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शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

जिंदगी बिन तेरे मुझे भाती नहीं है

तेरी याद इस दिल से जाती नहीं है
कोई चीज़ भी मन को भाति नहीं है

तन्हा हुआ है सफर अब तो अपना
कोई हमसफ़र कोई साथी नहीं है

जहाँ पर भी देखूँ अँधेरा वहीँ है
रोशनी अब कहीं से आती नहीं है

क्या मर्ज़ है कोई दवा तो बताए
जिंदगी बिन तेरे मुझे भाती नहीं है
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

कटेगा कैसे बिना हमसफ़र

कैसा है यादों का सफर
बिखरे हुए हैं यादों पल
मन की चंचलता के पल
किसी सोच में डूबा मन
कहता मेरी अँगुली पकड़
क्या करूँ कहाँ मैं जाऊँ
चहुँ ओर  अँधेरा है अब
आगे जाते मन डूबता अब
कोई मनमीत साथी नहीं
 साथ जो विचरण करें अब
क्या करें कोई तो समझाए
क्या सब भूल जाऊँ अब
वो पल न जाने कैसे थे
बिखर गए सुनहरे स्वप्न
हो गईं अकेली शामें सुबहें
वो प्रेमालाप की धड़कन
सिर्फ यादें हैं चन्द लम्हों की
तन्हा है जिंदगी का सफर
कटेगा कैसे बिना  हमसफ़र
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

विलीन होने की चाहत है

सब कुछ छोड़कर चलने की आदत है
मौत को हँसकर गले लगाने की चाहत है

जिंदगी की मुश्किलें भी क्या टकरायेंगी
मुसीबतें सारी कतरा के निकल जायेंगी

हर पल मुस्कुराने की मुझे आदत है
परायों को भी अपना बनाने की चाहत है

दुनिया के दुःख समेटने की आदत है
अनन्त में विलीन होने की चाहत है
@मीना गुलियानी

बुधवार, 31 जनवरी 2018

वक्त यादों में कैद हो जाता है

लम्हा लम्हा यूँ ही गुज़र जाता है
गुज़रा वक्त फिर लौटके न आता है

कीमती हो जाता है वो गुज़रा लम्हा
जब कोई दूर छिटककर चला जाता है

जब किसी को शिदद्त से याद करते हैं
पर वो सामने कभी नज़र नहीं आता है

आँख से निकले हुए आँसू की तरह
वो लम्हा लम्हा सरकता जाता है

यही सोचती हूँ कुछ वक्त और होता
गुज़रा वक्त यादों में कैद हो जाता है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

इक शमा सी जलाए हुए

मुदद्तें बीत गईं जिन्हें मुस्कुराए हुए
कहाँ जाएँ वो जग के ठुकराए हुए

खुश रहते हैं वो अपनी ही तन्हाई में
सदियाँ बीत गईं त्यौहार मनाये हुए

जिंदगी में जाने कितने ग़म समेटे हैं
अरसा गुज़रा है उनको मुस्कुराए हुए

किसी की याद में खोए हुए बैठे हैं
दिल में इक शमा सी जलाए हुए
@मीना गुलियानी

सोमवार, 29 जनवरी 2018

क्यों रूठ गए मुझसे

इस तरह ओझल हुए मेरी जिंदगी से
सारे रिश्ते जैसे टूट गए हों मुझसे

आँखों से दरिया इस कदर बहता न था
जाने ऐसी क्या ख़ता हो गई  मुझसे

पाँव रखें भी तो हम कहाँ पर रखेँ
दलदली ज़मी पर न उठते मुझसे

 सबब तो यकीनन जानते हैं सब
फिर भी जाने क्यों रूठ गए मुझसे
@मीना गुलियानी 

रविवार, 28 जनवरी 2018

मौसम जैसे रूठ गया मुझसे

ये कौन गुज़रा है मेरी गली से
 साये की तरह गुज़रा इधर से

न जाने किस सोच में फिरता हूँ
वो शख्स दे गया ज़ख्म किधर से

कैसी हवा चली पर बेअसर होकर
ज़ख़्म दिल का भरा गया न उससे

बुत की तरह जी रहा था अभी तक
आईने की तरह बिखर गया मुझसे

साथ था वो  धूप छाँव का एहसास था
अब तो मौसम जैसे रूठ गया मुझसे
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 27 जनवरी 2018

दिल में दर्द सा भरता रहा है

तेरे आने का धोखा सा हुआ है
दिया ये दिल का जल रहा है

सुना है रात भर बरसा है सावन
ये दिल फिर भी प्यासा रहा है

वो आलम कैसा गुज़रा है मुझ पर
नशा सा कोई जैसे चढ़ता रहा है

कैसे ढूँढूँ तुझको मैं इस जहाँ में
दिल में दर्द सा भरता रहा है
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

रिमझिम बूँदें बरसने लगी है

आज फिर चिड़िया एक डाल पर फुदक रही है
वह यूँ फुदकती चहकती अच्छी लग रही है

कभी आम की डाली कभी अमरुद की डाली पर
कभी नीम की तो कभी जामुन की उस डाली पर

हवा की ताज़ी सौंधी सी खुशबु मन में भर रही है
प्रकृति की  सुरम्य छटा बसंत में निखर रही है

सरसों के पीले  फूल इस बगिया में खिलने लगे हैं
देखो बगिया संवर रही है ख़ुशी दिल में भर रही है

 भँवरे मंडराने लगे हैं मधुपान कर इतराने लगे हैं
लता पेड़ों का लेके सहारा देखो ज़रा तन के खड़ी है

नई भोर आई लाली है छाई उषा ने भी ली अंगड़ाई
सूरजमुखी ने आँखे खोली कुमुदिनी सुस्ताने लगी है

सितारे शर्माने लगे हैं घूँघट में मुखड़ा छिपाने लगे हैं
चंदा ओझल हुआ सूरज की किरणें जमी पे पड़ रही हैं 

प्रकृति संवरने लगी कुमकुम फूलों से झरने लगी है
संध्या रानी आई उसकी  पायलिया छनकने लगी है

कैसे न मोहित हों छटा पर आँखे ख़ुशी से झरने लगी हैं
 घटा छाई लेके बिजुरिया रिमझिम बूँदें बरसने  लगी है
@मीना गुलियानी


बुधवार, 24 जनवरी 2018

लब पर आती तो है

नदी की  कितनी चंचल है धारा
इस पार से उस पार जाती तो है

जीवन की लौ भी बुझने को है
सुलगाओ चिंगारी बाती तो है

भंवर में किश्ती डूबी तो क्या
टकरा के उस पार जाती तो है

न यूँ मायूस हो तुम इस कदर
रात के बाद भोर आती तो है

जिंदगी में बहुत दुःख झेले मगर
हँसी फिर भी लब पर आती तो है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

जो पिया न साथ में

आज हम फिर से निकले सुकूँ की तलाश में
चार कतरे आँसुओं के भी हो लिए साथ में

हम भुलाने तो चले हैं हर गुज़रे लम्होँ को
भूल कैसे पायेँगे जो दिन गुज़ारे साथ में

नामुमकिन लगता है तन्हा रहना तुझ बिन
वक्त ने फिर ला खड़ा किया ऐसे हालात में

लगता है आसमां भी गुमसुम सा बैठा हुआ
कोई तारा भी नज़र आता चंदा के साथ में

कहदो इन घटाओं से जाके बरस जाएँ कहीं
क्या मज़ा यूँ भीगने का जो पिया न साथ में
@मीना गुलियानी

सोमवार, 22 जनवरी 2018

मोतियों को न लुटाओ

जिंदगी के हर पल को ख़ुशी से बिताओ
जो हुआ सो हुआ उन सबको भूल जाओ

गया वक्त क्या कभी लौटा है किसी का
भुला दो बीते कल को न खुद को मिटाओ

गर चाहते हो ख़ुशी को गले से लगाना
वो पल जो हंसी थे उन्हें फिर दोहराओ

जिन्हें  याद करके भीगें पलकें तुम्हारी
अच्छा होगा गर उन लम्हों को भुलाओ

आंसू भी किसी की अमानत हैं तुम पर
इन बेशक़ीमती मोतियों को न लुटाओ
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

दर्द सब बेअसर हो गए

आप जाने किधर खो गए
दुनिया में तन्हा हम हो गए

रात काटे ये कटती नहीं
दिन भी अब ज़हर हो गए

याद में तेरे छलनी जिगर
हर नज़र चश्मे तर हो गए

ज़ुल्म तो हम पे होते रहे
हादसों के शहर हो गए

ख़्वाब पलकों पे जो थे सजे
जिंदगी पे वो क़हर हो गए

मत पूछो मेरा  हाले दिल
दर्द सब बेअसर हो गए
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 17 जनवरी 2018

महल हमारे न टूट जाएँ

जिंदगी के फैसले जाने क्या हो जाएँ
यादों के सिलसिले जुड़ें या टूट जाएँ

वक्त की हलचल बनी हुई सी है
जाने कब किस मोड़ पे ले जाए

हर कदम सोचकर हम बढ़ा रहे हैं
मंजिल पे कदम न कहीं डगमगाएं

गैरों की बातों का शिकवा नहीं है
अपनों के अफ़साने हमको रुलाएं

हकीकत में हर लम्हा हँसके बिताया
ख्वाबों के महल हमारे न टूट जाएँ
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 15 जनवरी 2018

मित्र वही कहलाता है

जो मित्र की पीड़ा देखके
आँखों से अश्रु बहाता है
मित्र वही कहलाता है

फ़टी बिवाई सुदामा की
अश्रुजल से धुलवाता है
मित्र वही कहलाता है

जो उसके तप्त हृदय को
 स्नेह से सहलाता है
मित्र वही कहलाता है

जो आहत मन की पीड़ा को
प्रेम से अपने मिटाता है
मित्र वही कहलाता है

जिसका हृदय परपीड़ा में
तुरंत द्रवित हो जाता है
मित्र वही कहलाता है

रूखे सूखे भात छीनके
बड़े चाव से खाता है
मित्र वही कहलाता है
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

