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Monday, 29 February 2016

मैने तुझे सौंप दी


जिंदगी की डोर पिया आज तुझे मैने सौंप दी 

                   तू चाहे ले चल जिस ओर 
                   सूझे न कोई मुझे ठोर 
                   ये अपनी बागडोर 
                   मैने तो तुझे सौंप दी 

मेरा जीवन है भूलभुलैया 
दे दो अपने प्रेम  की छैंया 
किश्ती पड़ी है मंझधार 
पतवार तुझे सौंप दी 

                  सैंया तू है बड़ा चितचोर 
                  मेरा मन है बड़ा कमज़ोर 
                  दिल पे लगे न अब बाण 
                  कमान तुझे सौंप दी 

विश्वास तू उस पे करना


इस दिल में मची हलचल मन कहता अब तू सम्भल 
आगे है बड़ी दलदल कहीं फंसा तो मिलेगा न इक पल 

रे मनवा सम्भल सम्भल पग धरना दो पल यहीं ठहरना 
ऐ दिल तू ज़रा सम्भलना 

टेढ़ी मेढ़ी है जीवन की राहें है वीरान तुझको बुलाएं 
पर तू आगे कदम मत धरना 

करदे जीवन तू उसके हवाले वो ही हर मुश्किल से निकाले 
एक विश्वास उस पर तू करना 

आशा संचार दिए जाओ


ऐ मेरे हमराही मुझको बस यह विश्वास दिए जाओ 
कभी लौट के फिर तुम आओगे ये इकरार किये जाओ 

                       तुम बिन मन बहलेगा कैसे 
                       जब तुम आँखों से ओझल हो 
                      भावों के व्याकुल निर्झर में 
                     अपनी रसधार दिए जाओ 

तुम संबल और सहारा हो 
मेरे इस एकाकी पथ में 
इस पथ को कैसे काटूँगा 
आशा संचार दिए जाओ 

Sunday, 28 February 2016

इज़हारे बेबसी



तेरे इस हुस्न मुजस्सम पर 
कैसे न नज़र उठती मेरी 

                  इस मंज़र में गज़री उम्र मेरी 
                 जाने कब इनायत हो तेरी 

परवाह नहीं जलने की मुझे 
जले गर आशियाँ जो मेरा 

                कौंधे हज़ार बिजलियाँ तो क्या 
                करें इज़हार बेबसी का क्या  ?

अपरिचित


एक अपरिचित अनजाने से कितना मुझको मोह हो गया   
गाँव छोड़के जाने वाले उसको क्या तुम जान सकोगे

                  पल दो पल ही साथ हुआ था किन्तु बन गया जीवन नाता
                  साथी बोलो उस नाते की गहराई पहचान सकोगे

जिस तरुवर के नीचे हमने अरमानों के फूल खिलाए
उस उजड़े तरुवर की पीड़ा थोड़ी भी अनुमान सकोगे

                 थके पंथ के पंछी जैसा आ ही जाऊँ द्वार तुम्हारे
                 क्या विश्वास कि कल का बिछुड़ा साथी मान सकोगे

कटे पंख के पंछी जैसा गिर ही जाऊँ गोद तुम्हारी
इसका क्या विश्वास कि मेरी मजबूरी पहचान सकोगे


चंचल मन

ओ मेरे चंचल मन, तू मत कर पागलपन
कुछ देर ज़रा ठहर जा यूँ बावला मत बन

                        पुरवाई को बहने दे
                        हवाओ को महकने दे
                        परिंदों को चहकने दे
                        मिटा मन की ये भटकन

मन को अब धीर बंधा तू
मत उलझन और बढ़ा तू
दिल की परवाज़ बढ़ा तू
सुलझ जायेगी हर उलझन  

Saturday, 27 February 2016

निज चित्र उभरते देखे है


जिसके म्रृदु बनो,नैनो से और सरल चित्त ओ सैनो  से 
मैने तो  उसकी तड़पन में जज़्बात तड़पते देखे है 

                    वेदना विकल जिसकी बनकर 
                    अब धुँआ उगलती आँगन में 
                     उसकी उन उलझी अलकों  से 
                    मैने घनश्याम बरसते देखे है 

जो चकवी अपने चकवे से 
बिछुड़ी अपनी मजबूरी में 
उसकी उन भूली यादो में 
मैने तो फूल बरसते देखे है 

                   तुम छिपा न पाओगी मुझसे 
                   अब अपने मन की चाहत को 
                   तव  सूनी सूनी चितवन में 
                  मैने तो निज चित्र उभरते देखे है 

दो घड़ी पास बैठो



दो घड़ी तुम  पास बैठो
बस ज़रा मै प्यार कर लूँ
तेरे इन नाज़ुक लबों के
रस ज़रा स्वीकार कर लूँ

                हाय खिलता रूप तेरा
                हो रहा जैसे सवेरा
                फूल सी मुस्कान दे दो
                जिस पे मै अधिकार कर लूँ

इस तरह आना तुम्हारा
रूठकर जाना तुम्हारा
भूल मेरी है यदि तो
मै तेरी मनुहार कर लूँ

              जब ठिकाना है न पल का
              फिर भरोसा केसा कल का
              आओ जी भर कर तुम्हारा
             आज मै सत्कार कर लूँ 

Friday, 26 February 2016

ऐ मेरे हमसफ़र


ऐ मेरे हमसफ़र लम्बा है बहुत जिंदगी का सफर
थोड़ा सा तो कट जाए इसलिए थोड़ी दूर साथ चलो

                ये माना जिंदगी का सफर  कठिन है
                माना तुम्हारा साथ निभाना कठिन है
                कुछ लम्हे तो हँसते गुज़र जाएँ
                इसलिए थोड़ी दूर मेरे साथ चलो

ये माना  तेरे मेरे जज़्बात अलग है 
ये माना तेरे मेरे हालात अलग है
दुनिया वाले हम पर न  हँसे
इसलिए थोड़ी दूर मेरे साथ चलो

               आएंगे मोड़ कई जब चाहे रुक जाना
               आएंगे मुकाम कई जब चाहे रुक जाना
               सारे जाने पहचाने निकल जाएँ
                इसलिए थोड़ी दूर मेरे साथ चलो 

