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Thursday, 31 March 2016

हमें मालूम न था


दिल की बस्ती लुट जायेगी
ऐसा तो हमें मालूम न था

                   दिल के हाथो मजबूर हुए हम
                   उल्फ़त की मौजो ने लूटा
                   आगाज़ तो हो ही गया था
                   अंजाम हमें मालूम न था था

मेरे आंसू और ये आहें
राहों में यूँ खो जाएंगे
कौन सुने फरियाद दिल की
ये राज़ हमें मालूम न था
@मीना गुलियानी


Wednesday, 30 March 2016

वक्त कभी भी रुकता



है मौसम हँसता हँसता नहीं वक्त कभी भी रुकता
चलो सफर पे बढ़े चलो यह रास्ता कभी न रुकता

मस्ती की है बयार छाई , तन मन की सुधि गई बिसारी
झूमें है हर इक पौधा , खिल गई हर इक क्यारी
सूरज की लाली छाई, हर इक कली मुस्कुराई
कोयल भी देखो कूकी , वसन्त ऋतु ने ली अंगड़ाई

बदरी  भी देखो घिर आई , चपला दामिनी चमकी
लेकर के नई चित्रकारी ,मीनाकारी है अम्बर  की
हंसों की टोली आई, गीतों की गूंजी शहनाई
अम्बर ने अपनी मस्ती में गीत की तान सुनाई 

जल थल अम्बर है डोला , वक्त नहीं किसी का रुकता
चलो सफर पे बढ़े चलो , यह रास्ता कभी न रुकता
@मीना गुलियानी 

आज उजाला करदे


सबके दिलो में तू आज उजाला करदे
दूर दुनिया से नफरत का अँधेरा करदे

                   हर दिल में सदाकत की शमा रोशन हो
                   झूठ का शरारा भी हर दिल से दूर करदे

प्यार के फूल खिलें  जिससे महके ये फ़िज़ा
न रहे दिल में नफरत के लिए बाकी जगह

                   न हो कोई दुश्मन न किसी से वैर यहाँ
                   हर तरफ अमन  का ही रहे नामोनिशाँ

सबके दामन को खुशियों के गुलो से भरदे
न कभी आये खिज़ा ऐसा गुलिस्ताँ करदे
@मीना गुलियानी 

अपनी ही लगन में



आज तो मै उड़ती चलूँ मस्त पवन में
आज झूमूँ गाऊं अपनी ही लगन में

                  जिया झूमे चुनरिया लहराए
                 सर से पल पल सरकती जाए
                  छू लूँ बादलों को मै उड़के गगन में

मेरे संग संग चलती पुरवईया
मेरे गजरे की लेने को बलैया
मन मयूरा नाच उठा संग पवन में

                  ओढूँ तारो की झिलमिल चुनरिया
                  चंदा देखे तो  यूँ चमके बिजुरिया
                  आँख मिचौनी मै खेलूँ संग संग में
@मीना गुलियानी 

पायलिया छम छम गाने लगी



आई बरखा सुहानी मोरी पायलिया छम छम गाने लगी 
भीगी मोरी चुनरिया मै तो खुद ही सिमट सकुचाने लगी 

                 छेड़ो मुझको न कोई देखो रोको न कोई 
                 आज अपनी ही धुन में मै गाने लगी 

पड़ी ठंडी फुहारें भीगा तन मन  पुकारे 
कंपकंपाते लबों पे ये बूँदें सजाने लगी 

                  कैसा नशा है छाया प्यारा मौसम आया 
                  बगिया फूलो की खुशबु लुटाने लगी 
@मीना गुलियानी 

Monday, 28 March 2016

बात नहीं होती है



कैसे कहदूँ मुलाक़ात नहीं होती है
रोज़ मिलते है मगर बात नहीं होती है

                  तुम देखा न करो आईना यूँ ही अक्सर
                  दिल का आ जाना बड़ी बात नहीं होती है

मुझसे मत पूछो क्या है मेरे दिल का हाल
दिन तो ढल जाता है पर रात नहीं होती है

                 सबसे हम  नज़रो को छिपाए फिरते है
                 कोई कहीं देखे न बरसात नहीं होती है

जब भी मिलते है और पूछते है हाल मेरा
इससे आगे तो कभी बात नहीं होती है
@मीना गुलियानी




ऐसा वादा कौन करेगा



कोई न दुःख में सांझी बनेगा
मन के इस सूने पनघट पर
आके कौन अब नीर भरेगा

                  सब है  अपने पराये बंदी
                  कोई किसी का नहीं है संगी
                  दुनिया है कितनी दोरंगी
                  मुक्त दुखों से कौन करेगा

कुछ पल के है सारे नाते
कुछ ही पलों के है ये वादे
जो टूटे न कभी उम्र भर
ऐसा वादा कौन करेगा
@मीना गुलियानी 

Sunday, 27 March 2016

तुझे महसूस किया है


कैसे तुझसे कहूँ कि मैने  तुझे महसूस किया है 

तुम छिपे हो इन हवाओं में 
तुम छिपे हो इन लताओं में 
इन फूलों की खुशबु में महसूस किया है 

                   तुम्ही हो बादलों के गर्जन में 
                   तुम्हीं हो पायल की छमछम में 
                   इन भँवरो के गुंजन में महसूस किया है 

तुम ही इस सांझ और धूप में 
तुम ही इस रंग और रूप में 
साँसों के सरुर में  महसूस  किया है 

                   तुम्हीं छिपे हो गीत और संगीत में 
                   तुम्हीं छिपे हो सुर और प्रीत में 
                   धड़कनों के गीत में महसूस किया है 

तुम हो परिंदो की परवाज़ में 
तुम हो आस और विश्वास में 
धरती आकाश में महसूस किया है 
@मीना गुलियानी 

दिल चाहे यादों में डूब जाना



खुशियों का न ठिकाना,  दिल मेरा चाहे मुझसे ,  यादों में डूब जाना 


कैसे बताऊँ तुझको क्या मुझको हो गया है 
दिल मेरा था कभी जो अब तेरा हो गया है 
लगता नहीं ये तुझ बिन तुझको ही चाहे पाना 


                         तस्वीर तेरी अपने दिल में छिपाई हमने 
                         दुनिया को भूलकर ये हस्ती मिटाई हमने 
                         अब दर्द जी में उठता मुश्किल हुआ छिपाना 


दो घड़ी तो पास बैठो तुम पास भी तो आओ 
इतनी दूर होकर न मुझे तुम यूँ सताओ 
मेरी धड़कनों से सुन लो मेरे दिल का ये फ़साना 
@मीना गुलियानी 

Saturday, 26 March 2016

दिल उड़ा जाता है

तेरी तरफ जाने क्यों मेरा दिल उड़ा जाता है
बेवफा क्यों तू इतना मुझे अब सताता है

                    दूर रहकर भी मुझसे दूर होता नहीं
                    याद न करने पर भी याद आता है

कैसे दूर  करूँ अपनी यादों से तुझे
तू लिपटे साये सा चला आता है

                  मेरी हर खामोशी की सदा कैसे सुन लेता है
                  बिना आहट बिन बुलाये भी चला आता है

तेरा आना कभी नागवार न लगा मुझको
पता नहीं क्यों तू इतना दिल को भाता है
@मीना गुलियानी











अब मुस्कुराइये

दिल की बेताबियाँ न यूँ बढ़ाइये
है आपको कसम मेरी लौट आइये
दूर मुझसे इस तरह यूँ भी न जाइये
मेरा कहा मानकर अब मुस्कुराइये

                    धीरे धीरे आसमां झुकने लगा
                    धरती को झूमके छूने लगा
                    तारे देखो कर रहे सरगोशियाँ
                   चमक रही बादलों में बिजलियाँ
                   इन हवाओं की महक में झूम जाइए

फूलों पे भी केसा ये निखार है
हर तरफ बहार ही बहार है
झूम रही डाली भी गुलनार की
कर रही  मदहोश ये बयार भी
आज इन्हीं वादियों में गुनगुनाइए
@मीना गुलियानी 

