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बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

उसे भी जीने दो

मेरी बेटी अक्सर मुझसे सवाल करती है
हमें दूसरे घर में विदा क्यों करते हो
क्यों नहीं अपने ही आँगन में रहने देते
क्यों नहीं इसी आँगन के फूल को
इसी बगिया में ही खिलने देते
क्या दूँ मैं उत्तर इस प्रश्न का
कितने ही यत्न से सभी माँ बाप
बेटी को पाल पोसकर बड़ा करते हैं
कितना ममत्व देते हैं फिर भी
अपने कलेजे के उसी टुकड़े को
दिल पर पत्थर रख परायों को सौंप देते हैं
बेटियों को यही शिक्षा दी जाती है
दोनों घरों की लाज उसे ही रखनी है
घर में बेटा बेटी दोनों होते हैं
बेटे से माँ बाप को कोई अपेक्षा नहीं होती
बेटी सदैव उनके सुख दुःख में साथ निभाती है
बेटा तो अपनी शादी के बाद पराया हो जाता है
बेटी पराये घर जाकर भी इस घर की
चिंता में विलीन रहती है
माँ बाप की रग रग से वाकिफ होती है
दुःख की खबर पाते ही दौड़ी चली  आती है
बेटा पास होकर भी बेख़बर होता है
उसका ध्यान कहीं और बँटा होता है
बेटी को पराया धन मत समझो
उसे भी खूब प्यार दुलार दो शिक्षा दो ,संबल दो
ताकि समय आने पर वो
 अपने परिवार का ध्यान रख सके
उसे बोझ न समझो स्वावलम्बी बनाओ
खुली हवा में सांस लेने दो उसे भी जीने दो
@मीना गुलियानी


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