चारों दिशाएं मौन है, गूँजे बस पदचाप
दिल पर मेरे गुरुवर, छोड़ गए जो छाप
मन वीणा के तारों को, झंकृत करे अब कौन
तुम तो निद्रालीन हो, तुम्हे जगावे कौन
फिरत फिरत हूँ आयो, परया तुम शरणाई
मेरी तुमसे विनती, न देना बिसराई
गुरुवर दीनदयाल है, तुमसा नाही और
तुम सम हम दीनन की, और न कोई ठौर
तुमसे ही है विनती, तुम ही करो उपकार ,
भले बुरे जैसे भी है, तुम हे करो सम्भार
दाता तुम सा कौन है, इस जग में कोई और
डोरी तुमको सौंप दी, ले जाओ जिस ओर
पल में कृपा करत हो, तुरंत बंधावो धीर
तुम सम दाता कौन है, सुने निर्बल की पीर
बाबा मेरी इस विपद् में, आन बचावो आप
तुम बिन बाबा कौन हे, जो दे मेरा साथ
कान्हा ने विनती सुनी, तुरंत बढ़ायो चीर
बाबा सुनलो अर्ज तुम, आके बँधावो धीर
बाबा ने इस जगत में सदा निभाया साथ
मेरे तो इस जगत में, तुम्हीं एक रघुनाथ
तुम पर पूरी आस्था, तुम्ही निभाना साथ
बाबा कृपा तुम करना, टूटे न विश्वास
नाम को तेरे लेते ही, पूर्ण हों सब काम
इस चंचल मन को मेरे, कभी नहीं विश्राम
मन तो भमत है जगत में, दिल भटकावे मोहे
ऎसी कृपा अब कीजिये, अनहोनी न होवे
मोहनिद्रा में लीन हम, माया बजावे बीन
गुरूजी ने कृपा करी, तुरन्त ली निद्रा छीन।
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