार, 4 मार्च 2018

जग में तेरा आवागमन

मृत्यु के डर से छटपटाता है मन
सबको मुक्ति की चाह मिले न राह
पाप में सदैव डूबा रहता चंचल मन
पञ्चतत्व का है तन करे न चिंतन
तन अस्थाई और मोहपाश के बंधन
करे न कृष्ण चिंतन छूटे ये बंधन
काम ,क्रोध,ईर्ष्या में लीन है मन
वक्त है सम्भल नहीं व्यर्थ है जीवन
कर आत्मचिंतन छोड़ सारे ये भ्रम
ताकि न हो जग  में तेरा आवागमन
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 3 मार्च 2018

साये से लिपटा जा रहा हूँ

शीशे का महल बना रहा हूँ
दिल अपना बहला रहा हूँ

मेरे सीने में बहुत दर्द भरा है
सबसे उसको छिपा रहा हूँ

सारा ज़माना है मुझसे बेखबर
उसको मैं आईना दिखा रहा हूँ

सबके ज़ज्बात पत्थर से हो गए
अपने ज़ख्मों को सहला रहा हूँ

किसी से शिकवा गिला न मुझे
अपने साये से लिपटा जा रहा हूँ
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

हम दूर होने लगे हैं

यूँ यादों में उनकी खोने लगे हैं
कभी हँसते हँसते यूँ रोने लगे हैं

न बेचारगी थी हमें इससे पहले
कि यादों में खुद को खोने लगे हैं

सीखा न जीने का हमने सलीका
अरमां ये नश्तर चुभोने लगे हैं 

है दर्द ये कैसा बताए तो कोई
नशेमन में खुद को डुबोने लगे हैं

उतरे भी कैसे कोई साहिल के पार
साहिल से हम दूर होने लगे हैं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

सुध दीनी बिसराए

सखी कैसे मैं खेलूँ फाग
मोरे पिया घर नहीं आए

हेरत हेरत थक  गईं अखियाँ
जियरा मोरा अकुलाय

लिख लिख पाती भेजूँ कैसे
कोई संदेशा पहुँचाए

होती गर मैं बन की कोयलिया
उड़ जाती उत धाय

सबके बलम घर आवन लागे
नैना मोरे भर आए

सब सखियाँ मोसे करत ठिठोली
काहे सुध दीनी बिसराए
@मीना गुलियानी 

मेरे जीने की तू आस भी है

चाहे दूर है तू चाहे पास भी है
हर पल तेरा एहसास भी है

इस जग में कितने लोग मिले
पर तुझसे रिश्ता ख़ास भी है

तुझसे खुशियाँ इतनी हैं मिली
मुझे तुम पर इतना नाज़ भी है

तुम दूर न मुझसे कभी होना
तू ही धड़कन और श्वास भी है

तू ही है समाया इस दिल में
मेरे जीने की तू आस भी है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

संग बिताए त्यौहार

बताओ भला कैसे हम भुलाएँ वो बचपन
 नानी का दुलार और प्यारा सा आँगन

वो गुड़िया का घर वो गर्मियों की दोपहर
वो कड़ाके की सर्दी और हवाओं का कहर

वो दादा दादी की कहानी हवा की रवानी
मम्मी से शिकायत डाँट पड़ती थी खानी

वो गेंद के टप्पे और वो  टॉफियों के रैपर
वो साईकिल पे कितने लगाते थे  चक्कर

वो खेतों में जाना और गन्ने भुट्टों को खाना
बारिश के दिनों में कागज़ की नाव चलाना

वो हलवा और चाट क्या हमारे थे ठाठ
वो हँसना हँसाना और दोहराते थे पाठ

कभी स्कूल की छुट्टी और दोस्तों से कुट्टी
कभी बचपन के झगड़े करते थे अट्टा बट्टी

याद आता है पापा और  दादा का प्यार
भला कैसे भूलेंगे  संग बिताए त्यौहार
@मीना गुलियानी


सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

मधु प्याले क्यों रीत गए

वो सब टेसू के रंग में भीग रहे हैं
होली आई  गुलाल से सराबोर हैं

बच्चे हरसिंगार के फूल झाड़ रहे हैं
 पानी में कागज़ की नाव चला रहे हैं

सपने मेरी आँखों में लहलहाने लगते हैं
होंठ अनकहे रहकर थरथराने लगते हैं

तुम्हें कुछ याद है हमने क्या खोया है
तुम्हारी याद में अपना दिल गंवाया है

वो मधुर सुहाने दिन जल्दी ही बीत गए
आँखों से छलके मधु प्याले क्यों रीत गए
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

बाजे ढोल मृदंग और चंग

आया है फागुन
पुलकित हुआ मन
हुलसा है तन
महका हर उपवन
पुराने पत्तों का क्षरण
नवपल्ल्वों का अवगुंठन
कोमल पत्तों पर
ओस कणों की छुअन
धरा का पुष्पों से
महका है आंगन
पहनी है धानी चूनर
लटकी मोती की झूमर
पहनी मोतियन माला
इठलाई बनके बाला
सूरज उतरा नीचे
छूने पाँव धरा के
चंदा ने दी बाहें पसार
चाँदनी गाए मल्हार
नाचे बन में मोर
प्रमुदित हुआ चकोर
ब्रज में छाया  उल्लास
कान्हा संग गोपियन का रास
आई ग्वालों की टोली
खेलें सब हिलमिल होली
उड़े अबीर गुलाल का रंग
बाजे ढोल मृदंग और चंग
@मीना गुलियानी




शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

खामोशी से सीपियाँ चुनते हैं

समुद्र के किनारे लहरों को गिनते हुए
बैठे हुए चुपचाप खामोश से हम तुम
तुमने जब आँखे खोली बजी एक धुन
जो एक लय में धड़कने लगती है

तुम्हारे होंठों पे हँसी आते आते
क्यों ठिठक जाती सिहर जाती है
एक तूफ़ान सी खामोशी फिर से
तुम्हारे हाथों में ही सिमट जाती है

तुम्हारी आँखों से परछाईयाँ उभरती हैं
अनगिनत रंगों के सपने निकलते हैं
एक  गुबार सा बरसने लगता है
हम तुम खामोशी से सीपियाँ चुनते हैं
@मीना गुलियानी