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Monday, 31 July 2017

कैसे सपने साकार करूँ

कबसे समाया तू मेरे मन में
कैसे इसका इज़हार करूँ
दुविधा के ऊँचे पर्वत को
कैसे  मैं अब पार करूँ

जीवन के पथ की ये देहरी
हर दम आती यादें तेरी
प्रीत की उलझी भंवरों से
कैसे तुम बिन आज तरूं

तेरे बिना हम हुए अधूरे
मिले तुम सपने हुए पूरे
इक डोरी से दोनों जुड़े
कैसे सपने साकार करूँ
@मीना गुलियानी 

Friday, 28 July 2017

नाचें और गुनगुनाएँ

शाम है कोहरे में डूबी हुई
समुद्र का किनारा वीरान है
आओ हम तुम गीत गाएँ
जगमगाएँ उदास साँझ है

                       मिल बैठ कर लें मौसम की आहट
                       ठण्डे रिश्तों में भरदें गर्माहट
                      कटुता खत्म करें जी भर जी लें
                      दिल से दिल बात करे होंठ सी लें

जो भी हों शिकवे बिसराएँ सारे
तोड़के लायें आसमाँ से तारे
गहराने लगी शाम कंदीले जलाएँ
आओ झूमें नाचें और गुनगुनाएँ
@मीना गुलियानी 

Wednesday, 26 July 2017

फिर से ज़रा आज जगमगाओ

आज तुम आँसू मत बहाना
दर्द को भी समीप मत लाना
आज तुम केवल मुस्कुराना
मत बनाना कोई भी बहाना

लहरों का ठहराव कहाँ होता है
जिंदगी को भी चलना होता है
उलझने भटकाव आते जाते हैं
समय की नाव को खेना होता है

पतझड़ हमें कहाँ सुहाता है
लेकिन वसन्त गुनगुनाता है
गर्मी में सूरज तमतमाता है
सर्दी में वही मन को भाता है

आज भूलकर कड़वे पलों को
जीवन में फिर प्रीत जगाओ
ढलती हुई जीवन की शाम को
फिर से ज़रा आज जगमगाओ
@मीना गुलियानी




Friday, 21 July 2017

साये से बिछुड़ जाना है

जिंदगी इक सफर है चलते ही जाना है
जीवन है जिम्मेदारी उसको निभाना है

कभी पाई ख़ुशी कभी मिला हमें गम
कभी खाई ठोकर जहाँ चूके थे हम
लेकिन हँसते हँसते सब सहते जाना है

मर मरके भी हम पूछो कैसे जिए
कितने रोये थे हम कितने आँसू पिए
अश्कों को दी कसम न बाहर आना है

दोस्त दुश्मन बने पराये अपने बने
जिनपे हमको गुमां था वो कातिल बने
तन्हाइयों में साये से बिछुड़ जाना है
@मीना गुलियानी 

Thursday, 20 July 2017

यादों का वो सिलसिला

आज ख़ुशी के मारे उसकी चीख जो निकली
लगा जैसे आसमां से कौंधी हो बिजली
तेरे आँचल को लहरा के पवन हँसके निकली
बरखा की बूंदे तेरे मुखड़े से झूमके निकली

बहारें गुनगुना उठीं पायल झनझना उठी
गीत ले  बहारों के तितलियाँ मुस्कुरा उठी
फूलों से महके गुंचे तमन्नाएँ खिलखिला उठी
हथेलियों से मुँह छिपाए अदाएं झिलमिला उठी

सितारों की कायनात सजी चाँद दूल्हा सजा
रात की तन्हाइयों में रजनी का मुख सजा
सिहरते ,दुबकते ,बादलों का देखो चला काफिला
शर्माते , सकुचाते थमा यादों का वो सिलसिला
@मीना गुलियानी

Friday, 14 July 2017

अकेले मन घबराता है

आज फिर दिल मेरा उड़ा उड़ा जाता है
खुशियों का लेके पैगाम कोई आता है

हवा में संदली दुपट्टा जब लहराता है
खुशबू से तन मन मेरा महका जाता है

गेसुओं की लटें  माथे पे बल खाती हैं
सर्पिणी सी बन हवा में वो लहराती है

तेरे तब्बसुम से चाँद भी शर्मा जाता है
बादलों को भी देखके पसीना आता है

बौछारें बनके वो मुझपे बरस पड़ती हैं
रिमझिम सी टिप टिप बूँदें पड़ती हैं

ऐसा मौका कहाँ रोज़ रोज़ आता है
चले भी आओ अकेले मन घबराता है
@मीना गुलियानी


Wednesday, 5 July 2017

औंधे मुँह गिर पड़ा

अक्स अपना देखने को मन मेरा था जब करा
झील पर पहुंचा तो देखा उसका पानी था हरा

                  सोचा था तन्हाई ही है मेरे जीने का सबब
                  उसको मिलने पर सोचा तन्हा मै क्यों रहा

अपनी बर्बादी के गम से दिल बहुत मेरा भरा
मेरे जिस्म का साया मुझसे इस कदर है डरा

                    थे बुरे हम पर खुद को ही समझा खरा              
                   डूबा दिल का सफीना औंधे मुँह गिर पड़ा
@मीना गुलियानी