करुणाकर इस दीन की, लाज अब रख लीजिए
दयासिन्धु विपद में, साथ अपना दीजिये
भय भंजना इस दींन की, वन्दना सुन लीजिये
जगत के इस त्रास से, अब मुक्त हमको कीजिये
काटो जम की त्रास तुम, भय का करदो नाश
जैसे माँ के गर्भ में, रक्षा की थी नाथ
हम तो बाल अबोध हैं, क्षमा करो हे नाथ
पल-पल हम पर मेहर की, नज़र करो हे नाथ
भूलें मेरी माफ कर दो, बाबा इतना तो इंसाफ कर दो
बच्चों को माता गले लगाती, उक्ति को चरितार्थ कर दो
धन, दारा, सम्पति सकल, नहीं निभाय साथ
जपले केवल नाम तू, बाबा होवें साथ
बाबा दीनदयाल हैं, सिमरन कर दिन रैन
जैसे जल बिन मीन को, आवत नाही चैन
चातक प्यासा नीर का, टेर लगावे आज
वैसे घन बरसो प्रभु, प्यास बुझावो आज
दृगजल छलकत जात है, कोई न पूछे बात
तुम बिन ऐसा कौन जो, सदा निभाय साथ
सतगुरु दीनदयाल हैं, आपे करें सम्भाल
भ्रमवश डूबे कूप सो, सतगुरु दियो निकाल
खुद ही बंधन खोल दें, जिस पर मेहर करें
खुद ही उसको बक्श दें, जिस पर नज़र करें
माया भूल भुलैया में, क्यों डोले तू दीन
अब तो चेत रे हे मना, क्यों आयी तोहे नींद
कबसे पंथ निहारूँ मैं, दर्शन दो महाराज
अपने सेवक के बिगड़े, काज सवारों आज
तुमही मेरी मात हो, पिता तुम्हीं हो नाथ
मेरे तो इस जगत में, तुम्हीं एक रघुनाथ
कोई न दुखिया लौटा है, बाबा खाली हाथ
बलिहारी गुरु आपकी, सदा निभाया साथ
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