Thursday, 25 February 2016

गुज़रा ही नहीं



मै कब से इस  राह में बैठी हूँ 
यहाँ कबसे तू गुज़रा ही नहीं 

                  कुछ चाँद के रथ भी गुज़रे थे 
                  पर चाँद से तू उतरा ही नहीं 

दिन रात के दोनों पहिये भी 
कुछ धूल उड़ाकर गुज़र गए 

                 मै आँगन में बैठी ही रही 
                चौखट से तू गुज़रा ही नहीं 


अब मुझे जाना है

आओ मेरी सखियो  सजाओ मुझे सखियो 
जाना है पिया के साथ ,अब मुझे जाना है 
छेड़ो न यूँ मुझको ,सताओ न यूँ मुझको 
जाने दो उनके साथ ,चलेगा न बहाना है 

मेहँदी लगाओ कंगना पहनाओ 
बिंदिया लगाओ और पायल पहनाओ 
दुल्हन बनाके सजाओ 
माथे टीका लगाओ आज 
अब मुझे जाना है 

हल्दी लगाओ कुमकुम लगाओ 
चूनर ओढ़ाओ बिछिया पहनाओ 
बालों में गजरा लगाओ 
फूलों की करो बरसात 
अब मुझे जाना है 


Wednesday, 24 February 2016

छोडो जी मोरी बैंया


आज मुझको आती है लाज 
कैसे दिखाऊँ दिल के दाग 
देखो तो सनम छेड़ो न आज 
सैंया -----छोडो जी मोरी बैंया 

कैसे दिखाऊँ दिल की प्रीत 
आज तुम्हारी हो गई जीत 
देखो मुझको तुमसे है प्रीत 
तुमको बनाया है मनमीत 
सैंया ----छोड़ो जी मोरी बैंया 

बादल काले छाएँ है आज 
लेकर नीर घुमड़े है आज 
खड़ो उनसे बरसो जी आज 
हम दोनों भी खेलेंगे फाग 
सैंया ----छोड़ो जी मोरी बैंया 



बदलता वातावरण



प्रात; हुआ पंछी भी जागे 
रवि ने स्वर्ण लुटाया 

               ढलते दिन की थकती काया 
              साँझ का वैभव आया 

दो क्षण को फिर जग का आँगन 
कलरव से इठलाया 

              देख सकी  कब रजनी उसको 
              मग में तिमिर बिछाया 

सुख दुःख की धूप छाँव से 
मन ही मन अकुलाया 

क्यों चले गए


ममता की डोर तोड़कर 
तुम क्यों चले गए 

               सपनो के मीत मेरे 
               भावों के गीत मेरे 

कम्पन बने, बने रहे 
उलझन भी बन गए 

              यौवन के नयन खोले 
              अन्तर में प्यार डोले

जगते ही जगते कैसे  
वरदान सो गए 

           मिलने की आस लिए 
           युग युग से दीप बाले 

झंझा झकोर आई 
अञ्चल में बुझ गए 

           मंझधार नाव छोड़कर 
           तुम क्यों चले गए 




Tuesday, 23 February 2016

राज़े दिल न पूछो



राज़े दिल पूछो न मुझसे जो छुपा रखा है

दागे दिल दागे जिगर
और तमन्नाओं से
मैने वीरान बहारो को
सजा रखा है

दिल में इक शोला दबाया
दुनिया ने मिटाना चाहा
मैने उस याद को
सीने से लगा रखा है

अपने इस दर्द की मैने
तो कसम दी तुमको
मैने इस दर्द में
दुनिया को भुला रखा है 

तुम्हें मेरी कसम है



मुझसे तुम इतना न शरमाओ तुम्हें मेरी कसम है
इक झलक मुझको तो दिखलाओ तुम्हें मेरी कसम है

                       तुमने चूनर ओढ़ ली है जबसे मेरे नाम की
                       पग में पायल बाजे छम छम झनक मेरे नाम की
                      चाँद की डोली में आ जाओ तुम्हें मेरी कसम है

हर जगह ढूँढा फ़िर भटका मै तेरी याद में
दिल तो बेकाबू हुआ शैदा हुआ तेरी याद में
इल्तज़ा मेरी न ठुकराओ तुम्हें मेरी कसम है

                     लाज की तेरी चुनरिया जान से भी प्यारी है
                      तूने अपने प्यार से किस्मत मेरी ये संवारी है
                     घूँघट न और सरकाओ तुम्हें मेरी कसम है 

सजना खड़े है मेरे द्वार




सुनो मोरी सखियाँ सजना बुलाये
कैसे मै जाऊँ उस पार
सजना खड़े है मेरे द्वार

चुन चुन बगिया से लाओ चमेलिया
कलियों से मोरी सजाओ रे डोलिया
लेके सैंया आये कहार ---------------

कजरा लगाओ माथे बिंदिया सजाओ
मेरी चुनरिया गुलाबी रंग में रंगाओ
डोली में होना है सवार ---------------

Monday, 22 February 2016

किसको मीत बनाएँ



जग की इस नश्वरता में 
किसको बोलो मीत बनाएँ 

                लहरों सी अभिलाषाएँ यह 
                क्या क्या रंग दिखाती 

उठती गिरती बढ़ती जाती 
तट अवलोक न पाती 

                पानी के बुदबुद से अपने 
                 सतरंगी बन आते 

बालू के कितने निकेत वे 
झंझा में भर पाते 

             सुख दुःख की इस धूप छाँव में 
             अमर गान क्या गाएँ 

मूक रुदन


मूक रुदन इस अन्तर का 
प्रिय तुम तक कैसे आ पाये 

                तुम चिर परिचित अनजान रहे 
                अंतर के तार न मिल पाये 
               कल्पना मौन थी शब्दों में 
               उद्गार नयन में भर आये 

उच्छ्वास भरे स्वप्निल जग का 
आभास तुम्हें क्या मिल पाये 

                   निर्मम मेरी इस ममता का 
                    प्रतिदान वेदना ही दोगे 
                  आकुल अरमानो की झोली 
                   क्या खाली ही लौटा दोगे 

 जो अपना तुमको मान चुका 
वह मन  तुममें लय हो जाए 

                 अनभिज्ञ अकिंचन मै जग का
                 व्याकुल प्राणी मैने माना 
                 पर उसकी अडिग भावना को 
                क्षण भर कब तुमने पहचाना 

