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रविवार, 31 मई 2020

जून तुम्हारा स्वागत है यहाँ

जून तुम्हारा स्वागत है यहाँ
दिल की उमंगें हैं सब जवां
सुनलो दिल की तुम दास्तां
फूलों से महकती हैं घाटियाँ
दिल चुराती हैं तेरी मस्तियाँ
रंग भरे फूलों भरा गुलिस्तां
किसको अब होश है यहाँ
बिन पिए मदहोश सब यहाँ
सारा दुःख भूले हम हैं यहाँ
सुरम्य वातावरण है यहाँ
@मीना गुलियानी

रेत पर लिखा था कुछ

रेत पर लिखा था कुछ
वो पढ़ा न गया मुझसे
मिटा डाला लहरों ने उसे
 कोई कैसे पूछे तो उनसे
बता दिया कौन समझेगा
कैसे ये राज़ वो जानेगा
क्या है सबब  पहचानेगा
क्या ये प्रीत की कहानी है
रेत पे कोई बेजुबानी है
किसी की दास्तां पुरानी है
गर समझो तो समझाना
राज़ क्या है मुझे बताना
@मीना गुलियानी


खर्च कर दिया खुद को

खर्च कर  दिया खुद को
कुछ भी न मिला मुझको
यूँ वीरानों में भटकना पड़ा
तन्हाईयों में बसना पड़ा
खामोशी की सदा ही मिली
कोई ख़ुशी भी न हमें मिली
दिल को सदा बेकली मिली
आता याद हमको वो जमाना
हो सके तो तुम लौटा लाना
@मीना गुलियानी


बदलते ठिकाने -कहानी

आपने अक्सर सड़कों पर खासतौर पर रैड लाइट होने पर कुछ बच्चों को हाथ में अगरबतियाँ , खिलौने ,गुब्बारे लेकर कार के आस पास या यूँ ही पैदल चलने वालों के पास भी जाते हैं।   मुझे उनको देखकर इस बात पर ख़ुशी होती है कि ये लोग कम से कम भीख तो नहीं मांग रहे हैं।  वो आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं।  तभी तो वो लोग  सामान बेचकर पैसे कमाते हैं।  शायद कुछ स्वयं सेवी संस्थाएँ ऐसे लोगोँ से जुड़ी हैं।  एक बच्चे जिसका नाम रामू था वो ऐसे ही जब कार रोकी थी तो गुब्बारे और खिलौने उठाके ले आया।  मुझसे बोला- दीदी आप गुब्बारे ले लो चाहे कोई खिलौना खरीद लो।  आज बहुत भूख भी लगी है मेरी कोई बोहनी भी नहीं हुई है।   दस रूपये में गुब्बारा और पचास रूपये में छोटी कार बेच रहा था।  मैंने वो दोनों चीजें खरीद लीं जबकि मुझे उनकी कोई आवश्यकता नहीं थी।  रामू बोल रहा था -दीदी आप बहुत अच्छी हो भगवान आपकी मदद करेगा। 

  उस दिन मेरा एक टेण्डर पास होना था जो ईश्वर की कृपा से हो गया। ईश्वर भी तो बच्चों के निष्कपट दिल में बसता है।    मुझे लगता है कि इन बच्चों को ऊपर उठने में हमें भी सहयोग उनका सामान खरीद करके कर सकते हैं।  रामू से पता चला था कि कोई आकर उन्हें ये वस्तुएँ बेचने को दे जाता है।   उसने हमसे भीख न माँगने की कसम ली है। पहले तो हम सब जो भी फुटपाथ पर आपको दिख रहे हैं सब भीख माँगते थे।  पर अब सामान बेचकर जो पैसे मिलते हैं उसमें से कुछ पैसे वो सामान के काटकर बाकी पैसे हमको लौटा देता है और दूसरे दिन के लिए वो और सामान दे जाता है।   इस प्रकार मुझे भी उससे यह जानकर अच्छा लगा कि मेहनत से कमाकर वो लोग अपना गुज़ारा करते हैं। 

रामू जैसे और भी कई बच्चों ने यही बताया।  फिर मैंने उनसे पूछा कुछ पढ़ते लिखते भी हो या नहीं।  रामू ने जवाब दिया- दीदी मैं और मेरा छोटा भाई टिंकू तो सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते हैं।  स्कूल से ही हमें एक ड्रैस पहनने को मिल जाती है और खाना भी स्कूल से मुफ्त मिलता है।   एक गुरूजी वहाँ आकर स्कूल वालों से पूछते रहते हैं।  कोई भी गरीब बेसहारा होता है तो उसकी मदद करते हैं। गुरूजी तो उन बच्चों का नाम लिखकर ले जाते हैं।  फिर वो स्कूल में पैसे भेज देते हैं।   पहले  तो जब भीख मांगते थे तब हम लोग अपने ठिकाने बदलते रहते थे।  क्योंकि पुलिस वाले भी हमें पीटते थे।   कभी कभी तो कुछ लोग हम लोगों को जेल में बंद कर देते थे पता नहीं क्यों। लेकिन अब हम लोग भी इज्जत से जीवन गुजारते हैं। मेहनत करते हैं और अपना पेट पालते हैं। 

तबसे मैं भी कभी कभी उधर से गुजरते हुए उनके साथ किसी का जन्मदिन हो , त्यौहार हो खुशियाँ बाँटती हूँ। उनके चेहरे पर जो सुकून ख़ुशी देखती हूँ तो मेरा मन भी बहुत ख़ुशी से भर जाता है।  इन गरीबों का सहारा बनने की कोशिश करती हूँ।  रामू को कभी उसके भाई के लिए भी स्कूल ले जाने के लिए कॉपी ,पेन्सिल,रबर,स्केल आदि देती रहती हूँ। कभी आप भी किसी की सहायता करें तो पायेंगे खुशी आपको मिल रही है। इनका कोई घर तो नहीं है इसी फुटपाथ पर ही सड़क के किनारे जिंदगी गुजारते हैं।  जहाँ इनका मुक़ददर ले जाता है वहीं अपना ठिकाना आसमां के नीचे बसा लेते हैं। 
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 30 मई 2020

निभाना पड़ेगा

जिंदगी कैसी भी हो निभाना तो पड़ेगा
चाहे हँसी मिले या गम गाना तो पड़ेगा
चाहे हो गम के अँधेरे बादल घोर घनेरे
कर  विश्वास तू उस पर होंगे तेरे सवेरे
 जिंदगी प्रेम सागर , दुख की गागर है
करके विषपान तुझको मुस्कुराना पड़ेगा
जिंदगी इक पहेली भी है ,सहेली भी है
बढ़ा दोस्ती अब  इसको निभाना पड़ेगा
बाँसुरी की तरह इसके सुर सजाना पड़ेगा
@मीना गुलियानी 

सारा रंग बिखर जाता है

सारा  रंग बिखर जाता है
तू नहीं कहीं नज़र आता है
दिल ये देख के घबराता है
घोर अँधेरा सा छा जाता है
संकट में दिल घिर जाता है
आँखों में तू सिमट जाता है
दिल को सुकूँ  आ जाता है
इंद्रधनुष सा बन जाता है
@मीना गुलियानी 

करोना-कहानी

 आजकल पूरा विश्व करोना संकट से जूझ रहा है। पहले से कहीं ज्यादा स्थिति विकट होती जा रही है।   भारत में तो इसे नियंत्रण में करने के लिए लाक डाउन भी कभी कभी सप्ताह भर कभी 21 दिन फिर बढ़ाते जाते हैं। अब 31  मई तक का है।  इससे मजदूरों पर भारी संकट है वो लोग दाना पानी का जुगाड़ करने में भी सफल नहीं हो पा रहे हैं।  कुछ दिहाड़ी के मजदूर तो पलायन कर गए।  कितने ही मर गए। सरकार ने भी करोना से निपटने हेतु बहुत से राहत पैकेज भी घोषित किये हैं लेकिन पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। 

