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शनिवार, 9 जून 2018

दिल मेरा दुआ करे

हर अरमान जिंदगी के तेरे हों पूरे
कोई भी सपने तेरे रहें न अधूरे

खुशियों का साया तुझ पर रहे मेहरबां
तुझको उस परवरदिगार की मिले पनाह

न हो कभी ख़ौफ़ कभी तुझे किसी का
 झोली मुरादों भरी बने आसरा किसी का

हर पल रहे जुनून तुझे दोस्ती का
रहे दूर तुझसे साया भी दुश्मनी का

खुदा का  हाथ हमेशा सिर पर तेरे रहे
तू सलामत रहे दिल मेरा दुआ करे
@मीना गुलियानी 

शुद्ध मन करो

भाग्य पाने के लिए
कुछ श्रम करो
लक्ष्य पाने के लिए
कुछ प्रण करो
ज्ञान पाने के लिए
भ्रमण करो
जीत पाने के लिए
पराक्रम करो
दीपक जलाने के लिए
शुद्ध मन करो
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 7 जून 2018

बह चले यह नयन निर्झर

आज फिर स्मृति तुम्हारी
क्यों सताती विकल होकर
उधर प्राची से उठे हैं
श्याम गहन संदेश लेकर
गए उठा पागल पपीहा
प्रणय के भूले फ़साने
बज उठे सुन मधुर रिमझिम
हृदय के कम्पित तराने
देख स्वनिल छवि तुम्हारी
बह चले यह नयन निर्झर
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 6 जून 2018

इसमें प्राणों के पाश बँधे

यह बंधन ही मुझको प्रियकर
निष्कृति जीवन गति रुक जाना
प्रियतम के प्रियतम बन्धन में
सुख मिलता मुझको मनमाना
चिर बन्धन ही है अमर मुक्ति
जिसमें धरती आकाश बँधे
बन्धन ही प्रेरक है गति का
इसमें प्राणों के पाश बँधे
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 5 जून 2018

है हँस रहा गगन

जग हँस रहा है आज   -    है हँस रहा गगन
सुरभित समीर कहती कलियों से तुम खिलो
लहरों चली चलो सागर से तुम जा मिलो
जीवन का सुख यही अन्तर का मृदु मिलन

चितवन किसी की भोली मन में समा गई
आकाश गंग सी इक रेखा बना गई
सुधियों के साथ जागे आँखों के यह सपन
जग हँस रहा है आज   -    है हँस रहा गगन
@मीना गुलियानी

सोमवार, 4 जून 2018

तुम्हीं पर वारा करूँ

बन पागल  चातक सा प्रिय मैं
नित आनन चन्द्र निहारा करूँ
नित नैनन नीर नवोदित से
तुम्हारे पद पदम् पखारा करूँ
अपने हिय आज बसा तुमको
नित आरती मञ्जु उतारा करूँ
अपनापन लीन तुम्हीं में करूँ
सर्वस्व तुम्हीं पर वारा करूँ
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 1 जून 2018

किश्ती मैं पार लगा जाऊँ

या रब ! ये कैसी मजबूरी
दो साथी आज बिछुड़ते हैं
उखड़ी उखड़ी सी सांसे हैं
दिल में अरमान तड़पते हैं

खामोश निगाहों से मांझी
है देख रहा किश्ती जाती
तूफ़ान उमड़ता जाता है
आवाज़ न हमदम की आती


हमदम मेरे आवाज़ तो दो
तूफानों से टकरा जाऊँ
मिटते मिटते भी बस तेरी
किश्ती मैं पार लगा जाऊँ
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 31 मई 2018

साहिल तक जाना मुश्किल है

जीने को जिए जाते हैं मगर
हर सांस का आना मुश्किल है
इक बोझ है सीने पर ऐसा
जिसको उठाना मुश्किल है

इक याद हे दिल में ऐसी कुछ
जिसको कि भुलाना मुश्किल है
इक चाह है ऐसी कुछ दिल में
जिसको कि गंवाना मुश्किल है

तूफ़ां के थपेड़ों में पड़कर अब
किश्ती का बचाना मुश्किल है
मौजों की रवानी में बहकर
साहिल तक जाना मुश्किल है
@मीना गुलियानी

बुधवार, 30 मई 2018

बिखरे सुर जो गाया

जिंदगी में इक मोड़ ऐसा भी आया
वादा किया रुकने का पर रुक न पाया

रेत सा वक्त हाथों से फिसलता गया
दीद को तरसते रहे मिला सिर्फ साया

पुकारते ही रह गए जुबां से न कह पाया
जहाँ तलक देखा ख़्वाब टूटता नज़र आया

जिंदगी के साज़ पर एक गीत सजाया
कसक दिल में उठी बिखरे सुर जो गाया
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 29 मई 2018

हर ग़म गले लगाते हैं

बुझते चिराग़ों को फिर जलाते हैं
उजड़े हुए ख़्वाबों को सजाते हैं

लम्हे जिंदगी के जो गुज़र भी गए
उनकी यादों में हम डूब जाते हैं

दर्दे दिल हमसे सहा नहीं जाता
दरिया अश्कों के हम बहाते हैं

खोए रहते हैं हम ख्यालों में
हम तो हर ग़म गले लगाते हैं
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 28 मई 2018

चाँदनी भी लगी नाचने

ज्येष्ठ की दुपहरी में तपती है धरती
मीलों तक नज़र आए बंजर सी धरती
कैसे बनाओगे आशियाना रेतीली धरती
रेत का फैला समुन्द्र उठता बवण्डर
शूल बिखरे हर पथ पर तपती धरती
फिर इन्द्र का दिल भी देखकर डोला
भेजा बादलों को बनाने उर्वर धरती
बादल जो गरजे तो बरसी बदरिया
कुहुक उठी कोयल मोर झूमे गोरैया
खिल उठे कमल दल भरे पोखर तलैया
धरती फिर झूम उठी पहन पायल उठी
ओढ़ ली धानी चुनरिया गगरी छलक उठी
चंदा की चाँदनी, झिलमिलाती रात में
ले सितारों को संग , आई खुशियाँ बाँटने
लेके धरा को संग चाँदनी भी लगी नाचने
@मीना गुलियानी
ए -180 , जे डी ए  स्टाफ कालोनी
हल्दीघाटी मार्ग ,जगतपुरा
जयपुर -302017

रविवार, 27 मई 2018

अब तो मुझे अपनाओ

प्रभु जी मेरी विपदा आन मिटाओ

फँस गया मैं भंवरजाल में
सत्यपथ मुझे बतलाओ

रास्ता भूला पथ है अँधेरा
आप ही मार्ग दिखाओ

मुझसा न दुखियारा जग में
अब तो फन्द कटाओ

धीरज गया धर्म भी छूटा
आफत आन मिटाओ

शरण आया हूँ मैं आपकी
अब तो मुझे अपनाओ
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 26 मई 2018

फिर मिट जाए आवागमन

हे मेरे मन  उतावला मत बन
तज दे चंचलता उच्छृंखलता
भूल जा अपनी तू चतुराई
ले ले अब प्रभु की शरण
जग में वो ही तारनहारा
तनिक तो करले  चिन्तन
घाट  घाट का पानी देखा
मिटी नहीं तृष्णा की रेखा
जग है मिथ्या काहे डोले
वृथा है तेरा ये भ्रमण
वो ही पाले वो ही सम्भाले
करदे जीवन उसके  हवाले
फिर मिट जाए आवागमन
@मीना गुलियानी

हादसा टल गया था

रेल की पटरियों के बीचों बीच
कोई अपनी धुन में जा रहा था
कानों में हैडफोन लगाए हुए था
गाने वो सुनता चला जा रहा था
इतने में गाड़ी ने सीटी बजाई
पर उसके दोनों ही कान बंद थे
फिर भला उसे सुनाई कैसे देता
न ही जान की परवाह थी उसको
लगता था जैसे कोई दीवाना
या किसी शमा का परवाना
रेल की पटरियों पर इंजन
धड़धड़ाता समीप आ रहा था
पटरियाँ भी थर्राने लगी थीं
वो  दीवाना मौत को दावत
दिए चला ही जा रहा था
अकस्मात मैंने उसे पटरी से
 दूर धकेला वो पटरी पार गिरा
गाड़ी धड़धड़ाती हुई निकल गई
मैंने भी चैन की साँस ली और
ईश्वर को धन्यवाद किया वो
भयानक हादसा टल गया था
@मीना गुलियानी


गुरुवार, 24 मई 2018

निंदिया से ख़्वाब तुम्हारे

उतरी फ़लक से पानी की बूँदें
लगा जैसे टकराईं हैं वो तुमसे
उनकी खनक से लगा है ऐसे
बजी हो तेरी पायल कहीं से
बिखरी गगन में प्यारी चाँदनी
फ़िज़ा भी देखो कितनी खिली
लगता चुराई है रोशनी उसने
चुपके चोरी तेरी बिंदिया से
दिलकश नज़ारे कितने प्यारे
चुराए निंदिया से ख़्वाब तुम्हारे
@मीना गुलियानी 

