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शनिवार, 4 अप्रैल 2015

सतगुरु दोहावलि-०५, (Satguru Dohawali-05)



तुम्हरे हाथों सौप दी , अब तो अपनी  डोर 
पार करो भव से  मुझे , भ्रमत हूँ चहुँ ओर  

दया दृष्टि से  देखिये , खड़ी  हूँ  हाथ पसार 
कृपा  करदो नाथ  तुम , डूबत  हूँ मँझधार 

काम ,क्रोध  की बाढ़  में , टूटे  न  बाबा  बांध 
हाथ दे रक्षा करो , कभी न आवे  आँच 

सिर पर तेरा हाथ तो, दुनिया से डर नाही 
तुमपे मुझको नाज़ है आन बसो मन माही

मेला जग का घड़ी भर , क्यों न भजे रे मीत 
भज ले प्यारा नाम तू,विसरे न मन का मीत 

बाबा आन छुड़ाए लो, फँसा हुआ मंझधार 
पतवारों को थाम लो, तुम्ही हो खेवनहार। 

बाबा कोई और ना, तुध बिन दूजा कोई 
तेरी रज़ा में राज़ी हम, जो तुध भावे होई। 

भला-बुरा क्या नाम दे, तू जाने करतार 
घट-घट में तू बस रहा, तू ही पालनहार। 

बाबा मुझको बक्श दो, मैं हूँ मूढ अंजान  
कोटि किये अपराध जब, रखा ना कुछ भी ध्यान। 

सतगुरु दीनानाथ जी, बिनती सुनलो आज 
शरण तुम्हारी आ गया, दाता रख लो लाज। 

मैं तो मतिहीन दीन हूँ, कृपा करो गुरुदेव 
निशदिन करूँ मैं चाकरी, राखो चरणों में देव। 

मूढ़ मति भ्रम जाल में, फँसा हुआ चहुंओर 
कृपा करो हे दीनानाथ, सूझे नाही ठोर। 

अब तो मुझे संभालिये, बहुत बिगाड़े काज 
अब तो शरणागत के, तुम्ही संवारों काज। 

तुमरी कृपा की ओंट ली, अब तो दीनानाथ 
शरण तुम्हारी आ गया, छूंट गया सब साथ। 

तुम बिन मेरा कौन है, किसे पुकारूँ आज 
मंन मोरा भया बावँरा, सुध लीजे महाराज।  

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