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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

सतगुरु दोहावलिः -०३ (Satguru Dohawali-03)

सतगुरु  खेवनहार को, सौंप दी है पतवार 
चाहे उबारो तुम मुझे, या डुबाओ बीच मंझधार। 

तुम ही  खेवनहार हो, तो मन में क्या सोच 
आप ही सुध लेवोगे लेवोगे, फिर काहें की लोच। 

तुम ही आदि और अंत हो, कोई तुमसा नाही 
पीर परायी जो जाने, ऐसा तुझ बिन नाही। 

विपद सुने दया दृष्टि करे, ऐसा गुरु बिन कौन 
बिन कहे ही पीर पछाणै, वाणी हो गयी मौन। 

सतगुरु तुम जब मिल गए, तो सब मिला अनन्त 
लोचन अनन्त उघाड्या, फिर दिखा दिया अनन्त। 

कागल हंस बनावते, ऐसा बोलो कौन 
मैं बोलूं या चुप रहूँ, बिन सतगुरु के कौन। 

बिन बोले सब बाँच ले, हर ले सबकी पीर 
उसके दर पे सब झुके, क्या राजा क्या फ़क़ीर। 

बाबा तुम दातार हो, दोनों हाथ से दो 
कर दो ऐसी कृपा, फिर कभी जन्म ना हो। 

जन्म फिर यदि कभी हो, पाऊँ तुम्हारा साथ 
तुम्ही दिखाओ रास्ता, तुम्ही निभाओ साथ। 

दुर्लभ मानुष देहि ये, मिले ना बारम्बार 
जो श्रद्धा से भजे उन्हें, करदें भव से पार। 

चाहूँ भक्ति प्रेम और, चरण कमल से नेह 
गुरुवर तुम्हरे स्नेह का, रहे बरसता मेह। 

तुम ही मेरी आन हो,  तुम ही मेरी शान 
मैं हूँ रचना आपकी, तुम हो गुण की खान। 

ब्रह्म जीव से भिन्न नहीं, केवल मति को भेद
जब गुरु से दृष्टि मिले, मिट जाए हर भेद। 

नाद से ब्रह्म ऊपजे, नाद ब्रह्म का रूप 
नाम सुरत के ठहरते, दिखे वो रूप अनूप। 

सुर से ये संसार है, सतगुरु हैं सरताज 
हर बेसुर सुर को, देते हैं  आवाज़। 

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