गुरु जी को वन्दना करुँ, करो नमन स्वीकार
दीज्यो बुद्धि विवेक , यही मांगू बारम्बार
गुरूजी दीप पतंगा मैं , धावत हूँ चहुँ ओर
जैसे पंछी जहाज को, सूझत और न ठौर
सूझत न बूझत मोहे, करो प्रेम प्रकास
ह्रदय चुभा जो तीर वो , आप निकालो फांस
सतगुरु डूबत जात हूँ , आन बचा लो म्हारी
भली बुरी जैसी भी हूँ ,हूँ पर दासी तिहारी
शरणागत हूँ आपकी , सतगुरु लीजे उबार
हाथ पकड़कर खींच लो, डूबत हूँ मंझधार
तुम ही खेवनहार हो , किससे करू पुकार
दीनो के दातार हो , विनती सुनो इक बार
तुम्हे पुकारूँ नाथ मै , तुम ही हो आधार
बेग मेरी सुध लीजिये, टूटे न सांस की तार
मन की वीणा बज रही ,छेड़ रही मृदु तान
रे मन अब तू जाग जा, क्यों सोया लम्बी तान।
सतगुरु ने कृपा करी, नाम की नौका बनाए
कृपा करके हाथ दे, नाव पे लिया चढ़ाए ।
खेवनहार हैं सतगुरु, उनसा और ना कोई
मेटे कर्म के लेख सब, अंत सहाय होई।
हाथ जोड़ विनती करूँ, सुन लो दीनदयाल
बाँह पकड़ कर कीजिये, मेरी तुम प्रतिपाल।
बेबस और लाचार हूँ, फिरता हूँ चहुँऔर
राह पे मुझको लाइए, भटकत है मन मोर।
बाबा तुमसा दाता नाहीं, ढूँढा है जग माही
कृपा करो अकिंचन पे, मुझसा पापी नाहीं।
बाबा नज़रें करम की, मुझपे डालो आज
शरणागत की राख लो, बाबाजी तुम लाज।
मेरा तुम बिन कौन है, तुमरे मम सम बीस
बाबा तुम्हरी ओट ली, तुम ही मेरे ईश।
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