वरदान जिसे मै समझा था 
वह शाप अरे क्यों बन जाए 

शहीदों का जयगान

गूँज रहे जय गान तुम्हारे
गूँज रहे जय गान
सत्तावन के अमर शहीदो
गूँज रहे जय गान

                    एक शतक पहले तुमने ही
                     एक नया इतिहास लिखा

अचल हिमानी के आँगन में
प्रथम क्रांति का सूर्य दिखा

                          हिन्दू हर हर महादेव कर
                          जब रण में हुंकारे थे

बांध कफ़न सर पे जवान
बरस रहे अंगारे थे

                        जब दुर्गा की शक्ति लिए
                        गरजी थी झाँसी की रानी

देख फिरंगी कांपे थे भारत
की खड्गों  का पानी

                      आज़ादी के समरांगण में
                       कूद पड़ा था हिन्दुस्तान

गूँज रहे जय गान तुम्हारे
गूँज रहे जय गान

                         शाह ज़फ़र के शहजादों का
                           खून रंग ले ही अाया

रानी की बुझती आँखों का
स्वप्न सत्य बनकर छाया

                          ले भारत का आज़ाद तिरंगा
                          लिए शहीदों का वह मान

गूँज रहे जय गान तुम्हारे
गूँज रहे जय गान

                        सत्तावन  के अमर शहीदो
                        गूँज रहे जय गान 

Sunday, 21 February 2016

दीप जलता रहेगा




दीप जो उसने जलाया , दीप वो जलता रहेगा 
जो कि बढ़के जिंदगी में है शमा को चूम लेते 
जो मरण को वरण करके है प्रलय में झूम लेते 
जो हिमालय से अटल है आन पर झुकते नहीं 
जो कदम तलवार की भी धार पर रुकते नहीं 
उस चरण की हर ठहर पर नित नया मंदिर बनेगा 

दीप जिसकी लौ लिए इन्सानियत की रोशनी 
दीप जिसकी हर किरण मज़लूम की ताकत बनी 
पा जिसे यह युग जगा फिर से जवानी आ गई 
उतुंग शिखरों से कि जिसने मुक्ति को आवाज़ दी 
सुन सको तो आज भी वह स्वर तुम्हें मिलता रहेगा 

प्यासे नयन



खोलकर हृदय की बन्द खिड़की 
झांक रहे किसके यह प्यासे नयन 

                   अन्तर का मूक प्यार 
                   मुखरित हो बार बार 

आज करने लगा मेरे भावों के 
झुरमुट में मधुमय गुन्जन 

                  परिचित सी तुम अंजान 
                   तुमने छू दिए प्राण 

जीवन का तिमिर चीर 
हँसा फूलों सा मन का गगन 

Saturday, 20 February 2016

पिया न आये



न जाने क्यों पिया न आये
मोरा मनवा क्यों घबराये

               न भाये मोहे  बदरिया काली
               रहती जो पिया संग मतवाली

कैसे भेजूँ संदेश न जानू
क्या लिखूँ पाती न जानू

               इक विरहन नदिया के किनारे
               जाने क्यों प्यासी रह जाए

दीपशिखा की प्रज्वलित लौ
अनायास ही न  बुझ जाए 

अनाज का अपमान मत करना



ऐ बंधुओ इस अनाज का अपमान मत करना
भोजन को झूठा छोड़कर अभिमान मत करना

                  अनाज को किसान ने मुश्किल से उपजाया
                  पहले तो बीज बोया और फिर हल चलाया
                  तैयार फसल होने पे काटी इसका ध्यान करना

इसमें तो उसने अपना खून पसीना बहाया
खुद भूखा रहा पर उसने तुमको है खिलाया
भरपेट खाके तुम इसका अनुमान भी करना

                   कितनी मेहनत झोंकी है उसने तब फल पाया
                  उसकी मेहनत रंग लाई धरा से सोना उगाया
                  इस धरती की माटी का तुम अपमान मत करना 

दुनिया भुलाये बैठे है



तेरी याद में हम तो ऐ दिलबर दुनिया ही भुलाये बैठे है 
हम आज तो अपनी हर चाहत तुझ पर ही लुटाए बैठे है 

                  दुनिया  की न है परवाह हमें न फ़िक्र हमें है ज़माने की 
                  हम तो तेरे दर पे दिल अपना सज़दे में झुकाये बैठे है 

जैसे भी होगा सह लेंगे इलज़ाम तुझ पे न आने देंगे 
रुसवाई न होने देंगे  तेरी ये कसम उठाए बैठे है 

                गैरों से हमको क्या लेना अपनों ने लूटा है हमको 
                इस दर्दे जिगर को  हम अपने सीने में छुपाये बैठे है 

इक बार पलट के देख तो ले अरमान यही है इस दिल का 
 जग पे न कुछ ज़ाहिर होने देंगे गम अपना छुपाये बैठे है 

तुझे दूर जाना ही होगा



मुसाफिर तुझे दूर जाना ही होगा
सोया मुक़ददर जगाना ही होगा

               हस्ती को अपनी मिटा मुस्कुरा दे
               तू हर फांसला दरम्यां से मिटा दे
                जहर पीके भी मुस्कुराना ही होगा

तू ये सोच कि तेरी मंजिल कहाँ है
सितारों से उस पार तेरा जहाँ है
तुझे आसमां को झुकाना ही होगा

              दिखा अपनी हिम्मत बसा ले ये बस्ती
              देखे ये ज़माना मिटा अपनी हस्ती
              जलवा अपना तुझको दिखाना ही होगा


अन्जाम -ऐ -चाहत



जाने वाले कुछ देर रुको 
अंजाम जिंदगी बाकी है 
जी भरके तुझको देख तो लूँ 
इक रात क़ज़ा की बाकी है 

                    इस बुझते जीवन को क्षण भर 
                    तुम रुको क्षणिक संबल तो दो 
                    देकर तुम अपनी निज पद रज 
                     कुछ बात हृदय की बाकी है 

उखड़ी उखड़ी सी सांसे है 
दिल के अरमान तड़पते है 
अन्जाम -ऐ -हसरत सामने है 
अन्जाम -ऐ -चाहत बाकी है 

Friday, 19 February 2016

रात्रि का सन्नाटा



वो धीरे धीरे सर्द हवा में टहल रही थी 
लैम्प पोस्ट के नीचे बैंच पड़ी थी 
वहाँ एक पुस्तक अधखुली पड़ी थी 
मैने उस पुस्तक को छुआ 
उसकी पलकें मेरी ओर उठीं 
मैने रात्रि के अँधेरे में 
उसके मन की इबारत को पढ़ा 
वो मन ही मन डरी हुई 
सहमी सी थी 
वो संकुचित सी हुई 
निश्चेष्ट सी, निष्प्राण सी उसकी देह 
सर्द हवा में पत्ते सी कांप रही थी 
मैने उसे कंबल ओढ़ाया 
उसकी प्रतिछाया मुझे घूरने लगी 
मन ही मन मै घबराया सकुचाया 
चुपचाप वापिस चला आया 
अब केवल वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था 
नि ;शब्द निष्कलंक कोई झाँक रहा था 