पहिया अनवरत चलता है

जब सुबह कलरव करते
पक्षियों को देखती हूँ
तो अपने मन में सोचती हूँ
कैसे वो घोंसला बनाते हैं
तिनका तिनका बीनकर लाते हैं
अपनी चोंच से फिर सजाते हैं
सुबह दाना चुगने निकलते हैं
तो शाम को घर लौटते हैं
उनके बच्चे अपनी चोंच खोलते हैं
माँ आती है उन्हें खिलाती है
आँधी तूफ़ान जब आते हैं
उनको भी तो डर लगता होगा
न जाने कितने घोंसले तो उस
तेज़ हवा के झोंकों से ही
टूटकर बिखर जाते हैं
मुझे यह देखकर दुःख होता है
उनका परिश्रम व्यर्थ जाता है
भगवान ने कैसा संसार रचा है
उत्पत्ति  विनाश का समन्वय है
जिंदगी कैसी  भी हो जीना पड़ता है
यह सफर तय करना पड़ता है
समय का पहिया अनवरत चलता है
@मीना गुलियानी
























बुधवार, 23 मई 2018

मैं पूरी करना चाहती हूँ

मैं एक मीठी नींद में खोना चाहती हूँ
उम्र के इस पड़ाव पर आकर भी
चाहती हूँ की कोई मेरा सिर सहलाये
माँ की तरह दिलासा दे, बहलाये
मेरा बचपन तो पीछे छूट गया
पर वो दिन अभी भी याद आते हैं
वो रूठना,मनाना ,हँसना ,खिलखिलाना
मैंने उम्र के हर पड़ाव पर संघर्ष झेला है
चाहती हूँ अब तो कुछ सुकून पा सकूँ
सूरज से उम्मीद की रश्मियों को लेकर
संभालकर रखा है जिसे अब बच्चों पर
उंढ़ेलना चाहती हूँ ताकि  उस उजाले को
 देखकर वो मुझे याद करें मुस्कुराएं
चाहती हूँ कि वो अपनी उम्मीदों के पंख
फैलाकर उन्मुक्त आकाश को छू लें
मुक्त स्वच्छन्द हवा में साँस लें
हर फ़िक्र दिल से निकालें, मुझे सौंप दें
मैं उनके हर संताप को हर लेना चाहती हूँ
बस यही ख़्वाहिश मैं पूरी करना चाहती हूँ
@मीना गुलियानी

सोमवार, 21 मई 2018

तेरा जादू सा चल गया

वक्त हाथों से फिसल गया
दिल का ग़म भी पिघल गया

उसने चालें तो वैसे खूब चलीं
पर इस बार मैं संभल गया

अक्स आईने में मैंने जब देखा
खुद मेरा ही दिल मचल गया

जिंदगी गुज़री है यूँ अपनी
वक्त मुझे जैसे छल गया

आया ज़हन में जो तेरा ख्याल
बर्फ़ सा मैं वहीँ पे जम गया

आने लगा ऐतबार फिर तुझपे
मुझपे तेरा जादू सा चल गया
@मीना गुलियानी 

रविवार, 20 मई 2018

प्रभु दर्शन हो जायेँगे

तुम अपने अंतर्मन की खिड़की खुली रखना
ताकि किसी दुखी मन की पुकार सुन पाओ
जब कभी घुमड़ते हुए सवालात के बादल
तुम्हारे हृदय पटल पर छा जाएँ मन भटकाएं
 मन का दीप जला लेना अन्धकार मिटा लेना
आसमान के तारे भी तुम्हें राह दिखायेंगे
तुम्हारे अंतर्मन में छिपे डर को दूर भगायेंगे
चाहे बिजली कड़के चाहे घनघोर बादल गरजें
पर तुम कभी अपने पथ से विचलित मत होना
तुम्हारे लिए सब बंद दरवाज़े स्वत; खुल जायेंगे
फिर जब नेत्र मूँद लोगे तुम प्रभु दर्शन हो जायेँगे
@मीना गुलियानी

शनिवार, 19 मई 2018

जहाँ तू मेरे साथ हो

मत जाओ दूर इतना कि हम  तुझे ढूँढ़ते ही रहें
मत पास आओ इतना मिटे दिल की प्यास वो

सजा दो चाँदनी को भी तुम अपने ऐसे लिबास में
लगता रहे मुझे कि तेरा खिलता  नूर मेरे पास हो

क्यों बेकरार करती है मुझे ये दिलकशी तेरी
घटती ही नहीं कभी मेरी आँखों की प्यास वो

हो जाए कभी ऐसा है तमन्ना सदा से ही  मेरी
ज़मीं वो फूलों से भर जाए जहाँ तू मेरे साथ हो
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 18 मई 2018

यही बात इससे मैंने सीखी है

ये जिंदगी बहुत अलबेली है
मेरी वो मस्त सहेली है
जब मैं हँस दूँ वो हँसती है
मैं रोऊँ वो  संग में रोती है
मेरा वो  ख़्याल रखती है
अपनी पलकों पे बिठाती है
मेरे संग वो मुस्कुराती है
खुशियों की बौछार करती है
कितने ही मनुहार करती है
खुद ही रूठके मान जाती है
कितना प्यार वो जताती है
बात बात पर झगड़ती है
इतराती धौंस जमाती है
पहले पहेली जैसे लगती थी
अब सहेली जैसी लगती है
ममता की छाँव और प्यार है 
माँ के आँचल सी उसकी गोद है
मेरे थकने पे लोरी गाती है
मुझे अपनी बाहों में सुलाती है
इसका प्यार दुनिया से अनोखा है
कहीं भी फरेब न कोई धोखा है
खुश रहना जो चाहो तो इसे
अपना बना लो या इसके बन जाओ
यही बात इससे मैंने सीखी है
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 17 मई 2018

मुझे महसूस करो

मैं तो सिर्फ एक एहसास हूँ
तुम मुझे छू नहीं सकते
तुम मुझे महसूस करो
मैं तुमसे दूर नहीं हूँ
तुम्हारे आसपास ही हूँ
सुबह की धूप में हूँ
सुरमई शाम में हूँ
बारिश की बूंदों में हूँ
तुम्हारी नींद में हूँ
तुम्हारी जागृति में हूँ
तुम्हारे ख्वाबों में हूँ
हवा के झोंकों में हूँ
फूलों की खुशबु में हूँ
तुम सिर्फ अपनी आँखें बंद
करके अन्तर्मन  में देखो
तुम्हारी ही आत्मा हूँ
तुम्हारे ही भीतर  हूँ
तुम्हारे अचेतन मन में
सदा से समाई हूँ पर
दिखाई नहीं देती
मुझे पहचानो और सिर्फ
 मुझे महसूस करो
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 16 मई 2018

तसव्वुर इतना प्यारा हो गया

ज़ख़्म पुराना ताज़ा हो गया
बगावत का इरादा हो गया

नज़रों को यूँ चुराया न करो
अब ये दिल तुम्हारा हो गया

करो रोशन तुम इस जहाँ को
खुद के भीतर उजाला हो गया

सबसे दूर होते जा रहे हो तुम
तसव्वुर इतना प्यारा हो गया
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 15 मई 2018

प्रेम निधि से भर लो

जीवन की कठिन डगर है
पर मत घबराओ इससे
तुम जीत लो अपना मन
पूरे करलो सारे स्वप्न

हर लक्ष्य को पहले साधो
फिर मन को वहीं टिका लो
पंछी की तरह उड़ो तुम
जतन के पंख फैला लो

खुद पर भरोसा करके
दामन खुशियों से भरलो
तुम अपने मन का आँगन
इस प्रेम निधि से भर लो
@मीना गुलियानी 

रविवार, 13 मई 2018

भटकते ही रह जाते हैं

जीवन में न जाने कैसे मुकाम
हमे कहाँ से कहाँ ले आते हैं
कितने ही टेढ़े मेढ़े रास्ते, घुमाव
मंज़िल की राह में आते हैं
जाने कितने ही तूफ़ान दिल में
वो उठाते हैं ,जाने कितने ही
अन्जान मुसाफिर टकराते हैं
कितने संगदिल इंसान हमसफ़र
बन जाते हैं , फिर पलक झपकते
ही वो ओझल  भी हो जाते हैं और
हम उन्हें ढूँढ ही नहीं पाते हैं
उनकी तलाश में हम सिर्फ
भटकते ही रह जाते हैं
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 12 मई 2018

दामन अभी खाली है

रहमत तो तुमने लुटाई है
 दामन अपना अभी खाली है

खुशियाँ ज़माने में बिखरी हैं
करार से दिल अभी खाली है

कहने को तो सब कुछ है यहाँ
 दिल का इक कोना खाली है

मुलाकातें इज़हार भी खत्म हुआ
प्यार से दामन अभी खाली है
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 11 मई 2018

