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सोमवार, 26 मार्च 2018

बात यूँ सताने की

उनको आदत है दिल दुखाने की
हमको आदत है फ़रेब खाने की

जाने क्यों रूठके यूँ बैठ गए
राज़ न खोला छिपाके बैठ गए
उनको आदत है रूठ जाने की

मिन्नतें खुशामद गवारा न तुझे
मनाऊँ कैसे तू ही बता दे मुझे
बिना मनाए लौटके न जाने की

ख़ता नहीं है फिर भी मुझे माफ़ करो
मुस्कुराके अपने दिल को साफ़ करो
मान जाओ न करो बात यूँ सताने की
@मीना गुलियानी 

रविवार, 25 मार्च 2018

तेरी याद

हर रोज़ सुबह की धूप
खिड़की के झरोखों से
छनकर मुझ तक आती है
फूलों और पत्तों पर
चमक अपनी लुटाती है
मलयानिल के झोंके भी
सुरभि ,मकरंद लाते हैं
उनकी महक जादू जगाती है
हवा में जब तुम्हारी ज़ुल्फ़
यूँ ही लहराती है
लगता है कोई बदली
घुमड़कर छा  जाती है
साँसों में इक सिहरन
सी दौड़ जाती है
धड़कन मेरी थम जाती है
तेरी पायल की रुनझुन
मधुर गीत सुनाती है
दिल पे बिजली सी
कौंध कौंध जाती है
शाम  होते ही  तेरी याद
मुझ तक दबे पाँव
रोज़ चुपचाप चली आती  है
दिल में हलचल मचाती है
नई पुरानी यादें दोहराती है
जब मैं थक जाता हूँ
अपनी आग़ोश में सुलाती है
@मीना गुलियानी

शनिवार, 24 मार्च 2018

एहसास

तुम मेरे पास नहीं हो
फिर भी तेरे  पास  होने का
एहसास मुझे होता है
हर पल तुम्हारी यादोँ का
मेला सा लगा होता है
हर वो लम्हाा  मेरे लिए
बहुत ही ख़ास होता है
तुम्हारी शरारतें वो बातें
सब दिल के पर्दे में
उतर सी आती हैं
दिल की धड़कनों को
यूँ ही वो बढ़ाती हैं
तेरे साये का अक्स
अक्सर ही साथ होता है
दिल के आईने में तेरा
चेहरा छिपा होता है
तुम हमेशा यूँ ही मुझसे
लुकाछिपी खेला करते हो
कभी हँसाते कभी यूँ ही
मुझे रुलाते और मनाते हो
मेरे सपनो में गुनगुनाते हो
मेरी उदासी दूर भगाते हो
अपनी कमी का एहसास
कभी  न होने देते मुझे 
मेरी कल्पना में समाए जाते हो
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 23 मार्च 2018

माता की भेंट -हृदय में जगाओ प्रीत

अब देर न कर हे माँ तुझे तेरे भक्त बुलाते हैं
आके विनती ज़रा सुनलो तेरे बिन चैन न पाते हैं

बरसे नयन मेरा तरसे है मन
 ऐ मैया तू दर्श दिखा जा
तेरे दर्श बिन तड़पे है मन
मेरी मैया तू जल्दी से आ जा
ये जीवन न जाए बीत-------------तुझे------

माता मेरी जगदाता तू ही
अब तो मैया जी दर्श दिखाओ
नैया भंवर में डोले मेरी
आके मैया जी पार लगाओ
मेरी मैया मिटाओ भव भीत ------ --तुझे-----

काम क्रोध मद लोभ मोह ने
मैया जी मुझको है घेरा
आके बचाओ जान मेरी
ये चौरासी वाला है फेरा
हृदय में जगाओ प्रीत ------------------तुझे-----
@मीना गुलियानी




वो लम्हा मेरा होता है

हर आहट पे तेरे आने का गुमा होता है
दिल के दरवाज़े पे खटका तेरा होता है

पहरों बीत जाते हैं तेरी यादों में
हर लम्हे में तजुर्बा नया होता है

तुमको फुरसत नहीं मिलती आने की
हम पे इस ज़माने का पहरा होता है

दिखाएँ जख्म तुम्हें क्या उल्फत के
क्या बताएँ दिल में दर्द कहाँ होता है

हम तो तेरी चौखट पे सजदा करते हैं
बड़ा पोशीदा वो लम्हा मेरा होता है
@मीना गुलियानी 

माता की भेंट -सब दास्तां बता दे

तेरे द्वार कैसे आऊँ मैया ज़रा बता दे
मँझधार में फंसी हूँ तू ही रास्ता बता दे

घेरे हुए हैं मुझको रंगीन वासनाएँ
मन का नहीं भरोसा पग पग पे जो दगा दे


मुझमें वो बल कहाँ है जो तुझे यहाँ बुला लूँ
निर्बल को दे सहारा, भव पार तू लगा दे

लाखों उबर गए हैं तेरे नाम के सहारे
सौलह भुजाओं वाली मुझको भी आसरा दे

कैसे सुनाऊँ तुमको, अपनी करुण कहानी
शायद ये मेरे आंसू ,सब दास्तां बता दे
@मीना गुलियानी



गुरुवार, 22 मार्च 2018

वफ़ा में मेरी कमी नहीं है

लबों की बातें हम सुन न पाए
नज़र भी उनकी झुकी हुई है
कहीं थीं तुमने हँसते हँसते
बातें वहीं पर रुकी हुईं हैं

जवाब मांगो तो क्या कहूँ मैं
कैसे तुम्हारा  जिक्र करूँ मैं
ह्या से चेहरा उठा न पाओ
नज़र तुम्हारी झुकी हुई है

बताओ दिल में क्या है तुम्हारे
खुले हुए हैं गेसू तुम्हारे
आँखों में कितना गहरा तूफां
बरसात जैसे बनी हुई है

जो न कहोगे और चुप रहोगे
करेंगे तेरा इंतज़ार फिर भी
सुनेंगे तेरी तो हम सदायें
वफ़ा में मेरी कमी नहीं है
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 21 मार्च 2018

माता की भेंट - भक्तों का करती है उद्धार

माँ जगदम्बे जी के द्वार जो भी करता है पुकार
आस पुजाये, माँ अम्बे , सुन लेती है पुकार

माँ जगदम्बे की शान निराली
लौटा न खाली कोई यहाँ से सवाली
सुनके करुणा भरी पुकार ,शेरों पे होके सवार
आके अम्बा हर लेती सबके दुखड़े अपार

जो भी मैया जी की आस लगाए
मैया जी उसकी हर आस पुजाये
माँ की महिमा अपरम्पार ,प्रेम की शीतल चले फुहार
मैया अम्बे  जगदम्बे ,कर देती भव से पार

राजा हो या कोई भिखारी
सब हैं बराबर यहाँ नरनारी
माँ के भरे हुए भंडार ,लेवे नाम जो होवे  पार 
माँ जगदम्बे जी भक्तों का करती है उद्धार
@मीना गुलियानी


मंगलवार, 20 मार्च 2018

माता की भेंट -अज्ञान को मिटाओ

हे अम्बिके भवानी दर्शन मुझे दिखाओ
अन्धकार ने है घेरा ज्योति मुझे दिखाओ

मैया तेरे ही दर का मुझको तो इक सहारा
नैया भँवर में डोले सूझे नहीं किनारा
मँझधार से निकालो नैया मेरी बचाओ

लाखों को तूने तारा भव पार है उतारा
बतलाओ मेरी माता मुझको है क्यों बिसारा
बच्चा तेरा हूँ मैया मुझको गले लगाओ

सूनी हैं मेरी राहें आँसू भरी निगाहें
बोझिल हैं मेरी साँसे दुःख कैसे सुनाएं
गम आज सारे मेरे मैया तुम्हीं मिटाओ

तेरा नाम सुनके आया जग का हूँ माँ सताया
मुझको गले लगालो तेरी शरण हूँ आया
रास्ते विकट हैं मैया अज्ञान को मिटाओ
@मीना गुलियानी



माता की भेंट -

माता की भेंट -छोड़ दिया जग सारा

मेरी मैया मेरा तुझ बिन दूजा न और सहारा
मेरी नाव भंवर में डोले माँ सूझे नहीं किनारा

तुम आके पार लगाओ माँ आप ही जान बचाओ
मुझे पार करो इस भव से नैया को पार लगाओ
माँ तेरे भरोसे पर ही मैंने जीवन को है गुज़ारा

माँ मैंने यही सुना है तू विपदाओं को मिटाती
माँ सबके दुखड़े हरके रोतों को तू है हँसाती
मेरी भी विनती सुनलो इस जग से मैं तो हारा

तुम अर्ज़ सुनो माँ मेरी सुनलो मत करना देरी
माँ शेर सवारी करके रखना तू लाज मेरी
तेरा ही सहारा लेकर माँ छोड़ दिया जग सारा
@मीना गुलियानी



सोमवार, 19 मार्च 2018

दिल मेरा कहाँ खो गया

जिंदगी मुझे बहलाने की
कोशिश न करो
मेरा दिल खिलौने की तरह
बहुत ही नाज़ुक सा है
हाथ लगाते ही वह
टुकड़ों में बिखर जायेगा
सुनी हमने चुप की सदा
अंबर पर चाँद न घटा
हँसी को करा लिया जिबह
दिल मेरा कहाँ खो गया
@मीना गुलियानी 