सनम तू ही दिल में बसा



तुझे देखा है जबसे सनम तू ही दिल में  बसा
अब तेरे सिवा  कोई नहीं और कहूँ क्या

                    दिल में बसाके मैने तुझको रोज़ सज़दा कर  लिया
                    तू बता ये गुनाह क्या है जो कि मुझसे है हुआ
                    कैसे बताऊँ तुझसे कि मेरे दिल की यही है ख़ता

तेरे ही हाथों में मैने अपनी किस्मत सौप दी
तू बता इस दिल की तूने कौन सी रेखा लिखी
दिल मेरा तेरा हुआ और कुछ चाहे भी क्या
@मीना गुलियानी 

अखियाँ प्यासी रे


आ जाओ अब न तरसाओ अखियाँ प्यासी रे
कबसे तेरी राह निहारूँ छाई उदासी रे

                  प्रीतम कितनी दूर बसे हो
                   मन मंदिर में कर  लो बसेरा

दिल भी तो ये घर है तुम्हारा
इसमें ही डालो तुम डेरा

                 कबसे ये अखियाँ  देखे बिन तुमको
                  नीर बहाती रे


आ जाओ इक बार तो सजना
पूरा मेरा हो जाए ये सपना

                   चिन्ता मिटाओ जल्दी आओ
                   दिल को मेरे न तरसाओ

आ जाओ तो मिट  जाए
जन्मों की उदासी रे
@मीना  गुलियानी 

Thursday, 24 March 2016

मेरे हमसफर


कभी धूप में कभी छाँव में 
कभी इन महकती फिजाओं में 
तुझे ढूंढती है मेरी नज़र 
मेरे हमसफर - मेरे हमसफर 

                        तू जहाँ पे है मै भी हूँ वहाँ 
                        तेरे होने ही से मेरा जहाँ 
                       मेरी आहटें तेरी धड़कनें 
                        ज़रा सुनले इन पे भी गौर कर 

मेरी हर ख़ुशी में सरूर है 
तू ही तो मेरा गरूर है 
तेरे साथ ही मै चली चलूँ 
चाहे जो भी हो तेरी रहगुज़र 

                     पिया तू अगर मेरे साथ हो 
                     तो न दिल मेरा यूँ उदास हो 
                     यूँ हाथों में तू थाम ले 
                     मुझे फिर रहे न कोई फ़िक्र 
@मीना गुलियानी 

Wednesday, 23 March 2016

होली के रंग

रंगो से तो सब खेलते है 
                 हम खेलें आज बातों से 
देश में हो या विदेश में 
                 हम होली मनायें यादों से 
लाल गुलाब-बचपन की याद 
                नीला गुलाब -उसकी फरियाद
 हरा रंग -मेरा लड़कपन 
                पीला रंग - मेरी पहचान 
रंगों भरी यादों की लड़ी 
                होली के बहाने मुझे मिली 
रंग है तो जीने का मज़ा है 
                वरना  जीना तो इक सज़ा है 
रंगो से हमारा नाता है 
                जो साँसों को भी भाता  है 
इनका मेल खूबी की सौगात है 
               इनकी तो बस अपनी ही बात है 
जंगल भी टेसू से सज जाते है 
               अमलतास के बगीचे सुनहरे हो जाते है 
वनों में देखो नाचता मोर है 
                 मन बावरा फिरे बन चकोर है 
@मीना गुलियानी 

Tuesday, 22 March 2016

रहनुमाई न होती

अगर तेरी ये रहनुमाई न होती
मेरी जिंदगी मुस्कुराई न होती

                    नज़रों ने तेरी दिल पे ऐहसा किया है
                   हसीं उम्र भर का ये तोहफा दिया है
                   दुनिया से मेरी बगावत न होती
                   अगर तेरी नज़रों की इनायत न होती

मिली मुझको जन्नत साथ है तुम्हारा
तेरे बिना अब न जीना गंवारा
अगर आँख तुझसे मिलाई न होती
खुशियों की महफ़िल सजाई न होती

                   तेरे लिए है मुझको हर गम गंवारा
                   तुझसे ही चमका मेरा ये सितारा
                   किनारे पे किश्ती ये आई न होती
                   अगर तूने पतवार चलाई न होती
@मीना गुलियानी 

Monday, 21 March 2016

वफाओं के दीपक तो जलते रहेंगे

वफाओं के दीपक तो जलते रहेंगे
कभी न बुझे ये कभी न बुझेंगे
ज़माने ने सारी ख़लिश हमको दे दी
अरमां ये दिलों के मचलते रहेंगे

                 कहीं भी रहे तू मुझे गम नहीं है
                जहाँ तू रहे मेरा दिल तो वहीं है
                तेरा प्यार  दिल से कभी कम न होगा
                है वादा किया जो कभी न टलेगा
                हवाओं से गम की गुज़रते रहेंगे

कहदो  ज़माने से अब न सताएँ
बहुत सह चुके अब न जी को जलाएँ
बहुत करली परवाह ज़माने की हमने
बहुत सह  लिए है सितम इसके हमने
न अब जिंदगी में कोई गम रहेंगे
@मीना  गुलियानी

छोडो मोरी बैंया


ओ मोरे सैयां छोडो मोरी बइयाँ छेड़ो न दिल की बात 
अब मोहे जाने दो 
पूछेंगी सखियाँ छेड़ेंगी सारी  सखियाँ कैसे बताऊँ जी की बात 
अब मोहे जाने दो 

                   प्रेम नगरिया कठिन डगरिया गाँव मेरा बड़ी दूर है 
                  थक गई मै तो चलते चलते पाँव हुए मजबूर है 
                   सैेया पूरी हुई न तेरी बात अब मोहे जाने दो 


दिल के अरमां रहे सुलगते सावन को तो बुलाओ 
पद जायेगी ठण्डी फुहारें मेघ बरस भी जाओ 
अब भीगेंगे हुई बरसात अब मोहे जाने दो 


                आई है ये रुत मस्तानी हुई कामना पूरी 
                पापी पपीहा पीहू पीहू बोले जाने क्या मजबूरी 
                जीवन भर का है साथ अब मोहे  जाने दो 
@मीना गुलियानी

Sunday, 20 March 2016

भूले भटके तुम आ जाना


सपनों की इस भूल भुलैया में
तुम अधिक नहीं खो जाना
दूर अमराई में है मेरा गाँव
भूले भटके तुम आ जाना

                 यहाँ शीतल बयार चलती है
                  रुत नित नया रूप बदलती है
                  जुगनू से तारे टिमटिमाते यहाँ
                   भूले भटके तुम आ जाना

बादलों में चाँद जगमगाता है
सच कहूँ कितना मन को भाता है
हर शिकवों को तुम भूल जाना
भूले भटके तुम आ जाना

                 चंचल है  पथिक मन मेरा
                 है प्रेम का सागर गहरा
                 दिल चाहे मुझे भटकाना
                भूले भटके तुम आ जाना
@मीना गुलियानी 

करते है कितना प्यार


कैसे बताएँ हम तुम्हें करते है कितना प्यार 
इतना कि जितने तारे गगन में है बेशुमार 

                 तुम ही हो अब चैन मेरा दिल में बसे तुम 
                 तुम हो संगीत मेरा और तुम ही इसकी  धुन 
                 हर जर्रे जर्रे पर तुम्हारा नाम ही शुमार 

हमने तो दिल कुर्बान किया तेरी चाह में 
तू चाहे तो अपना इसे या दे  भुला दे हमें 
हमने तो कर दी है तुझपे जान भी निसार 

                मेरी धड़कनों में तुम बसे हो राग की तरह 
                 बजती है इक मधुर तान गान की तरह 
                हर बोल पर तुम्हारा ही होता है इख्तियार 
@मीना गुलियानी 

कुदरत का वरदान है बेटियाँ



माँ बाप के दिलों में समाई है बेटियाँ 
हर सुख और दुःख में याद आई बेटियाँ 

                      बेटी के आगमन से घर का खिला हर कोना 
                      हर माँ का पूरा हुआ सपना वो इक सलोना 

छोटी थी तो अंगुली पकड़कर माँ बाप ने सिखाया 
स्कूल से कालेज की शिक्षा तक भी उसे पहुँचाया 

                    अब समझदार होते ही उसने संभाला चूल्हा चौका 
                    माँ को मिला सहारा किसी ने भी न उसको टोका 