वो बात न कहने पाए

गए परदेस जो तुम
बात न करने पाए
होंठ भी मेरे सिले
खुलके न कहने पाए

छिप गया चाँद मेरा
बादलों ने घेर लिया
बुझ गई शमा रहे
गम के काले साए

दिल के एहसास अधूरे
ही रहे दिल में मेरे
जिसका अरमान था
वो बात न कहने पाए
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 10 मई 2018

कहता इसे कर्मफल

हे मेरे चंचल मन
तू बावला मत बन
क्यों घूमे तू चहुँ ओर
तुझे सूझे न कोई ठोर

रख तू भी ज़रा संयम
यूँ न जला मेरा मन
तू निष्ठुर मत बन
मत बढ़ा तू उलझन

जीवन में सुख और दुःख
आता जाता है प्रतिपल
कोई कहते हैं इसे भाग्य
कोई कहता इसे कर्मफल
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 9 मई 2018

उलझनें सुलझाएँ कैसे हम

जिंदगी ने किस तरह छला मुझे सनम
लब हमारे हैं सिले कुछ कह सके न हम

वक्त ने ढाये सितम चुपचाप हम सहते रहे
तुम भी तो कुछ कर न पाए यूँ ही बैठे रहे
लगता है खामोशियाँ ले लेंगी अपना दम

आ गई है शाम भी साया नज़र आता नहीं
बिन तुम्हारे कुछ भी हमको तो भाता नहीं
टूटी हैं उम्मीदें सारी संभलेंगे  कैसे हम

टूटे हैं सब ख़्वाब मेरे टूटे सपनों के महल
वक्त ने ढाये सितम बाकी न हँसने का पल
जिंदगी की उलझनें  सुलझाएँ कैसे हम
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 8 मई 2018

वह दृष्टिगोचर होगा

हे मेरे मन
तू कब तक यूँ ही
दुनिया में मूर्ख बन
डोलता फिरेगा
ये काया , माया
सब मिट्टी का
ढेला मात्र ही है
सब माटी में ही
मिल जाना है
तो क्यों न उसका
हम ध्यान करें
जो हर पल
अन्तर में
अनहद नाद सा
गुंजायमान होता है
प्रकाश बन मन
आलौकित करता है
उसे ढूँढने के लिए
हृदय के कपाट
खोलने ही पड़ेंगे
अन्तर्चक्षुओं से ही
वह दृष्टिगोचर होगा
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 7 मई 2018

मोती हैं बरसाए

जाने काहे बदरा घिर आए 
बीती सारी यादें वो ले आए

मेरी वीणा सूनी तारें इसकी ढीली
बिना सुर के जिया अकुलाए

आसमान के तारे कहाँ छिप गए सारे
बाती दिल की जले बुझ जाए

कैसे भेजूँ पाती लिख भी न पाती
अखियों ने मोती हैं बरसाए
@मीना गुलियानी 

रविवार, 6 मई 2018

सुबह की प्रतीक्षा करती हूँ

मेरी खिड़की से रोज़ धूप
छनकर बिस्तर से होकर
दीवारों ,सीढ़ियों से चढ़ती
गलियारे में उतरती, रूकती है
मानो अपनी थकान उतारती है
मेरे घर में लगे नीम,फालसे ,
अमरुद,अशोक के पेड़ों को
उनकी पत्तियों को,फूलों को
स्नेह से सहलाती है उनकी
ओसकणों को अपनी किरणों से
और भी चमकीला बना देती है
दोपहर में तेज़ होने पर बादल
घिर आते हैं बूँदाबाँदी होती है
जो धरती की तपन मिटाती हैं
मिट्टी से सौंधी खुशबु आती है
जो मन को पुलकित करती है
फिर सूरज ढलने लगता है
यह धूप भी अपना स्थान
बदल लेती है ,धीरे धीरे
वो खम्बों की आड़ में
पहाड़ो के पीछे,परछाईं
सी बनकर तिरोहित हो जाती है
और मैं उसे दोबारा देखने को
अगली सुबह की प्रतीक्षा करती हूँ
@मीना गुलियानी

शनिवार, 5 मई 2018

परिवर्तित करना होगा

रे मन मत हो निराश
तुझे इस अन्तर के
अन्धकार  को चीरकर
बाहर निकलना होगा
तुझे उगते सूरज जैसे
आगे बढ़ना ही होगा
चाहे दिल तुम्हारा टूटे
चाहे कोई तुमसे रूठे
सब कुछ भुलाकर तुम्हें
नए रिश्तों को गढ़ना होगा
आगे बढ़ोगे तो नए
रास्ते भी खुलने लगेंगे
कई  अपने बेगाने भी
इस पथ में तुमको मिलेंगे  
उगते हुए सूरज को भी
इक दिन ढलना होगा
इस सत्य को पहचानो
जड़ता को चैतन्य में
परिवर्तित करना होगा
@मीना गुलियानी



शुक्रवार, 4 मई 2018

साये को अपनाया हमने

जिंदगी के हालात कुछ ऐसे हुए
शीशे के महल बनाए हमने

दिल नाजुक मोम सा है हमारा
तेज़ रोशनी से छिपाया हमने

दुनिया को ख़ुशी दिखाने को
चेहरे पे नकाब लगाए हमने

जब कोई हमदर्द करीब न पाया
अपने साये को अपनाया हमने
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 3 मई 2018

कराहें और सिसकियाँ

दिल में जाने क्यों रहतीं उदासियाँ
अजीब सी होती रहती सरगोशियाँ

वीरान सी सुबह देती है रोज़ दस्तक
दर्द के गुल छाई ग़म की बदलियाँ

चेहरा बयां करता है दिल का फ़साना
सुनाई देती हैं  कराहें और सिसकियाँ 
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 2 मई 2018

शूल हम उठाने लगे हैं

बिन पिए ही कदम लड़खड़ाने लगे हैं
जिंदगी की राह में डगमगाने लगे हैं

कुछ दिन पहले तो आई थीं बहारें
ख़ुशी ही ख़ुशी की  बरसी थीं फुहारें
गुलिस्तां के फूल मुरझाने लगे हैं

शायद मुझमें ही कोई कमी है 
जो तू मेरा होके भी मेरा नहीं है
दिल तसल्ली से बहलाने लगे हैं

सोचा था आएगा  रास्ते का भूला
पर तू तो इधर का रास्ता ही भूला
रास्ते के शूल हम उठाने लगे हैं
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 1 मई 2018

चुनरिया पहन धरती मुस्काई

हुआ आगमन ग्रीष्म ऋतु का
आम्रमंजरी ने भी ली अंगड़ाई
नीम के वृक्ष ने निंबौली बिखराई
सुबह सूर्योदय से पूर्व की शीतल
बयार सबके मन को अति भाई
दोपहर में गर्मी ने तपन बढ़ाई
प्यास की मात्रा में हुई अधिकाई
गन्ने का रस पीकर तपन बुझाई
घरों में ए सी, कूलर ने होड़ मचाई
चाय ,कॉफ़ी से अच्छी लगे ठण्डाई
चिड़िया ,मैना भी लगी चहकने
जब मिट्टी से सौंधी खुशबु आई
नन्ही गिलहरी भी फुदकने लगी
पेड़ की टहनी के ऊपर चढ़ने लगी
तीतर ,कबूतर दाना चुगने लगे
कुत्ते ,बिल्ली रोटी ले भगने लगे
खेतों में होने लगी फसलों की कटाई
धानी चुनरिया पहन धरती मुस्काई
@मीना गुलियानी

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

कर दूर ह्रदय की समरसता

यह प्रेम हृदय की प्रथम चाह
स्वर्गगंगा सा पावन उज्ज्वल
रति का कुंकुम श्रृंगार मधुर
जड़ता में चेतन की हलचल

यदि प्रत्यावर्तन  सम्भव हो
मानव क्यों जलना वरण  करे
क्यों पी पी चातक रटा करे
क्यों शलभ प्रीति में मरण करे

यह सृष्टि सदा से मोहमयी
मानव ने बांटी है कटुता
वह कितना गरल उड़ेल रहा
कर दूर ह्रदय की समरसता
@मीना गुलियानी

मत और किसी को दे देना

सागर से रूठी कभी नहीं
सरिता की मादक लाल लहर
खग से न गई क्षण भर भूली
विस्तृत नभ की स्वच्छन्द डगर

तुम मोहमयी स्वर्णिम छाया
जिससे यह प्राण हुए शीतल
सरळे सारल्य तुम्हारा ही
विश्वास बना मेरा अविचल

सब कुछ चाहे जग छीन चले
पर वह  विश्वास न खो देना
मेरा संबल अवलम्ब वही
मत और किसी को दे देना
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

ख़्वाब पूरे होते होते

 तुम्हारी याद आई शाम होते होते
बुझने लगा चिराग़ शाम होते होते

ग़म के दरवाज़े भी खुलने लगे
तेज़ रूख़ हवा का होते होते

जाने कौन कैसे दिल में समाया
टूटे सब ख़्वाब पूरे होते होते
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