राही मै चलता रहूँगा

राही मै चलता रहूँगा 
धूप  हो या छाँव में 


त्याग है धारा बनी 
मेरे जीवन के पथ की 
पथ में चाहे शूल हों 
न ये रुक सकेगी 
दीप बन जलता रहूँगा 
आंधियों के गाँव में 


विजय की बनके पताका 
पथ पे मै बढ़ता रहूँगा 
देशहित प्राणों को भी 
अपने समर्पित मै करूँगा 
ज्योत्स्ना फैलाऊंगा शिक्षा की 
मै हर इक गाँव में 

Tuesday, 16 February 2016

एक मुकाम हुए हम तुम


प्यार के सफर में एक मुकाम हुए हम तुम 
याद जो रहेगा वो पैगाम हुए हम तुम 

               सपनो की भीड़ में ये  जिन्दगी वीरान है 
              प्रीत में ढली जो वो मुस्कान हुए हम तुम 

धडकनों के पास तेरी यादोँ का बसेरा है 
फासले सब टूटे एक पहचान हुए हम तुम 

              जिन्दगी और मौत पल दो पल का सवेरा है 
              जो कभी न ढ़ले ऐसी शाम हुए हम तुम 

दर्द का सफर एक  ख्याल बनकर रह गया 
खुशियो का गाँव मेहमान हुए हम तुम 

दिल की बेताबी



दिल की ये बेताबी जाने किधर ले जाए हमें
बढ़ रही सीने की धड़कन कैसे बतलाएँ तुम्हें

                 जाने क्या होगा अन्जामे मुहब्बत अब हमारा
                 क्या जाने कब गर्दिश में छुप जाए सितारा
                 चोरी चुपके से यूँ मिलना रास न आया हमें

क्या करें काबू में ये  दिल मेरा रहता नहीँ
कितना बेगाना हुआ हमसे कुछ कहता नहीँ
और भटकायेगी कितना दीवानगी अब हमें 

Monday, 15 February 2016

अगवानी में प्रतीक्षारत हूँ

फूलों से कहो -
अपने पराग  से सजाएँ पालकी 
वृक्षों से कहो -
अपनी हरियाली से सजाएँ पालकी 
आकाश से कहो -
चाँद सितारों से सजाएँ पालकी 
बादलों से कहो -
इन्द्रधनुष से सजाए पालकी 
उस पालकी पर मेरी प्रियतमा को जब लाएं 
द्वार पे बंधनवार बांधे 
सुहागिनें मंगलगान गाएँ 
उसकी आरती उतारें 
फिर वो देहरी लांघकर मेरे अंतर्मन में प्रवेश करे 
मै पलकें बिछाए अगवानी में प्रतीक्षारत हूँ 

मंगलसूत्र

कहने को तो है माला 

माला के मोती में धागा 

धागा है मंगलसूत्र का

मंगलसूत्र है विवाह का प्रतीक 

प्रतीक है प्रेम का ,सात वचनों  का, विश्वास का ,

विश्वास में छुपी इक आस का 

आस में छुपा इक बंधन 

बंधन में बंधे हुए दो मन 

दो मन को बंधे हुए है डोर 

डोर का कोई न छोर 

छोर है ये अनन्त 

अनन्त में विलीन होना है इसका अन्त 

नेह के दीप जलाएँ हम



हाय रे तेरा ये भोलापन 
याद मुझे फिर आया बचपन 
बचपन की वो भूलभुलैया 
भूलभुलैया की ता थैया 

               झूमें नाचे गाये हम 
               मिलकर ख़ुशी मनायें हम 
               सबके दुःख बिसराएँ हम 
               सबको गले लगाएं हम 

इक कोना भी रहे न सूना 
हर दिल को है हमको छूना 
स्नेह के हरसू फूल खिलाकर 
नेह के दीप जलाएँ हम 

दिल में उठी हिलोर



नदी जाती सागर की ओर 
सरिता ढूंढ रही हे छोर 
कविता जाती शब्द की ओर 

                धरती घूमे सूरज के चँहुओर 
                मेरे प्यार को सूझे न ठोर 
                आहें मेरी बड़ी है पुरज़ोर 

दिल बावरा घूमे इस ओर उस ओर 
अंतर्मन में मच रहा है शोर 
दिल की लहरों में उठी हिलोर 

Sunday, 14 February 2016

कलियाँ प्रतीक्षारत है



धूप में छाया घिरती है 
हृदय में निराशा भरती  है 

                   गवाक्षों में रौशनी नहीँ हुई 
                   गलियारे भी सुनसान है 

कलियाँ भी वसन्त के न आने से मुरझाई 
चिड़ियाँ भी स्पन्दन कम होने से अकुलाई 

                 हो सकता है उसे घेर लिया हो 
                 या किसी भूलभुलैया में फँसा हो 

वचन देकर भी वसन्त नहीँ आया 
कलियाँ फिर भी प्रतीक्षारत है 

कैसी ये तकदीर



वही शामे ग़म की तन्हाई 
तन्हाई में क्यों है रुसवाई 
रुसवाई में जां पर बन आई 
या रब कैसी तकदीर बनाई 

                माटी का तूने पुतला बनाया 
                उसमें काहे दिल को लगाया 
               दिल में तूने प्रीत जगाके 
               फिर काहे  दे दी जुदाई 

सपनो का इक महल बनाया 
प्यार से हमने इसको सजाया 
इस ज़ालिम दुनिया वालों ने 
अपने पाँव से  ठोकर लगाई 