अपनी सयानी बेटी को माँ बाप ने डोली में था बिठाया 
इक अजनबी के हाथों सौंपा कर दिया उसे पराया 

                    पर दिल उस बेटी का तो माँ बाप के यहीं था 
                    उसकी यादो का भोला बचपन भी यहीं था 

जब भी सुनी खबर कोई पीहर के सुख दुःख की 
वो दौड़ी दौड़ी चली आई हर पल की उसे फ़िक्र थी 

                      दोनों कुलों की शान बढ़ाती है बेटियाँ 
                     नारी के हर रूप में समाई है बेटियाँ 
@मीना गुलियानी 




पिया घर आओ जी


पिया घर आओ जी  न यूँ तरसाओ जी
मै करूँ इन्तज़ार तेरा जिया बेकरार मेरा
कदर तू न जाने मेरी, पिया घर आओ जी

                  कबसे तेरी बाट निहारूँ जी मेरा घबराये
                  इत उत डोलूँ रास्ता देखूँ तू नज़र नहीं आये
                  रास्ता तेरा देखूँ पिया करूँ और क्या
                  तू कर ऐतबार मेरा है दिल बेकरार मेरा

जबसे तुम बिदेस गए हो लौटके क्यों नहीं आये
 लिख भेजी कितनी पत्तियां कुछ न मोहे भाये
कैसे पिया लागे जिया न तेरे बिन ओ पिया
तू कर ऐतबार मेरा है दिल बेकरार मेरा

                  तेरे बिन ये सावन सूखा कैसे झूला झूलें
                 बिन तेरे बैरन भई  रतियाँ अरमां सारे भूले
                 मोरे पिया सुन ले ज़रा मेरी तू सदा
                  तू कर ऐतबार मेरा है दिल बेकरार मेरा
@मीना गुलियानी 

करलें बसेरा हम


नदिया के पार चलो , करलें बसेरा हम 
 ढूँढती रहे दुनिया , आएं न लौटके हम 

                दूर अमराइयों में कहीं हम खो जाएँ 
               इन्हीं प्यारी वादियों में नज़र नहीं आएं 
               हो जहाँ प्यार तेरा डालें वहीं डेरा हम 

कसम है चिनारों की कसम इन बहारों की 
कभी न जुदा हों हम कसम इन नज़ारों की 
खुशियों भरी हो डगर दूर हो जाएंगे गम 

                 प्यार का जादू तेरा इक नशा जगाने लगा 
                 तू तो अब सपनों में मेरे रोज़ आने लगा 
                 आँसुओं भरे दिन भी होने लगे अब गुम  
@मीना गुलियानी 

Saturday, 19 March 2016

ऐ मेरे हमनशीं हुआ क्या है

ऐ मेरे हमनशीं हुआ क्या है 
क्या तेरा है मर्ज और दवा क्या है 

मै तो कुछ जानती नहीँ तू बता 
अपनी हालत का पता मुझको बता 
सुनके कर दूँगी फैसला क्या है 

ग़मों को तुम दबाये बैठे हो 
कबसे मुझसे छिपाए बैठे हो 
आखिर इस उदासी का सबब क्या है 

कैसे इस जिंदगी को काटूँगी 
तू है चुपचाप कैसे दुःख बाटूँगी 
इस तन्हाई का सबब क्या है 

हम नहीं है गैर क्यों बताते नहीं 
दिल में यूँ गमों को भी छुपाते नहीं 
तुम्हीं कहदो ये माज़रा क्या है 
@मीना गुलियानी 

Friday, 18 March 2016

ज़रा सम्भल जाना


ऐ दिल तू होश में आके ज़रा सम्भल जाना
अब न नज़रें चुराना यूँ ही न मचल जाना

                 मै अपनी खोई हुई जिंदगी संवार तो लूँ
                 अपने बिखरे हुए जज़्बात भी निखार तो लूँ
                दिल तू  मुझको न बहकाना ज़रा सम्भल जाना

आज खुशियों की बारात मेरे द्वार आई है
मेरे दिल की कली भी आज मुस्कुराई है
इन हवाओं से कहदो अपनी सुरभि फैलाना

                मेरी जिंदगी में भी बहार आने तो दो
                मुझको जी भरके आज मुस्कुराने तो दो
                आंसुओ तुम अब मेरे करीब मत आना
@मीना गुलियानी 

मुस्कुराओगे तो जां आएगी


तेरे चुप रहने से जां चली जायेगी
मुस्कुराओगे तो जां में जां आएगी

               गेसुओं में न मुखड़ा छिपाया करो
               थोड़ा थोड़ा सा यूँ मुस्कुराया करो
               दिल की बुझती शमा फिर से जल जायेगी

मुझसे नाराज़ हो माफ़ कर देना तुम
हूँ खतावार मुझको सज़ा देना तुम
रुठने से घटा ये बरस जायेगी

                तेरे नाराज़ होने से बदला समां
                दिल की बेताबियों से उठता धुँआ
                खुश रहो हर तमन्ना निकल जायेगी
@मीना गुलियानी




नारी तेरे रूप अनेक


सरस्वती के रूप में तुम हो
लक्ष्मी के स्वरूप में तुम हो
बढ़े कहीं जब अत्याचार
दुर्गा काली रूप में तुम हो

                    खुशियो का सागर भी तुम हो
                    प्रेम का भंडार भी तुम हो
                    घर आँगन है  तुम्हीं से रोशन 
                    त्याग की पहचान भी तुम हो

संस्कारों की जान भी तुम हो
ममता की पहचान भी तुम हो
कोमलता का ऐहसास तुम्हीं से
शक्ति का अवतार भी तुम हो
@मीना गुलियानी 

क्यों ये नज़र फेरी है

जबसे तूने निगाह फेरी है 
दुनिया मेरी तो बस अँधेरी है 

                 किस जन्म का तूने बदला लिया 
                 ऐसा कौन सा गुनाह मैने किया 
                  क्यों ये बदली निगाह तेरी है 

जब तुझे मुझसे दूर जाना था 
तो मेरे यूँ करीब आना न था 
जिंदगी अब राख की ही ढेरी है 

                    मुझको अब चैन भी नहीँ आता 
                    बिन तुम्हारे रहा नहीँ जाता 
                    आई आफत में जान मेरी है
@मीना गुलियानी 

घर तेरा मेरा हो



पीछे उस पर्वत के अपना बसेरा हो 
जहाँ सिर्फ सुख ही हो दूर अँधेरा हो 

                 वादियों में जब गूँजे खुशियों के हों नगमे 
                गम कोसों दूर रहे साथ जब तेरा हो 

न हो कोई उदासी यहाँ प्यार बरसता हो 
तारे टिमटिमाते रहें फूलों से सवेरा हो 

                  घने पेड़ छाया करें वादियों की छाँव में 
                  खुशियाँ जगमगाएँ वहाँ घर तेरा मेरा हो 
@मीना गुलियानी 

Thursday, 17 March 2016

ये चाँद सितारे कहते है

फुरकत का कुछ आलम ऐसा है
खुद को भी बेगाने लगते है
तन्हाई से घबरा जाते है
परछाईं से खुद की डरते है

                    मंजिल की तमन्ना में भटके
                     काँटो से गुज़रते आये है
                    अब पाँव के छाले भी रिसते
                    हर गाम पे उठते गिरते है

रुसवाइयों के डरकर तो हमने
चेहरे पे नकाब भी पहनी मगर
ये शहरे वफ़ा के लोग हमें
हर मोड़ पे घूरा करते है

                  ऐ काश कोई हमदम होता
                  जख्मों को मेरे सहला देता
                   बेदर्द ये दुनिया वाले तो
                   हर जख्म कुरेदा करते है

बाहों का तुम्हारी गर मुझको
दम  भर जो सहारा मिल जाए
वो मौत हंसी होगी कितनी
ये चाँद सितारे कहते है
@मीना गुलियानी 

Wednesday, 16 March 2016

आओ कहीं छुप जाएँ


चाँद देखे न इधर आओ कहीं छुप जाएँ
नदिया के पार चलो आओ कहीं छुप जाएँ

                   पेड़ों के झुरमुट में करलें बसेरा हम
                   आज हरियाली की चादर ओढ़ ले हम
                   बादलों की छाँव तले आओ कहीं छुप जाएँ