 डाक्टर , नर्स , सफाईकर्मी सभी दिन रात मरीज़ों की सेवा में जुटे हुए हैं।  न तो उन्हें दिन का पता है न रात का दिन रात मरीजों के लिए न्यौछावर  कर दिया। उनकी फैमिली भी है उसे अपना समय नहीं दे पाते हैं।  कुछ लोग तो सप्ताह भर से घर का मुँह तक नहीं देख पाए।   पुलिस भी अपना पूरा सहयोग दे रही है।  कुछ ज्यादा संवेदनशील इलाकों में भीड़ नहीं होने देती है।  जहाँ कर्फ्यू लगा होता है वहाँ तो पूरा रास्ता ही रोक दिया जाता है जो कहना नहीं मानता तो डंडे बरसाए जाते हैं। 

इन दिनों कुछ समाजसेवी संस्थाएँ भी मदद को जुडी हैं जिन्होंने मुफ्त में भोजन की व्यवस्था इन असहाय लोगों के लिए की है।  गुरुद्वारों में लंगर दिया जा रहा है।  देव दर्शन इन दिनों बंद है। यातायात भी पूरी तरह से ठीक होने में वक्त लगेगा।   धीरे धीरे लॉक डाउन खुलने पर हवाई जहाज़ , रेल, बसें चलाई जायेंगी। कुल मिलाकर इसी निष्कर्ष पर हम पहुँचते हैं कि इसमें पूरी स्थिति सम्भलने में वक्त लगेगा।   तब तक समाज में सभी एक दूसरे से कम से कम एक मीटर की दूरी में रहे और मास्क भी जब जरूरी हो लगाए।   हाथों को बार बार धोता रहे सेनिटाइज़र का प्रयोग करे।  सफाई और खानपान सही हो।  पानी भी गुनगुना पिए व् गरारे करे।  ऐसा करने से भी काफी बचाव हो सकता है।   घर में रहें सुरक्षित रहें। सरकार की तरफ से आरोग्य सेतु एप भी चलाई गई है जिससे कोई भी व्यक्ति खुद ही अपना परीक्षण कर सकता है।   गंभीर हालत होने पर फोन करने से एम्बुलेंस से उसे अस्पताल पहुँचाया जाता है। धीरे धीरे कुछ ऑफिस खुलने लगे हैं कुछ दुकानें भी खुलने लगी हैं। पूरी हालत तो सुधरने के लिए वक्त लगेगा। 
@मीना गुलियानी 

जाया हो जाते हैं हम

जाया हो जाते हैं हम
तो कुछ लोग टूट जाते हैं
कुछ खुद को नक्कारा
समझकर बिखर जाते हैं
कुछ फिर से उम्मीद से
जीवन में उमंग भरते हैं
फिर से नए  जीवन को
फिर से आरम्भ करते हैं
@मीना गुलियानी