हाय रे हालात



उन्मुक्त वातावरण का छलावा 

व्यर्थ का दिखावा 

बातों का रुझान 

आँखों में तूफ़ान 

दिल है पशेमान
 
बोझिल है सांसे 

रुकने को साँस 

दर्द की दास्तां 

डूबती है जां 

स्याह है रात 

कैसे ये जज़्बात 

हाय रे हालात 

घड़ी का अलार्म



घड़ी की सुइयाँ सहसा बज उठीं 

उसमें अलार्म जो लगाया था
 
ये अलार्म भी क्यों बजता है 

ये वक्त भी बड़ा बेमुरव्वत है 

चैन से सोने भी नहीँ देता 

सुइयाँ बढ़ती जाती है 

दिल की बेताबी बढ़ाती है 

कभी घड़ी तकिए नीचे दबाती हूँ 

पर कमबख्त चैन नहीँ लेने देती 

फिर से अलार्म बजाती है 

करलूँ मनमर्ज़ी



ये बादल गरजता है

बरसता क्यों नहीँ

चक्कर काटता रहता है

शोर मचाता है

सिर पर हथौडे सा वार करता है

दिल चीत्कार कर उठता है

ये शोर अब सहा नहीँ जाता

बादल की ही मर्ज़ी क्यों चले

मै भी क्यों प्यासे पेड़ की तरह जिऊँ

क्यों न पानी खींच लूँ

अपनी जड़ों द्वारा पाताल से

क्यों न ताकत मांग लूँ उससे

जो सबको ताकत देता है

फिर क्यों मै मोहताज़ रहूँ

उस बादल की

करलूँ मनमर्ज़ी 

Saturday, 13 February 2016

सुबह का होना



उसके आने से सुबह होती है 

                  फिर शुरू होता है 

पक्षियों का कलरव 

                 फूलों का खिलना 

पत्तियों में कम्पन से 

                 ज़ाहिर होती है 

उसकी विकलता 

               मनोरम दग्धता 

दीपशिखा सी रोशन 

             अरुणाभ शरीर 

जुगनू सी जगमगाहट 

             मौन होना 

शब्दों का बोलना 

          शब्दों का शांत होना 

जिंदगी - एक ज़हर



जिंदगी जीने को जिए जा रहे है हम 
एक कड़वा ज़हर पिए जा रहे है हम 

                मांगने से मौत होती नहीँ नसीब 
                लुटा आशियाँ कभी थे खुशनसीब 
                 फिर भी कल की आस किए जा रहे है हम 

न होती उल्फ़त तो न यूँ होती रुसवाई 
यह जिंदगी हमें कभी रास न आई 
सच है कि गरल पिए जा रहे है हम 

               किश्ती से किनारा छूटा तो भंवर ले डूबा 
              अपनी किस्मत का सितारा भी डूबा 
               फिर भी बेआस जिए जा रहे है हम 

न पूछो हमसे अब तन्हाई का आलम 
क्या क्या न सहे हमने दुनिया के सितम 
दिए वादे को निभाते जा रहे है हम 

बेवफा सनम




किसे दिखाने जाएँ हम दिल के छाले
किस तरह के लोगों से पड़ गए पाले

                  जिन्हें पाके हम जहाँ को भूल बैठे थे
                  आज उन्हीं के दर से गए है निकाले

समझते थे सब गंवाना पड़ता है ख़ुशी में
थे हम कितने नादान खुद ही पर नोच डाले

                   समझे थे जिसे अपना उसी ने ठुकराया
                    पड़ गए है अब तो जुबां पर भी ताले 

प्रेम की देहरी



प्रेम करना आसान नहीँ 

                  इसमें है निराशा 

निराशा में भी इक उम्मीद 

                 उम्मीद में जिज्ञासा 

जिज्ञासा में अग्नि 

                अग्नि में लौ 

लौ ही है प्रेम की देहरी 

              देहरी लांघना उचित नहीँ 

मैने कुछ कहा



जब मैने उससे  कुछ कहा 
अँधेरे में फुसफुसाहट सी हुई 
किसी को भी कुछ पता न चला 
फ़ूलों ने पक्षियों ने भी कुछ न सुना 
पत्तों की सरसराहट ने कुछ कहा 
नि ;शब्द वाद्यवृन्द बजा 
पक्षियों के कलरव का
गान का, तान का 
फ़ूलों के पराग का 
कल कल निनाद का 
हँसी का, मौन का
 किसी ने कुछ न सुना 

वसन्तऋतु में फूल खिला


उसका नैसर्गिक सौंदर्य 
उद्दीप्त था दीपशिखा समान 
सूर्य की प्रथम किरण नें 
उसकी कोंपल को स्पर्श किया 
फिर वो फूल मुस्कुरा उठा 
उसने धीरे धीरे पंखुड़ी को खोला 
सकुचाते हुए अंगड़ाई ली 
उस पर गिरी ओस की बून्द 
अपना अस्तित्व खोने लगी 
सूर्य की आभा फैल गई 
किरणों के सौंदर्य से 
फूल ने स्नान किया 
अब वह प्रफुल्लित होकर झूमने लगा 
वह पूर्ण परिपक्व हो गया था 
पराग से भरा , मकरन्द भार से झुका 
भंवरे आस-पास मंडराने लगे 
पक्षी चहचहाने लगे 
यह वसन्तऋतु का आगमन था  

Friday, 12 February 2016

मेरा सलाम



हाय सूखा पत्ता डाली से टूटा
पहले हरा था पौधे को सींचा 

               अब पड़ा है यूँ ही
               न आस है न प्यास है 

न कोई अपना है 
न कोई पराया है 

             वो भी क्या दिन थे 
             दिल के तार छेड़े थे तुमने 

फूंकी थी जान इसमें 
निष्प्राण को जीवन दिया तुमने 

            बिन तुम्हारे रहा नहीँ जाता 
            तेरा ये दुःख सहा  नहीँ जाता 

तू रहे सलामत चाहे जहाँ रहे 
मेरा सलाम पहुँचे तू जहाँ रहे 

अकेलापन



हाय ये अकेलापन जिसकी सीमा नही कोई
सभी अपने है मगर अपना नही कोई

                क्या यही था अपनापन कोई चीज़ कहीं खोई
                मिलेगी नहीँ मुझको किस्मत भी थी सोई

जीवन इक खेल है नाचता है हर कोई
आखिरी साँस तक साथ न चलता कोई

               तन्हाई की महफ़िल है ख़ामोशी की पायल है
               बजते है घुँघरू आवाज़ न सुनता कोई

आज तन्हा हूँ सभी मेरे पास है
तन्हाई की नागिन आसपास है 

               जाने कब ये नागिन डसेगी मुझे
               जिसका ज़हर पीने की प्यास है 

Thursday, 11 February 2016

न आंसू बहाना है



जिंदगी के सफर पर चलते ही जाना है 
रुकना नही सफर में बढ़ते ही जाना है 

                  कभी मिलती है खुशी तो कभी मिलता है गम 
                  कभी कुछ भी ज़ाहिर तुझपे न होने देंगे हम 
                  चुपचाप हर गम हमको हँसते हँसते सहे जाना है 