फूलों से देखो पिया किसी सुगंध आने लगी
मन मदहोश हुआ मस्ती सी छाने लगी
शीतल बयार बही आओ कहीं छुप जाएँ

                   चाँद भी निकल आया तारे टिमटिमाने लगे
                  कोयल कूकी जब भंवरे गुनगुनाने लगे
                  चंचल चितवन ये तेरी आओ कहीं छुप जाएँ 

बनाते हो बहाना



सनम तुम बनाते हो हमेशा बहाना , बुलाऊँ कभी तो  तुम चले आना 

ज़रा अपनी पलकें झुकाके तो देखो 
कुछ पल ज़रा मुस्कुरा के तो देखो 
कितनी  कशिश है मेरे आँसुओ में 
तुम्हे खींच लाई दूर जाके तो देखो 
न जाना कभी मुझसे दूर न जाना 

                       भरोसा करो तुम ज़रा तो हमारा 
                      बाहों का अपनी दे दो सहारा 
                      सम्भालो हमें तुम तुम्हें अपना माना 
                      सताए न हमको ये  बेदर्द ज़माना 
                     अभी  पास आये  हो अभी तुमको जाना 
@मीना गुलियानी 

Tuesday, 15 March 2016

चाहत की घटा


ये नज़र झुकी झुकी 
आरजू घुटी घुटी 
चाहत की ये घटा 
फिर से उमड़  उठी 

               कहदो इन फ़िज़ाओं से 
               और इन हवाओं से 
               रास्ता न रोको तुम 
              मस्ती में हो जाएँ गुम 

गीत गुनगुना उठे 
फूल मुस्कुरा उठे 
कलियाँ बहार की 
मस्त है बयार भी 

              सुरभि लिए चली पवन 
               मस्त हो रहा गगन 
              झूम उठा तन और मन 
             क्यों न  नाचे गाएँ हम 
             @मीना गुलियानी 

ममता की भावना


हिरणी जो थी शावक के संग 
वन में विचरण करती स्वछन्द 

                 माँ ने देखा उसे प्रेमातिरेक से 
                 लिपट गया  था वो भी माँ से 

एक शिकारी ने जब शावक देखा 
साधा उसने बाण पाके मौका 

                हिरणी भांप गई उसे तत्क्षण 
                शावक बचाया किया समर्पण 

शिकारी का भी पसीज गया मन 
क्यों बींधा बाण से हिरणी का तन 

               शिकारी देख विचलित हुआ और जाना 
               ममता बच्चे के प्रति पशु में भी होती 

जब बच्चा हो असुरक्षित उसकी ममता है रोती 
सिर्फ इंसानो में नहीँ भावना ये सबमें है होती 
@मीना गुलियानी 

स्याम लगन लगी

पंछी बन डोले फिरुँ कुञ्ज गलियन में
स्याम लगन छाने लगी मेरे तन  मन में 

                 चले सन सन ये जब पुरवइया 
                 जिया झूमे है उड़ती चुनरिया 
                 पंख लगे झूमूँ अपनी ही लगन में 

तेरा मुखड़ा है सुंदर सलोना
प्रफुल्लित है मन का हर कोना
जाऊँ मथुरा तो कभी वृन्दावन में

                तेरी प्यारी छवि मन को भाई
                तेरी सूरत ये  मन में समाई
                देखूँ तुझे हमेशा मन उपवन में
@मीना गुलियानी 

थोड़ी देर और ठहर


मुझको यूँ छोड़ न जा दिल को यूँ तोड़ न जा
होने वाली है सहर  थोड़ी देर और ठहर 

                    अभी राहों में अँधेरा ही होगा 
                    रोशनी का नहीँ निशां होगा 
                    अभी चँदा को जगमगाने दे 
                    और तारों को टिमटिमाने दे

बादलों में तो छुपा है नूर मेरा
अब चिलमन उठाके चेहरा दिखा
इक झलक मुझको देख लेने दे
थोड़ी देर और मुझको जीने दे

                      तुझे जाने से किसने रोका  है
                       बस थोड़ी देर को ही टोका है
                      अभी आँखे भी मेरी तरसी है
                      बनके सावन अभी ये बरसी है
@मीना गुलियानी 


Monday, 14 March 2016

सिलसिला मिटे नहीं



चाहत का ये सिलसिला देखो कहीं मिटे नहीं 
देखलूँ तुमको जी भरकर  सिलसिला मिटे नहीं 

                     तुमसे मेरी ये विनती है पुकार मेरी सुन लो तुम 
                     घटा ज़रा बरस तो ले लाई फुहार सुन लो तुम 
                     ये चाँद जब भी आएगा तेरी ही यादें लाएगा 
                    तुम बिन न मेरा जी लगे सूना सूना जहाँ लगे 

अभी अभी तो आये हो ये शाम भी ढली नहीं 
तू प्रीत की पुकार सुन शमा अभी जली नहीं 
चंदा निकल तो ले ज़रा ये दिल सम्भल तो ले ज़रा 
दिल को ज़रा संभाल लूँ तुझको ज़रा निहार लूँ 
@मीना गुलियानी 

नदिया किनारे मेरा गाँव


नदिया किनारे मेरा गाँव तू मिलने आ जाना
शीतल ठण्डी छाँव तनिक सुस्ता जाना

                    बाजरा मक्का की मै तो  रोटी पकाऊँगी
                   अपने हाथों से सैंया तुझको खिलाऊँगी
                   छाछ भी पिलाऊँगी साथ तू जल्दी आ जाना

सरसों का मैने साग पकाया
खालिस घी उसमें मिलवाया
गुड रबड़ी का स्वाद चखने आ जाना

                 कितने चाव से चूरमा बनाया
                उपले बनाकर बाटी को पकाया
                ढेर से घी के साथ तू आके खा जाना
@मीना गुलियानी 

पायल मोरी बाजे ना

पायल मोरी बाजे ना
सखी जबसे गए मोरे पिया विदेसवा
मोहे कछु भी भाये ना

कासे कहूँ मै  दुखड़ा मोरी सखी री
नैनन निंदिया न अाये
जबसे पिया  विदेस  गए
मोहे कछु भी अब न भाये
काहे जिया तू लुभाये ना

कैसे भेजूँ लिख लिख पत्तियाँ
धड़के जिया मोरी कांपे छतियाँ
बरखा फुहार बैरन सी लागे
चंदन लेप सर्पदंश लागे
मोहे कछु भी सुहाए ना

बैरन हो गई दुनिया मोसे
पिया नाहिं इत पूछूँ तोसे
लागि करजवा चोट वो जाने
जिस तन लागी वही पहचाने
कोई तपन बुझाए ना
@मीना गुलियानी



आज आसमां छू लेंगे हम

आज  आसमां  छू लेंगे हम
पिया संग में ले चल मुझे तारों के पार
छोटा सा बना लें आशियाँ
दुःख का न हो कोई निशां

तू कहे जो आज अपनी मस्ती में
इस हवा के संग झूम लूँ
मस्ती है आज इन हवाओं में
 बादलों सी मै उड़ती फिरूँ
चाँद से कहदो  इधर
देखे न यूँ घूरकर
आती है मुझको शर्म
 करले अपना मुँह उधर

तारे गगन में देखो आज ये
कैसे है टिमटिमा रहे
जुगनू कैसे रात की
स्याही में जगमगा रहे
फूलो से खुशबू उडी
देखो मै तो उड़ चली
बादलों के गाँव में
प्रीत  घटाओं में
@मीना गुलियानी 

दिल की दास्ताँ


दिल की दास्ताँ तुम सुनो तो कहें
प्यार का है दुश्मन जहाँ तुम सुनो तो कहें

                   ऐसा भी क्या दर्द उठा अरमां सुलग उठे मेरे
                   मैने भी ये सोच लिया हो गए अब तो तेरे
                   दिल ने अपना  मान लिया तुम सुनो तो कहें

धरती अंबर दुनिया में कभी न मिलने पाते है
बादल इस  घर आँगन से बिन बरसे चले जाते है
कहदो  इनसे बरसे ज़रा तुम सुनो तो कहें

                  सपने भी बेगाने से ये  क्यों नहो होते अपने
                  रह गए दिल के अरमां दिल में पूरे हो कैसे सपने
                  इस दिल को ले जाएँ कहाँ तुम सुनो तो कहें
@मीना गुलियानी 