एक अरेंज्ड विवाह - कहानी

एक अरेंज्ड विवाह में मुझे शामिल होने का मौका मिला।   आजकल इसका प्रचलन करीब 60 -70 प्रतिशत ही रह गया है।  अधिकतर लोग प्रेम विवाह करते हैं या मैरेज ब्यूरो द्वारा करते हैं।  अरेंज्ड विवाह में पुराने जमाने में तो यह काम नाई  या पंडित लोग किया करते थे।  वो वर पक्ष या कन्या पक्ष दोनों के लिए वर या वधू का प्रस्ताव लाते थे।  घर के बड़े बुजुर्ग सभी सहमति देते थे तो जन्मपत्री का कुंडली का मिलान होता था।   कुछ लोग पैसे भी पंडित जी को खिला देते थे ताकि वो जजमान से कहे कि 24 गुण मिल रहे हैं तो रिश्ता पक्का हो जाता था। फिर लड़का लड़की को दिखाने का प्रोग्राम होता था जो स्कूल परीक्षा की तरह होता था पास या फेल। उसके बाद सगाई पक्की होती थी फिर शादी का महूर्त निकाला जाता था।  कुल मिलाकर पाँच या छः  महीने का समय लग जाता था।   आजकल पंडित जी ज्यादा समय नहीं लगाते हैं पहली बार में ही वो जन्मपत्री वर वधू आदि सब परिवार के सामने बुला लेते हैं फिर हाथों हाथ ही रिश्ता ओके कर दिया जाता है।

हमारे मित्र के साले का अरेंज्ड विवाह का निमन्त्रण पत्र प्राप्त हुआ था।  हम वहाँ गए।  अभी दूल्हे को तैयार करके घोड़ी पर बैठाना था फिर बैंड बाजा लेकर कन्या के घर जाना था।   दूल्हे को सेहरा पहनाया गया ,शेरवानी पहनाई ,गले में रुपयों की मालाएँ भी डाल दीं।  अब उसे घोड़ी पर बैठाकर पहले मंदिर ले जाया गया।  उसके बाद सारे बाराती इकट्ठे होकर दूल्हे की घोड़ी के आगे बैंड की धुन पर नाचने लगे।   इस समय तो जिसको नहीं भी आता वो भी थोड़ा हाथ पैर चला ही लेता है। कई परिवारों के लोग ऐसे समय में मदिरा पान भी करते हैं जो उचित नहीं है। अब 7 बजे के स्थान पर 9 बजे तक ही नाचते कूदते लोग दुल्हन के मंडप पहुँचते हैं।  दूल्हे की आरती उसकी सास उतारती है और जीजा घोड़ी से नीचे उतारता है।  फिर तो जलपान की व्यवस्था होती है  तरह तरह के पकवानों के स्टॉल लगे होते हैं।  उसके बाद खाना होता है।  दूसरी तरफ दूल्हा दुल्हन की जयमाला होती है फिर वो भी खाना खाते हैं।  कुछ बाराती घर चले जाते हैं और कुछ लोग पूरी शादी करवाकर डोली लेकर ही जाते हैं।   हमने भी खाना खाया और फेरे चालू हो गए थे तो हम भी पुष्प वर्षा करने लगे।दुल्हन के पिता ने कन्यादान किया। दुल्हन की दूल्हे ने मांग भरी।   फिर विदाई का समय आया।  दुल्हन सभी से गले मिलकर रोई और उसे फिर दूल्हे की कार में बिठाकर कार को दूल्हे के घर के लिए रवाना किया।

घर पहुँचकर दूल्हे की माँ ने दोनों की आरती उतारी और दुल्हन का गृह प्रवेश हुआ। फिर कुछ पूजा हुई और एक परात में थोड़ा दूध , फूल और पानी डालकर उसमें एक अँगूठी डाली गई और दुल्हन और दूल्हे को कहा गया जो पहले अँगूठी खोज लेगा वो जीतेगा और वो ही पूरी जिंदगी भर हावी रहेगा। इस गेम में बहुत मज़ा आता है। अब शादी तो हो गई जो लोग दूर से आते हैं उन्हें मिठाई कपड़े आदि देकर विदा किया जाता है।  सुबह दुल्हन का भाई बहिन के साथ घर पर दूल्हे के साथ फेरा लगाने आते हैं।   इस प्रकार हमने भी अरेंज्ड विवाह का आनन्द लिया। इस तरह से शादी करने का बड़ा फ़ायदा यह भी है की दोनों परिवार वाले लोग शादी से पहले पूरी जाँच पड़ताल कर  लेते हैं कहीं  कुछ बात हो भी जाए तो आपसी रजामंदी से नतीजा सामने आ जाता है और संबंध टूटने से बच जाते हैं।  प्रेम विवाह में तो तलाक जल्दी हो जाते हैं।  कभी कभी सफल होते हैं।
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 29 मई 2020