मर मर के हम तो तन्हा ऐसे जिए 
घुट घुट के जिए हमने आंसू पिए 
अश्क़ों को कसम न आंसू बहाना है 

भारतमाता की अर्चना



जय जय हे भारतमाता 
ये अर्चन स्वीकार करो 
अचल हिमानी के आँगन में 
कल्याणी तुम स्वर्ग भरो 

                    देश हमारा रहे फूलता 
                    फलता सदा बहारो में 
                    रहे चमकती विजय पताका 
                    नभ के चाँद सितारों में 

सदा रहो  तुम वन्दित घर घर 
चाहत ये स्वीकार करो 
जय वरदानी जय कल्याणी 
जीवन में तुम ज्योति भरो 

मुक्तक

प्राणों में विकल कम्पन 
कम्पन में निराशा 
नयनों में सजग सपने 
सपनों में पिपासा 


इक महफ़िल लो आबाद हुई 
इक बज्मे मुहब्बत लुटती है 
देकर के उजाला औरों को 
इक शमा अचानक बुझती है 


हमदम मेरे आवाज़ तो दो 
तूफानों से टकरा जाऊँ 
मिटते मिटते भी बस तेरी 
किश्ती को पार लगा जाऊँ 


यूँ ही बैठे रहो तुम  मेरे आस पास 
डर है तू दिल से उतर न जाए कहीं 


प्यास मुझे थी लगी हुई 
पानी उसने पिया 
लगा मेरी प्यास बुझ गई 
क्या यही होती है सच्ची लगन 


विधाता ने रचा




विधाता ने रचा है
उसे प्रेम से 
कल्पना से 
कामना से 
फुर्सत में 
वह मुझमे है 
उसकी हँसी 
कुसुमित होती है 
पलाश में ,अमलतास में 
हेमंत में ,वसंत में 
बढ़ती जाती है 
अगाध की ओऱ 

Wednesday, 10 February 2016

कदम लड़खड़ाने लगे है



बिन पिए ही कदम लड़खड़ाने लगे है
जिंदगी की राह में डगमगाने लगे है

                    कुछ बरस पहले बहार आई थी
                    ख़ुशी जीवन में मुस्कुराई थी
                    गुलिस्तां के फूल मुरझाने लगे है
                    दिल को तसल्ली से मनाने लगे है

शायद मुझमें ही कोई कमी है
जो मेरा होकर भी मेरा नही है
सपने थे सपने कब हुए अपने
नस नस में काँटे चुभाने लगे है

प्रलय का ज्वार




मंजिल मेरी कितनी अपार 

                   कितने घातक होते प्रहार 

टूटे सपनों के अखिल हार 

                   सुख तंत्री के है मौन तार 

है वर्तमान में रुदन भार 

                   चेतना विश्व का सत्य सार 

उठ रहा प्रलय का भीषण ज्वार 

शिष्टाचार



नैनो में सपन 
सपन में निराशा 
निराशा में आशा 
आशा में दिलासा 
दिलासा में मूक भाषा 
भाषा में व्यवहार 
व्यवहार में शिष्टाचार 
शिष्टाचार बिना सब बेकार 

ले जाओ पार



नदिया के उस पार
साजन का द्वार
कैसे मै जाऊँ
अटके है तार

                 किश्ती है खोई
                 तकदीर भी सोई
                 बिन पतवार
                बिन खेवनहार

डूबी मै जाऊँ
कैसे तीर पाऊँ
आओ सजनवा
ले जाओ पार 

Tuesday, 9 February 2016

मनमोहन का पग वन्दन


पहुँचे जमुना के तट पर 
उठ पड़ी लहर  मदमाती 
शशि मुख का अवलोकन कर 
थी अपने में न समाती 
 
                 जमुना संग लहरों के 
                 लेती थी मधुर बलैयां 
                 अनुराग भरी बलखाती 
                छूने को प्रभु की पइयां 

मनमोहन ने मुस्काकर 
निज चरण कमल लटकाया 
जग गए भाग जमुना के 
छूकर जीवन सुख पाया 

                  जमुना ने निज उर अंतर 
                  खोला पृथ्वी के पथ का 
                  युग ओर कोर थे जल के 
                   वसु बढ़े बीच ले नटवर 

मोहभंग होना



झंझा के प्रबल झकोरे
 चपला थी चमक दिखाती
 कण कण में इक सिहरन थी
नीरवता थी थर्राती

                ओले की उस वर्षा में
                प्रेमी थे बढ़ते जाते
                उर भाग रहा था आगे
                पग पीछे थे पड़ जाते

कमनीय कान्त किरणों से
थे अंग अंग उत्तेजित
पर इधर प्रकृति थी रचती
बाधाओं की नव संसृति

               अधरों में आसव भरकर
              सोती थी यौवन बाला
              अलसाए से नयनों में
              थी छलक रही मृदु हाला

सपनों की माला टूटी
टूटी रजनी नीरवता
भोगी के हृदय गगन में
योगी का योग विकसता              

प्रतिदान लेकर क्या करूँ



झांकती तुम उप नयन से 
कौन जीवन की कहानी 
किस वन वल्ल्ररी पर 
थी खिली तुम रूप रानी 

               किस क्षितिज की अचल रेखा 
               कौन तुम उषा सुहानी 
               नयन नभ में चढ़ रही तुम 
               प्रेम की हो तुम निशानी  

तप्त उर के गान गीले 
राग लेकर क्या करूँ मै 
आज तुमसे प्रीति का 
प्रतिदान लेकर क्या करूँ मै 

Monday, 8 February 2016

मिलन निशा


ये  नज़र झुकी झुकी 
आरज़ू घुटी घुटी 
इस जवान चाह  की 
यह घटा उठी उठी 

                 लाल लाल होठ पर 
                 गीत कुछ रुके रुके 
                सावनी बहार के 
                मेघ कुछ झुके झुके 

मस्त ये बयार है 
झूमती दिशा  दिशा 
इक उनींदे स्वप्न की 
हँस रही मिलन निशा 

चिड़िया और सैयाद



सन्नाटा सा है छाया हुआ 
जो कभी दूर न होगा 
न कभी महसूस होगा 
चिड़िया का चहकना क्या हुआ 

इस डाल पर रहती थी इक चिड़िया 
उड़ती फिरती रहती थी जो गगन में 
पिंजरे में कैद कर लिया सैयाद ने 
पंख भी काट दिए उसकी लगन ने 

मन हल्का कर लेती थी जो बोलकर 
 जमाने की नज़र में लगता था बेहुनर 
अब न उठाएगी अपनी पलकों को 
पी जायेगी ज़माने का सारा वो ज़हर 