Saturday, 12 March 2016

दिल की बात


कितनी बार मिले तुम मुझसे
कितनी बार मै तुम तक आई
बन गई मै खुद अपनी बैरन
दिल की बात नहीं कह पाई

                     आई फिर वो शाम सिन्दूरी
                     बात रह गई मेरी अधूरी
                     सुधियों के बादल भी छाये
                     तुम तक बात पहुँच न पाई

संध्या ने आँचल फैलाया
देखो चाँद निकल भी आया
चम्पा चमेली की सुरभि ने
मन की ये बगिया महकाई

                     भंवरा फ़ूलों पर मंडराए
                    तितली रस पी झूमे गाये
                    पापी पपीहा शोर मचाये
                   मन ही मन मै क्यों अकुलाई
                  @मीना गुलियानी 

जिंदगी की कश्मकश



ये जिंदगी की कश्मकश कभी कम नहीं होती
क्या करें अपनी बेकसी कभी कम नहीं होती

                    तुझसे मिलने की तड़प बढ़ती जाती है
                    जिद अपनी  मिलने की कम नहीं होती

मायूसी का आलम हमसे न पूछिए
अपनों से बेगानगी कम नहीं होती

                  हमने तो रिश्ता -ऐ -उम्मीद तोडा सबसे
                  फिर भी तुझसे अदावत कम नहीं होती

उभरेंगे अभी और ये दिल के वलवले
दबाने से हसरते चाहत कम नहीं होती
 @ मीना गुलियानी 

जिंदगी का सफर


जिंदगी का सफर कितना भी मुश्किल हो
जब साथी हो साथ तो आसां लगता है

                   यूँ तो लगता है हर कोई अन्जाना सा
                   पर कभी कभी कोई अपना सा लगता है

यूँ तो बिन बात भी हम मुस्कुरा देते है
 किसी बात पर शर्माना अच्छा लगता है

                 जाने क्या सोचकर चुपचाप रह जाते है हम
                 उनका पलकें झुकाके मुस्काना अच्छा लगता है  
  @ मीना गुलियानी 

पत्थरदिल


खाई थी कसम तूने ओ सनम इक बार किसी के होने की
अब लौटके फिर से आती है आवाज़ वो पूरे होने की

                       तुम पत्थरदिल इंसान न थे किसने तुम्हे ऐसा बना डाला
                        किसने तुमको मोम के साँचे से ढलकाकर पिघला डाला
                       अरमानो की चिता से आती है आवाज़ किसी के रोने की

इस राख की चिंगारी में ओ सनम अरमान सुलगते है  मेरे
तुम ढूँढ़  न पाओगे मुझको पाओगे न कभी तुम निशां मेरे
फरियाद ये फिर भी करती हूँ आबाद तेरे खुश होने की    
@ मीना गुलियानी 

स्वयंभू थे वो सृजनहार


हे मौन तपस्यालीन यति
              पल भर तो करो दृग उन्मेष
बोली इक चंचल रमणी
              खोले तब उसने नयन द्वार
देखा उस कमनीय रमणी  को
              करदी तपस्या भंग जिसने
यति उठा उसे श्रापित करने
               पर तत्क्षण ही हृदयपटल पर
हो गई उसकी छवि अंकित
              परिदृश्य हुआ परिवर्तित
याद आया अतीत वृतान्त उसे
              थी पूर्व जन्म की सहधर्मिणी
अब न रही वो मृगछाला
              न रहे कंठ में सर्पहार
कैलाश में विचरण करने लगे
             स्वयंभू थे वो सृजनहार
    @  मीना गुलियानी

Friday, 11 March 2016

तू काहे पूछता है


तू काहे पूछता है मेरे गाँव का पता रे
मै काहे तुझे बताऊँ तू कौन है बता रे

                      मै हूँ गाँव की गुजरिया
                      न बस में तेरे आऊँ
                     मै चलाऊँ अपनी मर्जी
                     जी चाहे जहाँ जाऊँ

इन हवाओं संग लहरूँ
इनके ही संग गाऊं
लहरों के संग खेलूँ
मस्ती में गीत गाऊं

                       तू कहाँ का रहने वाला
                       इतना मुझे बता दे
                       क्यों आया तू यहाँ पे
                       इसका भी तो सिला दे

तेरे जैसा न यहाँ पर
दिल क्यों तुझे सदा दे
क्या छिपा है तेरे दिल में
इसका मुझे पता दे
@  मीना गुलियानी

Thursday, 10 March 2016

उसे समझो अपना


तू क्यों  करता है मेरी मेरी 
होना इक दिन राख की ढेरी 
नहीं सूझे तुझे रात घनेरी 

                    झूठे है सब  ये  रिश्ते नाते 
                   कोई न किसी का साथ निभाते 
                   वक्त पड़े सब साथ छोड़ जाते 

अपना दुःख न सबको सुनाना 
सबने इसे है फ़साना बनाना 
किसी ने न तुझे है अपनाना 

                   एक वही  है सहारा अपना 
                 दुनिया को  समझो सपना 
                 पाया जिसने उसे समझा अपना 
@मीना गुलियानी 

भोर हुई

बीती विभावरी जाग री
                    अंबर पनघट में डुबो रही
तारघट उषा नागरी
                     किसलय पराग मकरन्द लिए
भंवरे करें गुन्जन किसलिए
                      चारुचन्द्र की चंचल किरणें
जो खेल रहीं थी जल थल में
                      अब वो भी हो गई विलीन
सूर्योदय से अस्ताचल में
                      तारागण भी लगे  ढूंढने उनको
नीरव निशीथ अंबर में
                       जागे है पंछी हुआ सवेरा
फैला है चहुँ ओर उजाला
                        भोर हुई है जागो मोहन
भर भर लाई  रीता प्याला
                       जाग उठे वीणा के सुर भी
जग हुआ सुनकर मतवाला
                        नृत्य करती है धरा भी
पीकर प्रेम की मधुमय हाला
@मीना गुलियानी

तेरी मुस्कान




तेरी मुस्कान में है जादूगरी
ढूँढा इसे मैने नगरी नगरी


                  तूने इसे कहाँ से पाया है बता
                   कहाँ मिलती है पता तो बता
                   नहीं ढूंढ पाया गया नगरी नगरी


दिल तो तेरी मुस्कान पर मिट गया
कैसे मै सम्भालूँ गया मेरा जिया
कहाँ इसे ढूँढूँ फिरूँ नगरी नगरी
@मीना गुलियानी 

मुस्कुराते हुए जिओ



जीना है तो हँसते हँसते जियो 
मुस्कुराओ गम के आँसू पियो 


                  हँसो और दुःख सभी के ले लो 
                  गमों को तुम मुस्कुराके झेलो 


जीवन के यही पल तो अपने है 
मुस्कुराके करें सच जो सपने है 


                   कभी सुख है यहाँ कभी दुःख है यहाँ 
                   कभी आशा तो कभी निराशा है यहाँ


 सुख दुःख के मधुर मिलन से 
यह जीवन हो भरपूर 


                        कभी घन  में ओझल हो शशि 
                        कभी शशि में ओझल हो घन 
@ मीना गुलियानी 

Wednesday, 9 March 2016

दोराहा



बात इतनी बढ़ी कि उलझन में पड़ गए 
न पता था ऐसा भी कभी दोराहा आएगा 

                    हम तो बेखुदी में जहाँ को भूल बैठे थे 
                     क्या पता था ज़माना ये कहर ढायेगा 

जिस आशियाने को फूंक दिया 
इस ज़माने की चिलमन ने 

                    कबसे हम बैठे  इस फिराक में है कि 
                    कभी अपना मुक़ददर जगमगाएगा 

हम अपनी बर्बादी का सितम देख चुके है 
देखते है ज़माना और क्या गुल खिलायेगा 
@मीना गुलियानी 

ज़माने की नज़र बदली है


ज़माने की नज़र बदली है अब देखिए क्या हो
अब होने को है पास सहर देखिए क्या हो

                      जब पास थे तुम खुश थे बहुत चाँद सितारे
                     तुम पास हमारे थे तो हम पास तुम्हारे
                     अब बदली है तस्वीर मगर दखिए क्या हो