तेरे ग़म से इंतकाम लिया

मेरे नसीब ने फिर मेरा इम्तेहान लिया
तेरी यादों ने चुपके से दिल थाम लिया

हवा भी सर्द हुई दिल भी तो बेचैन हुआ
आई शाम तो दिल ने तेरा नाम लिया

मैं तो चुपचाप रहा कुछ न तुझे बोल सका
मेरी तमन्नाओं ने जाके तेरा सलाम लिया

दिए गम तूने मैंने कोई शिकवा न किया
मेरी ख़ुशी ने तेरे ग़म से इंतकाम लिया
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

कौन सुने मालूम न था

दिल की बस्ती लूट जायेगी
हमको ये मालूम न था
टूटेगा दिल किसी के हाथों
राज़ हमें मालूम न था

दिल ने हमें मजबूर किया तो
मौज में अपनी बहने लगे
न थी फ़िक्र अंजाम की हमको
आगाज़ भी मालूम न था

अपने आँसू हम पी जाएँ
ठंडी आहें ख़ामोशी से
सन्नाटे में फरियाद दिल की
कौन सुने मालूम न था
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

सामने साहिल आ जाए

चिलमन से न तुम ऐसे झाँको
जो कौंध के बिजली गिर जाए

बेताबिए दिल का ख्याल करो
दो पल ही सुकूँ बस मिल जाए

जज़्बात जुबां पर गर आएँ
डर हमको है रुसवाई का

हर अश्क बहे जो आँखों से
खुद एक फ़साना बन जाए

हर तूफ़ां से टकराया हूँ
है सैलाबों से प्यार मुझे

या रब मैंने कब चाहा है
कि सामने साहिल आ जाए 
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

फिर से सपने बुनने लगी

दिन ढलने लगा रेत सा
वक्त फिर फिसलने लगा
तुम्हारा  स्निग्ध स्पर्श पाकर
मन फूल सा खिलने लगा
तुमसे कुछ माँगा नहीं मैंने
कभी कुछ चाहा नहीं मैंने
बस तमन्नाओं में ही मेरा
वक्त यूँ गुज़रने लगा
हर वक्त तुम्हें देखने का
तुम्हें पुकारने ढूँढने का
मेरा मन करता रहता
तुमने जब हाथ पकड़ा
उस स्पर्श की सिहरन से
दिल का साज़ बजने लगा
तेरे दर्द की कसक मेरे
दिल में जगने लगी
बंद आँखों में भी दिल के
एहसास जगने लगे और
फिर से सपने बुनने लगी
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

आँधियो से बचाना पड़ता है

जिंदगी के साथ कदम मिलाकर चलना पड़ता है
वक्त के साथ खुद को बदलना भी पड़ता है

राहों में मुश्किलें तो आती जाती रहती हैं
लगे जो ठोकर तो खुद सम्भलना पड़ता है

माना कि हर तरफ अँधेरा है छाया हुआ
दिल के चिरागों को रोशन रखना पड़ता है

हर कोई शख़्स ताउम्र तो साथ नहीं देता
अपने ग़म को छुपाकर हँसना भी पड़ता है

वक्त तो हमेशा ही आँख मिचौली खेलता है
जिंदगी के फूल को आँधियो से बचाना पड़ता है
@मीना गुलियानी


रविवार, 22 अप्रैल 2018

वादा कौन करेगा

दुःख में पीड़ा कौन हरेगा
मन के सूने पनघट पर
नीर बताओ कौन भरेगा

हम सब दिल के हाथों बंदी
कोई न साथी न कोई संगी
अरमानों में रुदन छिपाए
ऐसी है ये दुनिया दोरंगी
सुख पर है पीड़ा का पहरा
मुक्त दुःखों से कौन करेगा

पल दो  पल के हैं सब नाते
मतलब के सब झूठे वादे
सबको केवल खुद की चिंता
कौन किसी के दुखड़े बाँटे
सदा किसी का साथ निभाए
ऐसा वादा कौन करेगा
@मीना गुलियानी

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

साहिल ने ठुकराया मुझको

ये अन्जान राहें घेर लेती हैं मुझको
तेरी सदा झकझोर देती है मुझको

नहीं कोई अपना जाएँ तो जाएँ हम कहाँ
जिंदगी भी चुपके से क्या कह जाती मुझको

मुझे कोई गिला न शिकवा है किसी से
बुझता चिराग हूँ रोशनी की तलाश मुझको

क्यों सबकी निगाहें गैरों सी लगती हैं
सहारा न कोई साहिल ने ठुकराया मुझको
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

मगर बात नहीं होती है

कैसे कहदूँ कि मुलाक़ात नहीं होती है
मिलते वो रोज़ हैं पर बात  नहीं होती है

वो कभी भूले से भी पूछते जो हाल मेरा
दिन तो कट जाता है पर रात नहीं होती है

तुम कभी भूले से भी आइना देखा न करो
खुद पे मिट जाना बड़ी बात नहीं होती है

चुपके दुनिया से पहरों आँसू हम बहाते हैं
कब इन आँखों से बरसात नहीं होती है

गर वो सामने आ जाएँ तो पूछें हम कैसे
नज़रें मिलती हैं मगर बात नहीं होती है
@मीना गुलियानी







गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

सच्चा होना चाहिए

जिंदादिली से सफ़र तय होना चाहिए
ख़ुशी से जीवन ये बसर होना चाहिए

जिंदगी में कई लोग मिल जायेंगे
खुद में कोई हुनर होना चाहिए

प्यार किस्मत में तुमको मिले न मिले
बेवफ़ा न मगर कभी होना चाहिए

दिल लगाके  दगा न करना कभी
इरादा दिल में सच्चा होना चाहिए
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

जीतना सीख लिया

ऐ गम की परछाइयों
तुम दूर रहो मुझसे
मेरा पीछा करना छोड़ो
मेरा तुम्हारा मेल नहीं
मैंने अब जीना सीख लिया
घुट घुट के बहुत जी लिए
अब कड़वे घूँट पीके भी
मैंने जीना सीख लिया
सागर में मौजो के हाथों में
पतवार ही जब सौंप दी
फिर तूफां से डर कैसा
मंझधार से तैरना सीख लिया
नीला अंबर मेरा प्रहरी बना
बिजली मुझे राह दिखाती है
हर मोड़ पे ग़म की बदली
मुझे देखके अब घबराती है
डर लगता नहीं किसी हार से
हर हार  से जीतना सीख लिया
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

खुशहाल बनाओ तुम

चहुँ ओर मचा है हाहाकार
बर्बादी का मचा है तांडव
नौजवानों जागो तुम
अब निद्रा को त्यागो तुम
शिवजी का डमरू भी बोले
डम डम डम हर हर भोले
अब तो अलख जगाओ तुम
आगे कदम बढ़ाओ तुम
मर्यादा हो रही तार तार
हर तरफ है भ्रष्टाचार
स्त्री की मर्यादा रहे सुरक्षित
दहेज का कलंक मिटाओ तुम
कहाँ  है अब वो देश हमारा
कहते थे जिसे हम सोन चिरैया
अब वीणा की तान भी टूटी
कैसे होगा ता ता थैया
अब वीणा के  तार कसो  तुम
नारी की पीड़ा को हरो तुम
तुम पर है सबको भरोसा
देश को खुशहाल बनाओ तुम
@मीना गुलियानी

करना चाहती हूँ

मैं अपने अन्तर  के
अन्धकार को भेदकर
प्रकाश पुंज को
पाना चाहती हूँ
इड़ा पिंगला सुषुम्ना
का संगम मैं स्वयं
खुले नेत्रों से
देखना चाहती हूँ
अनहद का नाद
सुनना चाहती हूँ
त्रिकुटी के अमृत
का स्वाद भी
चखना चाहती हूँ
उस अनन्त में
 खुद को विलीन
करना चाहती हूँ
@मीना गुलियानी 

रविवार, 15 अप्रैल 2018

फिर कोई महत्व नहीं

संघर्ष भरा हो जब जीवन
 टूटा हुआ हो जिसका मन
उसके आगे सुख सागर का
रह जाता कोई महत्व नहीं

जब मन किसी का आहत हो
किसी के अप्रिय वचनों से
फिर बाद में बोले मृदु वचन
मन होगा कभी संतुष्ट नहीं

कहने को सभी अपने बनते
पर दुःख में साथ नहीं देते
फिर सुख में बने संबंधी जो
उस रिश्ते का औचित्य नहीं

जब फसलें सूखे जल के बिन
धरती की छाती भी फट जाए
फिर बरसे अंबर से पानी
उसका फिर कोई महत्व नहीं
@मीना गुलियानी

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

दुनिया लुटाई है

दिल की क़शमक़श और उलझनों में
उम्मीद की अपनी मैंने ढाल बनाई है

जिंदगी तुझसे आगे निकलने को
मैंने भी तो अपनी रफ़्तार बढ़ाई है

तुझसे खेलने में मज़ा आने लगा है
जीतने के लिए  हौसला अफ़ज़ाई है

माना कि कुछ पल ग़म के मिले हैं
सुनहरे पलों ने कीमत चुकाई है

ये लहरें तूफ़ां क्यों टकराएं मुझसे
मैंने वफ़ा के नाम दुनिया लुटाई है
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