न इससे कभी पूछना किसकी लागी  नज़र 
जुबां पर न  लाएगी  वो न शिकवा करेगी 
न बताएगी वो किसी को कभी अपनी खबर 
पहले भी कभी न थी उसे अपनी  फ़िक्र 

Sunday, 7 February 2016

आई बरखा बहार


आई बरखा बहार खिली हर कली कली
झूमी मस्त पवन उडी महक गली गली 

                      कोयल की कुहू कुहू
                      पपीहे की पीहू पीहू
                     टेर सुनने में लागे भली

वर्षो से कुम्लहाया  यौवन
हुआ हरा भरा तन मन
धुन में अपनी मस्त नार चली

                    फ़ूलों के पत्तों पर ओस की बूँद
                     लगी  जो कोपलों को चूमने
                     शर्मो -ह्या से झुक गई कली 

जुदाई का दर्द



मेरी मुहब्बत तू आज रो आँसू बहा 
कि तेरा प्यार तुझसे हुआ है जुदा 

                  न यूँ जज़्ब कर अश्कों को 
                  खुलके रोने दे अब मुस्कुरा 

कि बह गया है तेरे दिल का गम 
फना होने दे रूह को न तड़पा 

                 न इतना बोझ सह पायेगी ये 
                 इस उम्र में न तू दिल को लगा 

तेरी बेरुखी



आज तेरी बेरुखी  ने फिर मुझे रुला दिया
दिल इतना रोया  कि सारा जहाँ हिला दिया

               पहले इतने  सितमगर तो ने थे तुम
               किसने तुम्हें मोम से पत्थर बना दिया

मै तो वो दिया हूँ जिसकी लौ बुझने को है
क्यों  तूने मुझे इस राह तक पहुंचा दिया

               बेखबर अनजान थी मै तो इस अंजाम से
               बेखुदी ने आज किस मोड़ पे पहुंचा दिया

तन्हाई क्या है चीज़ है न जाना था कभी
क्यों तुम्हारी याद ने  ये मुझे बतला दिया 

सिलसिला जुड़ा रहे तुमसे


कोई गिला  नही शिकवा नहीँ रहा तुमसे 
आरज़ू  है कि सिलसिला जुड़ा रहे तुमसे 

                कभी थे जुदा  हम बरसों से  तन्हाई में 
                अब ये दुआ है कि कभी न हों जुदा तुमसे 

सपनों के राहों की भूलभुलैया में 
हम अपना पता पूछते रहे तुमसे 

                    कितने भी गम ज़माना दे चाहे अब हमें 
                    खुदा  करे यूँ ही मिलते रहें सदा तुमसे 


Saturday, 6 February 2016

खुशनसीबी



आपके जो करीब होते है वो बड़े खुशनसीब होते है

                    ये नज़र मिलती है जहाँ में मुश्किल से
                   गर जो दिल मिलें अच्छे नसीब होते है

कितने दर्दो -आलम झेलते है दिल वाले
उनके हौसले भी अजीब होते है

                 हम किसी से क्यों करेँ शिकवा
                 कितने लोग कम नसीब होते है 

Friday, 5 February 2016

बेवफ़ाई का मंज़र



आज तेरी बेवफाई का वो मंज़र याद मुझको आ गया 
आंसुओ का और गम का सिलसिला याद आ गया 

                   शाम के ढलते ही लौटकर दौड़े आते थे मेरे सामने 
                   अब वो  ढलती शामों का मंज़र सामने फिर आ गया 

पहले फूल भी खिलते थे तेरा मुखड़ा देखकर 
अब दिलों के दरम्यां का फासला याद आ गया 

                  किस गम को याद करूँ और किसे भूल जाऊं मै 
                  एक को भूलूँ तो दूसरा गम पास मेरे आ गया 

नगमें वफ़ा के गाएंगे



सिलसिला जो चलेगा यादोँ का 
हम तुम्हेँ भुला न पाएंगे 
बीते लम्हे तुमको भी तो 
ख्वाबों में याद आएंगे 

                तन्हा तन्हा हम रहें क्यों 
                 यादेँ भी खामोश है 
                गेसुओं में लिपटे चेहरे 
               याद तुमको आएंगे 

हम तो रो देते है अक्सर 
तेरी चाहत में मगर 
सोचते है फिर भी कभी 
नगमें वफ़ा के गाएंगे 

Thursday, 4 February 2016

ममता बिलखती है

ममता बिलखती  है - कभी हालात से, कभी जज़्बात से 

कभी माँ के रुप में, कभी बहन बनकर 
कभी बेटी तो कभी पत्नी के रूप में 
उसकी आँख में नमी तैरती है 
हाँ - ममता बिलखती  है 

कभी झिझकती , कभी  तरसती  है 
रूप जवानी नहीं बुढ़ापे की सफेदी चमकती है 
वो हर मोड़ पर डरती रहती है 
हाँ -ममता बिलखती  है 

कुछ लेती नही बदले में वो सिर्फ देती है 
आंसू आँख में छुपाकर ममता बिखेरती है 
मगर आज उसकी ममता बिलखती है 
हाँ  - ममता बिलखती है 

गिला किससे करे कौन पराया है 
सभी अपने है पर संग सिर्फ साया है 
वह एकटक किसे तकती है बेआस जीती है 
हाँ - ममता बिलखती  है 

मुखौटा



कलियाँ है गुलशन और फूल भी 
माली भी क्या करे, कब तक सींचे 
बंद होने को है उसकी सांसे आवाज़ भी 

पत्थर से बना है ,हर दीवार रंगीन है 
इसमें रहने वालों की जिंदगी संगीन है 
जो होना है वो तो होगा एक दिन 
पर काटे नहीँ कटता हर लम्हा हर दिन 

दिखने में महल बना हुआ है 
नींव कहाँ है ?  किस पर खड़ा है ?
दूसरा देखता है बाहरी मुस्कुराहट 
नहीं दिखती भयभीत मन की भनभनाहट 

खोया बचपन




हाय विधाता ने क्यों रचा मुझको
जिंदगी तो दी जिन्दा न रखा मुझको 
जिल्ल्त की है जिंदगी 
दूसरों के टुकड़ो ने पाला मुझको 

                  कभी किसी ने कभी किसी ने 
                  हर शख्स ने ठुकराया मुझको 
                  जन्म तो दिया माँ बाप ने 
                  पर मरने को छोड़ा मुझको 