उम्मीद के नादान परिंदे

ऐ मेरी उम्मीद के नादान परिंदे
तू हमेशा गगन में उड़ता रहे
होंसलों की उड़ान तू भरता रहे
हर मुश्किल आसान करता रहे
जीवन में उमंग तू भरता रहे
अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे
अपने सपनों को पूरा करता रहे
@मीना गुलियानी 

चार पंक्तियों की कहानी

एक था गुल और एक थी बुलबुल
दोनों प्यार से रहते थे
बुलबुल को एक सैयाद ने पकड़ा
 दीवाना गुल मुरझाया
@मीना गुलियानी 

आफ़ताब ढल गया बातों ही बातों में -कहानी

सुरेश और मीता आज पूरे एक सप्ताह बाद मिल रहे थे क्योंकि वो पेशे से डाक्टर थे और अलग अलग जगह पर उनकी ड्यूटी लगी हुई थी।   वो रात दिन करोना के मरीजों की देख रेख कर रहे थे।  करीब हफ्ते भर से घर पर भी न जा पाए थे।  न रात की नींद थी न दिन को आराम था वैसे ही कुर्सी पर बैठे बैठे झपकी ले लेते थे।  थोड़ी चाय ले लेते जब फ्री होते थे।   खाने का भी कोई निश्चित समय यहाँ नहीं था।   जब थोड़ा वक्त मिलता था उसी समय खा लेते थे।

सुरेश और मीता दोनों कालेज में साथ साथ ही एम बी बी एस  कर रहे थे।  पढ़ाई खत्म होते ही दोनों डाक्टर बन गए थे और अलग अलग अस्पताल में ड्यूटी लग गई थी।  जैसे ही एक दूसरे के पास समय मिलता था तो एक डोरी से खिंचे चले आते थे एक दूसरे से मिलने के लिए।    इस बार तो पूरा एक सप्ताह बीत गया बिना मिले। आज दोनोँ को अवकाश मिला था इसलिए उन्होंने घर की बजाए बाहर घूमने का सोचा।  पहले वो एक पार्क में गए वहीँ थोड़ी गप शप की पर मन नहीं भरा।

 वैसे भी लॉक डाउन का माहौल था तो सुरेश ने मीता से बोला चलो आज मेरे घर पर चलते हैं।  पहले फ्रेश हो जाते हैं फिर कुछ खाने पीने का साथ साथ मिलकर बना लेंगे। सुरेश ने कहा तुम लोग तो रोज़ घर पर खाना बनाती हो चलो आज मेरे हाथ का बना खाओ।  मेरा दावा है की अँगुलियाँ भी चबा जाओगी।   मीता कहने लगी - अरे वाह इतना भरोसा है खुद पर।  चलो देखते हैं कौन अच्छा बनाता है। दोनों ने एक एक डिश बनाने का सोचा।  सुरेश तो पनीर की सब्जी में माहिर था और मीता को दाल मखनी बनानी पड़ी।   वाकई में मजा आ गया मीता खाते हुई बोली।  सुरेश ने कहा - वह मीता तुमने भी दाल बहुत ही लाजवाब बनाई है।   एक एक कौर एक दूसरे के मुँह में भी डाल रहे थे। अब काफी का दौर चला। 

 सुरेश ने बोला मीता अब तुम्हारी शादी के बारे में क्या राय है।  क्या बुढ़ापे में शादी करोगी।  मैं तो चाहता हूँ तुम जल्दी से मेरे घर पर शादी करके आ जाओ तो तुम्हारे हाथों से बना हुआ खाना रोज़ ही खाऊं।  मीता बोली अब जब मैं अपने घर जाऊँगी तो ममी से बात करके बताऊँगी नहीं तो तुम ही उनसे बात करके पूछ लेना।  तुम्हारी बात कभी उन्होंने टाली है।   अब देखते ही देखते आफताब ढल गया था बातों बातों में।  सुरेश ने मीता से अगले रविवार के दिन उसके घर पर आने का बोलकर विदा ली।
@मीना गुलियानी 