आ मिल मुझसे

वक्त तू क्यों
रेत सा बनकर
,मेरे हाथों से
फिसला जाता है
क्यों रुकता नहीं
तू पल भर भी
कितना तड़पाता है
मेरे साथ चल
मत आगे निकल
न बन निष्ठुर
मत कर व्याकुल
दिल पस्त हुआ
तू मस्त हुआ
बढ़ती धड़कन
रूकती साँसे
कहती तुझसे
आ मिल मुझसे
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

गाँव वो हमारा हो

आओ नदिया के उस पार चलें
वहाँ कल कल जलधारा बहती है
ठंडी हवाएँ  मन को मोहती हैं
फूलों की सुरभि मदहोश करती है
सन सन फ़िज़ाएं बहकाती हैं
जहाँ पर्वत से सुरम्य झरने बहते हैं
बरगद के पेड़ की छाँव में चलें
वहाँ हम दोनों प्रेम से झूला झूलें
एक दूसरे के सारे गिले शिकवे भूलें
अपना प्यारा सा घर वहीं बसाएं
सुन्दर सपनों से उसे हम सजाएँ
जहाँ धरती से मिलता आसमान हो
दुःख दर्द का नामोनिशान न हो
जहाँ सब हिलमिल कर रहते हों
दुःख सुख सब सांझा करते हों
जहाँ सिर्फ प्रेम और भाईचारा हो
ऐसा प्यारा सा गाँव वो हमारा हो
@मीना  गुलियानी 

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

बेकार हठ करते हो

तुम्हारा चेहरा सब कुछ  बयां करता है
जो तुम्हारा मन गुस्ताखियाँ करता है

एक झलक पाने को कितना चलते हो
सफर है मुश्किल पर नहीं  समझते हो

 मुकदद्ऱ में नहीं बेकार ज़िद करते हो
तकदीर बदलने को क्या कर गुज़रते हो

लौट भी जाओ मान लो तुम कहना मेरा
मिलेंगे फिर कभी बेकार हठ करते हो
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

गुनगुनाने की सदा आ रही है

एक दिन मैंने जिंदगी से पूछा
तुम इतनी तेज़ क्यों दौड़ रही हो
कुछ देर मेरे पास बैठो बात करो
तुम्हारा साथ मेरे मन को भाता है
तुमसे बात करने में मज़ा आता है
तुम मेरी हमराज़ हो, हमदर्द हो
 तुम्हारा हाथ थामकर भूले हुए
वो पल मुझे याद फिर आने लगे
फूलों को देखकर मुस्कुराने लगे
बरखा की फुहार पड़ते ही मेरा मन
ख़ुशी से भीगकर झूमने लगा
जिंदगी के इस पड़ाव पर हमें
वक्त मिला साथ साथ जीने का
वो पल संजीदगी भरे भी थे
सुकून भी देते थे कुछ हमारी वो
अल्हड़पन की यादें ताज़ा हो जाती थीं
पेड़ों के झुरमुट में एक दूसरे को
ढूंढते हुए फिर खो से जाते थे
भूले बिसरे गीत गुनगुनाते थे
रंग  बिरंगे चित्रों से हम अपनी
जिंदगी का कैनवास सजाते थे
अब सारे सुहाने सपने टूट गए हैं
हमसे अपने सब जैसे रूठ गए हैं
जिंदगी भी मुझसे दूर जा रही है
उसके गुनगुनाने की सदा आ रही है
@मीना गुलियानी



सोमवार, 9 अप्रैल 2018

हम धोखा न करेंगे

हम तुमसे कभी कोई तकाज़ा न करेंगे
तुम्हें खुद की नज़र में रुसवा न करेंगे

चाहे  तुम कुछ भी सोचो शिकवा न करेंगे
तुमको हम भूले से भी तन्हा न करेंगे

माना कि तेरे मेरे ख्यालात अलग हैं
हम फिर भी तुझसे झगड़ा न करेंगे

उठ जाएँ सभी चाहे तेरी महफ़िल से सनम
पर तेरी महफ़िल को हम सूना न करेंगे

चाहे तूने खाए हों फरेब इस जहान से
पर इतना तय है हम धोखा न करेंगे
@मीना गुलियानी 

रविवार, 8 अप्रैल 2018

गैरों से निभाते गए

जाने क्या बात थी कि बस चलते गए
न किसी से कुछ खा न सुना चलते गए
जाने किस धारा में हम भी बहते गए

सारे रिश्ते नाते सब पीछे छूट गए
सब अपने बेगाने हमसे रूठ गए
हम तो सबसे गाफिल चलते गए

सजाया था हमने अपना आशियाना
हर गम चाहा था हमने भी भुलाना
मिला न अपना गैरों से निभाते गए
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

यह सोचने का विषय है ?

वृद्धजन बरगद के पेड़
की तरह ही होते हैं
इनकी संगत में बड़ा
सुकून मिलता है
सिर पर छाया होती है
जीवन में जब कभी
हौंसले पस्त होने लगते हैं
यही वृद्धजन राह दिखाते हैं
उनकी सीख से नया
आयाम मिलता है
जीवन की खुशहाली का
राज़ उजागर होता है
अत: वृद्धजनों का हमेशा
आदर सम्मान करो
उन्हें प्रेम ,स्नेह की ही
आकांक्षा है और कुछ नहीं
अपना सारा जीवन वो
संतान की परवरिश पर
गुज़ार देते हैं पर उनके
वृद्ध होने पर वही बच्चे
क्यों उन्हें ठुकराते हैं
क्यों उनका ध्यान नहीं रखते
जिसकी उन्हें आवश्यकता है
यह सोचने का विषय है ?
@मीना गुलियानी 

सबकी नज़रें टिकी यहाँ पर

दिल पे जब हो बोझ ये भारी
कैसे कोई मुस्कुराए दम भर

शाखों पर भी वीरानी है
नहीं कोई हरियाली इन पर

कैसे कोई पंछी चुगेगा दाना
उनके पँख भी कटे यहाँ पर

कैसे निकलें घर से बाहर
सबकी नज़रें टिकी यहाँ पर
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

सब निष्काम है

जिंदगी ज़िन्दादिली का नाम है
है नहीं ऐसी तो फिर नाकाम है

जिसने खुद्दारी से जीना सीखा है
हँसते हँसते जीना मरना सीखा है
ठोकरों पे उसकी सारा जहान है

जिसने लुटा दी जा वफ़ा के नाम पर
मिटा दी हस्ती भी उसके नाम पर
मौत उसके लिए हँसी पैगाम है

खूब शान से जीना तुमने सीख लिया
खा पीकर आराम से रहना सीख लिया
बिन अंतर्मन सफर के सब निष्काम है
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

घर तो जला नहीं है

करूँ क्या ज़िक्रे मैं बेवफ़ाई
मुझे किसी से गिला नहीं है

नदी हूँ  इक तन्हाई की मैं
किनारा कोई  मिला नहीं है

पुकारा है मेरे दिल ने तुमको
लबों पे लेकिन सदा नहीं है

दिलों में धुँआ सा उठ रहा है
कोई  घर तो जला नहीं है
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

हम भी जी न पायेंगे

जिंदगी में जीने के कई पड़ाव आयेंगे
गुज़रोगे जहाँ से तुम हम साथ आयेंगे

खाएँ गर ठोकर तो तुम बचा लेना
देना सहारा गिरे गर तो उठा लेना
दिलों में अब कभी फांसले न आयेंगे

बहारें बीत गईं तो खिज़ा भी जायेगी
ये बहारें फिर लौटकर भी आयेंगी
दिन सुहाने जो गुज़रे साथ लौट आयेंगे

अजीब सी बेकरारी घेर लेती है मुझको
तन्हाईयाँ बोलती हैं तुम पुकारो मुझको
जुदा जो तुमसे हुए हम भी जी न पायेंगे
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

चाँदनी को झूला झुलाया

फ़लक से उतरी चाँदनी
बालों को यूँ छितराए हुए
फूलों का उसमें गजरा सजाके
माथे पे कुमकुम लगाए हुए
पायल की रुनझुन बजाती
नाचे मन मयूरा थिरककर
पहनी है मणियों की मेखला
सितारों की चूनर सिर  पे सजाई
चंदा को देखा तो वो लज्जाई
शर्मा के उसने चेहरा छिपाया
बदली का उसने घूँघट बनाया
पहना हिम का मुकुट सर पर
फीका हीरों का हार उस पर
श्वेतवर्णा अप्रतिम सौंदर्य की
वो थी कोमलांगी बाला
जिसने सबपे जादू कर डाला
हाथों में कंगन जुगनू से चमकें
हीरे मोती भी उसमें दमकें
उसने घुमाके जो नज़रे उठाईं
फूलों ने सज़दे में चादर बिछाई
सुंदर पगों में महावर रचाई
दिलों में अप्सरा बन समाई
किरणों का उसने हिन्डोला बनाया
चन्दा  ने चाँदनी को झूला झुलाया
@मीना गुलियानी

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

तुम ही मेरे प्राण आधारा

मैं तो माटी का दिया हूँ
तुम ही इसकी बाती हो
साँसे मेरी तब ही चलेंगी
जब तक दिया और बाती है
बिन बाती के मोल नहीं कुछ
बाती से ही दीप हो रोशन
ऐसे ही तुम जीवन को मेरे
अपने प्रेम से करते रोशन
मन मेरा इक अँधा कुँआ है
तुमसे ही फैला उजियारा
तुम ही तो जीवन धन मेरे
तुम ही मेरे प्राण आधारा
@मीना गुलियानी 

रविवार, 1 अप्रैल 2018

मुझको निशानी दे गया

कोई ऐसे गया तन्हा मुझे छोड़कर
कुछ यादें सुहानी मुझे वो दे गया

पीछे छोड़े हैं उसने अधूरे से ग़म
साथ यादें न होतीं तो मर जाते हम
चन्द साँसें वो साथ हमारी ले गया

बीते लम्हों में दिखती कहानी उसकी
गुज़रे पलों में बिखरी हैं यादें उसकी
जाते जाते वो आँखों में पानी दे गया

फिर वो आया तो जाने न देंगे उसे
इन पलकों में बंद कर लेंगे उसे
प्रीत अपनी मुझको निशानी दे गया
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 31 मार्च 2018

लक्ष्य बन चुका है

कभी कभी ये सारा जहाँ
मुझे तुच्छ जान पड़ता है
मुझे लगता है कि मैं किसी
महाशून्य में खो गई हूँ
मैं खुद को जानना चाहती हूँ
कि मैं कौन हूँ ? क्या हूँ ?
क्या है मेरा वर्चस्व ,अस्तित्व
अपने आप को पाना चाहती हूँ
खुद को मिटाकर मैं
उस शून्य से खुद को मैं
उबारना चाहती हूँ
अब इस अन्धकार को
भेदकर बाहर आना चाहती हूँ
इस गहन यंत्रणा को
मैंने बहुत झेला है
पर अब और नहीं
अब मुक्ति पाना ही
मेरा लक्ष्य बन चुका  है
@मीना गुलियानी

अल्हड़पन मासूमियत को

ऐ वक्त काश तुम लौट आओ
मुझे बताओ ज़रा मैं अपना
खुशहाली भरा जीवन कैसे लाऊँ
इस कंक्रीट भरे जंगल सरीखे
जीवन से कैसे मैं निज़ात पाऊँ
कैसे बचाऊँ खुद को मैं इस
दुनिया में ईर्ष्या ,द्वेष ,नफरत से
कैसे बचाऊँ मैं इंसानियत को
जब हावी हो रही हैवानियत
कैसे भरूँ दिल के जख्मों को
जो हर समय टीस देते हैं
कैसे करूँ दूर ग़म के अंधेरों को
ऐ वक्त काश तुम्हीं लौटा पाते
मेरी हसरतों भरी सुबह शामों को
मेरा अल्हड़पन मासूमियत को
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 29 मार्च 2018

दुनिया में सिमट जाओ

जब सुहानी भोर दस्तक देती है
तुम्हारी आँखे अधखुली होती हैं
 नर्म अंगुलियाँ मेरी हथेली को
छूकर मेरी  धड़कनें बढ़ा देती हैं

तमाम यादें फिर से उभर आती हैं
बीते पलों की याद दिलाती हैं
दुनिया का वजूद  हम भूल जाते हैं
अपनी यादों का मेला सजाते हैं

जी चाहता है तुम मेरे पास बैठो
चुपचाप मुस्कुराते हुए मुझे निहारो
दिल की संवेदना मुझ पर उढ़ेलो
 ख्यालों की दुनिया में सिमट जाओ
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 28 मार्च 2018

कड़वा सच है

मैं एक पानी की बूँद हूँ
कुछ हवा भी तूफ़ान उठाती है
एक प्रलय ,ज्वारभाटा सा
मेरे अन्तर में उभरता है
हर कोई जिसे नहीं समझता
कभी शबनम तो कभी शोले
मेरे अन्तर में धधकते हैं
हर लम्हा मेरा रूप
बदलता ही रहता है
रात दिन एक प्रलय सा
तूफ़ान उमड़ता है
वक्त ने मुझे ऐसे मोड़ पे
लाकर खड़ा कर दिया
कितना कोहराम मचता है
पर सुनता ही कौन है
कभी मेरे अन्तर में
झरना बहा करता था
आज वो एक रेगिस्तान
बन चुका है
यह सब वक्त की
विडम्बना , कड़वा सच है
@मीना गुलियानी 

जिसे नहीं चाहती खोना

मैं तो हँसना ही जानूँ नहीं जानती हूँ मैं रोना
मुझको भाता है हँसना न भाता मुझको रोना

कितनी  पीड़ाएँ झेली पर तनिक क्षोभ नहीं है
हर चिंता क्रीड़ा करती मुझमें  भूल गई हूँ रोना

जीवन को ऐसा ढाला तन मन को बदला मैंने
सुख का सागर लहराए दुःख का उठा बिछौना

अब भरा है मेरा तन मन उत्साह और उमंग से
है प्रेम से अब आलोकित मेरे मन का हर कोना

मेरे जीवन में निराशा कैसे घेरेगी अब मुझको
अब धैर्य है मेरा साथी जिसे नहीं चाहती खोना
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 27 मार्च 2018

गगन की ओर बढ़ी जा रही है

प्रकृति की मनोरम छटा लुभा रही है
कहीं ऊँचे पर्वत तो कहीं खलिहान
कहीं गुलिस्तान तो  कहीं  रेगिस्तान
धरती की धानी चुनरी लहरा रही है

नदिया की कल कल ध्वनि आ रही है
एक मधुर संगीत की लय भा रही है
बहते झरने धरा से कुछ कह रहे हैं
चंद्रकिरणें पत्तों से छनके आ रही हैं

बादल भी उमड़ घुमड़कर छाने लगे हैं
गगन के तारे भी चमक दिखाने लगे हैं
धीमे से पुरवइया कुछ गुनगुना रही है
सुनके धरा भी जिसे सकुचा रही है

मन का मयूरा देखो कैसे इतरा रहा है
पपीहा भी पीहू पीहू की रट लगा रहा है
मधुर मिलन की नैनो में प्यास लिए
धरती गगन की ओर बढ़ी जा रही है
@मीना गुलियानी



सोमवार, 26 मार्च 2018

बात यूँ सताने की

उनको आदत है दिल दुखाने की
हमको आदत है फ़रेब खाने की

जाने क्यों रूठके यूँ बैठ गए
राज़ न खोला छिपाके बैठ गए
उनको आदत है रूठ जाने की

मिन्नतें खुशामद गवारा न तुझे
मनाऊँ कैसे तू ही बता दे मुझे
बिना मनाए लौटके न जाने की

ख़ता नहीं है फिर भी मुझे माफ़ करो
मुस्कुराके अपने दिल को साफ़ करो
मान जाओ न करो बात यूँ सताने की
@मीना गुलियानी 

रविवार, 25 मार्च 2018

तेरी याद

हर रोज़ सुबह की धूप
खिड़की के झरोखों से
छनकर मुझ तक आती है
फूलों और पत्तों पर
चमक अपनी लुटाती है
मलयानिल के झोंके भी
सुरभि ,मकरंद लाते हैं
उनकी महक जादू जगाती है
हवा में जब तुम्हारी ज़ुल्फ़
यूँ ही लहराती है
लगता है कोई बदली
घुमड़कर छा  जाती है
साँसों में इक सिहरन
सी दौड़ जाती है
धड़कन मेरी थम जाती है
तेरी पायल की रुनझुन
मधुर गीत सुनाती है
दिल पे बिजली सी
कौंध कौंध जाती है
शाम  होते ही  तेरी याद
मुझ तक दबे पाँव
रोज़ चुपचाप चली आती  है
दिल में हलचल मचाती है
नई पुरानी यादें दोहराती है
जब मैं थक जाता हूँ
अपनी आग़ोश में सुलाती है
@मीना गुलियानी

शनिवार, 24 मार्च 2018

एहसास

तुम मेरे पास नहीं हो
फिर भी तेरे  पास  होने का
एहसास मुझे होता है
हर पल तुम्हारी यादोँ का
मेला सा लगा होता है
हर वो लम्हाा  मेरे लिए
बहुत ही ख़ास होता है
तुम्हारी शरारतें वो बातें
सब दिल के पर्दे में
उतर सी आती हैं
दिल की धड़कनों को
यूँ ही वो बढ़ाती हैं
तेरे साये का अक्स
अक्सर ही साथ होता है
दिल के आईने में तेरा
चेहरा छिपा होता है
तुम हमेशा यूँ ही मुझसे
लुकाछिपी खेला करते हो
कभी हँसाते कभी यूँ ही
मुझे रुलाते और मनाते हो
मेरे सपनो में गुनगुनाते हो
मेरी उदासी दूर भगाते हो
अपनी कमी का एहसास
कभी  न होने देते मुझे 
मेरी कल्पना में समाए जाते हो
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 23 मार्च 2018