दो 'ठीकरी' मिली उसे बजाया बसों में 
कभी 'पेटी ' मिली तो गाय बसों में 
इस बस से उत्तर किसी और पे चढ़ 
बस यही कमाने का सहारा मिला मुझको 

                 कोई देता अठन्नी तो कोई तरस खाकर रुपया 
                 कोई देता ताना तो कोई बनाता बहाना 
                  पढ़ना दूर, प्यार दूर, ख़ुशी दूर, बचपन दूर 
                  हाय इस वैरी  दुनिया ने लूट लिया मुझको 

Wednesday, 3 February 2016

ख़ुशी छलक जाए



तेरी जिंदगी के गुलशन से महक आए
ख़ुशी तेरी आँखों से ही छलक जाए

                   रात -दिन जिंदगी के दो पहलू है
                   यूँ ही निकल के ढल जाते है
                    रात आये पर दिन के होने पर
                    हृदय की कालिमा भी छंट जाए

गम से भरी रात सुबह में बदल जाए
मेरे मन की हर दुआ तुझे लग जाए
तेरी जिंदगी कलियों से महक जाए
कोई काँटा हो तो हवा से हट जाए

नया तराना गुनगुनाएं



ख़िज़ाँ क्यों देखें जब बाहर फ़िज़ा है
बहार क्यों न देखें जिसका रंग जवां है

                        आओ सब जिंदगी के  चुरा लाएं
                        चलो मिलकर नाचें और गाएँ
                        अँधेरे से निकलें उजाला ढूँढ लाएँ

कोई नई उम्मीद हम जगाएँ
बगिया को फूलों से  महकाएं
क्यों न नया तराना गुनगुनाएं

झूठ के रंग



झूठ के रंग भी देखे है मैने
काल झूठ और सफेद झूठ
काल झूठ बनाना पड़ता है
सफेद पर रंग नही चढ़ता है

                    पर सफेद बोलना सोचकर है
                    पकड़े जाने का इसमें डर है
                    काला  तो काला है ,कवर है
                    कवर कर लेता, ढक जाता है

अति होना हर चीज़ का बुरा है
केवल सच ही सबसे खरा है
झूठ काला हो या सफेद लेकिन
चोरी औ सीनाजोरी कैसी परम्परा है 

उदास न हो


तू इस कदर उदास होकर 
हमको भी उदास न कर 

                  एक आंसू भी न बहने देना 
                  जुबां को कुछ भी न कहने देना 

अभी बचा जिंदगी के दामन का छोर 
सौंप दे तू  उसके हाथ में अपनी डोर 

                उठो यह समय निकल न जाए 
                करो सभी के लिए जो भी बन पाये 

जैसे पहले भी किया सभी के लिए 
जिंदगी को जिया सभी के लिए 

                जिंदगी की राह में पतझड़ भी आती है 
                 बहार  आते आते कभी रुक जाती है 

उसके आगे किसी की नहीं चलती 
जिंदगी आगे ही आगे निकल जाती है 

                 यह मत सोचो कि स्वप्न टूट गए 
                 वो तो बस मोती थे बिखर गए 

क्या हुआ जो ठुकराया सभी ने 
एक वो है सबका सम्भाला उसी ने 

Monday, 1 February 2016

बुझता दीपक जलाना है



ये अनजान राहें घेरती है मुझको 
चारों तरफ से जकड़ती है मुझको 
न कोई अपना यहाँ जाऊँ तो जाऊँ कहाँ 
काश उसकी सदा झकझोर देती मुझको 

                     बहुत जी लिया अब ये खामोश जिंदगी 
                     न जाने चुपचाप क्या कह जाती मुझको 
                     मुझे कोई शिकवा न शिकायत किसी से 
                     मै तो नाराज़ हूँ न जाने क्यों खुद से 

बुझा दीपक हूँ रौशनी नहीँ धुँआ चहुँ ओर 
सभी की निगाह गैरों सी दिखती मुझको 
 सहारा नही क्यों साहिल ने ठुकराया मुझको 
नही निराश होना बुझता दीपक जलाना मुझको 

जिंदगी इक सफर



यह सफर जिंदगी का चलते जाना है 
जीवन है जिम्मेदारी इसको निभाना है 

                कभी है आगे  ख़ुशी और पीछे गम 
                कभी है साथ वो कभी तन्हा है हम 
               लेकिन हँसते हँसते सहते जाना है 

मर मर कर भी हम तो जिए 
रो रो कर भी आंसू हमने पिए 
कसम अश्कों को बाहर न आना है 

                   दूर साथ में न चलता है कोई 
                   तन्हाई की आहट सुनता  न कोई 
                   अँधेरे में साये भी से बिछुड़ जाना है 

शाम है उदास



आज शाम है उदास उदास
वीरान सी चुपचाप

                   फ़िज़ा भी है गुमसुम
                   हवा भी है मद्धम मद्धम

धीमे धीमे पायल के सुर
बजते है यूँ छम छम

                    पलकों की छाँव के नीचे
                    घनी जुल्फ में अखियाँ मीचे

सोच रहा है कोई दीवाना
काश जो होता मै परवाना

                    रहता सदा शमा के पास
                    फिर क्यों रहता मै उदास 

चलो दिलदार चलो



चलो उस पार चलो , बादलों के पार चलो
चलो दिलदार चलो

               आज खो जाएँ बहारों में कहीं
               ढूंढे हमको ये ज़माना पाएं न कहीं

आज गुलज़ार बना दे ये ज़मीं
चाँद तारों को भी ले आएं यहीं

                तू सलामत रहे ऐे जाने -नशी
                 सजदे में झुके आसमाँ औ ज़मीं 

दिल से सदा दे


जो उनकी तमन्ना है तो दिल लुटा दे
मिटा दे ये हस्ती आसमां को झुका दे

                  ये सौदा तुझे कितना महंगा पड़ेगा
                  न सोच और आगे क्या करना पड़ेगा
                  ये उनका तब्बसुम और उनके जलवे
                  तभी होंगे हासिल जो सबको भुला दे

तुझे अपनी हस्ती मिटानी पड़ेगी
दिल ही क्या जां भी लुटानी पड़ेगी
है सोच अगर तूने पाने का उनको
तू सर अपना उनके सजदे में नवा दे

              दीदार  करने को पर्दा   गिराया
              न पर्दानशीं को समझ तू है पाया
              नहीँ इतनी आसां मुहब्बत की मंजिल
              मिलेगी ये मंजिल तू दिल से सदा दे