माता की भेंट -तूफ़ान में दिया है

बेकार सोचना है तेरे सोचने से क्या है
होगा वही जो कि तेरे भाग्य में लिखा है

तेरे रास्ते अगरचे , हैं मुसीबतों ने घेरे
माता का आसरा ले,जब तक है स्वांस तेरे
उसका ही नाम केवल, हर रोग की दवा है

उसका पता जो पूछे ,कटड़े से हो रवाना
जो सामने है पर्वत,उसपे तू चढ़ते जाना
दरबार पर पहुँच जा,माता की वो गुफा है

दुनिया की दौलतों का,झूठा है ये खज़ाना
ये महल और बंगले ,कुछ भी न साथ जाना
मत खेल ज़िन्दगी से, बेकार का जुआ है 

गर चाहते हो मुक्ति ,  माँ के चरण पकड़ लो
जीवन की नाव उसकी ,शक्ति से पार करलो
उसकी कृपा से जलता ,तूफ़ान में दिया है
@मीना गुलियानी



शनिवार, 17 मार्च 2018

माता की भेंट -कैसे क़द्रदानियाँ

तेरे दर आऊँ तेरा दर्श मैं पाऊँ खाली लौटके न जाऊँ
 मेरी माँ ---करदे मेहरबानियाँ करदे मेहरबानियाँ

तू है माँ भोली , भरती सबकी तू झोली
मुझे पार लगाना माँ ,मेरी नैया डोली
मेरी माँ शेरों वाली, जोतों वाली
सुन माँ  -  दुःख भरी कहानियाँ

तेरे दर आया हूँ , माँ ग़म का सताया हूँ
दुःख दूर करो मेरे ,जग का ठुकराया हूँ
मेरी माँ दे दो शक्ति ,करूँ मैं भक्ति
जलाऊँ  -  जोतें नुरानियाँ

तेरा सहारा है ,माँ तेरा ऊँचा द्वारा है
तेरे भक्तों को लगता ,तेरा नाम प्यारा है
माँ भव से तारे , पार उतारे
भूलें हम--कैसे क़द्रदानियाँ
@मीना गुलियानी




नित दर्शन की प्यासी

प्रभु जी तेरी शरण पड़ी है दासी
भव पार करो काटो जम की फाँसी

मैंने कष्ट बहुत है पाया
भटक भटक जून चौरासी
मानुष का तन पाया
मिटादो दुखों की ये राशि

मैंने बहुत पाप है कीन्हा
संसारी भोगों की आशा ने
दुःख बहुत मुझे  दीन्हा
ये कामना है सत्यानाशी

प्रभु जी मैंने भक्ति नहीं कीन्हि
झूठे भोगों की तृष्णा में
उम्र सारी खो दीन्ही
दुःख मेरे काटो अविनाशी

प्रभु जी अब सारी आशा टूटी
तेरे चरण की धूलि लागे
मुझे एक संजीवनी बूटी
रहूँ नित दर्शन की प्यासी
@मीना गुलियानी

वो लम्हा न मिला

मैं तन्हा हूँ तुम्हारा तसुव्वर है
वक्त कुछ ठहर सा गया है
तुम्हारे पाँव के निशान खो गए
मैं सोच रहा हूँ कि कहाँ जाएँ

तुम अभी अभी तो गुज़रे थे
तुम्हारी महक हवाओं में है
इस गहन सन्नाटों के बीच
तुम्हारे चहकने की आवाज़ है

मैंने अपनी उम्र यूँ ही गुज़ार दी
इसी बात का ग़म सालता है
मुझे सिर्फ तन्हाई ही मिली
फ़ुरक़त का वो लम्हा न मिला
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 14 मार्च 2018

किसी का दिल बहलाने

मैं जो कहता था तब किसी ने न सुना
अब चुप हुआ तो सबने बनाए अफ़साने

अपने ग़म खुद ही समेटे जीने के लिए
चाहता हूँ कि कोई भी न मुझे पहचाने

गुज़ारे हैं कितने ही लम्हे यूँ तेरे बगैर
अब तो खुद को भी लगने लगे दीवाने

ये चाँद सितारे भी आज ग़ुम क्यों हुए
गए हैं शायद किसी का दिल बहलाने
@मीना गुलियानी


सोमवार, 12 मार्च 2018

मेहमाँ तुम्हीं तो हो

करते हमेशा याद वो मेहरबां तुम्हीं तो हो
करते हैं जां निसार जिसपे राजदां तुम्हीं हो

दिल की बात कह रहे हैं तुमसे कबसे हम
मतलब भी पूछते हो नादाँ तुम्हीं तो हो

आता है बाद ज़ुल्म के रहम भी तुम्हीं को
अपने किए पे खुद भी परेशां तुम्हीं तो हो

पछताओगे एक दिन मेरा सुकूँ उजाड़कर
इस दिल में कौन है मेहमाँ तुम्हीं तो हो
@मीना गुलियानी

शनिवार, 10 मार्च 2018

तुम बहुत याद आते हो

इस मतलबी दुनिया की तंगदिली
दुनिया के फरेब और कड़वे शब्द
जब मेरे मन को ठेस पहुँचातें हैं
तुम बहुत याद आते हो

चलते चलते जब इस सफर में
बहुत घना अँधेरा  छा जाता है
और मन का हौंसला टूटता है
तुम बहुत याद आते हो

तुम्हारे प्यार की रोशनी मुझे
तब एक नई राह दिखाती है
 दुनिया की मची हलचल में
तुम बहुत याद आते हो
@मीना गुलियानी



शुक्रवार, 9 मार्च 2018

जीवन की भंवर से उबरूँ

जी चाहता है पँख लगाकर
नील गगन की परिक्रमा करूँ
आकाश की ऊँचाइयाँ छू लूँ
जहाँ घुटन भरे बादल न हों
न ही भेदभाव या स्वार्थ हो
हर तनाव ताप से मुक्त होऊं
जीवन सागर की गहराई में
फिर डूबकर गोता लगाऊँ
जीवन के सत्य के मोती ढूँढूँ
जीवन में मधुरता भर लूँ
उपवन सी ताज़गी पा लूँ
मन की भटकन खत्म करूँ
सरल शान्ति की आगोश पाऊँ
और जीवन की भंवर से उबरूँ
@मीना गुलियानी 

जब बेटी ससुराल पधारे

माता पिता के प्रेम का कैसे क़र्ज़ चुकायेंगे
बच्चों के सुख खातिर कितने ग़म उठायेंगे

कैसे भूलेंगे हम वो पल जब माँ थी लोरी गाती
खुद भूखी रहकर भी हमको भरपेट वो खिलाती

राजा बेटा रानी बिटिया कहकर गले लगाती
पापा से जब डाँट पड़ती वही आके हमें बचाती

बचपन के दिन हमें याद हैं करते थे हम मौज
पापा की पीठ के घोड़े पर चढ़ते थे हर रोज़

माँ की ममता का न कोई सांनी न ऐसा ज्ञाता
बच्चे की वो प्रथम गुरु है वो ही  भाग्यविधाता

पापा भी हैं सबको प्यारे हम हैं उनकी आँख के तारे
आँखे उनकी भी भर आती जब बेटी ससुराल पधारे
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 8 मार्च 2018

हस्ती को मिटाया जाएगा

वाह क्या यही है नारी का सम्मान 
सदा से सहा है उसने इतना अपमान 
करता रहा वो जुल्म और तू सहती रही 
वो तो वहशी है और तू नादान 

अरे ---ये तो है ---एक करोड़ का बंगला 
सभी कुछ होने पर भी तू है कंगला 
कितना बड़ा बनाया तेरा ये पिंजरा 

फिर से क्या वही पाठ दोहराया जाएगा 
फिर से तेरी हस्ती को मिटाया जाएगा 
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 7 मार्च 2018

आके तुम इसे जला जाओ

दिखता है हर ओर अँधेरा
उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम
चारों ओर अँधेरा छाया
सूझे न कोई राह मुझे

मन का कोरा मेरा आँचल
रोते रोते भीग गया है
भूले से ही सही तुम आओ
एक बार तो राह दिखाओ

यह जीवन की पगडंडी
पलक झपकते डसती है
जीवन की नागिन मुझ पर
मौत बनकर हँसती है

जिंदगी की रहगुज़र कैसे होगी
हर तरफ एक परछाईं है
एक अक्स नज़र आता है
दुनिया में कौन किसका है

ये जिंदगी एक रात की है
प्यार एक चिराग सा है
जितनी देर तक जल सके
आके तुम इसे जला जाओ
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 6 मार्च 2018

मुझे तेरी सिसकियाँ

क्यों तेरे चेहरे पर दिखाई देती हैं वीरानियाँ
अजीब सी करती हैं मुझसे ये सरगोशियाँ

क्यों हैं फूलों के बगीचे यूँ पड़े सुनसान से
दर्द के गुल खिले छाईं ग़म की बदलियाँ

क्यों छिपा रहे हो हाथों से अपना चेहरा तुम
तेरे चेहरे से अयाँ होती कितनी कहानियाँ

दिल तेरा यूँ टूटा टूटा रोता है चुपचाप क्यों
अक्सर सुनाई देती हैं मुझे तेरी सिसकियाँ
@मीना गुलियानी

रविवार, 4 मार्च 2018

जग में तेरा आवागमन

मृत्यु के डर से छटपटाता है मन
सबको मुक्ति की चाह मिले न राह
पाप में सदैव डूबा रहता चंचल मन
पञ्चतत्व का है तन करे न चिंतन
तन अस्थाई और मोहपाश के बंधन
करे न कृष्ण चिंतन छूटे ये बंधन
काम ,क्रोध,ईर्ष्या में लीन है मन
वक्त है सम्भल नहीं व्यर्थ है जीवन
कर आत्मचिंतन छोड़ सारे ये भ्रम
ताकि न हो जग  में तेरा आवागमन
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 3 मार्च 2018