मालूम न था हमको कि कभी ऐसा भी होगा
जिसको नाखुदा समझा वो था आँखों का धोखा
अब मेरी भी आहों का असर देखिए क्या हो

                     मुमकिन है कि तेरे ये जज़्बात अलग है
                     पर मुझको गुमाँ होता है ख्यालात अलग है
                     पशेमानी में कट जाए उम्र देखिए क्या हो
@ मीना गुलियानी


कैसे करूँ बयां



कैसे करूँ बयां गमे जिंदगी को आज

फट गए है पाँव मंजिल की तलाश में चलते चलते
कोई तो आता मरहम लगाने आज

तुम पास होते तो बात कुछ और ही होती
न आँखे रोती  न दिल टूटता आज

लेकर चिराग भटकता हूँ मज़ारों के आसपास
 कोई तो करे रोशनी मेरी जिंदगी में आज

कब तक सहर गुज़रेगी यूँ ही तड़प तड़प कर
कोई हमदर्द तो गुज़रे मेरी गली से आज
@मीना गुलियानी 

वसंत ऋतु


देखो बादलों की ओट से फिर चंदा निकल आया 
कुमुद कुमुदिनी खिल गए  हर उपवन महकाया 

                   सूर्योदय की लाली से उषा का मन इठलाया 
                   पक्षियों के कलरव ने भी कैसा रंग जमाया 

कोयल फिर से लगी कूकने वृक्षों ने आम्ररस टपकाया 
घन  को घिरते देख मन मयूरा भी है कितना  हर्षाया 

                   नन्हीं नन्हीं बूंदो ने पत्तों को आज हुलसाया 
                   धरती आकाश के समक्ष इन्द्रधनुष छितराया 

शीतल सुगंधित बयार चली हर मन उपवन महकाया 
मिलकर खेलें आओ फाग अब  ऋतु वसंत है आया 
@मीना गुलियानी 

Tuesday, 8 March 2016

कैसे मै धीर बंधाऊँ


सखी री कैसे मै धीर बंधाऊँ
कैसे अपनी हर उलझन को
मन ही मन सुलझाऊँ

                  कैसे हरलूँ हर वो पीड़ा
                  दिल को जिससे दर्द मिला
                 टीस उठी जो सीने में तो
                कैसे मेरा खून जला
                 सखी री कैसे मै मुस्काऊँ

मेघ उमड़ आते है जब भी
रोता क्यों दिल आज मेरा
याद आई वो बरसातें फिर
सावन सूखा आज मेरा
सखी री  क्यों मै नीर बहाऊँ

              धरती अंबर आज तलक भी
               क्यों नही मिल पाते है
               दरम्याँ के फांसले भी
               क्यों नहीं मिट पाते है
               सखी री मन ही मन अकुलाऊँ


@मीना गुलियानी 

कौन हो तुम


कौन हो तुम मेरी मन वीणा की तारों को छेड़ दिया
किसने मेरे सोये हुए अरमानों को फिर से छेड़ दिया

                   मेरे उर में प्राण फूंककर कर दिया इसे पुन :जीवन्त
                   पीड़ा हरके हृदय की तुमने टूटी तारों को जोड़ दिया

हृदय झंकृत होने लगा अंगुलियों से कम्पित स्वर निकले
तुमने मधुर आलाप लिया और मन वीणा को छेड़ दिया

                      जीवन है क्षण -भंगुर जब जाना तबसे अब जागा
                      तुमने आकर मन की सोई रागिनी को छेड़ दिया

अमर गान फिर होने लगा और वेदना के सुर निकले
दिल के अरमां जगते गए मृदु तान को तुमने छेड़ दिया


@मीना गुलियानी 

नवीन राष्ट्र का निर्माण



आओ नवीन राष्ट्र का निर्माण हम करें

अरुणोदय की है बेला
मधुर मस्त नज़ारे
नवजागरण का  गान गाएं
नभ के ये तारे
बीती विभावरी दुखी मन शान्त हम करें

दुःख दूर करें
 उजियारा फ़ैलाएँ
घर घर जलाके दीप
अन्धकार हम मिटाएँ
हर उपवन फ़ूलों से गुलज़ार हम करें

हो देश में खुशहाली
हर भेद को मिटाएँ
लेके उजाला ज्ञान का
अविवेक हम मिटाएँ
अब अमन  के सुरों की झंकार हम करें


@मीना गुलियानी 

मुझसे रहा जाता नहीं



बिन तेरे मुझसे रहा जाता नहीं
कुछ भी अब मुझको पिया भाता नहीं

                 कैसे कहदूँ क्यों हुई मै दूर हूँ
                 तुझसे मिलने के लिए मजबूर हूँ
                 तेरे बिन अब चैन भी आता नहीं

छीना तुमने जबसे मेरे दिल का चैन
तबसे मेरे व्याकुल है ये दोनों नैन
कैसे देखूँ कुछ नज़र आता नहीं

                  बिन तेरे गलियाँ मेरी ये उदास है
                 वीरान सी रहती सदा चुपचाप है
                 अब तो ये चंदा भी इतराता नहीं 

Monday, 7 March 2016

ऐसी मुहिम चलाना

मिलकर हाथ बँटाना साथी आगे आना
पहुंचे शिक्षा हर गाँव में ऐसी मुहिम चलाना

                      कोई भी बच्चा रहे न वंचित शिक्षा के अभियान में
                       हर बच्चा सुयोग्य बने पहुँचे शिक्षा हर गाँव में
                       हर अभाव दूर करें हम शिक्षा की अलख जगाना

मूलमंत्र है यही हमारा तकनीकी ज्ञान बढ़ाएँ
 हर बच्चा पढ़  लिखकर स्वालम्बी बन जाए
हर बच्चे का उज्ज्वल भविष्य ज्ञान से बनाना

                       तकनीकी ज्ञान में निपुण होने से  होगा कौशल विकसित
                      जब वो ज्ञानी विज्ञानी होगा तो न रहेगा फिर  वो कुण्ठित
                       उसका ज्ञान विज्ञान हो विकसित ऐसा पाठ पढ़ाना



@मीना गुलियानी 

उस पार मैने देखा था



कैसे भुला पाऊँगी वो मन्ज़र उस पार जो मैने देखा था 

                    तेरा मदभरा हास्य चेहरे पे खिला लास्य 
                    कामदेव शर्मा जाए वो रूप तुम्हारा देखा था 

सीने पे बिखरे गेसू और उसमे छुपा तेरा चेहरा 
मदहोश कर देने वाला वो रूप तुम्हारा देखा था  

                   होठों को बन्द करके जो तुमने कहा वो मैने सुना 
                   उस बंद खामोशी में भी तो तूफ़ान उमड़ते देखा था 

तेरी पलकें भी झुकी रहीं मेरी साँसे भी रुकी रहीं 
तेरी उस सूनी चितवन से सैलाब पिघलते देखा था 

मेरा सपना



देखो मेरा भी  है  इक सपना
सुंदर प्यारा सा हो घर अपना

                जहाँ बड़ों का हो सम्मान
                छोटो को मिले प्रेम  और ज्ञान

सबका मान बढ़ाना है
जीवन सफल बनाना है

               इस सपने को सजाना है
              अपना घर महकाना है 

प्यार तेरा पाने को



खोया हमने सब कुछ अपना प्यार तेरा पाने को
तूने भंवर में छोड़ा हमको दर दर भटकाने को

                   एक उजाला मेरी जिंदगी पाने से भी महरूम रही
                   घुटती रही मेरी सांसे पर जीने को मजबूर रही
                   रोती है यूँ मेरी मुहब्बत घुटके मर जाने को

मालूम न था प्यार में हमको ऐसे दिन भी आएंगे
जो कल तक थे हमको प्यारे बेगाने बन जाएंगे
फूट फूट कर रोया है दिल प्यार तेरा पाने को

                  ऐसा धड़का है मेरा दिल फिर से धड़कना भूल गया
                  खोया सब संसार में इतना रोने पर मजबूर हुआ
                  राह में तूने छोड़ दिया क्यों ठोकरें खाने को



