दिलाना प्रभु सदा मुझे सत्सग
बार बार यही वर मांगू कृपा करो श्री रंग
प्रेम भक्ति उपजे सत्सग से लगे तुम्हारा रंग
शील संतोष दया उपजे दिल में हृदय होत उमंग
विवेक वैराग उपजे सतसंग से जग से होत असंग
ब्र्ह्मज्ञान होवे सतसंग द्वैत मति होए भंग
जीव पलटकर ब्र्ह्म होत है जैसे पलटे भृंग
जीवन मुक्त हुए सतसंग से विचरे हुए निसंग
सतसंग से परमपद पावे फिर नहीं होवे भंग
गुरुकृपा से मिले पदार्थ, सतसंग के प्रसंग
@मीना गुलियानी
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