रोते चेहरे भी मुस्कुराते हैं

हर पल डर हमें सताता है
कभी समाज का डर
कभी असफल होने का डर
अकेले हो जाने का डर
रिश्ते टूटने का डर
नाकारा साबित होने का डर
निर्णय से चूकने का डर
हम डर पर विजय पा सकते हैं
भावनाओं को नियंत्रित करके
तो लगेगा अँधेरे से निकले हैं
उजाले में आ पहुँचे हैं
किसी पहाड़ की चोटी पर हैं
या किसी पेड़ की छाँव में हैं
नदी की कल कल ध्वनि
पेड़ के पत्तों की सरसराहट
चिड़ियों का कलरव होना
ओस की बूंदों का गिरना
सब मन को लुभाता है
खुशियों के पल लौट आते हैं
प्रकृति से हम जुड़ जाते हैं
रोते चेहरे भी मुस्कुराते हैं
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

दूर हो हर उलझन

मैंने महसूस की ओस की ताज़गी की छुअन
मिट्टी पर गिरी पहली बूंदों की वो सिहरन

पेड़ों की शाखाओं पर चिड़ियों की चहकन
 कोमल फूलों के प्रस्फुटन में डूबा ये मन

चाँद की चाँदनी में नहाकर अलसाया यौवन
इठलाता इतराता हुआ मधुर नेह का बंधन

मन का मदमाता हुआ प्रकृति से संगम
पक्षियों के कलरव में जुड़ने का उपक्रम

मन को सुकून देता है ये सुरम्य वातावरण
ईश्वर की चित्रकारी का होता है हमें दर्शन

हर  पीड़ा शमन करता आत्मिक उद्बोधन
अनुभूतियों में उतरकर दूर हो हर उलझन
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

प्रेम का एहसास देते हैं

कुछ रिश्ते अनायास ही जुड़ जाते हैं
एक कच्चे धागे से ही बँध जाते हैं

ज़रूरत नहीं होती झूठी रिवायतों की
न ही इन्हें परम्पराओं में कसने की

ज़रूरत नहीं होती रोपने और सींचने की
ज़रूरत नहीं पड़ती खोखले रिवाज़ों की

फिर भी ये रिश्ते वटवृक्ष जैसे पनपते हैं
मन को सुकून प्रेम का एहसास देते हैं
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 8 जनवरी 2018

भूली दास्ताँ लिख रहा हूँ

रफ़्ता रफ़्ता याद में खोकर
भूली दास्ताँ लिख रहा हूँ

कहने को तो भीड़ बहुत है
 फिर भी तन्हा लिख रहा हूँ

तुमने पूछा है हाल जो मेरा
ख़ुद को अच्छा लिख रहा हूँ

हुई है रोशन तुमसे दुनिया
चंदा तुमको लिख रहा हूँ

इस ज़मीं से दूर फ़लक तक
तेरा आशियाँ लिख रहा हूँ

महक घुली है साँसो में तेरी
उसकी ऊष्मा लिख रहा हूँ
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 6 जनवरी 2018

पुनर्जीवित करवा दो

निःशब्द  हो गई है वीणा
फिर से कोई तान सुना दो
तार पड़  गए ढीले ढाले
फिर से इनको कसवा दो

मन में कितनी ही आशाएँ
बलवती हो उठीं बेलों सी
अमरलता कोई बन जाए
ऐसी कोई सुधा पिला दो

सुधियों के वो सुर प्याले
पड़ गए रीते अनचीन्हे से
उन प्यालों को स्पर्श से
तुम पुनर्जीवित करवा दो
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 3 जनवरी 2018

निःशब्द मूक मनुहार लिखूँ

तू कहे तो वीणा की जो बज उठी झंकार लिखूँ
 डूब गया अश्रुजल में वो दर्द भरा श्रृंगार लिखूँ

मन सिक्त हुआ है मेरा प्रेम पल्ल्वित होने से
नयनों की गगरी से छलकी अँसुअन धार लिखूँ

सपने हों पूरे ज़रूरी नहीं मंज़ूर हो अर्ज़ी ज़रूरी नहीं
मन कहता है उड़ जाने दो पंखों का विस्तार लिखूँ

अंतर्मन का है गठबंधन रूहों का रूहों से है मिलन
मत रोको खो जाने दो निःशब्द मूक मनुहार लिखूँ
@मीना गुलियानी 

अंतिम सोपान है

जीवन क्या है  ?
एक ऐसी महायात्रा
जो अनवरत चलती है
इसके तीन पड़ाव हैं
बचपन, यौवन , बुढ़ापा
सकारात्मकता ज़रुरी है
यही जीवंतता है
नकारात्मकता मृत्यु समान है
जड़ के समान नश्वर है
अपने विचारों से उभरना है
नैराश्य को जीवंतता में
परिवर्तित करना है
नए गंतव्य की तैयारी हेतु
स्वयं का मूल्यांकन करना
जीवन को सुधारना है
काम ,क्रोध,मद ,लोभ
नष्ट करना, कमल समान
व्यक्तित्व निखारना है
जीवन में उतार चढ़ाव
आते रहते हैं , आयेंगे
जीवन में हर पल को
 हँसते हुए गुज़ारना है
चित्त को शांत करना है
क्षमा मांगकर क्षमादान देकर
मन एकाग्र करना है
उस विराट को पाना है
यही जीवन का लक्ष्य है
जीवन का अंतिम सोपान है
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

हमें मुस्कुराना चाहिए

जीवन एक सौगात है जीना आना चाहिए
कैसे भी पल आएँ हमें मुस्कुराना चाहिए

चाहे दिल पर बोझ हो कितना भी भारी
भूलकर सारे गम को हँसना आना चाहिए

चाहे आशा इस जीवन में बन जाए निराशा
विगत सुखद पलों को न बिसराना चाहिए

जीवन की रणभूमि में चाहे जीत या हार मिले
हर घड़ी परीक्षा की है समझ में आना चाहिए
@मीना गुलियानी

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कण कण में स्पंदन है

तू ही मेरे दिल में बसा है
तुझसे ही जग रोशन है
रोम रोम तेरा नाम पुकारे
तू ही अंतर्मन में है

तुझसे ही संगीत है मेरा
तू ही मेरी सरगम है
सांसो की वीणा में है तू
तू  ही दिल की धड़कन है

मन की भावना में बसा तू
लहरों में तेरा गान बसा
अस्ताचल की किरणों में तू
तू ही मेरा दर्पण है

मन उपवन का फूल है तू
तुझसे ही ये संसार बसा
हर पल तू नज़रों में समाया
कण कण में स्पंदन है
@मीना गुलियानी 

हँसना सिखा दिया है

जब दर्द उठा तो रो दिए हम
वरना हँसते हुए जीवन जिया है

यकीं है तुझे पा ही लेंगे एक दिन
तेरी खुशबु ने पता बता दिया है

तेरी याद में जिंदगी गुज़ार लेंगे हम
तेरी चाहत ने सुकूँ मुझे बहुत दिया है

अच्छा होता गर तुम साथ रह पाते
वक्त से पहले  दामन छुड़ा लिया है

क्या कयामत ढा गई तेरी वफ़ा भी
रोते रोते भी हँसना सिखा दिया है
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

जो पिया का संदेशा लाए

मुंडेर पे काला कौआ बैठा काँव काँव चिल्लाए
सुनके उसकी काँव काँव को दिल मेरा हुलसाए

शायद आज कोई संदेशा पिया के गाँव से आए
दिल में  फिर से हूक उठी सौ सौ तूफ़ान उठाए

करने फिर सिंगार को बैठी दिल में प्रेम जगाए
पिया बिना कछु सूझे नाहीं मन मोरा बौराए

माथे  कुमकुम टीका बिछिया पायल भी इतराए
कर  सौलह सिंगार सजी मैं पिया की आस लगाए

बार बार उठ द्वार पे जाऊँ नैनन टकटकी लगाए
करूँ मनुहार पवन की जो पिया का संदेशा लाए
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

दीप जला जाना

इस दिल ने उठाये लाखों सितम
तुम और सितम अब मत ढाना

तड़पा है किसी की याद में ये
तुम इसको याद नहीं आना

चाहे सुबह ढले चाहे शाम ढले
नाम जुबां पे हमारा मत लाना

खुश रहना  हर हाल में तुम
अश्कों को न अपने ढलकाना

दिल तुमको दुआएँ देता है
ख़ुशी  के दीप जला जाना
@मीना गुलियानी


तुम बिन रहा नहीं जाता

आज फिर दिल ने तुमको पुकारा
तुमने पलटकर न देखा दुबारा

 क्यों इतनी कड़वाहट रिश्तों में घुली
खुदा जाने क्यों ये सज़ा मुझे मिली

वो पल हसीन थे जब हम मिले थे
दिल में उमंगों के फूल खिले थे

अब वो सारे गुल मुरझाने लगे हैं
तेरी विरह में आँसू बहाने लगे हैं

कलियों का तड़पना देखा नहीं जाता
आ जाओ तुम बिन रहा नहीं जाता
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

समीकरण में उलझा रहता है

जिंदगी की समस्या क्या कभी खत्म होगी
समुद्र की लहरों सी मचलती रहती हैं
इनका क्षेत्र कितना विस्तृत है
अनवरत सी चलती रहती हैं
कभी कभी तो ज्वारभाटा
और कभी ज्वालामुखी बन
नागिन सी फुँफकारती हैं
कभी गर्मी की तपिश तो
कभी सर्दी का तीक्ष्ण रूप लेती हैं
जीवन अस्त व्यस्त कर  देती है
कोई बेघर, बेचारा, भूख का मारा
सड़कों के फुटपाथ पर ठिठुरता है
अलाव जलाकर सर्दी कम करता है
बिना वस्त्रों के रात गुज़ारता है
तो कभी भूखे पेट सोता है
उनकी हालत बहुत खस्ता होती है
जिसे देखो समस्याग्रस्त नज़र आता है
क्या समस्या से बचने का कोई रास्ता है
मेरा मन इसी समीकरण में उलझा रहता है
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

टूट के बिखर जाएँ हम

तुम्हीं बताओ कैसे जिया जाएगा सनम
इक तरफ जहाँ है और इक तरफ सनम
ऐसे तो घबरा के टूट ही जायेंगे हम
दिल मेरा कहाँ है और तू कहाँ सनम

बीच भंवर में डूबती ही जा रही थी नाव
आये तुम तो डूबते हुए को लिया थाम
लड़खड़ा रहे हैं कदम गिर न जायें हम
आओ तुम्हें पुकारते हैं थाम लो सनम

राहते जा बनके आ गए जिंदगी में तुम
मुस्कुरा दी जिंदगी भी मिल गए जो तुम
अब तो ज़िद अपनी छोड़ो तुमको है कसम
ऐसा न हो कि टूट के बिखर जाएँ हम
@मीना गुलियानी

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

तेरे आने से बढ़ जाती है

तारों की छाँव में हर एक रात गुज़र जाती है
 दिल को समझाने तेरी याद चली आती है

हम ख्यालों में तुमको ही बुला लेते हैं
जब शबे ग़म की तन्हाई तड़पाती है

जाने क्यों कौंधती है बिजली घटाओं में
हिचकियाँ देके मुझे पवन चली जाती है

जब घटा झूमके आँगन में बरस जाती है
दिल की धड़कन तेरे आने से बढ़ जाती है
@मीना गुलियानी


रविवार, 3 दिसंबर 2017

दिल ही में सिमट जाएंगी

आईना देखके जब याद मेरी आएगी
साथ गुज़री मुलाक़ात याद दिलाएगी

जब यादें भावनाओं का ज्वार उठायेंगी
तुम्हीं बताओ वो शाम कैसे गुज़र पायेगी

आँखों आँखों में ही कह देंगे सारी बातें
 रात तारों की छाँव में ही कट जायेगी

सारी कटुता भूलकर दूरी मिट जायेगी
सब ख़्वाहिशें दिल ही में सिमट जाएंगी
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

समेटकर ले आती है

इक मुलाकात में सारी उम्र चली जाती है
आंसू के कण में सृष्टि सिमट जाती है

अंतर्मन में मीठे पानी की लहर आती है
जिसमें सूने मन की रेत भीग जाती है

मन की माला कोमल किसलयी हो जाती है
 मलयानिल सुगंध अपनी लुटा जाती है

खुशियों की सीपियाँ जो जिंदगी चुराती है
फ़ुरक़त के पलों मेँ समेटकर ले आती है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

स्मृतियों का अवशेष हैं मेरे सपने

मेरे सपने मेरी आँखों में लहलहाते हैं
होठों पे थरथराते हैं बिन कहे रह जाते हैं
मेरे सपनों में इंद्रधनुष रंग भरता है
बादल भी कूची सा बन बिखरता है
मैं फूलों से रंग बिरंगे रंग चुनती हूँ
उनसे सपनों का ताना बाना बुनती हूँ
कभी चम्पा चमेली जूही का फूल मैं
बनाती हूँ ,उन्हें देख देख हर्षाती हूँ
मलयानिल के झोंके सुगंध भरते हैं
हरी दूब का बिछौना बनता है मेरा
मेरे सपनों में प्रकृति का है पहरा
धरा से आकाश तक हिंडोला मेरा
चन्द्रमा की किरणें आके झुलाती हैं
शीतल बयार लोरी मुझे सुनाती है
तारों की चूनर चन्द्रमा का टीका
पहन इठलाती हूँ झूम जाती हूँ
जुगनू  उजाला करते हैं राहों में
कभी जलते बुझते हैं वीरानों में
मेरे सपने उफनती नदी समान हैं
जिसका कोई गंतव्य ही नहीं है
कोई सीमा नहीं कोई बंधन नहीं है
अपनी ही तान अपनी वृति और
अपने ही रस में लीन हैं अनन्त हैं
मेरे सपनों में एकांत की अनुभूति है
यथार्थ के सत्य की पीड़ा भी है
मेरा मन मानसरोवर समान है
मुझे संवेदना द्वारा मुझसे जोड़ता है
मेरी स्मृतियों का अवशेष हैं मेरे सपने
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 27 नवंबर 2017

क्या यही हूँ मैं

मैं अपनी जिंदगी की किताब
खोलता हूँ , पन्ना पलटता हूँ
घटनाएँ अनगिनत रंग में रंगती  हैं
बारिश की बूँद दूब पर मुस्काती है
मेरी तन्हाइयों की यादें गुनगुनाती हैं
तब मेरे आँसू पिघल जाते हैं और
मेरे अंतर के भय बिखर जाते हैं
मेरी अंगुलियाँ रेत पर थिरकती हैं
मैं अपनी तस्वीर को उकेरता हूँ
सुख की , दुःख की  परछाईयाँ
उभरती हैं , मेरे जीवन में तब
अनायास ही बसंत खिल उठता है
नए नए फूल उग आते हैं
अनन्त का झरना प्रवाहित होता है
जिससे मेरा तन मन रोमांचित होता है
मैं उसमे खो सा जाता हूँ
जिंदगी की किताब को देखता हूँ
पढ़ता हूँ , जीता हूँ, खुश होता हूँ
सोचता हूँ , क्या यही हूँ मैं ?
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 25 नवंबर 2017

सुर बन गुनगुनाते हैं

कुछ रिश्ते अनायास ही जुड़ जाते हैं
अनबूझ पहेली सी वो बन जाते हैं

न किसी परम्परा को वो मानते हैं
न कोई भेदभाव वो पहचानते हैं

बिन बोले ही दिल में  बस जाते हैं
दिल में नई प्रेरणा को जगाते हैं

विश्वास की इक डोर से बँध जाते हैं
अन्जान पर  दिल में रम जाते हैं

होठों की  मुस्कुराहट बन जाते हैं
नभ में बादल बन बरस जाते हैं

कागज़ की कश्ती बन तैरते हैं
अनमोल सुर बन गुनगुनाते हैं
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

याद हमको आने लगे हैं

वो रह रह के याद हमको आने लगे हैं
जिनको भुलाने में ज़माने लगे हैं

कभी कह न पाए जिन्हें दिल की बातें
वो बातें सभी को हम बताने लगे हैं

कहीं टूट जाए न हसरत भरा दिल
इस दिल को हम बहलाने लगे हैं

देखो चुभ न जाएँ कहीं तुमको काँटे
दामन अपना हमसे छुड़ाने लगे हैं

बहुत जी लिए हम घुट घुटके अब तक
नाकामियों पे पर्दे हम गिराने लगे हैं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 22 नवंबर 2017

कटु सत्य है, यथार्थ है

समय बचपन से मेरा सहचर रहा है
मेरे बचपन की क्रीड़ा का
यौवन के सुख दुःख के क्षणों का
समय साक्षी रहा है
समय अनुभूति का विषय है
रीति , नीति , प्रीति का
समय में संवेग है , संकल्प है
यह गतिशील , परिवर्तनशील है
सभी नक्षत्र इसके आधीन हैं
दिन, रात , सूर्य , चन्द्रमा ,तारे
सब समयानुसार कार्य करते हैं
पत्ते पर पड़ी ओस की बूँद है
जो उगते सूर्य को समर्पित है
यह शतरंज की बिसात है
यही शह और मात है
समय उन्नति का मार्ग है
यह एक अनवरत सीढी है
धरा को गगन से मिलाने के लिए
समय नश्वर और अनश्वर है
समय चेतना और अचेतना है
यही आस्था , भक्ति और विरक्ति है
समय ही गति , नियति , प्रगति है
समय की धारा बहुत प्रबल है
बड़े बड़े राजा महाराजा इसके आगे
नतमस्तक हो जाते हैं
कब, कौन, कैसे, कोई घटना घटित होगी
यह सिर्फ समय ही जानता है
हर युग का इतिहास केवल
समय के ही पास है
हम सब समय के आधीन हैं
यही कटु सत्य है, यथार्थ है
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 20 नवंबर 2017

कोशिश कर रहा हूँ मैं

तेरे साथ मेरे हमदम हमेशा रहा हूँ मैं
मुझे जिस तरह से चाहा वैसा रहा हूँ मैं

तेरे सर पे धूप आई तो मैं पेड़ बन गया
तेरी जिंदगी में कोई वजह रहा हूँ मैं

मेरे दिल पे हाथ रखके बेबसी को समझो
मैं इधर से बना तो उधर ढह रहा हूँ मैं

तू आगे बढ़ गई तो यहीं पे रुक गया
तू सागर बनी कतरा बन रहा हूँ मैं

चट्टानों पे चढ़ा तो पाँव की छाप रह गई 
किन रास्तों से तेरे साथ गुज़र रहा हूँ मैं

ग़म से निज़ात पाने की सूरत नहीं रही
 निजात पाने की कोशिश कर रहा हूँ मैं
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

हमपे इनायत नहीं रही

हमने अकेले सफर किया है तमाम उम्र
किसी मेहरबां की हमपे इनायत नहीं रही

कुछ दोस्तों से हम भी मरासिम नहीं रहे
कुछ दुश्मनों से हमारी अदावत नहीं रही

तकल्लुफ़ से कुछ कहें तो बुरा मानते हैं
रो रो के बात करने की आदत नहीं रही 

सीने में जिंदगी अभी सलामत है मगर
इस जिंदगी की कोई ज़रूरत नहीं रही

कितनी मशालें लेके चले थे सफर पे हम
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही

खण्डहर बचे हुए हैं इमारत कोई नहीं रही
अब तो हमारे सर पे कोई छत नहीं रही
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 15 नवंबर 2017

याद आया वो गुज़रा ज़माना

वो चिलमन उठाके तेरा मुस्कुराना
वो पलकें उठाना उठाके गिराना
खिलखिलाती हँसी होंठों में दबाना
तितली सी उड़ती फिरना इतराना

वो पहरों तेरा छुपके आँसू बहाना
तेरा यूँ मचलना बहाने बनाना
हथेली में अपने मुँह को छिपाना
कभी छुपके रोना कभी गुनगुनाना

वो तारों की छाँव में छिपना छिपाना
चेहरे को अपने पल्लू में छिपाना
आँखों से अपने बिजली को गिराना
पाँव में  पायल की रुनझुन बजाना

वो शाखों से लिपटकर बल खाना
जुगनू सी दमकना सिमट जाना
यादों की भूल भुलैया में खो जाना
मुझे याद आया वो गुज़रा ज़माना
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

बनाने में जमाने लगे हैं

वो नज़रें हमसे ही चुराने लगे हैं
जिनको मिलाने में जमाने लगे हैं

किसी ने पाई हर ख़ुशी इस जहाँ में
हमें जिसको पाने में जमाने लगे हैं

अमावस की रातें  कटें एक पल में
कभी पल बिताने में जमाने लगे हैं

  खोजा जिसे वो मंजिल थी सामने
हमें  उसको पाने में जमाने लगे हैं

न टूटे कभी भी दिल के ये रिश्ते
इनको बनाने में जमाने लगे हैं
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 13 नवंबर 2017

मेरे मन को हर्षाए

दूर अस्ताचल में सूरज ढल गया है
साँझ की बेला में फूल झरने लगे हैं
पक्षी घोंसलों में लौटने लगे हैं
उनका कलरव मन को लुभाता है
उनका चहचहाना चौंच से चुगना
दायें  बायें घूमना बच्चों को खिलाना
शीतल बयार में पंख फैलाये उड़ना
पानी में डुबकी लगाना इठलाना
सब देखना मन प्रमुदित करता है
मेरा मन भी चाहता है कि काश
मुझको भी गर पंख मिले होते
तो गगन के तारों को छू लेती
चन्द्रमा की किरणों से खेलती
व्योम की सहचरी बन कभी नभ
तो कभी धरा पर विचरती फिरती
मेरी उमंगों को भी पंख लगते
दुनिया के ग़म से विलग होते
केवल सुख का ही तब नाम होता
दुःख का न फिर हमें पता होता
चन्द्रमा का टीका माँग में सजाती
तारों की पायल पहन नृत्य करती
तुम वीणा से ताल को मिलाते
सब पक्षी वृन्द ढोल को बजाते
हिरण कुलांचे भरता हुआ आता
अपनी मस्त चाल पर वो इतराता
मोर मयूरी को रिझाता पंख फैलाए 
यह सब दृश्य मेरे मन को हर्षाए
@मीना गुलियानी

रविवार, 12 नवंबर 2017

ऐसी कोई व्यवस्था बना दो

आज डोलने लगे धरा भी
ऐसी तुम हुंकार लगा दो
धरती से अंबर सब डोले
अलख का नारा लगा दो

जाग उठे सारी ये जनता
सोये इनके भाग्य जगा दो
खोया सब विश्वास ये पाएं
ऐसा कुछ करके दिखला दो

हर नारी सम्मान को पाए
ऐसी जागृति देश में ला दो
सबकी मर्यादा रहे सुरक्षित
सुप्त संस्कारों को जगा दो

देश में  सब खुशहाल रहें
 शान्ति का मार्ग दिखा दो
सबकी हर पीड़ा मिट जाए
ऐसा प्रेम का दीप जला दो

कोई रहे न भूखा प्यासा
अन्न  समस्या सुलझा दो
हर कोई सुख से सो जाए
ऐसी कोई व्यवस्था बना दो
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

संवेदना दिल में जगाएं

विरक्त मेरा मन हो चला
देखकर  संसार की वृत्तियाँ 
 कुत्सित भावना छल प्रवृति 
मन मेरा संतप्त हो चला

मचा हर तरफ  हाहाकार
भूख बेबसी सब लाचार
कुछ जीवन से गए हार
किया परित्याग समझ बेकार

देखी नहीं जाती उनकी दुर्दशा
मन मेरा व्याकुल हो उठा
चाहूँ मैं भी कुछ करूँ आज
जिससे मिले सबको अनाज

सबके घरों में चूल्हे जलें
कोई भी भूखा न रहे
सबके बच्चे फूले फलें
तब तृप्ति मन को मिले

सबकी बेटियाँ शिक्षा पायें
कुंठित भावनाएँ नष्ट हों
मन सबके शुद्ध पावन हों
कोई भी  न पथभ्र्ष्ट हो

ईश्वर सबको सद्ज्ञान दे
बुद्धि और क्षमादान दे
सबको सन्मार्ग पे लाये
संवेदना दिल में जगाएं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 8 नवंबर 2017

आशा हम ऐसी जगायें

सुरम्य सी है धरा
नीला नीला है गगन
हवाएँ चली मंद मंद
पुलकित है मन उपवन

आओ मिलके ख़ुशी बाँटे
दुःख को दूर भगाएँ
ऐसे करें हम काम
दीप नए हम जलाएँ

बुझते हुए चिराग़ों को
 आज हम जगमगायें
कोई कोना न रहे अछूता
सबको एक पंक्ति में लायें

हर अनाथ बेसहारा को
आज हम गले लगायें
उनकी मुस्कुराहट को
आज फिर लौटाके लायें

धरती पे मानवता बसे
ऐसा कुछ करके दिखाएं
प्रेम भरा हर दिल हो
आशा हम ऐसी जगायें
@मीना गुलियानी

सोमवार, 6 नवंबर 2017

आओ थोड़ा जी लें

हम जीवन में कबसे भाग रहे हैं
तुम अकेले नहीं हो मैं भी साथ हूँ
आओ कुछ देर पेड़ की छाया में सुस्ता लें
कुछ मन का बोझ हल्का करें थकन उतार लें
वो भी क्या वक्त था जब हम मिले थे
क्या वो समाँ था क्या सिलसिले थे
वो सागर किनारे मचलती लहरों का देखना
रेत को पैरों के अँगूठे से कुरेदना
वो दिन रात पंख लगाकर उड़ गए
जीवन की प्रभात , दुपहरी ढल गई
अब साँझ चुनरी फैलाकर स्वागत कर रही है
चन्द्रमा की किरणें बाहें फैलाकर बुला रही हैं
इस भागती दौड़ती जिंदगी से थक गए हैं
अपनी मरूफियत के बोझ मन से उतार दो
गुज़रे पलों को पलकों में समेट लो
 जीवन की इस सांध्य बेला में
आँखे मुंदने से पहले जीवन में
उमंग भरके नए  भरके
खुशियाँ उँड़ेले आओ थोड़ा जी लें
@मीना गुलियानी 

दूर कहीं फिर मेरे होकर

आज तुम फिर से अजनबी बन जाओ
फिर से धीरे धीरे दिल में उतर जाओ

न पूछूँ गाँव तुम्हारा न पूछूँ  नाम तुम्हारा 
दोनों ही चुपचाप रहें आँखे ही करदे इशारा

 सागर का हो किनारा जहाँ थामा हाथ हमारा
चलें हम साथ साथ आये नज़र वही  नज़ारा

रेत के फिर महल बनाएं पलकों में सपने जगायें
चुपके चुपके चोरी से दिल की धड़कन बन जाएँ

सागर की लहरें जब हमसे करे अठखेलियाँ
तब हम भी किनारे  पे बैठे और ढूंढें सीपियाँ

रह जाएँ ये पल तब हमारे दिल में बसकर
जाना न मुझसे दूर कहीं फिर मेरे होकर
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 4 नवंबर 2017

सारा जीवन गुज़ार लेती है

आज की नारी घर बाहर संभाल लेती है
हर मुश्किल का वो हल निकाल लेती है
दुखी होने पर  ग़म हँसी में टाल देती है
घर में शान्ति के लिए चुप्पी साध लेती है
बिन कहे सबके मन की जान लेती है
 मसरूफ़ियत में खुद को तलाश लेती है
खुद टूटने पर भी खुद को संभाल लेती है
 छटपटाहट को मुस्कुराहट में ढाल लेती है
अपनी भावनाओं को दिल में उतार लेती है
प्रेम की चाह में सारा जीवन गुज़ार लेती है
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

बाजी में जी छोटा न करते हैं

थोड़ा सुकूँ भी तुम ढूँढो इस जिंदगी में
ख्वाहिशें तो हम बेहिसाब करते हैं

खोये रहते हैं सब अपनी उलझनों में
चुप रहने वालों से उलझा न करते हैं

दिलों की महफ़िल में खामोशियाँ अच्छी हैं
मुहब्बत के क़रीनों में बेअदबी न करते हैं

चाहे तूफानी लहरें हों चाहे कितने पहरे हों
किश्ती खेने वाले हिम्मत हारा न करते हैं

जिन्दगी में कुछ खोना है कुछ पाना है
शतरंज की बाजी में जी छोटा न करते हैं
@मीना गुलियानी




साहिल पा जाती हूँ

तुम मेरी कल्पना में बसते हो
न जाने क्या मुझसे कहते हो

मैं जब कविता लिखती हूँ
तुम अपनी झलक दिखाते हो

कभी तुम सामने आते हो
कभी खुद को छिपाते हो

 जाने कैसा पावन रूप तुम्हारा
उज्ज्वल जैसे अंबर का तारा

सारा ज्ञान तुममें सिमट जाता
ऐसा प्रकाश पुंज तुमसे है आता

मैं खुद ही उसमें डूब जाती हूँ
लगता है साहिल पा जाती हूँ
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

