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Wednesday, 26 July 2017

फिर से ज़रा आज जगमगाओ

आज तुम आँसू मत बहाना
दर्द को भी समीप मत लाना
आज तुम केवल मुस्कुराना
मत बनाना कोई भी बहाना

लहरों का ठहराव कहाँ होता है
जिंदगी को भी चलना होता है
उलझने भटकाव आते जाते हैं
समय की नाव को खेना होता है

पतझड़ हमें कहाँ सुहाता है
लेकिन वसन्त गुनगुनाता है
गर्मी में सूरज तमतमाता है
सर्दी में वही मन को भाता है

आज भूलकर कड़वे पलों को
जीवन में फिर प्रीत जगाओ
ढलती हुई जीवन की शाम को
फिर से ज़रा आज जगमगाओ
@मीना गुलियानी




2 comments:

  1. सिर्फ कहने या सोचने उसके लिए वैसा माहोल एवं साधन की अवश्कता होती है|वह कैसे उपलब्ध होगी| .
    ...... शुभ संध्या गुलियानी जी..

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  2. Sirf Kehne Ja sochne se kaam nahi Banta uske liye waisa Mahol hey Varma sadhan ki avashyakta Hoti Hai Wahan Kaise clubbed Hogi ok thank you dhanyavad g

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