@मीना गुलियानी 

Sunday, 6 March 2016

मुस्कुराते रहो

मुस्कुराते रहो गुनगुनाते रहो
खुश रहो और खुशियाँ लुटाते रहो

                 सोचो साथ तेरे और क्या जाएगा
                 हँसके हर पल ख़ुशी से गुज़र जाएगा
                  मुस्कुरा के गमो को भुलाते रहो

कारवां वक्त का यूँ गुज़र जाएगा
मुस्कुराओगे बचपन लौट आएगा
हर पल हँसते हँसते बिताते रहो




@मीना गुलियानी 

मुश्किल है मेरे सामने



हाले  दिल मै क्या कहूँ 
मुश्किल है मेरे सामने 

                    किश्ती जो है तूफां भी है 
                    पतवार जो है साहिल भी है 
                    सौंपा दिल जिस दिलबर को 
                    इक वो ही नहीं मेरे सामने 

न हो रूसवा किसी का तोहफ़ा 
बनके दिलबर दे गया धोखा 
इस महफ़िल का क्या करूँ 
कातिल है जो मेरे सामने 



@मीना गुलियानी 

तेरे ख्याल



तेरे  ख्याल आये तो आते चले गए
हम राज़ अपने दिल में छुपाते चले गए

                  तेरे दीद  की हसरत लिए बैठे थे कभी से
                 तुम आये तो हम सबको भुलाते चले गए

तेरे अाने से रोशन हुआ मेरा सारा जहाँ
किश्ती को हम किनारे पे लाते चले गए

                  दिल डूब रहा था मेरा गम के भंवर में
                  मिला सुकून जो तुम साथ हमारे चले गए


Saturday, 5 March 2016

गाये कोयलिया काली


सखी गाये कोयलिया काली
सखी झूमे वो डाली डाली
झूमे तितली भी बन मतवाली

                       फूलों पे फिर से शबाब आ गया है
                       खिलना उन्हें भी रास आ गया है
                       भाये फूलों की सुगंध मतवाली

टूटे पेड़ों के पत्ते पुराने दिन आए है बड़े सुहाने
हरे पत्ते और नव-कोंपले लिए फूल लगे मुस्काने
पँख फैलाये हुए वन में नाचे मयूर देखो आलि


@मीना गुलियानी 

दहेज़ प्रथा - एक कलंक


ऐ भारत के युवको तुमको आज सामने आना होगा 
दहेज़ है एक बुरी प्रथा इसको आज मिटाना होगा 

                      फिर न टूटे रिश्ता कोई दहेज़ के कलंक से 
                      फिर न टूटे दिल किसी का दहेज़ के कलंक से 
                      समाज से समूल ही तुमको कलंक मिटाना होगा 

कोई पिता की न हो बर्बादी इस झूठे रीति रिवाज़ से 
किसी की कन्या रहे न कुँवारी दहेज़ के अभिशाप से 
माना है बड़ा धर्म सकंट तुमको ये अलख जगाना होगा 

                         तुम इस  भारत के बेटे हो तुम कुछ भी कर सकते हो 
                        अगर ठान लो मन में तो संताप सभी का हर सकते हो 
                        हर बेटी के पिता की मर्यादा को तुम्हें बचाना होगा 

तुम भारत  माँ के सपूत हो जो झुका न किसी रण में 
यह भी ऐसा कर्मक्षेत्र है फूँक दो जान इसी प्रण में 
कोई न लेगा अब दहेज़ अब इसे समूल मिटाना होगा 


@मीना गुलियानी 

तेरी चौखट थामे बैठे है


सारी दुनिया को ठुकरा के हम
तेरी चौखट थामे बैठे है

                तूने तो हमको भुला दिया
                हमने न तुमको बिसराया
                सरे दर्दो गम झेले हमने
                हर दर्द छुपाये बैठे है

तुझको रूसवा होने न दिया
इल्ज़ाम तुम्हारा हमने लिया
हर चोट गंवारा है हमको
दिल अपना लुटाए बैठे है

               तेरे आशिक है शिकवा तुझसे
               तू हमको कैसे भूल गया
              सारी उम्र गुज़ारी सजदे में
              सर अपना झुकाये बैठे है



@मीना गुलियानी 

आज मिलन की बेला है

पिया से मिलन को मन तरसे क्यों तरसे
आज मिलन की बेला है
सर से चुनरिया क्यों सरके जी धड़के
आज मिलन की बेला है

आज पपीहे पी पी मत करियो
रहना तू चुपचाप
मेरे साँवरिया पहचानेंगे
जानेंगे मन की बात
देखूंगी ज़रा धीरज धरके --------आज -----

आज सखी तू पिया से न कहियो
मेरे मन की बात
फूलों पे गुँजन से करता
भंवरा मन की बात
प्रीत की छोड़ूँगी पिचकारी भरके --आज -----

आज तो होली के रंगो से
कर दूँगी सराबोर
ऐसा रंग मलूँगी उनपे
देखें न चित्तचोर
मन में उमँगो के रंग भरके--------आज ------


@मीना गुलियानी 

Friday, 4 March 2016

तुम्हारी पदचाप


ये तुम्हारी पदचाप मुझे सुनाई दे रही है
लगता हे जैसे आवाज़ मुझे दे रही है

              दूर की अमराइयों से घने जंगलों से
              कोई बांसुरी सी बजती सुनाई दे  रही है

ख़ामोशी के दामन से घटाओं के आँचल से
इक खुशबु सी उड़ती दिखाई दे रही है

               बहता हो कोई झरना जैसे टकराये साहिल से लहर जैसे
              ऐसी ही इक मौज मन में उमड़ती दिखाई दे रही है

तुमसे मै दूर नहीं कलियों के पीछे झुरमुट से
तेरे दिल की धड़कन मुझे सुनाई दे रही है

               जुल्फों की घनी छाँव जेसे मेहँदी लगे पाँव जैसे
               पायल की छम छम बजती सुनाई दे रही है

हर आहट पे खटका हो जैसे बदन में सिहरन हो जैसे
तेरी हर अदा बन्द आँखों से भी दिखाई दे रही है






@मीना गुलियानी 

दिल है परेशां


ज़माने वालो न सताओ हमको कि हम है खुद से परेशां 
दिल टूटेगा फिर न जुड़ेगा कि हो न जाए बदग़ुमाँ 

                हर शाख से पत्ता पूछेगा, गिरने का सबब जानेगा 
                हर हाल में फिर भी जीना है लेना न और इम्तहाँ 

न थी कोई बेवफाई  जिसकी ये सज़ा मिली 
जाने न हम फिर भी रहते है यूं तन्हा परेशां 

                मंजिल की तालाश में भटकते रहे मिली न रहगुज़र 
                न पाये अभी तक कहीं हमने उम्मीदों के निशां





@मीना  गुलियानी 

दुनिया को है भुलाये हुए



तुम्हारी याद में दुनिया को है भुलाये हुए 
ज़माना गुजरा है अपना  ख्याल आये हुए 

                         हज़ार पर्दे पहरे लगा ले ये दुनिया 
                        रहेंगे मेरी  नज़र में तो वो समाये हुए 

तुम्हारे हुस्न की बस इक झलक ही काफी है 
बुझा दो सारे  चिरागो को जो जलाये हुए

                        मै तो तेरी याद से दिल में उजाला कर लूँगा 
                        ये लोग क्यों मेरे आगे है शमा लाये हुए 

तमाम उम्र गुज़ारी है हमने तो  तेरी राहों में 
बाकी कट जायेगी सज़दे में तेरे आये हुए 

जाओ न परदेस (माँ की फरियाद)


विनती है कर जोड़कर , मुझे अकेला छोड़कर 
जाओ न परदेस 
कैसे मै जी पाऊँगी,  जीते जी मर जाऊँगी 
जाओ न परदेस 

सीने से आके लिपट  मेरे 
भूल पाऊँ न तुझे 
माँ हूँ तेरी भूल न 
फिर लौटके आना तुझे 
रास्ता तेरा देखूँगी 
तारे गिन  गिन रोऊँगी ---------जाओ न परदेस 

याद तेरी आएगी
 हर पल ये तो रुलाएगी 
सपने में भी लोरी गाकर 
माँ तेरे को सुलायेगी 
बेटा जब सो जाएगा 
दिल को चैन आ जाएगा -----जाओ न परदेस 