न यूँ तुम गँवाया करो

दर्द अपना सभी से छुपाया करो
आँसुओं को न यूँ ही बहाया करो

होंठों पे हँसी यूँ ही छलकती रहे
ऐसा चेहरा सबको दिखाया करो

कौन सुने फरियाद दर्दे दिल की
बेरहम जहाँ को न बताया करो

हर तरफ जिंदगी में बिखेरो ख़ुशी
मिलें ग़म भी गर मुस्कुराया करो

शिकवे शिकायतें बड़ी बेमुरव्वत हैं
न इन पर अपना वक्त ज़ाया करो

हमेशा करो यकीं उसकी इमदाद पर
सब्र अपना न यूँ तुम  गँवाया करो
@मीना गुलियानी 

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

सहस्रार निर्झर अन्तर

चन्द्रकिरण की ज्योत्स्ना से प्रकाशित है तन
प्रफुल्लित हुआ है देखो मेरे मन का भी उपवन

नभ के तारे चमक चमक कर मन को लुभाएं
अपनी रश्मि कणों  से चहुँ ओर प्रकाश फैलाएँ

बाल सुलभ हुआ आज मेरा प्रमुदित मन
वीणा सी झंकृत हुई तरंगित ये धड़कन

 कोई जैसे बुला रहा हो सोया भाग्य जगा रहा हो
त्वरित गति से कांपी धरती करने लगे पग नर्तन

नीला अंबर लगा झूमने बादल भी हर्षाने लगे
मन मयूरा नाच उठा गीत ख़ुशी के गाने लगे

भरा रोम रोम में अनुराग प्राणों का संचार हुआ
बरसों से प्यासी धरा में मधुमय मनुहार हुआ

अंतर्मन में गूँजे निनाद सुर अनहद बजे निरंतर
बरसी अमृत की धारा भी सहस्रार निर्झर अन्तर
@मीना गुलियानी



शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

अधिकार हमारा बाकी है

आहिस्ता चल मेरी जिंदगी
कुछ फ़र्ज़ निभाने बाकी हैं
कितना दुःख पाया है हमने
उसको भी मिटाना बाकी है

यूँ रफ्तार से तेरे चलने पर
अपने सब पीछे छूट गए
रूठों को मनाना बाकी है
रोतों को हँसाना बाकी है

,मेरी हसरतें पूरी हो न सकीं
कुछ ख़्वाब भी पड़े अधूरे हैं
जीवन में है कितनी उलझन
सबको सुलझाना बाकी है

कितने शिकवे इस रिश्ते में
मनुहार अभी तक बाकी है
मन के इस अवगुंठन पर
अधिकार हमारा बाकी है
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

दिल पे घाव करते हैं

जब तेरी आँखों से दो आँसू छलकते हैं
मुझपे लम्हे वो नागवार से गुज़रते हैं

खुदारा इस लौ को अब तो बुझ ही जाने दो
मज़ारों पे रौशन चिराग अच्छे न लगते हैं

कितनी मासूमियत से वो पूछ बैठे हमसे
क्या ज़िन्दादिल इन्सा तन्हाई से डरते हैं

चलो जिन राहों पे तुम काँटे मुँह फेर लेते हैं
हम जैसे ख़ाकसारों के दिल पे घाव करते हैं
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

सफर का मुसाफिर बनाया है

पैरों में सैंडल हो या जूते
पैरों के माप होते हैं
मिट्टी में मिट्टी बन जाते हैं
कोल्हू जब चलता है
चलते चलते घिस जाते हैं
जुर्म की इन्तहा तब होती है
जब वो पाँव बागी हो जाते हैं
जब पैरों की ज़ुम्बिश
कोई राग छेड़ देती है
सब कांप जाते हैं
मैंने पैरों को चलना सिखाया है
कंटीली वादियों में मिट्टी में
इस सफर का मुसाफिर बनाया है
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

फिर मुस्कुराने लगी

जिंदगी और मौत की लड़ाई रूबरू देखी
 जिंदगी हावी कभी मौत का पलड़ा भारी
साँसें मेरी धीरे धीरे घुटने लगी
दिल की धड़कन मेरी रुकने लगी
काली बदरिया से मैं डरने लगी
बिजली चमकी तो सिहरने लगी
हवा से पत्ते भी खड़खड़ाने लगे
दिल को मेरे और भी डराने लगे
जाने फिर कैसे तुम पलटकर आये
जिंदगी को भी मेरी लौटा लाए
सांस धीमे से मेरी चलने लगी
दिल की धड़कन भी जादू करने लगी
जिस्म में फिर से जान आने लगी
जिंदगी मेरी फिर मुस्कुराने लगी
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

होठों पे अपने हँसी लाना

मेरे द्वार पे तुलसी का पौधा है
जिसे बड़े चाव से मैंने सींचा है

देखो तो कितनी मंजरियाँ हैं खिली
तुम्हारे आने से उनको ख़ुशी मिली

पास ही उसके अमरुद की डाली है
जिसपे कूकती कोयल मतवाली है

सीताफल और अनार हो गए बड़े
तुमसे गुण सीखे हुए पैरों पे खड़े

इनकी आशाएं बलवती होने लगी हैं
कुछ कहानियाँ सी ये बुनने लगी हैं

देती हैं दलीलें मुझसे कुढ़ने लगी हैं
इन्हें दिलासा दो समझने लगी हैं

न हमसे यूँ उलझो इनकी भी सुनो
मत रूठो चुपके से ज़रा तुम हँस लो

  कुंठाएँ गुस्सा देहरी पे छोड़के आना
आओ जब होठों पे अपने हँसी लाना
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

अपनों का पता चलता है

हर एक आदमी खुद ही मरता है
वक्त और हालात कुछ नहीं करते
हमला और बचाव खुद ही करता है

प्यार आदमी को दुनिया में
रहने लायक बनाता है
इसके सहारे दुनिया विचरता है

मेरे भीतर घने बादल गरजते हैं
त्योहारों का चाव महकता है
अंग अंग नाच उठता है

कभी गिरो तो घबराना नहीं
औकात का पता चलता है
उठायें हाथ तो अपनों का पता चलता है
@मीना गुलियानी 

मोती पाते हैं जो हताश नहीं होते

जिंदगी में कभी भी निराश नहीं होते
तकदीर के तमाशे से नाराज़ नहीं होते

तुम लकीरों में कभी यक़ीं मत किया करो
लकीरें उनकी भी हैं जिनके हाथ नहीं होते

रिश्ते वो नहीं जो रोज़ बनते हैं बिगड़ते हैं
रिश्ते  टूटते हैं जिनमे एहसास नहीं होते

गर दुःख हर किसी का दिलों में संजोते
तो दुनिया में पत्थरदिल इन्सा न होते

हाथ खूबसूरत हैं जो किसी को दें सहारा
 भावनाहीन है जिसमें जज्बात नहीं होते

वक्त की रेत पर सब कुछ फिसल जाता है
सागर  में मोती पाते हैं जो हताश नहीं होते
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

याद आती है

कुछ ऐसे आती है तुम्हारी याद
जैसे झील के उस पार नाव
बारिश की बूंदों में भीग जाती है
दिखती, सहमती ,ठहर जाती है

मुझे रहता है हर पल इंतज़ार
छूकर परछाई  चली जाती है
लगता है डरके सूरज से वो
यहीं कहीं पर छिप जाती है

 तुम्हारी आवाज़ को तरसता हूँ
तुम सपनों मेँ आती हो गाती हो
आँखों से छलके प्याले रीत गए
सुहाने पल बीत गए याद आती है 
@मीना गुलियानी



सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

दिल को यूँ बेज़ार न कर

गुज़रे वक्त को फिर से याद न कर
तकदीर में लिखे की फरियाद न कर

वक्त जैसा  भी होगा वो गुज़र ही जाएगा
कल की फ़िक्र में आज को बर्बाद न कर

जिंदगी तो सुख दुःख के दो पहलू हैं
ख़ुशी के पल जी ग़मों को याद न कर

खोल मन की खिड़की अँधियारे को मिटा
आँसू पोंछ ले दिल को यूँ बेज़ार न कर
@मीना गुलियानी

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

राहते जां अब क्यों हो गए हैं

मेरे अलफ़ाज़ कहीं खो गए हैं
 क्यों खामोश  सब  हो गए हैं

 तेरी रहनुमाई दर्द का सबब बनी
आशना सभी बेगाने से हो गए हैं

जाने क्यों दर्द अंदर से सालता है
जख़्म दिल के फिर हरे हो गए हैं

क्यों इतनी कडुवाहट रिश्तों में घुली
दर्दे दिल जख्मों की  दवा हो गए हैं

नासूर से जख्म फिर रिसने लगे
बेकसी के आलम फना हो गए हैं

सुकूं इस दिल का जिसने लूट लिया
वही राहते जां अब क्यों हो गए हैं
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

तेरी आँखों से छलक जाए

रोज़ सूरज यूँ ही निकलता है
शाम होने पर वो ढलता है
 धूप होती है साँझ होती है
जिंदगी यूँ ही  तमाम होती है

रात दिन जिंदगी के दो पहलू हैं
हर दिन रंग नए बदलते हैं
रात आनी है चाहे आ जाए
दिलों की कालिमा छंट जाए

गम की बदली सुबह में ढल जाए
तेरी खुशियों में चाँद लग जाए
जिंदगी तेरी फूलों सी महक जाए
ख़ुशी तेरी आँखों से छलक जाए
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

