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रविवार, 12 जून 2016

तेरी परछाई

कभी कभी जब मेरे ज़हन में 
तेरा नक्श उभरता है तब 
मैने चाहा कि तुम मेरे पास होती 
तो कितना अच्छा होता 
सुलगते धुएँ की आँच की तरह 
सवाल उठे है मेरे ज़हन में 
याद आती है मुझे वो शाम 
जब तुम दीवार से सटी हुई थी 
और चाँदनी में पिघलकर 
तेरी परछाई दीवार पर उतर आई थी 
लगता है अभी तक वो 
परछाई वहीं पसरी हुई है 
तूने मेरे कानो में कुछ कहा  था 
कल हम यही पर मिलेंगे 
जहाँ हमने देर तक बातें की थी 
मै आज भी  वहीं अंधियारे में 
तेरी ही तलाश में वहीं बैठा हूँ 
@मीना गुलियानी 


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