वादा ये करले तू मुझसे 
तू न भूलेगा मुझे 
ये तेरी बचपन की गलियाँ 
याद आएँगी तुझे 
चंदा जब भी आएगा 
तेरी याद दिलाएगा -------जाओ न परदेस 

Thursday, 3 March 2016

माँ की ममता



किसी के लख़्ते जिगर का टुकड़ा जब दुखी होता है 
यह सच है कि उसकी माँ का दिल भी रोता है 

                संभाला कोख में अपनी फिर पाला पोसा 
                बड़ा हुआ तो जवानी में घर बसाया उसका 

लाई  वो ज़न्नत से परी  अपने लख़्ते जिगर के लिए 
पर खुद महरूम रह गई उसकी प्यार की नज़र के लिए 

               जब वो थका मांदा घर लौटता चौखट पे माँ होती 
               हर एक उसकी सदा पे वो अपनी जां लुटा देती 

पर उसने कब माँ के अरमानों का मोल चुकाया 
बीमार बूढ़ी होने पर उसे वृद्धाश्रम छोड़ आया 

                तिल तिल उसे याद करते करते उसकी याद में वो मर गई 
                मरते मरते भी सारी जायदाद उसको वसीयत कर गई 

यही है उस माँ की ममता की कहानी 
जिसे सुनकर भर आता आँखों में पानी  

अपना नसीब है



लिखा है सबका उसी ने तो नसीब है 
मिलता वही जो होता अपने नसीब है 

                नदिया के दोनों दूर है किनारे 
                मिल जाए मांझी तो वो पार उतारे 
                हो जो पतवार तो किनारा भी करीब है 

सबको बनाया उसने माटी वो एक है 
मिली जिंदगानी जैसे कर्मोँ के लेख है 
जिसको संवारा उसका चमका नसीब है 

सरूर तेरे प्यार का



छेड़ गया फिर से फ़साना कोई प्यार का 
दिल मेरा खो गया पूरा नशा हो गया 

                  अरमां यूं जगने लगे ख़्वाब कई सजने लगे 
                  दिल के अधूरे सपने आँखों में सजने लगे 
                  हवाओँ ने घोल दिया रस उसमें बहार का 

मस्ती सी छाने लगी है नींद सी आने लगी है 
कोई न रोके मुझे अब खुमारी सी छाने लगी है 
जाने ये  कोई जादू या सरूर तेरे प्यार का 

कैसे उतरूँ पार


ओ मोरे साजन तू रहे उस पार 
नदिया गहरी नाव बीच मंझधार 
बिन मांझी कैसे उतरूँ उस पार 

                  ओ सपनों के मीत मेरे 
                  गाऊं कैसे गीत मै तेरे 
                  टूटे मन वीणा के तार 

दूर कहीं जब कोयल बोले 
सुनके कुहुक मेरा मन डोले
 पपीहा पीहू पीहू छेड़े मल्हार 

                  मंजिल मेरी कितनी अपार 
                  कितने घातक  होते प्रहार 
                  टूटे सपनों के अखिल हार 

करते हो बेकरार किसलिए


करते हो हमको बेकरार आप किसलिए
छेड़ते मन वीणा के तार किसलिए

              लिए फिरते गमो को दिल में छिपाए
              चुपचाप बैठे हो यूँ बेज़ार किसलिए

हमसे न कहोगे  तो किससे कहोगे
रोते  हो तुम ज़ार ज़ार किसलिए

            ठुकरा दो उस जहाँ को जो तुम्हें सताए
            इस मतलबी जहाँ से प्यार किसलिये 

दिल को कैसे धीर बँधायें


हम  दिल को कैसे धीर बँधायें
कैसे इसके सूनेपन को मिटाएँ

                 यह तो हवा चलने से काँप उठता है
                 ज़माने की ठोकरों से भी डरता है
                कैसे हम इसका डर दूर भगाएँ

इस दर्दे गम की दवा क्या  है
तुम्हीं बताओ माज़रा क्या है
किसे हम हाल दिल सुनायें

                   कैसे सुकून मिलेगा इस ज़माने में
                 थक चुके है हम  तोहमतेँ उठाने में
                 थकान इस  जिया की कैसे मिटाएँ

गम से बोझिल हुआ मन दूर तेरे जाने से
जी उठेगा फिर बुझा मन एक तेरे आने से
दिल के अरमानो को फिर से हम जगाएं 

Wednesday, 2 March 2016

मै क्या करूँ



मेरे दिल में समा  गया कोई रे 
मेरी निंदिया उड़ाए मै क्या करूँ 

                  होले होले वो अाया दिल के पास रे 
                  छीन लिया दिल उसने बेबाक से 
                  ऐसे चुपके से आ गया कोई रे 
                  दिल में प्रीत जगाये मै क्या करूँ 

पहले छीन ली आँखों से निंदिया 
फिर हवा ने उड़ाई मोरी बिंदिया 
मुझे सोते से जगा गया कोई रे 
मीठे सपने दिखाए मै क्या करूँ 

                    जब बन में कोयलिया बोले 
                     दिल खाए मेरा हिचकोले 
                    मनवा मोरा चुरा गया कोई रे 
                    कुछ मन को न भाये मै क्या करूँ 

उदासी देखी नहीँ जाती


तेरी आँखों की वीरानगी देखी नहीं जाती 
तेरे दिल की उदासी मुझसे देखी  नहीं जाती 

               दिल खोलके रखदो तुम आज मेरे आगे 
               मुझसे तेरी बेबसी देखी नहीं जाती 

क्या करेंगे गर यूँ ही मुँह फिरके बैठोगे 
मुझसे तो तेरी ये बेरुखी झेली नहीं जाती 

                कुछ बात करो हँस दो चिलमन को उठाकर 
                मुझसे तो ये दीवार भी तोड़ी नहीं जाती 

घर आना परदेसी बलम



घर आना परदेसी बलम 
मेरे घर आना 

आप भी आना संग पुरवईया लाना 
सावन की आई बहार ------बलम ---

आप भी आना संग चूड़ियाँ लाना 
मेहँदी से रचाऊँगी हाथ ------बलम --

आप भी आना संग टीका भी लाना 
पायल और बिछिया साथ ---बलम ---

फूलों से देखो मंडप सजा है 
चम्पा चमेली की बहार -----बलम ----

शबे इंतज़ार


कैसे मकाम पे जिंदगी लाई है मुझे
न ख़ुशी न गम पे है इख्तयार मुझे

                  देना है तमाम उम्र का हिसाब मुझे
                  दिल तो फ़िदा है कैसे कहेगा तुझे

चिलमन के उस पार तूने बुलाया है मुझे
कैसे करूँ मै यकीं तू याद करता है मुझे
 
                 ज़मीं से उस आसमाँ तक दिखता गुबार मुझे
                 हसरते दीदार की शबे इंतज़ार होगी हासिल मुझे 

वो मिलेंगे कहाँ



कैसी चली हवाएँ गम 

                     मिट गए सभी निशां 

कोई तो मुझे बताए 

                   कैसे ढूँढूँ पिया का गाँव 

ऐ हवा ज़रा धीरे चलो 

                   मिटने लगी राह से छाँव 

कैसे पाऊँ पिया के निशां 

                 कारवां गुज़र गया 

रह गया बस धुँआ 

               उड़ती हवाओ बताओ 

पिया मिलेंगे मुझे कहाँ 

Tuesday, 1 March 2016

जीवन मिले न बार बार


सोच ज़रा मन अब तो करले यत्न , अपने जीवन में करले तू थोड़ा सुधार
जीवन मिले न बार बार -  जीवन मिले न बार बार


पी ले प्याला प्रेम का
मस्ती में तू दुनिया भूल जा
उसके नाम की लगन में तू
दुनिया की हर ख़ुशी को भूल जा
माया ये भटका रही जिंदगी ये जा रही
दो घड़ी बाकी रही वो भी बीती जा रही ----------सोच ज़रा ----------------


मस्ती उसके नाम की
ऐसी खुमार बनके छा  गई
राधा नाम की इक रटन
सांवरे के मन को भा  गई
जहाँ पड़े राधा चरण श्याम जी होके मगन
गोकुल के धाम से पहुँचे वो वृन्दावन -----------सोच ज़रा ------------------