हर आंधियों पे भारी हैं

ओ पंछियो वक्त तुम्हारी उड़ान पे भारी है
तुम्हारे हौसलों को परखने की आई बारी है

मैं तो जीवन की हर जंग लड़ता हूँ
मुझे बचाना उसकी जिम्मेदारी है

कैसे मैं मान लूँ कि जीवन की जंग हारी है
मेरी तो मौत भी इस जिंदगी पे भारी है

मैंने तो रोशन कर लिए दिल में चिराग
जो ग़मों की हर आंधियों पे भारी हैं
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

वक्त थम जायेगा

खुद में डूबकर वक्त गुज़ारो गुज़र जाएगा
इसी बहाने खुद से परिचय भी हो जाएगा

बाहर के दीपक तो बहुत तुमने जलाए
 भीतर जलाओ तो उजियारा हो जाएगा

सबके गुण अवगुण को खूब परखा तुमने
झाँको भीतर खुद का अक्स नज़र आयेगा

तन को तो खूब महकाया उम्र भर तुमने
रूह को भी महकाओ सुकूँ मिल जाएगा

कभी वक्त मिले तो तन्हाई की सरगोशी में
धीरे से गुनगुनाओगे तो वक्त थम जाएगा
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 27 सितंबर 2017

माता की भेंट ----09

तर्ज़ ------घर आया मेरा परदेसी 

अखियाँ दर्शन अनुरागी चरणकमल से लौ लागी 

अब तो दर्श दिखा जाना 
प्यास को आके मिटा जाना 
मन मेरा बना बैरागी ------चरणकमल 

मैया जी अब न देर करो 
मन की उदासी दूर करो 
प्रीत अगन मन में जागी ---चरणकमल 

जोड़ा तुम्हरे संग नाता 
बेटी मैं हूँ तुम माता 
माँ ने क्यों ममता त्यागी ---चरणकमल 
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

माता की भेंट ---08

ओ दिसदा दरबार पहाड़ां वाली दा 
चल भगता कर दीदार पहाड़ां वाली दा 

दूर दूर तों संगता आइया 
उचिया लंबियाँ चढ़न चढ़ाइयाँ 
हर दिल विच वसदा प्यार --------पहाड़ां वाली दा 

था था पर्वत देंण नज़ारे 
पत्थरां विच गूँजन जयकारे 
एथे होवे मंगलाचार   -----------पहाड़ां वाली दा 

सबदे मन दी आस पुजावे 
कोई न दर तों ख़ाली जावे 
है रहमत दा भण्डार   ---------पहाड़ां वाली दा 

होके ध्यानू वांग दीवाना 
हस हस दे सिर नज़राना 
मन बन जा खिदमतगार ------पहाड़ां वाली दा 
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 25 सितंबर 2017

माता की भेंट ----07

जय जगदम्बे मात भवानी दया रूप साकार
सुनो मेरी विनती  आया हूँ तेरे द्वार 

आज फँसी मंझधार बीच मेरी नैया 
तुम बिन मेरा कोई नहीं है खिवैया 
नैया मेरी जगदम्बे माँ करदो भव से पार--------सुनो मेरी विनती

महिषासुर के मान मिटा देने वाली 
रावण जैसे दुष्ट खपा देने वाली 
पाप मिटा देती चामुण्डा ले कर में तलवार ------सुनो मेरी विनती

तेरे नाम की महिमा अजब निराली है 
अपने भक्तों की करती रखवाली है 
अपने दासों की खातिर तूने रूप लिए बहु धार ----सुनो मेरी विनती

जगमग करती जोत तुम्हारी है माता 
विद्या और बुद्धि बल की तू दाता 
गाता हूँ मैं गीत तुम्हारे मैया करो उद्धार -----  ----सुनो मेरी विनती
@मीना गुल

रविवार, 24 सितंबर 2017

माता की भेंट ---06

जगदम्बे शेरां वाली बिगड़ी संवार दे 
नैया भँवर में मेरी सागर से तार दे 

मैं अज्ञानी मैया कुछ भी न जानू 
दुनिया के झूठे नाते अपना मैं मानू 
आके बचालो नैया भव से उबार दे 

लाखों की तूने मैया बिगड़ी बनाई 
फिर क्यों हुई है मैया मेरी रुसवाई 
लाज बचाले मैया दुखड़े निवार दे 

जपूँ तेरा नाम मैया ऐसा मुझे ज्ञान दे 
नाम न भूलूँ तेरा ऐसा वरदान दे 
आशा की जोत मेरे दिल में उतार दे 
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 23 सितंबर 2017

माता की भेंट ---05

आज दया कर मुझ पर मईया ,सुनले करुण पुकार हो
नैया फँसी मँझदार में मेरी , करदे इसको पार हो

तुम महाकाली  तुम चामुण्डा तुम ही मात भवानी हो
तुम हो दीन दुखी की पालक तुम दुर्गा महारानी हो
मम जीवन की तुम रखवाली तुम मेरी आधार हो

तेरे नाम की जोत जलाकर पापी भी तर जाते हैं
सुख पाते हैं वो जीवन में जो तेरा गुण गाते हैं
तुम ही पालक हो भक्तों की तुम देवी साकार हो

अष्ट भुजा से दुष्ट खपाकर पहनी मुण्डनमाला है
सिंह वाहिनी खड्ग धारिणी रूप तेरा विकराल है
मईया दया की दृष्टि डालो तुम आशा का तार हो
@मीना गुलियानी 

माता की भेंट ---04

किसका दर है कि ज़बीं आप झुकी जाती है 
दिले खुद्दार दुहाई कि खुदी जाती है 

आये जो तेरी शरण हमने तब ये पहचाना 
तेरे दर पे ही तो किस्मत जगाई जाती है 

ढाये दुनिया ने सितम हमको तुम न ठुकराना 
तेरे दर पे ही तो खुशियाँ लुटाई जाती हैं 

रूठे दुनिया चाहे सारी न तुम खफ़ा होना 
तुझे पाने को ही हस्ती मिटाई जाती है 

अपने दासों पे कर्म मईया आज फरमाना 
तेरे दर पे ही तो बिगड़ी बनाई जाती है 
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

माता की भेंट ---03

मेरी मात आ जाओ तुझे दिल ढूँढ रहा है 
मुझे दर्श दिखा जाओ तुझे दिल ढूँढ़ रहा है 

तुम आओ तो ऐ माँ मेरी किस्मत बदल जाए 
बिगड़ी हुई तकदीर माँ फिर से सँवर जाए 
कबसे खड़ा हूँ मैं तेरी उम्मीद लगाए --------- तुझे दिल ढूँढ़ रहा है 

इस दुनिया ने ऐ माँ मेरा सुख चैन है छीना 
मुश्किल हुआ है आज तो बिन दर्श के जीना 
आवाज़ दे मुझको माँ अपने पास बुला ले------ तुझे दिल ढूँढ़ रहा है 

रो रो के मईया आँखे भी देती हैं दुहाई 
सुनलो मेरी विपदा मईया जी करलो सुनाई 
अब जाऊँ कहाँ तुम बिन नहीं और ठिका है ----- तुझे दिल ढूँढ़ रहा है 
@मीना गुलियानी 

माता की भेंट ----02

तर्ज़ ----रहा गर्दिशों में हरदम 

मेरी मात आओ तुम बिन, मेरा नहीं सहारा 
दर्शन दिखाओ मुझको , दिल ने तुझे पुकारा 

आके हाल मेरा देखो , दुनिया के दुःख हैं झेले 
तेरे बिना जहाँ में , रोते हैं हम अकेले 
माँ मुझे न तुम भुलाना , मुझे आसरा तुम्हारा 

क्यों बेटे पर तुम्हारी, नज़रे कर्म नहीं है 
सारी ये दुनिया माता , वैरी मेरी बनी है 
मेरी लाज को बचाओ, मैं बच्चा हूँ तुम्हारा 

मेरे आँसुओ का तुम पर ,कोई असर नहीं है 
कैसे सुनाऊँ तुमको, विपदा जो आ पड़ी है 
मँझदार में फंसा हूँ ,सूझे नहीं किनारा
 @मीना गुलियानी 

बुधवार, 20 सितंबर 2017

माता की भेंट -01

तर्ज़ ---मैं  कता प्रीतां नाल

मैं करा प्रीतां नाल ---------------------------- दर्शन मइया दा
वा वा दर्शन मइया दा-----------------सोहणा दर्शन मइया दा

गुफा मइया दी सोहणी लगदी पर्वत दे विचकार
मइया शेरां वाली दा , है सुन्दर दरबार   - ------दर्शन मइया दा

आये भगत प्यारे मइया दे बोलण जय जयकारे
जेहड़ा उसदा नाम ध्यावे , पल विच उसनू तारे --दर्शन मइया दा

मइया जी दे द्वारे सोहणी जगदी ऐ जोत न्यारी
माता जी दी शेर सवारी, लगदी ऐ प्यारी प्यारी ---दर्शन मइया दा

माँ अम्बा जगदम्बा जी दा सुन्दर भवन रंगीला
प्रेम दे वाजे वजदे दर ते , नाम दी हो रही लीला ---दर्शन मइया दा

दुर्गा शक्ति जी दे अग्गे हाल फोलिये दिल दे
शेरां वाली दे दरबारों , मंगे मनोरथ मिलदे -----  दर्शन मइया दा
@मीना गुलियानी




मंगलवार, 19 सितंबर 2017

अरमाँ पूरे नहीं होते

           कभी ख़ुशी पाने की आशा
           कभी है गम की निराशा
           कुछ खोके पाने की आशा
           यही है जीवन की परिभाषा

इंसानियत आदमी को इंसान बना देती है
लगन हर मुश्किल को आसान बना देती है
सब लोग यूँ ही मंदिरों में नहीं जाते हैं
आस्था पत्थरों को भी भगवान बना देती है

कभी मेहनत करने पर भी सपने पूरे नहीं होते
इससे निराश न होना कभी हम अधूरे नहीं होते
जुटाओ हिम्मत बढ़ो आगे छू लोगे आसमाँ भी
बिना लहरों  से टकराए अरमाँ पूरे नहीं होते
@मीना गुलियानी