किनारा कर लिया

किनारा कर लिया हमने
दुनिया के रीति रिवाज से
झूठे इसके अलफ़ाज़ से
सहेंगे न अब जुर्म कोई
टूटेगी न हिम्मत संजोई
डिग सकेगा न इमां हमारा
मुझे है इक तेरा सहारा
@मीना गुलियानी 

हो अगर दिल में प्यार

हो अगर दिल में प्यार तो
जिंदगी हसीं हो जाती है
ग़म कोसों दूर हो जाता है
खुशियों की बहारें आती हैं
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 28 मई 2020

अपने खालीपन को भरते

पहले हम तेरी यादों से ही
 अपने खालीपन को भरते
अब तुझको पाकर जीवन
हम नित नवीन हैं करते
चरणों में तेरे स्वर्ग निहित
यही हम महसूस हैं करते
 @मीना गुलियानी 

वो गुलाबी फ्राक वाली लड़की - कहानी

कुछ साल पहले हमारे पड़ौस में एक ईसाई धर्म को मानने वाले लोग रहते थे।   उनके दो छोटे छोटे बच्चे भी थे। एक बच्चा तो तीसरी कक्षा में पढ़ता था और बेटी पहली कक्षा में पढ़ती थी।   वो बिल्कुल गोरी थी गोल मटोल सुंदर सी आँखें चेहरे पे गुलाबी रंगत थी।   दूर से देखो तो पूरी गुड़िया सी दिखती थी।  जब वो हँसती थी तो उसके गालों में डिंपल पड़ते थे। उसके हँसने पर मोती जैसे दाँत भी चमकते थे।  ख़ुशी की फुलझड़ी जैसे किसी ने छोड़ दी हो ऐसे वो खिलखिलाकर हँसती थी।   सबको उसने अपनी बातों से लुभाया हुआ था।  शाम को हमारे पोते के साथ भी बॉल खेलने आ जाया करती थी।  कभी कभी बाहर पार्क में दोनों खेल लेते थे।  दोनों ही हमउम्र थे और एक ही स्कूल में पढ़ने जाते थे।  सुबह स्कूल वैन आकर ले जाती थी और दोपहर में छोड़ देती थी।  उनका बेटा भी उसी स्कूल में उसके साथ ही जाता था। 

रविवार के दिन वो लोग चर्च जाया करते थे।  उस लड़की का नाम लिली था और बेटे का नाम डेविड था।   पढ़ाई में दोनोँ बच्चे अच्छे थे।  डेविड चर्च में पियानो बजाया करता था जो उसने अपने घर पर ही एक ट्यूटर से सीखा था।    मेरा पोता ड्रम सीखता था और स्कूल के प्रोग्राम में बजाता भी था।  लिली बहुत सुंदर गाती थी उसे डान्स करने में भी रूचि थी। जब वो डान्स करती थी तो उसकी गुलाबी फ्राक गोल गोल फूल जाती थी।   यह फ्राक पहनकर तो राजकुमारी लगती थी।   उन्होंने क्रिसमिस के दिन हमको घर पर पार्टी के लिए बुलाया था।   हम सब उनके घर फूलों का बुके और बच्चों के लिए चॉकलेट लेकर गए थे।   उन्होंने खुद अपने हाथों से ही घर पर बहुत ही सुंदर ड्राईफ्रूट वाला बेनीला केक बनाया था जो उन्होंने बड़े प्यार से हमको खिलाया। उसके बाद से हम लोग हर त्यौहार उनके साथ मिलकर मनाने लगे थे। 

