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मंगलवार, 8 मार्च 2016

कैसे मै धीर बंधाऊँ


सखी री कैसे मै धीर बंधाऊँ
कैसे अपनी हर उलझन को
मन ही मन सुलझाऊँ

                  कैसे हरलूँ हर वो पीड़ा
                  दिल को जिससे दर्द मिला
                 टीस उठी जो सीने में तो
                कैसे मेरा खून जला
                 सखी री कैसे मै मुस्काऊँ

मेघ उमड़ आते है जब भी
रोता क्यों दिल आज मेरा
याद आई वो बरसातें फिर
सावन सूखा आज मेरा
सखी री  क्यों मै नीर बहाऊँ

              धरती अंबर आज तलक भी
               क्यों नही मिल पाते है
               दरम्याँ के फांसले भी
               क्यों नहीं मिट पाते है
               सखी री मन ही मन अकुलाऊँ


@मीना गुलियानी 

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