सतगुरु ने चुनरी रंगी, खूब रंगी झकझोर
ओढ़ के मंन नाचन लगा, ज्यों नाचे बन मोर!
सतगुरु कृपा कीजिये, कभी ना भूलूँ तोहि
कृपाकर सुध लीजिये, मन भरमावे मोहि।
कृपासिंधु इस जगत में, तुम ही खेवनहार
बाँह पकड़ तुम ले चलो, सागर के उस पार!
जो भावे सतगुरु को, वैसा ही हो जाए
नाम खुमारी उतरे ना, दिन-प्रतिदिन बढ़ जाए।
सबकुछ दीन्हा आपने, कैसे करूँ बखान
सतगुरु तुम्हरी प्रीत पर, मैं जाऊँ क़ुर्बान।
सतगुरुजी सचखण्ड की, डोर तुम्हारे हाथ
सर पर जिसके हाथ है, सब जग उसके साथ।
मंन मोरा जोगी भया, भाग गया संताप
ज्यों-ज्यों डूबा नाम में, मंन में हुआ प्रकास।
ढाई आखर प्रेम का, लिया पीव का नाम
ओढ़ी चूनर पींव की, चली सतगुरु के धाम।
मन में बंसी बज रही, तुम मेरे चितचोर
गुरूजी तुम ना भूलना, सौंपी तुमको डोर।
तुम बिन कोई ना मीत है, संग सखा ना कोई
दिल की धड़कन की गति, नाम जपे सोँ होई।
पल-पल जिह्वा नाम ले, कर दो कृपा हे नाथ
मुझसे मूढ़ अज्ञानी के, तुम ही दीनानाथ।
जब से आया जगत में, सब कुछ भूला नाथ
कर्म ना अच्छे कर सका, कृपा करो तुम नाथ।
आशा तृष्णा मेट दो, मेटो कर्म के लेख
सतगुरु तुमरी शरण ली, मेटो जन्मो के लेख।
लख चौरासी फंद से, सतगुरु लीजे बचाये
जो सतगुरु का नाम ले, पुनः जन्म ना पाये।
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