रविवार, 17 सितंबर 2017

चैन न दिल को आए

तुम बिन न लागे जिया
अब तक काहे न आए

काहे बसे परदेस बलमवा
बिसरे तुम मोरा अँगनवा
कासे कहूँ अब कैसे रहूँ मैं
बिरहा तेरी जो सताए

ऐसे बेदर्दी से नाता जोड़ा
जिसने मेरे दिल को तोडा
बिसर गया मोको हरजाई
जाके देस पराए

छाये हैं चहुँ ओर अँधेरे
कैसे होंगे अब ये सवेरे
प्रीत मेरी ठुकराके तूने
दर्द भी मोरे बढ़ाए

अब छाये बादल मतवाले
 दिल को बोलो  कैसे संभाले
प्रीत अधूरी गीत अधूरे
चैन न दिल को आए
@मीना गुलियानी

बुधवार, 13 सितंबर 2017

स्मृति पलकों में बन्द रहती है

तुम्हारी स्मृति पलकों में बन्द रहती है
मुझसे वो बातें चन्द करती ही रहती है

कभी पलकों में ये मुस्कुराती है
कभी कभी अश्क भी बहाती है
जाने क्यों फिर भी तंग रहती है
दिल में इक जंग जैसे रहती है

तुमको ये हाले दिल बता देगी
पूछोगे गर तो ये पता देगी
मुझसे शायद नाराज़ रहती है
तभी ये कुछ उदास रहती है

कभी तो हौले से गुनगुनाती है
कभी थपकी देके भी सुलाती है
दिल के हर राज़ बयां करती है
मन में शायद सबसे डरती है

कभी ये लोरियाँ सुनाती है
कभी रूठूँ तो ये मनाती है
कभी आसमाँ से उतरती है
कभी ज़मीं पे पग धरती है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

चिरनिद्रा में सो लेने दो

तुम आज मुझे सो लेने दो
चुप चाप मुझे रो लेने दो
बरसों से सुख से सो न सका
चिरनिद्रा में सो लेने दो

क्या सोचा था और क्या पाया
दिल जाने कहाँ मुझको लाया
लहरों ने थपेड़े मुझको दिए
अब चाके गरेबाँ सीने दो

क्या क्या न सितम मुझपे टूटे
इक साथ तेरा तब पाया था
तूने भी भटकने को छोड़ा
अब मुझको सुकूँ से जीने दो

होठों तक आते आते भी
क्यों नाम तेरा न ले पाता
दिल रोता है पीड़ा से मगर
चुप चाप ये आँसू पीने दो
@मीना गुलियानी 

रविवार, 10 सितंबर 2017

ख्वाबों में मेरे आया करो

आ जाओ बारिश में थोड़ा भीग लें
इतना भी हमसे शर्माया न करो

चाँदनी बिखरी तेरे तब्बसुम पर
अपने जलवों को न छिपाया करो

दर्द जिंदगी भी कितना देती है
इसे आँसुओ में न बहाया करो

कुछ तुम्हारे लब खामोश रहते हैं
कभी खुलके तो मुस्कराया करो

जिंदगी वादों पे गुज़र जाती है
अपनी नज़रें न यूँ चुराया करो

हमसे इतना भी दूर मत जाओ
कभी ख्वाबों में मेरे आया करो
@मीना गुलियानी


गुरुवार, 7 सितंबर 2017

आज किसी ने चुपके चुपके

छेड़ दिया है मन वीणा का तार किसी ने चुपके चुपके
गीत से दिल गुञ्जार किया है चोरी चोरी चुपके चुपके

दिल को दिए हैं मीठे सपने
कुछ हैं पराये कुछ हैं अपने
वीणा का झंकार किया है
आज किसी ने चुपके चुपके

जानी मैंने  नैनो की भाषा
जागी फिर जीने की आशा
दिल को फिर गुलज़ार किया है
आज किसी ने चुपके चुपके

प्रीत को दिल में किसने जगाया
मृतप्राय को जीवन्त बनाया
स्पन्दन दिल में फिरसे किया है
आज किसी ने चुपके चुपके
@मीना  गुलियानी


मंगलवार, 5 सितंबर 2017

उन्नत पथ पर ले जाए कौन

बढ़ती जा रही हैं विडंबनाएँ
उनसे हमें  उबारे अब कौन
किनसे हम उंम्मीद लगाएं
सपने हमारे सँवारे कौन

सारी संवेदनाएँ सूख चली हैं
हृदय की भावना सिमट चली है
दिग्भ्रमित पीढ़ी हो चली है
राह सही बतलाये अब कौन

टूटी हैं मर्यादा आंतक का उत्पात मचा
अंधविश्वास से हरसू कोहराम मचा
अजब के गोरखधंधों में इंसान फंसा
संकट गहराया इतना उबारे अब कौन

है भरोसा युवा पीढ़ी पर आगे वो ही आएँ
धरती की उर्वरता को वो ही लहलहाएं
उनकी ही कर्मठता से बढ़ेंगी संभावनाएं
देश को अब उन्नत पथ पर ले जाए कौन
@मीना गुलियानी

शनिवार, 2 सितंबर 2017

घुट घुट के न मर जाऊँ

टूटी  है वीणा टूटी है आशा
व्यथित मन की हूँ परिभाषा
बोलो गीत मैं कैसे गाऊँ
कैसे मै  अब मुस्काऊँ

कब जाने ये बंधन टूटा
जाने क्यों तू मुझसे रूठा
जोड़ूँ कैसे मैं टूटे रिश्ते
कैसे दिल को धीर बँधाऊँ

सारे अपने छूट गए हैं
 रिश्ते नाते टूट गए हैं
अपने पराये से लगते हैं
किसको मैं मीत बनाऊँ

आसमान  से टूटे तारे
बिखरे हैं बनके अंगारे
सुलग रहा है मन मेरा
जाने क्यों मैं अकुलाऊँ

हाल कोई तो पूछे मेरा
काश कोई तो होता मेरा
किसे दिखाऊँ दिलके छाले
घुट घुट के न मर जाऊँ
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

तुम न होते तो क्या होता

कभी कभी मैं सोचती हूँ
तुम न होते तो क्या होता
न दिल का सुकूँ खोता
न यूँ उदास ये होता

            न नज़रों के बोल हम सुनते
            न सपने नए रोज़ बुनते
             न कभी फूल मुस्काते
             न भँवरे ये गुनगुनाते

न चिड़िया ये चहकती
न हवाएँ यूँ बहकती
न घटाएँ आँसू बहाती
न कलियाँ यूँ मुस्काती

           न आता मदमस्त वो सावन
           न फूलों से महकता गुलशन
          न दिल गुलज़ार ये होता
          न तुमसे प्यार यूँ होता

न दिल में अरमां होते
न आँख में आँसू होते
न होती हमें बेकरारी
न दिल को होती लाचारी

          न कल कल झरने बहते
          न हम तुम ऐसे मिलते
         न चमन में फूल यूँ खिलते
         न खुशियों के पल मिलते
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 30 अगस्त 2017

जाने कब परदेसी आये

ये साँसों की डोर न पड़े कमज़ोर
इक बार तो मुख दिखला जाना
बात जोहती हैं आँखे सूने हैं कोर
दिल मेरा ज़रा सा बहला जाना

                 कोयल कूकना है भूली मैना रास्ता भूली
                 भूली चिड़िया रानी अब तो चहकना
                 भूले भँवरे अपनी गुंजन भूले बहकना
                 कलियाँ सुध बुध में भूली हैं खिलना

तुम बिन बिरहन कल न पाती
भेजी लिख लिख तुझको पाती
कब आओगे इस देस लिखना
परदेसी न तड़पाओ अब इतना

                आवे बिरहन को फिर चैन
                पोंछे भर भर अपने नैन
                बैठी पथ पे आँख बिछाए
                 जाने कब परदेसी आये
@मीना गुलियानी


सोमवार, 28 अगस्त 2017

सब्र की इन्तहा कहाँ तक है

न पूछ मुझसे सब्र की इन्तहा कहाँ तक है
तू ज़ुल्म कर ले तेरी हसरत जहाँ तक है

न पूछो मुझसे ये नज़रें क्या ढूँढती रहती हैं
पूछो इनसे ये खुद से भी ख़फ़ा कहाँ तक हैं

आये ख्याल उनके तो आँखों में सिमट गए
मालूम न था इनको मुरव्वत कहाँ तक है

हुए मशहूर तुम तो हम भी मसरूफ हो गए
अब पता चला हमें तेरी शौहरत कहाँ तक है

काँधे पे ज़नाज़ा खुद का तलाशते राहबर को हम
किससे पूछे पता उसका जहाँ फैला कहाँ तक है
@मीना गुलियानी 

रविवार, 27 अगस्त 2017

संतप्त मन को शांत कर जाओ

आज तुम मेरे हृदय में बस जाओ
 अतृप्त मन पे  करुणाजल बरसाओ

थम जाए भावों का क्रन्दन
विचलित न हो फिर ये मन
तुम फुहार बनके बरस जाओ

नवांकुर फूटने लगा धरा पर
थामो हाथ मेरा बनो हमसफ़र
मन मेरा तुम आज हर्षाओ

कैसी विहंगम दृष्टि तूने डाली
कूकी है देखो कोयल ये काली
मन मयूरा नाचे  साज़ बजाओ

संध्या भी देखो तारों को लाई
धानी चुनरिया मोरी लहराई
संतप्त मन को शांत कर जाओ
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

धड़कन कैसे सुन पाओगे

बोलो तो ज़रा मेरे अन्तर्मन कितना मुझको तड़पाओगे
कब तक मैं जिऊँ चुप रहके कब तक मन को बहलाओगे