हमने भी दीवाली की  शाम को उनको बुलाया था।पहले हम लोगों ने दीवाली की पूजा की थी फिर शाम सात बजे वो लोग सपरिवार आये थे।   वो भी बच्चों के लिए मिठाई लाये थे।   सब बच्चों ने मिलकर खूब फुलझड़ी , पटाखे , जमीन चक्कर आदि आतिशबाजी छोड़ी।  उसके बाद हमने खाना खाया। पनीर की सब्जी और दाल मखनी सभी को अच्छी लगी।   मीठे पीले चावल भी बनाये थे उसमें ड्राई फ्रूट डाले थे।  हम सबने दीवाली का त्यौहार खुशी से मनाया था। उस रात को लिली ,डेविड और मेरे पोते ने मिलकर एक गाने पर डान्स भी किया था।उसके बाद से हम लोग हर त्यौहार उनके साथ मिलकर मनाने लगे थे।  

इन बातों को चार पाँच साल बीत चुके हैं पर लगता है वो आज भी यहीं कहीं हैं और उनकी बिटिया लिली अभी अंकल कहती हुई भागी चली आयेगी।   पाँच साल पहले उनका यहाँ से ट्रांसफर पूना हो गया था।   उनके फोन आते रहते हैं।   ऐसे ही कुछ मीठी मीठी लिली की बातें आज भी उसकी याद दिला जाती है।   वो सबकी नकल उतारने में भी माहिर थी। अब तो सब स्मृतियाँ ही हैं जो हमारे दिलों में उनकी याद बनाये हुए हैं। 
@मीना गुलियानी 

कम से कम

कम से कम तेरी मोहब्बत का  सहारा मिल जाता
अगर ये तूफान नहीं आता तो किनारा मिल जाता
बहुत दुःख झेले हैं हमने दूरी में तुझसे अब तक
न था  कोई आसमां था न कोई छत थी जमीं पर
चल रहे थे तन्हा और तन्हाई ही तो हमसफ़र थी
तुझसे बिछुड़ कर हमे अपनी कोई सुध बुध न थी
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 27 मई 2020

आओ मिलकर

आओ मिलकर इक दूजे की थाम ले बाहें
हम दोनों ही कदम अब आगे को बढ़ाएँ
जीवन तो इक गहरा सागर है हम दोनों
 पतवार थामके इक दूजे को पार लगायें
सुख दुःख को साथ सहेंगे वचन निभायें
@मीना गुलियानी 

अपना ख्याल रखना -कहानी

राजेश के लिए उसके गुड़गाँव हैड ऑफिस से मैनेजिंग डायरेक्टर का फोन आया कि इस सोमवार से ही उसे इन्दौर वापिस जाना होगा अपनी ऑफिस में जाकर ड्यूटी सम्भालने के लिए।   अभी तक तो वह अपने घर लॉकडाउन से पहले ही आया हुआ था।  उसके आते ही दो दिन के बाद से लॉकडाउन हो गया था।  तबसे ही राजेश अपने ऑफिस का काम घर से ही निपटा रहा था।   सारे पत्र व्यवहार सब घर में ही अपने लैपटॉप के द्वारा कर रहा था।   इन्दौर में वो डिप्टी मैनेजर की पोस्ट पर काम कर रहा था।    जयपुर में राजेश की बूढ़ी माँ , पत्नी और एक प्यारा सा बेटा रहता है जिनसे मिलने वो महीने में समय मिलने पर एक दो चक्कर लगा लेता था।  अब करीब डेढ़ माह से वो जयपुर से ही ऑफिस का काम देख रहा था क्योकि कोई भी फ्लाइट या ट्रेन इन्दौर के लिए अभी उपलब्ध नहीं थी।  अब तो उसे वापिस जाना ही था क्योंकि लॉक डाउन भी समाप्त हो चुका था और बॉस का फोन भी आ चुका था।   