माता की भेंट -हृदय में जगाओ प्रीत

अब देर न कर हे माँ तुझे तेरे भक्त बुलाते हैं
आके विनती ज़रा सुनलो तेरे बिन चैन न पाते हैं

बरसे नयन मेरा तरसे है मन
 ऐ मैया तू दर्श दिखा जा
तेरे दर्श बिन तड़पे है मन
मेरी मैया तू जल्दी से आ जा
ये जीवन न जाए बीत-------------तुझे------

माता मेरी जगदाता तू ही
अब तो मैया जी दर्श दिखाओ
नैया भंवर में डोले मेरी
आके मैया जी पार लगाओ
मेरी मैया मिटाओ भव भीत ------ --तुझे-----

काम क्रोध मद लोभ मोह ने
मैया जी मुझको है घेरा
आके बचाओ जान मेरी
ये चौरासी वाला है फेरा
हृदय में जगाओ प्रीत ------------------तुझे-----
@मीना गुलियानी




वो लम्हा मेरा होता है

हर आहट पे तेरे आने का गुमा होता है
दिल के दरवाज़े पे खटका तेरा होता है

पहरों बीत जाते हैं तेरी यादों में
हर लम्हे में तजुर्बा नया होता है

तुमको फुरसत नहीं मिलती आने की
हम पे इस ज़माने का पहरा होता है

दिखाएँ जख्म तुम्हें क्या उल्फत के
क्या बताएँ दिल में दर्द कहाँ होता है

हम तो तेरी चौखट पे सजदा करते हैं
बड़ा पोशीदा वो लम्हा मेरा होता है
@मीना गुलियानी 

माता की भेंट -सब दास्तां बता दे

तेरे द्वार कैसे आऊँ मैया ज़रा बता दे
मँझधार में फंसी हूँ तू ही रास्ता बता दे

घेरे हुए हैं मुझको रंगीन वासनाएँ
मन का नहीं भरोसा पग पग पे जो दगा दे


मुझमें वो बल कहाँ है जो तुझे यहाँ बुला लूँ
निर्बल को दे सहारा, भव पार तू लगा दे

लाखों उबर गए हैं तेरे नाम के सहारे
सौलह भुजाओं वाली मुझको भी आसरा दे

कैसे सुनाऊँ तुमको, अपनी करुण कहानी
शायद ये मेरे आंसू ,सब दास्तां बता दे
@मीना गुलियानी



गुरुवार, 22 मार्च 2018

वफ़ा में मेरी कमी नहीं है

लबों की बातें हम सुन न पाए
नज़र भी उनकी झुकी हुई है
कहीं थीं तुमने हँसते हँसते
बातें वहीं पर रुकी हुईं हैं

जवाब मांगो तो क्या कहूँ मैं
कैसे तुम्हारा  जिक्र करूँ मैं
ह्या से चेहरा उठा न पाओ
नज़र तुम्हारी झुकी हुई है

बताओ दिल में क्या है तुम्हारे
खुले हुए हैं गेसू तुम्हारे
आँखों में कितना गहरा तूफां
बरसात जैसे बनी हुई है

जो न कहोगे और चुप रहोगे
करेंगे तेरा इंतज़ार फिर भी
सुनेंगे तेरी तो हम सदायें
वफ़ा में मेरी कमी नहीं है
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 21 मार्च 2018

माता की भेंट - भक्तों का करती है उद्धार

माँ जगदम्बे जी के द्वार जो भी करता है पुकार
आस पुजाये, माँ अम्बे , सुन लेती है पुकार

माँ जगदम्बे की शान निराली
लौटा न खाली कोई यहाँ से सवाली
सुनके करुणा भरी पुकार ,शेरों पे होके सवार
आके अम्बा हर लेती सबके दुखड़े अपार

जो भी मैया जी की आस लगाए
मैया जी उसकी हर आस पुजाये
माँ की महिमा अपरम्पार ,प्रेम की शीतल चले फुहार
मैया अम्बे  जगदम्बे ,कर देती भव से पार

राजा हो या कोई भिखारी
सब हैं बराबर यहाँ नरनारी
माँ के भरे हुए भंडार ,लेवे नाम जो होवे  पार 
माँ जगदम्बे जी भक्तों का करती है उद्धार
@मीना गुलियानी


मंगलवार, 20 मार्च 2018

माता की भेंट -अज्ञान को मिटाओ

हे अम्बिके भवानी दर्शन मुझे दिखाओ
अन्धकार ने है घेरा ज्योति मुझे दिखाओ

मैया तेरे ही दर का मुझको तो इक सहारा
नैया भँवर में डोले सूझे नहीं किनारा
मँझधार से निकालो नैया मेरी बचाओ

लाखों को तूने तारा भव पार है उतारा
बतलाओ मेरी माता मुझको है क्यों बिसारा
बच्चा तेरा हूँ मैया मुझको गले लगाओ

सूनी हैं मेरी राहें आँसू भरी निगाहें
बोझिल हैं मेरी साँसे दुःख कैसे सुनाएं
गम आज सारे मेरे मैया तुम्हीं मिटाओ

तेरा नाम सुनके आया जग का हूँ माँ सताया
मुझको गले लगालो तेरी शरण हूँ आया
रास्ते विकट हैं मैया अज्ञान को मिटाओ
@मीना गुलियानी



माता की भेंट -

माता की भेंट -छोड़ दिया जग सारा

मेरी मैया मेरा तुझ बिन दूजा न और सहारा
मेरी नाव भंवर में डोले माँ सूझे नहीं किनारा

तुम आके पार लगाओ माँ आप ही जान बचाओ
मुझे पार करो इस भव से नैया को पार लगाओ
माँ तेरे भरोसे पर ही मैंने जीवन को है गुज़ारा

माँ मैंने यही सुना है तू विपदाओं को मिटाती
माँ सबके दुखड़े हरके रोतों को तू है हँसाती
मेरी भी विनती सुनलो इस जग से मैं तो हारा

तुम अर्ज़ सुनो माँ मेरी सुनलो मत करना देरी
माँ शेर सवारी करके रखना तू लाज मेरी
तेरा ही सहारा लेकर माँ छोड़ दिया जग सारा
@मीना गुलियानी



सोमवार, 19 मार्च 2018

दिल मेरा कहाँ खो गया

जिंदगी मुझे बहलाने की
कोशिश न करो
मेरा दिल खिलौने की तरह
बहुत ही नाज़ुक सा है
हाथ लगाते ही वह
टुकड़ों में बिखर जायेगा
सुनी हमने चुप की सदा
अंबर पर चाँद न घटा
हँसी को करा लिया जिबह
दिल मेरा कहाँ खो गया
@मीना गुलियानी 

माता की भेंट -तूफ़ान में दिया है

बेकार सोचना है तेरे सोचने से क्या है
होगा वही जो कि तेरे भाग्य में लिखा है

तेरे रास्ते अगरचे , हैं मुसीबतों ने घेरे
माता का आसरा ले,जब तक है स्वांस तेरे
उसका ही नाम केवल, हर रोग की दवा है

उसका पता जो पूछे ,कटड़े से हो रवाना
जो सामने है पर्वत,उसपे तू चढ़ते जाना
दरबार पर पहुँच जा,माता की वो गुफा है

दुनिया की दौलतों का,झूठा है ये खज़ाना
ये महल और बंगले ,कुछ भी न साथ जाना
मत खेल ज़िन्दगी से, बेकार का जुआ है 

गर चाहते हो मुक्ति ,  माँ के चरण पकड़ लो
जीवन की नाव उसकी ,शक्ति से पार करलो
उसकी कृपा से जलता ,तूफ़ान में दिया है
@मीना गुलियानी



शनिवार, 17 मार्च 2018

माता की भेंट -कैसे क़द्रदानियाँ

तेरे दर आऊँ तेरा दर्श मैं पाऊँ खाली लौटके न जाऊँ
 मेरी माँ ---करदे मेहरबानियाँ करदे मेहरबानियाँ

तू है माँ भोली , भरती सबकी तू झोली
मुझे पार लगाना माँ ,मेरी नैया डोली
मेरी माँ शेरों वाली, जोतों वाली
सुन माँ  -  दुःख भरी कहानियाँ

तेरे दर आया हूँ , माँ ग़म का सताया हूँ
दुःख दूर करो मेरे ,जग का ठुकराया हूँ
मेरी माँ दे दो शक्ति ,करूँ मैं भक्ति
जलाऊँ  -  जोतें नुरानियाँ

तेरा सहारा है ,माँ तेरा ऊँचा द्वारा है
तेरे भक्तों को लगता ,तेरा नाम प्यारा है
माँ भव से तारे , पार उतारे
भूलें हम--कैसे क़द्रदानियाँ
@मीना गुलियानी