हर पीड़ा मुझसे पूछती है ये कलियाँ क्यों मुझसे रूठी हैं
तुम जानते हो इनकी भाषा मेरी तो हिम्मत टूटी है
अब तक तो जिए हम घुट घुट के कितना और सताओगे

मैं भूल गई प्यारे सपने गुम हो गए सब जो थे अपने
मोती की माला बिखर गई जिनमें गूँथे थे हर सपने
अब कैसे गाऊँ गीत नए सुर कैसे तुम सुन पाओगे

न साज बजाया जा सकता न गीत कोई दोहरा सकता
अब तुम ही बताओ कैसे अपना दिल मैं बहला सकता
साँसे भी अब थमने को है धड़कन कैसे सुन पाओगे
@मीना गुलियानी

सोमवार, 21 अगस्त 2017

घड़ी हुई जग जाने की

समय परिवर्तनशील बना  है घड़ी हुई जग जाने की
अपनी क्षमता को पहचानो बात यही समझाने की

सब स्वार्थ के पुतले यहाँ हैं मन में कितनी कटुता है
अपनापन भुलाया सबने मानव मूल्य न दिखता है
हिम्मत अपनी आज जगाओ उन्हें मार्ग पर लाने की

आज की पीढ़ी को तुम देखो कितनी दलदल में है धँसी
हर तरफ है अनाचार दुष्प्रवृति के जाल में है ये फँसी
तुमसे ही  आशाएँ हैं इनको सन्मार्ग दिखलाने की

तुम भारत माँ के सपूत हो कर  सकते हो काम बड़ा
उस जननी का मान बढ़ाओ जिसको तुमपे नाज़ बड़ा
है ज़रूरत आज हमें है  गुमराह को राह पे लाने की
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

पथ की ऐसी करें तैयारी

आज की नारी में ऊर्जा का भारी संचार हुआ
नई चुनौती की तैयारी हेतु इसको है चुना
युगों से सुप्त जन सत्ता भी आज है जागी
धर्म कर्म की सत्ता में है इसकी भागीदारी

काम नहीं आसान बहुत लहरों से टकराना
है चुनौतीपूर्ण पर तनिक न तुम घबराना
सतत साधना बुद्धिबल से साहस बढ़ाएँ
युग निर्माण में जुड़ें हम ऐसा कदम बढ़ाएँ

वैर भाव मिटा दें सारे हर कटुता बिसरा दें
जन जन के मानस  में आशादीप जलादें
रोक न पाए कोई भी अक्षमता या लाचारी
हर अवरोध मिटादें पथ की ऐसी करें तैयारी
@मीना गुलियानी 

रविवार, 13 अगस्त 2017

गम रहेगा क्यों फासले मिले

जिंदगी की तलाश में जब हम निकले
जिंदगी तो मिली नहीं तजुर्बे बड़े मिले

दोस्तों से जब हम  मिले तो  पता चला
जिंदगी में रौनक के उनसे थे सिलसिले

जिंदगी मेरी एक रंगमंच बनकर रह गई
टूटते पुर्जे जुड़ने का नाटक करते हुए मिले

जलने वालों की इस जहाँ में कोई कमी नहीं
बिना तीली सुलगाये दिल जलाते हुए मिले

शीशा और पत्थर बनकर संग रहे दोनों
अब बात कुछ और है टकराते हुए मिले

जिंदगी के कई  ख़्वाब अधूरे पड़े रहे
हर लम्हा गम रहेगा क्यों फासले मिले
@मीना गुलियानी


बुधवार, 9 अगस्त 2017

सन्देश ये तुमको देती है

तेरी आँखों से बहता जल
बूँद बूँद इक मोती है

नदिया की धारा भी देखी
सागर  से वो मिलती है
पर किसी की याद में तेरी
आँख रात भर रोती है

नीम खेजड़ी की शाखाएँ
कितनी ही गदराई हैं
चकवी चकवे की याद में
आँसू से मुख धोती है

नया सवेरा फिर आएगा
डूबा सूरज उग जाएगा
हर पत्ते पर ओस की बूँदे
सन्देश ये तुमको देती है
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 5 अगस्त 2017

सर अपना झुकाने लगे हैं

बिना पिए ही कदम लड़खड़ाने लगे हैं
राहों में फिर से डगमगाने लगे हैं

बहारें तो आई थीं कुछ दिल पहले
ख़ुशी दिल में आई हम भी बहले
गुलिस्तां के फूल मुरझाने लगे हैं

सोचा था क्या हमने क्या हो गया है
यकीं जिसपे था बेवफा हो गया है
दिल तसल्लियों से बहलाने लगे हैं

जिए हम अधूरे रहे हम अकेले
जाने कहाँ छूटे खुशियों के मेले
सपनों के फूल बिखराने लगे हैं

करूँ मैं दुआ गर उसको कबूल हो
गुनाह माफ़ करदे जो उसे मंजूर हो
सज़दे में सर अपना झुकाने लगे हैं
@मीना गुलियानि


सोमवार, 31 जुलाई 2017

कैसे सपने साकार करूँ

कबसे समाया तू मेरे मन में
कैसे इसका इज़हार करूँ
दुविधा के ऊँचे पर्वत को
कैसे  मैं अब पार करूँ

जीवन के पथ की ये देहरी
हर दम आती यादें तेरी
प्रीत की उलझी भंवरों से
कैसे तुम बिन आज तरूं

तेरे बिना हम हुए अधूरे
मिले तुम सपने हुए पूरे
इक डोरी से दोनों जुड़े
कैसे सपने साकार करूँ
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

नाचें और गुनगुनाएँ

शाम है कोहरे में डूबी हुई
समुद्र का किनारा वीरान है
आओ हम तुम गीत गाएँ
जगमगाएँ उदास साँझ है

                       मिल बैठ कर लें मौसम की आहट
                       ठण्डे रिश्तों में भरदें गर्माहट
                      कटुता खत्म करें जी भर जी लें
                      दिल से दिल बात करे होंठ सी लें

जो भी हों शिकवे बिसराएँ सारे
तोड़के लायें आसमाँ से तारे
गहराने लगी शाम कंदीले जलाएँ
आओ झूमें नाचें और गुनगुनाएँ
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 26 जुलाई 2017

फिर से ज़रा आज जगमगाओ

आज तुम आँसू मत बहाना
दर्द को भी समीप मत लाना
आज तुम केवल मुस्कुराना
मत बनाना कोई भी बहाना

लहरों का ठहराव कहाँ होता है
जिंदगी को भी चलना होता है
उलझने भटकाव आते जाते हैं
समय की नाव को खेना होता है

पतझड़ हमें कहाँ सुहाता है
लेकिन वसन्त गुनगुनाता है
गर्मी में सूरज तमतमाता है
सर्दी में वही मन को भाता है

आज भूलकर कड़वे पलों को
जीवन में फिर प्रीत जगाओ
ढलती हुई जीवन की शाम को
फिर से ज़रा आज जगमगाओ
@मीना गुलियानी




शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

साये से बिछुड़ जाना है

जिंदगी इक सफर है चलते ही जाना है
जीवन है जिम्मेदारी उसको निभाना है

कभी पाई ख़ुशी कभी मिला हमें गम
कभी खाई ठोकर जहाँ चूके थे हम
लेकिन हँसते हँसते सब सहते जाना है

मर मरके भी हम पूछो कैसे जिए
कितने रोये थे हम कितने आँसू पिए
अश्कों को दी कसम न बाहर आना है

दोस्त दुश्मन बने पराये अपने बने
जिनपे हमको गुमां था वो कातिल बने
तन्हाइयों में साये से बिछुड़ जाना है
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

यादों का वो सिलसिला

आज ख़ुशी के मारे उसकी चीख जो निकली
लगा जैसे आसमां से कौंधी हो बिजली
तेरे आँचल को लहरा के पवन हँसके निकली
बरखा की बूंदे तेरे मुखड़े से झूमके निकली

बहारें गुनगुना उठीं पायल झनझना उठी
गीत ले  बहारों के तितलियाँ मुस्कुरा उठी
फूलों से महके गुंचे तमन्नाएँ खिलखिला उठी
हथेलियों से मुँह छिपाए अदाएं झिलमिला उठी

सितारों की कायनात सजी चाँद दूल्हा सजा
रात की तन्हाइयों में रजनी का मुख सजा
सिहरते ,दुबकते ,बादलों का देखो चला काफिला
शर्माते , सकुचाते थमा यादों का वो सिलसिला
@मीना गुलियानी

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

अकेले मन घबराता है

आज फिर दिल मेरा उड़ा उड़ा जाता है
खुशियों का लेके पैगाम कोई आता है

हवा में संदली दुपट्टा जब लहराता है
खुशबू से तन मन मेरा महका जाता है

गेसुओं की लटें  माथे पे बल खाती हैं
सर्पिणी सी बन हवा में वो लहराती है

तेरे तब्बसुम से चाँद भी शर्मा जाता है
बादलों को भी देखके पसीना आता है

बौछारें बनके वो मुझपे बरस पड़ती हैं
रिमझिम सी टिप टिप बूँदें पड़ती हैं

ऐसा मौका कहाँ रोज़ रोज़ आता है
चले भी आओ अकेले मन घबराता है
@मीना गुलियानी


बुधवार, 5 जुलाई 2017

औंधे मुँह गिर पड़ा

अक्स अपना देखने को मन मेरा था जब करा
झील पर पहुंचा तो देखा उसका पानी था हरा

                  सोचा था तन्हाई ही है मेरे जीने का सबब
                  उसको मिलने पर सोचा तन्हा मै क्यों रहा

अपनी बर्बादी के गम से दिल बहुत मेरा भरा
मेरे जिस्म का साया मुझसे इस कदर है डरा

                    थे बुरे हम पर खुद को ही समझा खरा              
                   डूबा दिल का सफीना औंधे मुँह गिर पड़ा
@मीना गुलियानी