उसने अपना जरूरी सामान और कुछ कपड़े आदि बैग में रखे और नीतू अपनी पत्नी से कहा सुबह 6 बजे की फ्लाइट से रवाना हो जाऊँगा।  मुझे घर से तो 5 बजे कैब से एयरोड्रम जाना होगा।  सुबह राजेश अपने समय के अनुसार उठ गया।   नीतू ने भी उसका हल्का फुल्का नाश्ता बना दिया था वो उसने खाया और कैब लेकर रवाना हो गया।  बेटा अभी सो रहा था  और नीतू बाहर दरवाजे तक छोड़ने आई थी। उसने राजेश को जाने से पहले ही कई हिदायतें भी दीं थीं।   6 मास्क सेनेटाइजर भी रख दिए थे।    कुछ भी बाहर से मत खाना ऐसा अनुरोध भी किया था।   लॉकडाउन के दौरान थोड़ा बहुत खाना उसने घर पर खुद बनाना भी सीख लिया था। यही सब उसके लिए अच्छी बात थी कि बाज़ार के खाने से बच सकता था।   

अब वो इन्दौर पहुँच चुका था ऑफिस की गाडी लेने के लिए आई थी।  उसमें बैठकर वो सीधा ऑफिस पहुँचा। सारे ही लोग एक दूसरे से काफी दिनों बाद मिल रहे थे।  सबके चेहरों पर ख़ुशी के भाव थे पर कोई भी शेक हेंड नहीं कर रहे थे।   करोना की वजह से सभी सोशल डिस्टेंसिंग को अपनाये हुए थे।  राजेश ने अपने केबिन में प्रवेश किया।   उसके कक्ष में खूब फाईल इकठ्ठी हो चुकी थीं।   धीरे धीरे उनको निपटाना शुरू किया।   लंच टाईम तक 15 फ़ाइल निपटा चुका था।   अब सब लोगों ने खाना खाया।  राजेश का खाना तो उसकी पत्नी ने पैक करके दिया था।  उसने वो खा लिया फिर एक कॉफ़ी पी फिर वापिस अपने काम में जुट गया। 

पूरा स्टॉफ उसकी कार्यशैली से प्रभावित था।   ऑफिस वाले बड़े सम्मान की दृष्टि से उसे देखते थे। राजेश की पत्नी ने सुबह से तीन चार बार उसका हाल चाल पूछने के लिए और अपना ध्यान रखने को बोला।   उसने बोला मुझे पता है कि तुम बिलकुल आराम नहीं करते हो।   इसलिए ही मुझे तुम्हारी  चिंता है।   काम के साथ आराम भी जरूरी है।  जयपुर में तो मैं तुम्हें देख लेती थी वहाँ तो अपना ख्याल खुद ही रखना होगा।  समय पर खाना खा लेना।   मास्क लगाकर ही किसी से बात करना इत्यादि सारी  हिदायतें फोन पर दे डालीं।   राजेश ने कहा -तुम आराम करो मैं पूरा ध्यान रखूँगा। पति पत्नी का संबंध ही कुछ ऐसा भगवान ने बनाया है कि दोनों एक दूसरे के  बिना नहीं रह सकते पर विपरीत परिस्थितियों में दूर बैठे बैठे ही उनका ध्यान एक दूसरे की सुरक्षा पर केन्द्रित रहता है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वो सबको खुशहाल रखे और इस महामारी से सबको बचाए। 
@मीना गुलियानी 

तुम समझते नहीं

प्यार की ये मूक भाषा तुम समझते नहीं
आँसुओं से लिखी गाथा तुम समझते नहीं
मोती की लड़ियों जैसे दिल को पिरो दिया
सांसों की सरगम की तारों को पिरो दिया
दिल की धड़कन बज उठेगी गूंजेंगे तार
राग छेड़ देंगे सुर ये सारे गायेगा संसार
@मीना गुलियानी