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रविवार, 5 अप्रैल 2015

सतगुरु दोहावलि-०7, (Satguru Dohawali-07)



काल नगाड़ा बज रहा , क्या समझावे तोहे
करले भजन  अब हरि का, फिर आवन न होये। 

सांसो की माला न टूटे कहीं, जपले प्रभु का नाम
इस जीवन में फिर तू, पा  लेना  विश्राम। 

मुक्त गगन में जो तू, उड़ना चाहे आज
रट्ले उसका नाम तू उस पर कर विश्वास। 

निश्चय प्रेम प्रतीति से, विनय करे  जो आज
उसके कारज सकल सिद्ध करें पूर्ण महाराज। 

प्रेम भ क्ति  मुझे दीजिये, हे प्रभु दयानिधान
अपनी शरण में लीजिये हो  जावे कल्याण। 

हर बाधा हर लीजिये विनती सुनो धर ध्यान
बाबा तेरा  नाम हम लेते है, निष्काम। 

मैं तो प्यासी  दर्श की, आन बूझावो प्यास
अखियाँ  भरी  है  नीर से, बरसों की है आस। 

दे दो छींटा ज्ञान का, कभी न हो अभिमान
बाबा तेरे ध्यान में, तजूँ मैं अपने प्राण। 

ऐसी कृपा कीजिये कबहुँ न बिछुरन होए
जब भी तुझको याद करू, दर्श  तिहारो होए। 

ह्रदय में बैठे यूँ ही बिसरूं न दिन -रात
बाबा तेरे सुमिरन में, बीते यूं दिन -रात। 

बाबा तुम बिन ह्रदय से बाजे न संगीत
वीणा तुम बिन मौन है, निकसे कैसे गीत। 

 जल बिन प्यासी मीन, ज्यो चकवी बिना चकोर
ऐसे तेरे दर्श बिन, मनवा व्याकुल मोर। 

कबसे तुम्हें पुकारती, आ जावो महाराज
आँखे भी पथरा गईं, दर्शन देवो आज। 

बाट निहारूँ आपकी, जाने कब तुम आओगे
भीलनी जैसे मुझसे भी, जूठे बेर कब खाओगे। 

नाथ मैं डूबत जात हूँ, पार मुझे कर दीजिये
दुनिया के  भवजाल से, मुक्त मुझे कर दीजिये। 


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