साये से लिपटा जा रहा हूँ

शीशे का महल बना रहा हूँ
दिल अपना बहला रहा हूँ

मेरे सीने में बहुत दर्द भरा है
सबसे उसको छिपा रहा हूँ

सारा ज़माना है मुझसे बेखबर
उसको मैं आईना दिखा रहा हूँ

सबके ज़ज्बात पत्थर से हो गए
अपने ज़ख्मों को सहला रहा हूँ

किसी से शिकवा गिला न मुझे
अपने साये से लिपटा जा रहा हूँ
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

हम दूर होने लगे हैं

यूँ यादों में उनकी खोने लगे हैं
कभी हँसते हँसते यूँ रोने लगे हैं

न बेचारगी थी हमें इससे पहले
कि यादों में खुद को खोने लगे हैं

सीखा न जीने का हमने सलीका
अरमां ये नश्तर चुभोने लगे हैं 

है दर्द ये कैसा बताए तो कोई
नशेमन में खुद को डुबोने लगे हैं

उतरे भी कैसे कोई साहिल के पार
साहिल से हम दूर होने लगे हैं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

सुध दीनी बिसराए

सखी कैसे मैं खेलूँ फाग
मोरे पिया घर नहीं आए

हेरत हेरत थक  गईं अखियाँ
जियरा मोरा अकुलाय

लिख लिख पाती भेजूँ कैसे
कोई संदेशा पहुँचाए

होती गर मैं बन की कोयलिया
उड़ जाती उत धाय

सबके बलम घर आवन लागे
नैना मोरे भर आए

सब सखियाँ मोसे करत ठिठोली
काहे सुध दीनी बिसराए
@मीना गुलियानी 

मेरे जीने की तू आस भी है

चाहे दूर है तू चाहे पास भी है
हर पल तेरा एहसास भी है

इस जग में कितने लोग मिले
पर तुझसे रिश्ता ख़ास भी है

तुझसे खुशियाँ इतनी हैं मिली
मुझे तुम पर इतना नाज़ भी है

तुम दूर न मुझसे कभी होना
तू ही धड़कन और श्वास भी है

तू ही है समाया इस दिल में
मेरे जीने की तू आस भी है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

संग बिताए त्यौहार

बताओ भला कैसे हम भुलाएँ वो बचपन
 नानी का दुलार और प्यारा सा आँगन

वो गुड़िया का घर वो गर्मियों की दोपहर
वो कड़ाके की सर्दी और हवाओं का कहर

वो दादा दादी की कहानी हवा की रवानी
मम्मी से शिकायत डाँट पड़ती थी खानी

वो गेंद के टप्पे और वो  टॉफियों के रैपर
वो साईकिल पे कितने लगाते थे  चक्कर

वो खेतों में जाना और गन्ने भुट्टों को खाना
बारिश के दिनों में कागज़ की नाव चलाना

वो हलवा और चाट क्या हमारे थे ठाठ
वो हँसना हँसाना और दोहराते थे पाठ

कभी स्कूल की छुट्टी और दोस्तों से कुट्टी
कभी बचपन के झगड़े करते थे अट्टा बट्टी

याद आता है पापा और  दादा का प्यार
भला कैसे भूलेंगे  संग बिताए त्यौहार
@मीना गुलियानी


सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

मधु प्याले क्यों रीत गए

वो सब टेसू के रंग में भीग रहे हैं
होली आई  गुलाल से सराबोर हैं

बच्चे हरसिंगार के फूल झाड़ रहे हैं
 पानी में कागज़ की नाव चला रहे हैं

सपने मेरी आँखों में लहलहाने लगते हैं
होंठ अनकहे रहकर थरथराने लगते हैं

तुम्हें कुछ याद है हमने क्या खोया है
तुम्हारी याद में अपना दिल गंवाया है

वो मधुर सुहाने दिन जल्दी ही बीत गए
आँखों से छलके मधु प्याले क्यों रीत गए
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

बाजे ढोल मृदंग और चंग

आया है फागुन
पुलकित हुआ मन
हुलसा है तन
महका हर उपवन
पुराने पत्तों का क्षरण
नवपल्ल्वों का अवगुंठन
कोमल पत्तों पर
ओस कणों की छुअन
धरा का पुष्पों से
महका है आंगन
पहनी है धानी चूनर
लटकी मोती की झूमर
पहनी मोतियन माला
इठलाई बनके बाला
सूरज उतरा नीचे
छूने पाँव धरा के
चंदा ने दी बाहें पसार
चाँदनी गाए मल्हार
नाचे बन में मोर
प्रमुदित हुआ चकोर
ब्रज में छाया  उल्लास
कान्हा संग गोपियन का रास
आई ग्वालों की टोली
खेलें सब हिलमिल होली
उड़े अबीर गुलाल का रंग
बाजे ढोल मृदंग और चंग
@मीना गुलियानी




शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

खामोशी से सीपियाँ चुनते हैं

समुद्र के किनारे लहरों को गिनते हुए
बैठे हुए चुपचाप खामोश से हम तुम
तुमने जब आँखे खोली बजी एक धुन
जो एक लय में धड़कने लगती है

तुम्हारे होंठों पे हँसी आते आते
क्यों ठिठक जाती सिहर जाती है
एक तूफ़ान सी खामोशी फिर से
तुम्हारे हाथों में ही सिमट जाती है

तुम्हारी आँखों से परछाईयाँ उभरती हैं
अनगिनत रंगों के सपने निकलते हैं
एक  गुबार सा बरसने लगता है
हम तुम खामोशी से सीपियाँ चुनते हैं
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

खुशियों को लुटाने चले आओ

इक बार झलक दिखला जाओ
चाहे बोलो या चुपचाप रहो
नज़रों से नज़र तो मिला जाओ
जब तार दिलों के मिल ही गए
सरगम को सजाने आ जाओ
दिल का रिश्ता जुड़ा नसीबों से
घुट रहा हूँ मैं तन्हा चले आओ
मेरी जिंदगी भी मुस्कुराएगी
खुशियों को लुटाने चले आओ
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

मृत्यु की चाह

कैसे करूँ तेरा अभिनन्दन
मेरे हृदय से निकली सांसे
बन जाती हैं काले बादल
कैसे तुझे बिठाऊँ मन में
नयनों से बहता अश्रुजल
कैसे करूँ मिलन की चाह
विरह टीस समाई मन में
 दिखाऊँ कैसे जीवन की राह
मुझको है मृत्यु की चाह
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

साहिल बना दिया

आसान नहीं था आकाश अपना तलाशना
आसान नहीं था मन का रास्ता नापना
क्योकि हर नज़र प्रश्न पूछ रही थी
उस पर मेरी खामोशी जुबान बन गई
मेरी हसरतों ने मुझे बेज़ार कर दिया
मंझधार को ही अपना साहिल बना दिया
@मीना गुलियानी



अपने घर जा रही है

लगता है कोई आवाज़ आ रही है
कुछ इशारे से मुझे समझा रही है

दिन ढल गया रात आई सोना है
मगर तेरी तस्वीर क्यों गा रही है

मैंने जीने की नई राह चुनी थी
वो मेरे करीब क्यों आ रही है

रात के दामन पे लिखे थे ख़्वाब
तेरी याद आके क्यों तड़पा रही है

सितारे छिपने लगे सूरज उगने लगा
लगता है चाँदनी अपने घर जा रही है
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

अपनी आगोश में समेटती है

मैं तुम्हें देखकर अनगिनत बातें सोचता हूँ
जिन्हें यह जिंदगी सुनिश्चित करती है
जिसकी उदास हवा में गीत दम तोड़ते हैं
एक खामोशी गुमनामी में सफर करती है

केवल रह गईं हैं यादें गुज़रे पलों की
गर्मियों की तन्हा रातें और चाँदनी
बेवजह हम दोनों एक दूसरे को ताकते
खो जाते बिखरे हुए पलों को समेटते

तुम्हारे कानों में हौले से कुछ कहना
जो लहरा के नज़्म बन जाते हैं
दूर से आती आवाज़ें सपनों में ढलती हैं
चाँदनी अपनी आगोश में समेटती है 
@मीना गुलियानी



शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

अपनी तस्वीर उकेरता हूँ

अपनी किताब का पन्ना पलटता हूँ
एक और बसंत सा खिलता है
झरना सा झरने लगता है मुझमें
और मेरे मन के इस उपवन में
अनगिनत रंगों के फूल खिलते हैं
बारिश की बूँदें पत्तों पर गाती हैं
फूलों की खुशबु मन को लुभाती है
सुख दुःख की व्यथा भी सुनाती है
तन्हाई की यादें आँसुओं में ढलती हैं
मेरी अँगुलियाँ रेत पर थिरकती हैं
जिस पर अपनी तस्वीर उकेरता हूँ
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

सपनों में गुनगुनाती हो

कभी कभी भीड़ में भी मन
नितान्त अकेला ही होता है
मन के कोने में छिपा दर्द
अचानक जाग सा उठता है
रिस रिस कर नस नस में
धड़कन बन बहता रहता है
कभी तुम मुझे भी पहचानो
हर पल तुम्हारी आवाज़ को
मैं हमेशा तरसता रहता हूँ
तुम्हारी परछाईं मुझे छूती है
 अंधेरों में ग़ुम हो जाती है
मैं तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ
नींद मुझे आगोश में लेती है
तुम सपनों में गुनगुनाती हो
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

उसे भी जीने दो

मेरी बेटी अक्सर मुझसे सवाल करती है
हमें दूसरे घर में विदा क्यों करते हो
क्यों नहीं अपने ही आँगन में रहने देते
क्यों नहीं इसी आँगन के फूल को
इसी बगिया में ही खिलने देते
क्या दूँ मैं उत्तर इस प्रश्न का
कितने ही यत्न से सभी माँ बाप
बेटी को पाल पोसकर बड़ा करते हैं
कितना ममत्व देते हैं फिर भी
अपने कलेजे के उसी टुकड़े को
दिल पर पत्थर रख परायों को सौंप देते हैं
बेटियों को यही शिक्षा दी जाती है
दोनों घरों की लाज उसे ही रखनी है
घर में बेटा बेटी दोनों होते हैं
बेटे से माँ बाप को कोई अपेक्षा नहीं होती
बेटी सदैव उनके सुख दुःख में साथ निभाती है
बेटा तो अपनी शादी के बाद पराया हो जाता है
बेटी पराये घर जाकर भी इस घर की
चिंता में विलीन रहती है
माँ बाप की रग रग से वाकिफ होती है
दुःख की खबर पाते ही दौड़ी चली  आती है
बेटा पास होकर भी बेख़बर होता है
उसका ध्यान कहीं और बँटा होता है
बेटी को पराया धन मत समझो
उसे भी खूब प्यार दुलार दो शिक्षा दो ,संबल दो
ताकि समय आने पर वो
 अपने परिवार का ध्यान रख सके
उसे बोझ न समझो स्वावलम्बी बनाओ
खुली हवा में सांस लेने दो उसे भी जीने दो
@मीना गुलियानी


मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

चिंताएँ कभी खत्म होंगीं

क्या जीवन की चिंताएँ कभी खत्म होंगीं
हर व्यक्ति के साथ क्या उम्र भर रहेंगीं

सुबह सुबह से ही खाने पीने की चिन्ता
फिर नहा धोकर दफ्तर जाने की चिंता

बच्चों को स्कूल छोड़ आने की चिन्ता
ऐसे कब तक ये चिंता दिमाग में पलेगी

दफ्तर से आते ही घर में मचा रोना धोना
बच्चों के झगड़े बीबी के कमेंट पास होना

बनिये का बिल कभी दूध वाले का बिल
कभी राशन धोबी और डाक्टर का बिल

हालत हो जाए खस्ता आमदनी से ज़्यादा खर्चा
भरूँ मैं कहाँ से बिजली और पानी का खर्चा

जितनी कमाई करो पड़  जाए वो खटाई में
कुछ जाए उधार कुछ दर्ज़ी की सिलाई में

पड़ौसी भी मांगे उधार काम वाली को बुखार
घर पर टी वी मोबाइल का नेटवर्क भी बेकार
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

विदा के क्षण

विदा के क्षण अजीब होते हैं
पलकों में अश्रु लरज़ आते हैं
बरबस आके बरस जाते हैं
आँखे दलहीज पर टिकी होती हैं
स्तब्ध वातावरण बोझिल करता है
एक सन्नाटा सा छा  जाता है
फिर किसी की चीख पुकार
मर्म तक बेधकर चली जाती है
हृदय को लहु लुहान कर देती है
कोई स्नेहिल स्पर्श कंधे पर पाकर
मन के सब्र का बाँध टूट पड़ना
सिसकियों का घुटा घुटा स्वर आना
फिर किसी के कंधे पर सिर रखना
सारी पीड़ा उस कंधे पर उड़ेलना
और मन का  बोझ  हल्का करना
मन की हताशा को सांत्वना देना
फिर से आशा के सेतु बाँधना
जीवन यात्रा को पुनः आरम्भ करना
गया वक्त फिर हाथ में नहीं आता
विदा के क्षण भुलाने पड़ते हैं
कैसा भी हो जीवन जीना पड़ता है
@मीना गुलियानी

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

ताउम्र याद रह जाते हैं

कुछ रिश्ते ताउम्र याद रह जाते हैं
बिन बाँधे ही हमसे जुड़ जाते हैं

कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं
जो ज़िगर में अटके रह जाते हैं

कुछ रिश्ते हकीकत नहीं बन पाते हैं
मगर सपनों में वो साथ निभाते हैं

कुछ रिश्ते अपने अरमान साथ लेकर
दिल में ही दफन हो जाते हैं

कुछ रिश्ते जिन्हें हम निभाते तो हैं
पर उनके हम हो नहीं पाते हैं
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

अनंत सागर में लीन हो जाती है

मेरे अंतर में भी एक झरना  बहता है
जो रोशनी की किरण की आस रखता है
सागर से मिलने की चाह रखता है
सागर में खो जाने को आकुल रहता है
मगर हवा मेरा रास्ता रोक लेती है
मन दौड़कर हवा से आगे निकलता है
जीवन नदिया की धारा के समान है
जो इठलाती  बलखाती चलती रहती है
जीवन के सपने और हकीकत दो किनारे हैं
 टूट कर इस धारा में मिलने को आतुर हैं
जीवन और नदिया बल खाते हुए मुड़ते हैं
अपनी राह बनाकर जीवन को आयाम देते हैं
अंत में नदिया अनंत सागर में लीन हो जाती है
@मीना गुलियांनी 

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

अपना वजूद ही खो दिया

जब हमें अपने मिलते हैं
फिर वो क्यों खो जाते हैं

जाने क्या खो जाता है
जिसे पागल मन ढूंढता है

इन पवन के झोंकों से
खुशबु तुम्हारी आती है

दिल में लगी है आग
खुद को ख़ाक बनाने की

अपना समझ अपनाया तुझे
अपना वजूद ही खो दिया
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

गीत नए बुनने लगी

तिनके का मिला सहारा मुझे
ख़्वाब आशियाने के बुनने लगी
हरी पत्तियों की कोमलता लेकर
फिर से मैं जीवन नया जीने लगी
फूलों की शबनम तितली के रंग
चुराकर आशियाना सजाने लगी
चिड़िया सा उड़ता है मेरा मन
भंवरों की रोज़ सुनती हूँ गुँजन
मिट्टी की सौंधी खुशबु मुझको
स्वर्ण कण जैसे लगने लगी
जिसे मैं धरा से चुनने लगी
ख्वाबों में गीत नए बुनने लगी
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

जीवन की किताब

जीवन में सुख दुःख के होते हैं पड़ाव
इनके दम से सबकी चलती है नाव

जिस तन लागे वही दर्द भी जाने
और कोई क्या जाने कहाँ है घाव

धूप में चलने पर अच्छी लगे छाँव
वरना कोई कैसे जाने इसका अभाव

कभी मिलती ख़ुशी कभी मिलते गम
इन पलों से भरी जीवन की किताब
@मीना गुलियानी


मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

जीवन में बसंत आ जाता

गर तुम आते फिर जीवन में
मन की कलियाँ खिल जातीं

धुल जाता इस मन से विषाद
सूनी अखियाँ फिर भर जातीं

अश्रुजल तुम्हें समर्पित करती
सुगंधित पवन मन में भरती

उन्माद गगन में छा जाता
जीवन में बसंत आ जाता
@मीना गुलियानी 

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

कभी भी सच्चा प्यार किया

जाने क्यों तेरे वादे पे ऐतबार किया
हर पल कयामत का इंतज़ार किया

कहके गए थे आएंगे पर तुम न आए
वादों में दिन ये कटे पर तुम न आए
दिल को तुम पर ही क्यों निसार किया

दिल में इक दर्द छिपा हुए खुद से पराए
चुपचाप ज़हर पीते रहे और मुस्कुराए
 मिलने का झूठा ही क्यों करार किया

प्रीत का दर्द भी कितना मीठा होता है
प्रीत जो सच्ची हो तो एहसास होता है
क्या तुमने कभी भी सच्चा प्यार  किया
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

जिंदगी बिन तेरे मुझे भाती नहीं है

तेरी याद इस दिल से जाती नहीं है
कोई चीज़ भी मन को भाति नहीं है

तन्हा हुआ है सफर अब तो अपना
कोई हमसफ़र कोई साथी नहीं है

जहाँ पर भी देखूँ अँधेरा वहीँ है
रोशनी अब कहीं से आती नहीं है

क्या मर्ज़ है कोई दवा तो बताए
जिंदगी बिन तेरे मुझे भाती नहीं है
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

कटेगा कैसे बिना हमसफ़र

कैसा है यादों का सफर
बिखरे हुए हैं यादों पल
मन की चंचलता के पल
किसी सोच में डूबा मन
कहता मेरी अँगुली पकड़
क्या करूँ कहाँ मैं जाऊँ
चहुँ ओर  अँधेरा है अब
आगे जाते मन डूबता अब
कोई मनमीत साथी नहीं
 साथ जो विचरण करें अब
क्या करें कोई तो समझाए
क्या सब भूल जाऊँ अब
वो पल न जाने कैसे थे
बिखर गए सुनहरे स्वप्न
हो गईं अकेली शामें सुबहें
वो प्रेमालाप की धड़कन
सिर्फ यादें हैं चन्द लम्हों की
तन्हा है जिंदगी का सफर
कटेगा कैसे बिना  हमसफ़र
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

विलीन होने की चाहत है

सब कुछ छोड़कर चलने की आदत है
मौत को हँसकर गले लगाने की चाहत है

जिंदगी की मुश्किलें भी क्या टकरायेंगी
मुसीबतें सारी कतरा के निकल जायेंगी

हर पल मुस्कुराने की मुझे आदत है
परायों को भी अपना बनाने की चाहत है

दुनिया के दुःख समेटने की आदत है
अनन्त में विलीन होने की चाहत है
@मीना गुलियानी

बुधवार, 31 जनवरी 2018

वक्त यादों में कैद हो जाता है

लम्हा लम्हा यूँ ही गुज़र जाता है
गुज़रा वक्त फिर लौटके न आता है

कीमती हो जाता है वो गुज़रा लम्हा
जब कोई दूर छिटककर चला जाता है

जब किसी को शिदद्त से याद करते हैं
पर वो सामने कभी नज़र नहीं आता है

आँख से निकले हुए आँसू की तरह
वो लम्हा लम्हा सरकता जाता है

यही सोचती हूँ कुछ वक्त और होता
गुज़रा वक्त यादों में कैद हो जाता है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

इक शमा सी जलाए हुए

मुदद्तें बीत गईं जिन्हें मुस्कुराए हुए
कहाँ जाएँ वो जग के ठुकराए हुए

खुश रहते हैं वो अपनी ही तन्हाई में
सदियाँ बीत गईं त्यौहार मनाये हुए

जिंदगी में जाने कितने ग़म समेटे हैं
अरसा गुज़रा है उनको मुस्कुराए हुए

किसी की याद में खोए हुए बैठे हैं
दिल में इक शमा सी जलाए हुए
@मीना गुलियानी

सोमवार, 29 जनवरी 2018

क्यों रूठ गए मुझसे

इस तरह ओझल हुए मेरी जिंदगी से
सारे रिश्ते जैसे टूट गए हों मुझसे

आँखों से दरिया इस कदर बहता न था
जाने ऐसी क्या ख़ता हो गई  मुझसे

पाँव रखें भी तो हम कहाँ पर रखेँ
दलदली ज़मी पर न उठते मुझसे

 सबब तो यकीनन जानते हैं सब
फिर भी जाने क्यों रूठ गए मुझसे
@मीना गुलियानी 

रविवार, 28 जनवरी 2018

मौसम जैसे रूठ गया मुझसे

ये कौन गुज़रा है मेरी गली से
 साये की तरह गुज़रा इधर से

न जाने किस सोच में फिरता हूँ
वो शख्स दे गया ज़ख्म किधर से

कैसी हवा चली पर बेअसर होकर
ज़ख़्म दिल का भरा गया न उससे

बुत की तरह जी रहा था अभी तक
आईने की तरह बिखर गया मुझसे

साथ था वो  धूप छाँव का एहसास था
अब तो मौसम जैसे रूठ गया मुझसे
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 27 जनवरी 2018

दिल में दर्द सा भरता रहा है

तेरे आने का धोखा सा हुआ है
दिया ये दिल का जल रहा है

सुना है रात भर बरसा है सावन
ये दिल फिर भी प्यासा रहा है

वो आलम कैसा गुज़रा है मुझ पर
नशा सा कोई जैसे चढ़ता रहा है

कैसे ढूँढूँ तुझको मैं इस जहाँ में
दिल में दर्द सा भरता रहा है
@मीना गुलियानी


शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

रिमझिम बूँदें बरसने लगी है

आज फिर चिड़िया एक डाल पर फुदक रही है
वह यूँ फुदकती चहकती अच्छी लग रही है

कभी आम की डाली कभी अमरुद की डाली पर
कभी नीम की तो कभी जामुन की उस डाली पर

हवा की ताज़ी सौंधी सी खुशबु मन में भर रही है
प्रकृति की  सुरम्य छटा बसंत में निखर रही है

सरसों के पीले  फूल इस बगिया में खिलने लगे हैं
देखो बगिया संवर रही है ख़ुशी दिल में भर रही है

 भँवरे मंडराने लगे हैं मधुपान कर इतराने लगे हैं
लता पेड़ों का लेके सहारा देखो ज़रा तन के खड़ी है

नई भोर आई लाली है छाई उषा ने भी ली अंगड़ाई
सूरजमुखी ने आँखे खोली कुमुदिनी सुस्ताने लगी है

सितारे शर्माने लगे हैं घूँघट में मुखड़ा छिपाने लगे हैं
चंदा ओझल हुआ सूरज की किरणें जमी पे पड़ रही हैं 

प्रकृति संवरने लगी कुमकुम फूलों से झरने लगी है
संध्या रानी आई उसकी  पायलिया छनकने लगी है

कैसे न मोहित हों छटा पर आँखे ख़ुशी से झरने लगी हैं
 घटा छाई लेके बिजुरिया रिमझिम बूँदें बरसने  लगी है
@मीना गुलियानी


बुधवार, 24 जनवरी 2018

लब पर आती तो है

नदी की  कितनी चंचल है धारा
इस पार से उस पार जाती तो है

जीवन की लौ भी बुझने को है
सुलगाओ चिंगारी बाती तो है

भंवर में किश्ती डूबी तो क्या
टकरा के उस पार जाती तो है

न यूँ मायूस हो तुम इस कदर
रात के बाद भोर आती तो है

जिंदगी में बहुत दुःख झेले मगर
हँसी फिर भी लब पर आती तो है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

जो पिया न साथ में

आज हम फिर से निकले सुकूँ की तलाश में
चार कतरे आँसुओं के भी हो लिए साथ में

हम भुलाने तो चले हैं हर गुज़रे लम्होँ को
भूल कैसे पायेँगे जो दिन गुज़ारे साथ में

नामुमकिन लगता है तन्हा रहना तुझ बिन
वक्त ने फिर ला खड़ा किया ऐसे हालात में

लगता है आसमां भी गुमसुम सा बैठा हुआ
कोई तारा भी नज़र आता चंदा के साथ में

कहदो इन घटाओं से जाके बरस जाएँ कहीं
क्या मज़ा यूँ भीगने का जो पिया न साथ में
@मीना गुलियानी

सोमवार, 22 जनवरी 2018

मोतियों को न लुटाओ

जिंदगी के हर पल को ख़ुशी से बिताओ
जो हुआ सो हुआ उन सबको भूल जाओ

गया वक्त क्या कभी लौटा है किसी का
भुला दो बीते कल को न खुद को मिटाओ

गर चाहते हो ख़ुशी को गले से लगाना
वो पल जो हंसी थे उन्हें फिर दोहराओ

जिन्हें  याद करके भीगें पलकें तुम्हारी
अच्छा होगा गर उन लम्हों को भुलाओ

आंसू भी किसी की अमानत हैं तुम पर
इन बेशक़ीमती मोतियों को न लुटाओ
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

दर्द सब बेअसर हो गए

आप जाने किधर खो गए
दुनिया में तन्हा हम हो गए

रात काटे ये कटती नहीं
दिन भी अब ज़हर हो गए

याद में तेरे छलनी जिगर
हर नज़र चश्मे तर हो गए

ज़ुल्म तो हम पे होते रहे
हादसों के शहर हो गए

ख़्वाब पलकों पे जो थे सजे
जिंदगी पे वो क़हर हो गए

मत पूछो मेरा  हाले दिल
दर्द सब बेअसर हो गए
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 17 जनवरी 2018

महल हमारे न टूट जाएँ

जिंदगी के फैसले जाने क्या हो जाएँ
यादों के सिलसिले जुड़ें या टूट जाएँ

वक्त की हलचल बनी हुई सी है
जाने कब किस मोड़ पे ले जाए

हर कदम सोचकर हम बढ़ा रहे हैं
मंजिल पे कदम न कहीं डगमगाएं

गैरों की बातों का शिकवा नहीं है
अपनों के अफ़साने हमको रुलाएं

हकीकत में हर लम्हा हँसके बिताया
ख्वाबों के महल हमारे न टूट जाएँ
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 15 जनवरी 2018

मित्र वही कहलाता है

जो मित्र की पीड़ा देखके
आँखों से अश्रु बहाता है
मित्र वही कहलाता है

फ़टी बिवाई सुदामा की
अश्रुजल से धुलवाता है
मित्र वही कहलाता है

जो उसके तप्त हृदय को
 स्नेह से सहलाता है
मित्र वही कहलाता है

जो आहत मन की पीड़ा को
प्रेम से अपने मिटाता है
मित्र वही कहलाता है

जिसका हृदय परपीड़ा में
तुरंत द्रवित हो जाता है
मित्र वही कहलाता है

रूखे सूखे भात छीनके
बड़े चाव से खाता है
मित्र वही कहलाता है
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

रोते चेहरे भी मुस्कुराते हैं

हर पल डर हमें सताता है
कभी समाज का डर
कभी असफल होने का डर
अकेले हो जाने का डर
रिश्ते टूटने का डर
नाकारा साबित होने का डर
निर्णय से चूकने का डर
हम डर पर विजय पा सकते हैं
भावनाओं को नियंत्रित करके
तो लगेगा अँधेरे से निकले हैं
उजाले में आ पहुँचे हैं
किसी पहाड़ की चोटी पर हैं
या किसी पेड़ की छाँव में हैं
नदी की कल कल ध्वनि
पेड़ के पत्तों की सरसराहट
चिड़ियों का कलरव होना
ओस की बूंदों का गिरना
सब मन को लुभाता है
खुशियों के पल लौट आते हैं
प्रकृति से हम जुड़ जाते हैं
रोते चेहरे भी मुस्कुराते हैं
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

दूर हो हर उलझन

मैंने महसूस की ओस की ताज़गी की छुअन
मिट्टी पर गिरी पहली बूंदों की वो सिहरन

पेड़ों की शाखाओं पर चिड़ियों की चहकन
 कोमल फूलों के प्रस्फुटन में डूबा ये मन

चाँद की चाँदनी में नहाकर अलसाया यौवन
इठलाता इतराता हुआ मधुर नेह का बंधन

मन का मदमाता हुआ प्रकृति से संगम
पक्षियों के कलरव में जुड़ने का उपक्रम

मन को सुकून देता है ये सुरम्य वातावरण
ईश्वर की चित्रकारी का होता है हमें दर्शन

हर  पीड़ा शमन करता आत्मिक उद्बोधन
अनुभूतियों में उतरकर दूर हो हर उलझन
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

प्रेम का एहसास देते हैं

कुछ रिश्ते अनायास ही जुड़ जाते हैं
एक कच्चे धागे से ही बँध जाते हैं

ज़रूरत नहीं होती झूठी रिवायतों की
न ही इन्हें परम्पराओं में कसने की

ज़रूरत नहीं होती रोपने और सींचने की
ज़रूरत नहीं पड़ती खोखले रिवाज़ों की

फिर भी ये रिश्ते वटवृक्ष जैसे पनपते हैं
मन को सुकून प्रेम का एहसास देते हैं
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 8 जनवरी 2018

भूली दास्ताँ लिख रहा हूँ

रफ़्ता रफ़्ता याद में खोकर
भूली दास्ताँ लिख रहा हूँ

कहने को तो भीड़ बहुत है
 फिर भी तन्हा लिख रहा हूँ

तुमने पूछा है हाल जो मेरा
ख़ुद को अच्छा लिख रहा हूँ

हुई है रोशन तुमसे दुनिया
चंदा तुमको लिख रहा हूँ

इस ज़मीं से दूर फ़लक तक
तेरा आशियाँ लिख रहा हूँ

महक घुली है साँसो में तेरी
उसकी ऊष्मा लिख रहा हूँ
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 6 जनवरी 2018

पुनर्जीवित करवा दो

निःशब्द  हो गई है वीणा
फिर से कोई तान सुना दो
तार पड़  गए ढीले ढाले
फिर से इनको कसवा दो

मन में कितनी ही आशाएँ
बलवती हो उठीं बेलों सी
अमरलता कोई बन जाए
ऐसी कोई सुधा पिला दो

सुधियों के वो सुर प्याले
पड़ गए रीते अनचीन्हे से
उन प्यालों को स्पर्श से
तुम पुनर्जीवित करवा दो
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 3 जनवरी 2018

निःशब्द मूक मनुहार लिखूँ

तू कहे तो वीणा की जो बज उठी झंकार लिखूँ
 डूब गया अश्रुजल में वो दर्द भरा श्रृंगार लिखूँ

मन सिक्त हुआ है मेरा प्रेम पल्ल्वित होने से
नयनों की गगरी से छलकी अँसुअन धार लिखूँ

सपने हों पूरे ज़रूरी नहीं मंज़ूर हो अर्ज़ी ज़रूरी नहीं
मन कहता है उड़ जाने दो पंखों का विस्तार लिखूँ

अंतर्मन का है गठबंधन रूहों का रूहों से है मिलन
मत रोको खो जाने दो निःशब्द मूक मनुहार लिखूँ
@मीना गुलियानी 

अंतिम सोपान है

जीवन क्या है  ?
एक ऐसी महायात्रा
जो अनवरत चलती है
इसके तीन पड़ाव हैं
बचपन, यौवन , बुढ़ापा
सकारात्मकता ज़रुरी है
यही जीवंतता है
नकारात्मकता मृत्यु समान है
जड़ के समान नश्वर है
अपने विचारों से उभरना है
नैराश्य को जीवंतता में
परिवर्तित करना है
नए गंतव्य की तैयारी हेतु
स्वयं का मूल्यांकन करना
जीवन को सुधारना है
काम ,क्रोध,मद ,लोभ
नष्ट करना, कमल समान
व्यक्तित्व निखारना है
जीवन में उतार चढ़ाव
आते रहते हैं , आयेंगे
जीवन में हर पल को
 हँसते हुए गुज़ारना है
चित्त को शांत करना है
क्षमा मांगकर क्षमादान देकर
मन एकाग्र करना है
उस विराट को पाना है
यही जीवन का लक्ष्य है
जीवन का अंतिम सोपान है
@मीना गुलियानी

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

हमें मुस्कुराना चाहिए

जीवन एक सौगात है जीना आना चाहिए
कैसे भी पल आएँ हमें मुस्कुराना चाहिए

चाहे दिल पर बोझ हो कितना भी भारी
भूलकर सारे गम को हँसना आना चाहिए

चाहे आशा इस जीवन में बन जाए निराशा
विगत सुखद पलों को न बिसराना चाहिए

जीवन की रणभूमि में चाहे जीत या हार मिले
हर घड़ी परीक्षा की है समझ में आना चाहिए
@मीना गुलियानी

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कण कण में स्पंदन है

तू ही मेरे दिल में बसा है
तुझसे ही जग रोशन है
रोम रोम तेरा नाम पुकारे
तू ही अंतर्मन में है

तुझसे ही संगीत है मेरा
तू ही मेरी सरगम है
सांसो की वीणा में है तू
तू  ही दिल की धड़कन है

मन की भावना में बसा तू
लहरों में तेरा गान बसा
अस्ताचल की किरणों में तू
तू ही मेरा दर्पण है

मन उपवन का फूल है तू
तुझसे ही ये संसार बसा
हर पल तू नज़रों में समाया
कण कण में स्पंदन है
@मीना गुलियानी 

हँसना सिखा दिया है

जब दर्द उठा तो रो दिए हम
वरना हँसते हुए जीवन जिया है

यकीं है तुझे पा ही लेंगे एक दिन
तेरी खुशबु ने पता बता दिया है

तेरी याद में जिंदगी गुज़ार लेंगे हम
तेरी चाहत ने सुकूँ मुझे बहुत दिया है

अच्छा होता गर तुम साथ रह पाते
वक्त से पहले  दामन छुड़ा लिया है

क्या कयामत ढा गई तेरी वफ़ा भी
रोते रोते भी हँसना सिखा दिया है
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

जो पिया का संदेशा लाए

मुंडेर पे काला कौआ बैठा काँव काँव चिल्लाए
सुनके उसकी काँव काँव को दिल मेरा हुलसाए

शायद आज कोई संदेशा पिया के गाँव से आए
दिल में  फिर से हूक उठी सौ सौ तूफ़ान उठाए

करने फिर सिंगार को बैठी दिल में प्रेम जगाए
पिया बिना कछु सूझे नाहीं मन मोरा बौराए

माथे  कुमकुम टीका बिछिया पायल भी इतराए
कर  सौलह सिंगार सजी मैं पिया की आस लगाए

बार बार उठ द्वार पे जाऊँ नैनन टकटकी लगाए
करूँ मनुहार पवन की जो पिया का संदेशा लाए
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

दीप जला जाना

इस दिल ने उठाये लाखों सितम
तुम और सितम अब मत ढाना

तड़पा है किसी की याद में ये
तुम इसको याद नहीं आना

चाहे सुबह ढले चाहे शाम ढले
नाम जुबां पे हमारा मत लाना

खुश रहना  हर हाल में तुम
अश्कों को न अपने ढलकाना

दिल तुमको दुआएँ देता है
ख़ुशी  के दीप जला जाना
@मीना गुलियानी


तुम बिन रहा नहीं जाता

आज फिर दिल ने तुमको पुकारा
तुमने पलटकर न देखा दुबारा

 क्यों इतनी कड़वाहट रिश्तों में घुली
खुदा जाने क्यों ये सज़ा मुझे मिली

वो पल हसीन थे जब हम मिले थे
दिल में उमंगों के फूल खिले थे

अब वो सारे गुल मुरझाने लगे हैं
तेरी विरह में आँसू बहाने लगे हैं

कलियों का तड़पना देखा नहीं जाता
आ जाओ तुम बिन रहा नहीं जाता
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

समीकरण में उलझा रहता है

जिंदगी की समस्या क्या कभी खत्म होगी
समुद्र की लहरों सी मचलती रहती हैं
इनका क्षेत्र कितना विस्तृत है
अनवरत सी चलती रहती हैं
कभी कभी तो ज्वारभाटा
और कभी ज्वालामुखी बन
नागिन सी फुँफकारती हैं
कभी गर्मी की तपिश तो
कभी सर्दी का तीक्ष्ण रूप लेती हैं
जीवन अस्त व्यस्त कर  देती है
कोई बेघर, बेचारा, भूख का मारा
सड़कों के फुटपाथ पर ठिठुरता है
अलाव जलाकर सर्दी कम करता है
बिना वस्त्रों के रात गुज़ारता है
तो कभी भूखे पेट सोता है
उनकी हालत बहुत खस्ता होती है
जिसे देखो समस्याग्रस्त नज़र आता है
क्या समस्या से बचने का कोई रास्ता है
मेरा मन इसी समीकरण में उलझा रहता है
@मीना गुलियानी

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

टूट के बिखर जाएँ हम

तुम्हीं बताओ कैसे जिया जाएगा सनम
इक तरफ जहाँ है और इक तरफ सनम
ऐसे तो घबरा के टूट ही जायेंगे हम
दिल मेरा कहाँ है और तू कहाँ सनम

बीच भंवर में डूबती ही जा रही थी नाव
आये तुम तो डूबते हुए को लिया थाम
लड़खड़ा रहे हैं कदम गिर न जायें हम
आओ तुम्हें पुकारते हैं थाम लो सनम

राहते जा बनके आ गए जिंदगी में तुम
मुस्कुरा दी जिंदगी भी मिल गए जो तुम
अब तो ज़िद अपनी छोड़ो तुमको है कसम
ऐसा न हो कि टूट के बिखर जाएँ हम
@मीना गुलियानी

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

तेरे आने से बढ़ जाती है

तारों की छाँव में हर एक रात गुज़र जाती है
 दिल को समझाने तेरी याद चली आती है

हम ख्यालों में तुमको ही बुला लेते हैं
जब शबे ग़म की तन्हाई तड़पाती है

जाने क्यों कौंधती है बिजली घटाओं में
हिचकियाँ देके मुझे पवन चली जाती है

जब घटा झूमके आँगन में बरस जाती है
दिल की धड़कन तेरे आने से बढ़ जाती है
@मीना गुलियानी


रविवार, 3 दिसंबर 2017

दिल ही में सिमट जाएंगी

आईना देखके जब याद मेरी आएगी
साथ गुज़री मुलाक़ात याद दिलाएगी

जब यादें भावनाओं का ज्वार उठायेंगी
तुम्हीं बताओ वो शाम कैसे गुज़र पायेगी

आँखों आँखों में ही कह देंगे सारी बातें
 रात तारों की छाँव में ही कट जायेगी

सारी कटुता भूलकर दूरी मिट जायेगी
सब ख़्वाहिशें दिल ही में सिमट जाएंगी
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

समेटकर ले आती है

इक मुलाकात में सारी उम्र चली जाती है
आंसू के कण में सृष्टि सिमट जाती है

अंतर्मन में मीठे पानी की लहर आती है
जिसमें सूने मन की रेत भीग जाती है

मन की माला कोमल किसलयी हो जाती है
 मलयानिल सुगंध अपनी लुटा जाती है

खुशियों की सीपियाँ जो जिंदगी चुराती है
फ़ुरक़त के पलों मेँ समेटकर ले आती है
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

स्मृतियों का अवशेष हैं मेरे सपने

मेरे सपने मेरी आँखों में लहलहाते हैं
होठों पे थरथराते हैं बिन कहे रह जाते हैं
मेरे सपनों में इंद्रधनुष रंग भरता है
बादल भी कूची सा बन बिखरता है
मैं फूलों से रंग बिरंगे रंग चुनती हूँ
उनसे सपनों का ताना बाना बुनती हूँ
कभी चम्पा चमेली जूही का फूल मैं
बनाती हूँ ,उन्हें देख देख हर्षाती हूँ
मलयानिल के झोंके सुगंध भरते हैं
हरी दूब का बिछौना बनता है मेरा
मेरे सपनों में प्रकृति का है पहरा
धरा से आकाश तक हिंडोला मेरा
चन्द्रमा की किरणें आके झुलाती हैं
शीतल बयार लोरी मुझे सुनाती है
तारों की चूनर चन्द्रमा का टीका
पहन इठलाती हूँ झूम जाती हूँ
जुगनू  उजाला करते हैं राहों में
कभी जलते बुझते हैं वीरानों में
मेरे सपने उफनती नदी समान हैं
जिसका कोई गंतव्य ही नहीं है
कोई सीमा नहीं कोई बंधन नहीं है
अपनी ही तान अपनी वृति और
अपने ही रस में लीन हैं अनन्त हैं
मेरे सपनों में एकांत की अनुभूति है
यथार्थ के सत्य की पीड़ा भी है
मेरा मन मानसरोवर समान है
मुझे संवेदना द्वारा मुझसे जोड़ता है
मेरी स्मृतियों का अवशेष हैं मेरे सपने
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 27 नवंबर 2017

क्या यही हूँ मैं

मैं अपनी जिंदगी की किताब
खोलता हूँ , पन्ना पलटता हूँ
घटनाएँ अनगिनत रंग में रंगती  हैं
बारिश की बूँद दूब पर मुस्काती है
मेरी तन्हाइयों की यादें गुनगुनाती हैं
तब मेरे आँसू पिघल जाते हैं और
मेरे अंतर के भय बिखर जाते हैं
मेरी अंगुलियाँ रेत पर थिरकती हैं
मैं अपनी तस्वीर को उकेरता हूँ
सुख की , दुःख की  परछाईयाँ
उभरती हैं , मेरे जीवन में तब
अनायास ही बसंत खिल उठता है
नए नए फूल उग आते हैं
अनन्त का झरना प्रवाहित होता है
जिससे मेरा तन मन रोमांचित होता है
मैं उसमे खो सा जाता हूँ
जिंदगी की किताब को देखता हूँ
पढ़ता हूँ , जीता हूँ, खुश होता हूँ
सोचता हूँ , क्या यही हूँ मैं ?
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 25 नवंबर 2017

सुर बन गुनगुनाते हैं

कुछ रिश्ते अनायास ही जुड़ जाते हैं
अनबूझ पहेली सी वो बन जाते हैं

न किसी परम्परा को वो मानते हैं
न कोई भेदभाव वो पहचानते हैं

बिन बोले ही दिल में  बस जाते हैं
दिल में नई प्रेरणा को जगाते हैं

विश्वास की इक डोर से बँध जाते हैं
अन्जान पर  दिल में रम जाते हैं

होठों की  मुस्कुराहट बन जाते हैं
नभ में बादल बन बरस जाते हैं

कागज़ की कश्ती बन तैरते हैं
अनमोल सुर बन गुनगुनाते हैं
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

याद हमको आने लगे हैं

वो रह रह के याद हमको आने लगे हैं
जिनको भुलाने में ज़माने लगे हैं

कभी कह न पाए जिन्हें दिल की बातें
वो बातें सभी को हम बताने लगे हैं

कहीं टूट जाए न हसरत भरा दिल
इस दिल को हम बहलाने लगे हैं

देखो चुभ न जाएँ कहीं तुमको काँटे
दामन अपना हमसे छुड़ाने लगे हैं

बहुत जी लिए हम घुट घुटके अब तक
नाकामियों पे पर्दे हम गिराने लगे हैं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 22 नवंबर 2017

कटु सत्य है, यथार्थ है

समय बचपन से मेरा सहचर रहा है
मेरे बचपन की क्रीड़ा का
यौवन के सुख दुःख के क्षणों का
समय साक्षी रहा है
समय अनुभूति का विषय है
रीति , नीति , प्रीति का
समय में संवेग है , संकल्प है
यह गतिशील , परिवर्तनशील है
सभी नक्षत्र इसके आधीन हैं
दिन, रात , सूर्य , चन्द्रमा ,तारे
सब समयानुसार कार्य करते हैं
पत्ते पर पड़ी ओस की बूँद है
जो उगते सूर्य को समर्पित है
यह शतरंज की बिसात है
यही शह और मात है
समय उन्नति का मार्ग है
यह एक अनवरत सीढी है
धरा को गगन से मिलाने के लिए
समय नश्वर और अनश्वर है
समय चेतना और अचेतना है
यही आस्था , भक्ति और विरक्ति है
समय ही गति , नियति , प्रगति है
समय की धारा बहुत प्रबल है
बड़े बड़े राजा महाराजा इसके आगे
नतमस्तक हो जाते हैं
कब, कौन, कैसे, कोई घटना घटित होगी
यह सिर्फ समय ही जानता है
हर युग का इतिहास केवल
समय के ही पास है
हम सब समय के आधीन हैं
यही कटु सत्य है, यथार्थ है
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 20 नवंबर 2017

कोशिश कर रहा हूँ मैं

तेरे साथ मेरे हमदम हमेशा रहा हूँ मैं
मुझे जिस तरह से चाहा वैसा रहा हूँ मैं

तेरे सर पे धूप आई तो मैं पेड़ बन गया
तेरी जिंदगी में कोई वजह रहा हूँ मैं

मेरे दिल पे हाथ रखके बेबसी को समझो
मैं इधर से बना तो उधर ढह रहा हूँ मैं

तू आगे बढ़ गई तो यहीं पे रुक गया
तू सागर बनी कतरा बन रहा हूँ मैं

चट्टानों पे चढ़ा तो पाँव की छाप रह गई 
किन रास्तों से तेरे साथ गुज़र रहा हूँ मैं

ग़म से निज़ात पाने की सूरत नहीं रही
 निजात पाने की कोशिश कर रहा हूँ मैं
@मीना गुलियानी 

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

हमपे इनायत नहीं रही

हमने अकेले सफर किया है तमाम उम्र
किसी मेहरबां की हमपे इनायत नहीं रही

कुछ दोस्तों से हम भी मरासिम नहीं रहे
कुछ दुश्मनों से हमारी अदावत नहीं रही

तकल्लुफ़ से कुछ कहें तो बुरा मानते हैं
रो रो के बात करने की आदत नहीं रही 

सीने में जिंदगी अभी सलामत है मगर
इस जिंदगी की कोई ज़रूरत नहीं रही

कितनी मशालें लेके चले थे सफर पे हम
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही

खण्डहर बचे हुए हैं इमारत कोई नहीं रही
अब तो हमारे सर पे कोई छत नहीं रही
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 15 नवंबर 2017

याद आया वो गुज़रा ज़माना

वो चिलमन उठाके तेरा मुस्कुराना
वो पलकें उठाना उठाके गिराना
खिलखिलाती हँसी होंठों में दबाना
तितली सी उड़ती फिरना इतराना

वो पहरों तेरा छुपके आँसू बहाना
तेरा यूँ मचलना बहाने बनाना
हथेली में अपने मुँह को छिपाना
कभी छुपके रोना कभी गुनगुनाना

वो तारों की छाँव में छिपना छिपाना
चेहरे को अपने पल्लू में छिपाना
आँखों से अपने बिजली को गिराना
पाँव में  पायल की रुनझुन बजाना

वो शाखों से लिपटकर बल खाना
जुगनू सी दमकना सिमट जाना
यादों की भूल भुलैया में खो जाना
मुझे याद आया वो गुज़रा ज़माना
@मीना गुलियानी 

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

बनाने में जमाने लगे हैं

वो नज़रें हमसे ही चुराने लगे हैं
जिनको मिलाने में जमाने लगे हैं

किसी ने पाई हर ख़ुशी इस जहाँ में
हमें जिसको पाने में जमाने लगे हैं

अमावस की रातें  कटें एक पल में
कभी पल बिताने में जमाने लगे हैं

  खोजा जिसे वो मंजिल थी सामने
हमें  उसको पाने में जमाने लगे हैं

न टूटे कभी भी दिल के ये रिश्ते
इनको बनाने में जमाने लगे हैं
@मीना गुलियानी 

सोमवार, 13 नवंबर 2017

मेरे मन को हर्षाए

दूर अस्ताचल में सूरज ढल गया है
साँझ की बेला में फूल झरने लगे हैं
पक्षी घोंसलों में लौटने लगे हैं
उनका कलरव मन को लुभाता है
उनका चहचहाना चौंच से चुगना
दायें  बायें घूमना बच्चों को खिलाना
शीतल बयार में पंख फैलाये उड़ना
पानी में डुबकी लगाना इठलाना
सब देखना मन प्रमुदित करता है
मेरा मन भी चाहता है कि काश
मुझको भी गर पंख मिले होते
तो गगन के तारों को छू लेती
चन्द्रमा की किरणों से खेलती
व्योम की सहचरी बन कभी नभ
तो कभी धरा पर विचरती फिरती
मेरी उमंगों को भी पंख लगते
दुनिया के ग़म से विलग होते
केवल सुख का ही तब नाम होता
दुःख का न फिर हमें पता होता
चन्द्रमा का टीका माँग में सजाती
तारों की पायल पहन नृत्य करती
तुम वीणा से ताल को मिलाते
सब पक्षी वृन्द ढोल को बजाते
हिरण कुलांचे भरता हुआ आता
अपनी मस्त चाल पर वो इतराता
मोर मयूरी को रिझाता पंख फैलाए 
यह सब दृश्य मेरे मन को हर्षाए
@मीना गुलियानी

रविवार, 12 नवंबर 2017

ऐसी कोई व्यवस्था बना दो

आज डोलने लगे धरा भी
ऐसी तुम हुंकार लगा दो
धरती से अंबर सब डोले
अलख का नारा लगा दो

जाग उठे सारी ये जनता
सोये इनके भाग्य जगा दो
खोया सब विश्वास ये पाएं
ऐसा कुछ करके दिखला दो

हर नारी सम्मान को पाए
ऐसी जागृति देश में ला दो
सबकी मर्यादा रहे सुरक्षित
सुप्त संस्कारों को जगा दो

देश में  सब खुशहाल रहें
 शान्ति का मार्ग दिखा दो
सबकी हर पीड़ा मिट जाए
ऐसा प्रेम का दीप जला दो

कोई रहे न भूखा प्यासा
अन्न  समस्या सुलझा दो
हर कोई सुख से सो जाए
ऐसी कोई व्यवस्था बना दो
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

संवेदना दिल में जगाएं

विरक्त मेरा मन हो चला
देखकर  संसार की वृत्तियाँ 
 कुत्सित भावना छल प्रवृति 
मन मेरा संतप्त हो चला

मचा हर तरफ  हाहाकार
भूख बेबसी सब लाचार
कुछ जीवन से गए हार
किया परित्याग समझ बेकार

देखी नहीं जाती उनकी दुर्दशा
मन मेरा व्याकुल हो उठा
चाहूँ मैं भी कुछ करूँ आज
जिससे मिले सबको अनाज

सबके घरों में चूल्हे जलें
कोई भी भूखा न रहे
सबके बच्चे फूले फलें
तब तृप्ति मन को मिले

सबकी बेटियाँ शिक्षा पायें
कुंठित भावनाएँ नष्ट हों
मन सबके शुद्ध पावन हों
कोई भी  न पथभ्र्ष्ट हो

ईश्वर सबको सद्ज्ञान दे
बुद्धि और क्षमादान दे
सबको सन्मार्ग पे लाये
संवेदना दिल में जगाएं
@मीना गुलियानी 

बुधवार, 8 नवंबर 2017

आशा हम ऐसी जगायें

सुरम्य सी है धरा
नीला नीला है गगन
हवाएँ चली मंद मंद
पुलकित है मन उपवन

आओ मिलके ख़ुशी बाँटे
दुःख को दूर भगाएँ
ऐसे करें हम काम
दीप नए हम जलाएँ

बुझते हुए चिराग़ों को
 आज हम जगमगायें
कोई कोना न रहे अछूता
सबको एक पंक्ति में लायें

हर अनाथ बेसहारा को
आज हम गले लगायें
उनकी मुस्कुराहट को
आज फिर लौटाके लायें

धरती पे मानवता बसे
ऐसा कुछ करके दिखाएं
प्रेम भरा हर दिल हो
आशा हम ऐसी जगायें
@मीना गुलियानी

सोमवार, 6 नवंबर 2017

आओ थोड़ा जी लें

हम जीवन में कबसे भाग रहे हैं
तुम अकेले नहीं हो मैं भी साथ हूँ
आओ कुछ देर पेड़ की छाया में सुस्ता लें
कुछ मन का बोझ हल्का करें थकन उतार लें
वो भी क्या वक्त था जब हम मिले थे
क्या वो समाँ था क्या सिलसिले थे
वो सागर किनारे मचलती लहरों का देखना
रेत को पैरों के अँगूठे से कुरेदना
वो दिन रात पंख लगाकर उड़ गए
जीवन की प्रभात , दुपहरी ढल गई
अब साँझ चुनरी फैलाकर स्वागत कर रही है
चन्द्रमा की किरणें बाहें फैलाकर बुला रही हैं
इस भागती दौड़ती जिंदगी से थक गए हैं
अपनी मरूफियत के बोझ मन से उतार दो
गुज़रे पलों को पलकों में समेट लो
 जीवन की इस सांध्य बेला में
आँखे मुंदने से पहले जीवन में
उमंग भरके नए  भरके
खुशियाँ उँड़ेले आओ थोड़ा जी लें
@मीना गुलियानी 

दूर कहीं फिर मेरे होकर

आज तुम फिर से अजनबी बन जाओ
फिर से धीरे धीरे दिल में उतर जाओ

न पूछूँ गाँव तुम्हारा न पूछूँ  नाम तुम्हारा 
दोनों ही चुपचाप रहें आँखे ही करदे इशारा

 सागर का हो किनारा जहाँ थामा हाथ हमारा
चलें हम साथ साथ आये नज़र वही  नज़ारा

रेत के फिर महल बनाएं पलकों में सपने जगायें
चुपके चुपके चोरी से दिल की धड़कन बन जाएँ

सागर की लहरें जब हमसे करे अठखेलियाँ
तब हम भी किनारे  पे बैठे और ढूंढें सीपियाँ

रह जाएँ ये पल तब हमारे दिल में बसकर
जाना न मुझसे दूर कहीं फिर मेरे होकर
@मीना गुलियानी 

शनिवार, 4 नवंबर 2017

सारा जीवन गुज़ार लेती है

आज की नारी घर बाहर संभाल लेती है
हर मुश्किल का वो हल निकाल लेती है
दुखी होने पर  ग़म हँसी में टाल देती है
घर में शान्ति के लिए चुप्पी साध लेती है
बिन कहे सबके मन की जान लेती है
 मसरूफ़ियत में खुद को तलाश लेती है
खुद टूटने पर भी खुद को संभाल लेती है
 छटपटाहट को मुस्कुराहट में ढाल लेती है
अपनी भावनाओं को दिल में उतार लेती है
प्रेम की चाह में सारा जीवन गुज़ार लेती है
@मीना गुलियानी 

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

बाजी में जी छोटा न करते हैं

थोड़ा सुकूँ भी तुम ढूँढो इस जिंदगी में
ख्वाहिशें तो हम बेहिसाब करते हैं

खोये रहते हैं सब अपनी उलझनों में
चुप रहने वालों से उलझा न करते हैं

दिलों की महफ़िल में खामोशियाँ अच्छी हैं
मुहब्बत के क़रीनों में बेअदबी न करते हैं

चाहे तूफानी लहरें हों चाहे कितने पहरे हों
किश्ती खेने वाले हिम्मत हारा न करते हैं

जिन्दगी में कुछ खोना है कुछ पाना है
शतरंज की बाजी में जी छोटा न करते हैं
@मीना गुलियानी




साहिल पा जाती हूँ

तुम मेरी कल्पना में बसते हो
न जाने क्या मुझसे कहते हो

मैं जब कविता लिखती हूँ
तुम अपनी झलक दिखाते हो

कभी तुम सामने आते हो
कभी खुद को छिपाते हो

 जाने कैसा पावन रूप तुम्हारा
उज्ज्वल जैसे अंबर का तारा

सारा ज्ञान तुममें सिमट जाता
ऐसा प्रकाश पुंज तुमसे है आता

मैं खुद ही उसमें डूब जाती हूँ
लगता है साहिल पा जाती हूँ
@मीना गुलियानी