नित दर्शन की प्यासी

प्रभु जी तेरी शरण पड़ी है दासी
भव पार करो काटो जम की फाँसी

मैंने कष्ट बहुत है पाया
भटक भटक जून चौरासी
मानुष का तन पाया
मिटादो दुखों की ये राशि

मैंने बहुत पाप है कीन्हा
संसारी भोगों की आशा ने
दुःख बहुत मुझे  दीन्हा
ये कामना है सत्यानाशी

प्रभु जी मैंने भक्ति नहीं कीन्हि
झूठे भोगों की तृष्णा में
उम्र सारी खो दीन्ही
दुःख मेरे काटो अविनाशी

प्रभु जी अब सारी आशा टूटी
तेरे चरण की धूलि लागे
मुझे एक संजीवनी बूटी
रहूँ नित दर्शन की प्यासी
@मीना गुलियानी

वो लम्हा न मिला

मैं तन्हा हूँ तुम्हारा तसुव्वर है
वक्त कुछ ठहर सा गया है
तुम्हारे पाँव के निशान खो गए
मैं सोच रहा हूँ कि कहाँ जाएँ

तुम अभी अभी तो गुज़रे थे
तुम्हारी महक हवाओं में है
इस गहन सन्नाटों के बीच
तुम्हारे चहकने की आवाज़ है

मैंने अपनी उम्र यूँ ही गुज़ार दी
इसी बात का ग़म सालता है
मुझे सिर्फ तन्हाई ही मिली
फ़ुरक़त का वो लम्हा न मिला
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 14 मार्च 2018

किसी का दिल बहलाने

मैं जो कहता था तब किसी ने न सुना
अब चुप हुआ तो सबने बनाए अफ़साने

अपने ग़म खुद ही समेटे जीने के लिए
चाहता हूँ कि कोई भी न मुझे पहचाने

गुज़ारे हैं कितने ही लम्हे यूँ तेरे बगैर
अब तो खुद को भी लगने लगे दीवाने

ये चाँद सितारे भी आज ग़ुम क्यों हुए
गए हैं शायद किसी का दिल बहलाने
@मीना गुलियानी


सोमवार, 12 मार्च 2018

मेहमाँ तुम्हीं तो हो

करते हमेशा याद वो मेहरबां तुम्हीं तो हो
करते हैं जां निसार जिसपे राजदां तुम्हीं हो

दिल की बात कह रहे हैं तुमसे कबसे हम
मतलब भी पूछते हो नादाँ तुम्हीं तो हो

आता है बाद ज़ुल्म के रहम भी तुम्हीं को
अपने किए पे खुद भी परेशां तुम्हीं तो हो

पछताओगे एक दिन मेरा सुकूँ उजाड़कर
इस दिल में कौन है मेहमाँ तुम्हीं तो हो
@मीना गुलियानी

शनिवार, 10 मार्च 2018

तुम बहुत याद आते हो

इस मतलबी दुनिया की तंगदिली
दुनिया के फरेब और कड़वे शब्द
जब मेरे मन को ठेस पहुँचातें हैं
तुम बहुत याद आते हो

चलते चलते जब इस सफर में
बहुत घना अँधेरा  छा जाता है
और मन का हौंसला टूटता है
तुम बहुत याद आते हो

तुम्हारे प्यार की रोशनी मुझे
तब एक नई राह दिखाती है
 दुनिया की मची हलचल में
तुम बहुत याद आते हो
@मीना गुलियानी



शुक्रवार, 9 मार्च 2018

जीवन की भंवर से उबरूँ

जी चाहता है पँख लगाकर
नील गगन की परिक्रमा करूँ
आकाश की ऊँचाइयाँ छू लूँ
जहाँ घुटन भरे बादल न हों
न ही भेदभाव या स्वार्थ हो
हर तनाव ताप से मुक्त होऊं
जीवन सागर की गहराई में
फिर डूबकर गोता लगाऊँ
जीवन के सत्य के मोती ढूँढूँ
जीवन में मधुरता भर लूँ
उपवन सी ताज़गी पा लूँ
मन की भटकन खत्म करूँ
सरल शान्ति की आगोश पाऊँ
और जीवन की भंवर से उबरूँ
@मीना गुलियानी 

जब बेटी ससुराल पधारे

माता पिता के प्रेम का कैसे क़र्ज़ चुकायेंगे
बच्चों के सुख खातिर कितने ग़म उठायेंगे

कैसे भूलेंगे हम वो पल जब माँ थी लोरी गाती
खुद भूखी रहकर भी हमको भरपेट वो खिलाती

राजा बेटा रानी बिटिया कहकर गले लगाती
पापा से जब डाँट पड़ती वही आके हमें बचाती

बचपन के दिन हमें याद हैं करते थे हम मौज
पापा की पीठ के घोड़े पर चढ़ते थे हर रोज़

माँ की ममता का न कोई सांनी न ऐसा ज्ञाता
बच्चे की वो प्रथम गुरु है वो ही  भाग्यविधाता

पापा भी हैं सबको प्यारे हम हैं उनकी आँख के तारे
आँखे उनकी भी भर आती जब बेटी ससुराल पधारे
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 8 मार्च 2018

हस्ती को मिटाया जाएगा

वाह क्या यही है नारी का सम्मान 
सदा से सहा है उसने इतना अपमान 
करता रहा वो जुल्म और तू सहती रही 
वो तो वहशी है और तू नादान 

अरे ---ये तो है ---एक करोड़ का बंगला 
सभी कुछ होने पर भी तू है कंगला 
कितना बड़ा बनाया तेरा ये पिंजरा 

फिर से क्या वही पाठ दोहराया जाएगा 
फिर से तेरी हस्ती को मिटाया जाएगा 
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 7 मार्च 2018

आके तुम इसे जला जाओ

दिखता है हर ओर अँधेरा
उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम
चारों ओर अँधेरा छाया
सूझे न कोई राह मुझे

मन का कोरा मेरा आँचल
रोते रोते भीग गया है
भूले से ही सही तुम आओ
एक बार तो राह दिखाओ

यह जीवन की पगडंडी
पलक झपकते डसती है
जीवन की नागिन मुझ पर
मौत बनकर हँसती है

जिंदगी की रहगुज़र कैसे होगी
हर तरफ एक परछाईं है
एक अक्स नज़र आता है
दुनिया में कौन किसका है

ये जिंदगी एक रात की है
प्यार एक चिराग सा है
जितनी देर तक जल सके
आके तुम इसे जला जाओ
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 6 मार्च 2018

मुझे तेरी सिसकियाँ

क्यों तेरे चेहरे पर दिखाई देती हैं वीरानियाँ
अजीब सी करती हैं मुझसे ये सरगोशियाँ

क्यों हैं फूलों के बगीचे यूँ पड़े सुनसान से
दर्द के गुल खिले छाईं ग़म की बदलियाँ

क्यों छिपा रहे हो हाथों से अपना चेहरा तुम
तेरे चेहरे से अयाँ होती कितनी कहानियाँ

दिल तेरा यूँ टूटा टूटा रोता है चुपचाप क्यों
अक्सर सुनाई देती हैं मुझे तेरी सिसकियाँ
@मीना गुलियानी

रविवार, 4 मार्च 2018

जग में तेरा आवागमन

मृत्यु के डर से छटपटाता है मन
सबको मुक्ति की चाह मिले न राह
पाप में सदैव डूबा रहता चंचल मन
पञ्चतत्व का है तन करे न चिंतन
तन अस्थाई और मोहपाश के बंधन
करे न कृष्ण चिंतन छूटे ये बंधन
काम ,क्रोध,ईर्ष्या में लीन है मन
वक्त है सम्भल नहीं व्यर्थ है जीवन
कर आत्मचिंतन छोड़ सारे ये भ्रम
ताकि न हो जग  में तेरा आवागमन
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 3 मार्च 2018

साये से लिपटा जा रहा हूँ

शीशे का महल बना रहा हूँ
दिल अपना बहला रहा हूँ

मेरे सीने में बहुत दर्द भरा है
सबसे उसको छिपा रहा हूँ

सारा ज़माना है मुझसे बेखबर
उसको मैं आईना दिखा रहा हूँ

सबके ज़ज्बात पत्थर से हो गए
अपने ज़ख्मों को सहला रहा हूँ

किसी से शिकवा गिला न मुझे
अपने साये से लिपटा जा रहा हूँ
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

हम दूर होने लगे हैं

यूँ यादों में उनकी खोने लगे हैं
कभी हँसते हँसते यूँ रोने लगे हैं

न बेचारगी थी हमें इससे पहले
कि यादों में खुद को खोने लगे हैं

सीखा न जीने का हमने सलीका
अरमां ये नश्तर चुभोने लगे हैं 

है दर्द ये कैसा बताए तो कोई
नशेमन में खुद को डुबोने लगे हैं

उतरे भी कैसे कोई साहिल के पार
साहिल से हम दूर होने लगे हैं
@मीना गुलियानी