यह ब्लॉग खोजें

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

सतगुरु की दोहावलि-02 (Satguru ki Dohawali-02)

सत गुरू तुमरि ओट ली, दूसरा और  ना  कोई 
तुझको  डोरी  सौंप दी, तुध  भावे सो होई

तुध  बिन  कौन दयाल है , विपद् हरे  जो  मोर 
करुणाकर  करुणा  करो, करो  न ह्रदय  कठोर 

 तुम  ही 'दीनानाथ  हो, समर्थ तुम  गोसांई  
मात -पिता  और भ्रात  हो, तुमसा दूजा  नाहीं 

ढूंढा  सारा  जग यहाँ ,  तुमसा  देखा नाही 
पल   में  दुखड़े  सब हरे, विपद कटे  पल  माहीं 

सतगुरु आप  सम्भाल  लो,  पलक  न झपके   मोरी 
स्वास -स्वांस तेरा  नाम  लूं,  थमे  ना माला डोरी 

सूरज  डूबा  साँझ  ढली, हो गई आधी रात 
गुरु से बिछुरत जीव की, ना होवे प्रभात। 

दिल में बसाई मूर्ति, निरखत हु दिन-रैन 
जपे बिन कल ना परत, तरपत हु बिन बैन। 

सतगुरु जी इस जीव की, लाज तुम्हारे  हाथ 
हाथ दे रक्षा करो, तुम बिन हुए अनाथ। 

दीनबन्धु इस जगत में, सबकुछ मिथ्या लागे 
काम ना आवे मित्र जन, जान छुड़ा कर भागे। 

इतनी शक्ति  दीजिये, कर्म करूँ जग माहि 
याद राखु तेरे नाम को, पल भी बिसरू नाही। 

संग सखा सब तज गए, माया का था जाल 
सतगुरु ने कृपा करी, हुआ मैं मालो-माल। 

नाम दान दिया आपने, सतगुरु  के कुर्बान
तुझ पर सब मैं वार दूँ, तन-मन और प्राण। 

गुरु बिन और ना ठोर है, किस दर जावे कोई 
यही सच्चा मीत है, अंत सहाई होई। 

वचन है पक्का साई का, वो मिथ्या ना होई 
जो भी जपे इस नाम को, तर जावे है सोई। 

नाम का चोला रंग दिया, अब तो उतरत नाही 
ज्यों-ज्यों धोवे पक्का रंग, होवत है मंन माही 

__________________________________**********_________________________________






कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें