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Thursday, 20 July 2017

यादों का वो सिलसिला

आज ख़ुशी के मारे उसकी चीख जो निकली
लगा जैसे आसमां से कौंधी हो बिजली
तेरे आँचल को लहरा के पवन हँसके निकली
बरखा की बूंदे तेरे मुखड़े से झूमके निकली

बहारें गुनगुना उठीं पायल झनझना उठी
गीत ले  बहारों के तितलियाँ मुस्कुरा उठी
फूलों से महके गुंचे तमन्नाएँ खिलखिला उठी
हथेलियों से मुँह छिपाए अदाएं झिलमिला उठी

सितारों की कायनात सजी चाँद दूल्हा सजा
रात की तन्हाइयों में रजनी का मुख सजा
सिहरते ,दुबकते ,बादलों का देखो चला काफिला
शर्माते , सकुचाते थमा यादों का वो सिलसिला
@मीना गुलियानी

1 comment:

  1. मीना जी हमेशा की तरह लाजवाब रचना।शुभ रात्री।

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